Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
انا الحق سے پہلے کیا ہوا؟ منصور حلاج کا پراسرار باطنی سفر | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- हुसैन बिन मंसूर उल हल्लाज के दीवान के इस इल्मी मुताले में उनके अफकार को उन्हीं के अल्फाज की रोशनी में तरतीब के साथ देखने की कोशिश की गई है।
- हल्लाज के कलाम में यह शूर मिलता है कि जुस्तजू की इब्तदा किसी बैरूनी मुहरिक से नहीं बल्कि इंसान के अपने ही अंदर गूंजती हुई एक सदा से होती है।
- हल्लाज के नजदीक हकीकत मुतलक का इंकशाफ कोई मीठा तजुर्बा नहीं बल्कि एक शदीद वजूदी जलजला है जो इंसान की पूरी शनाख्त को ढाकर रख देता है।

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Transcript
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मंसूर हल्लाश तसव्वफ का वो नाम जिसके गिर्द सदियों से सवालात भी गर्दिश करते रहे हैं और मुख्तलिफ ताबीरात भी जन्म लेती रही हैं। मगर इन सबके दरमियान एक बुनियादी सवाल आज भी कायम है। क्या हमने उनके अपने कलाम को उसी गहराई में सुना है जैसा वह खुद इसे बयान करते हैं। हम अक्सर यह समझते हैं कि उनके मकतल का सफर अनल हक जैसे बड़े
दावों से शुरू हुआ। लेकिन क्या यह मुमकिन है कि उस अंजाम की बुनियाद बहुत पहले एक सादा सी सदा लब्बैक में रख दी गई हो? इसी सवाल को सामने रखते हुए आज से हम हुसैन बिन मंसूर उल हल्लाज के दीवान का एक इल्मी मुताला शुरू कर रहे हैं। जहां हम उनके अफकार को उन्हीं के अल्फाज़ की रोशनी में एक तरतीब के साथ देखने की कोशिश करेंगे।
आइए हल्लाज की पहली सदा के साथ बंदगी के उस पहलू का मुशाहदा करते हैं जो बजाहिर सादा है मगर अपने पीछे एक मुकम्मल फिक्री बुनियाद रखता है। ये जो दीवान हल्लाज का मुताला है यह महज कुछ अशार की तशरी नहीं है। हल्लाज के नजदीक ये कलाम दरअसल एक अंदरूनी बेदारी का नक्शा पेश करता है। हम यानी यह कोई ऐसा सफर नहीं है जिसमें इंसान बस एक मादी मकाम से दूसरे मादी मकाम तक का
फासला तय करे। यह इल्म जाहिर से इल्म बातिन की तरफ एक इंतहाई गहरा और बाजकात बेचैन कर देने वाला फिक्री सफर है। अगर हलाज के अफकार पर हम गौर करें तो महसूस होता है कि वह उस रिवायती फ्रेमवर्क को यक्सर तोड़ रहे हैं। रिवायती फ्रेमवर्क से आपकी मुराद खालिक और मखलूक का फासला है। जी हां, वो फासला जो पुकारने वाले और जिसको पुकारा जा रहा है उनके दरमियान फर्ज कर लिया जाता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके नजदीक यह सफर बाहर की दुनिया को जानने का नहीं
बल्कि अपने ही बातिन में मौजूद हकीकत को तजुर्बा करने का है। जिसे आमतौर पर अकायद या मंतिक की बेड़ियों में जकड़ कर पेश किया जाता है। सही। हल्लाज के कलाम में यह शूर मिलता है कि जुस्तजू की इब्तदा किसी बैरूनी मुहरिक से नहीं बल्कि इंसान के अपने ही अंदर गूंजती हुई एक सदा से होती है। देखिए आम जिंदगी में अगर हम लुगत के ऐतबार से देखें तो लफ्ज लबक का मफूम बहुत वाज़ है।
जी मैं हाजिर हूं। हां। इसका मतलब है मैं हाजिर हूं। और यह हमेशा किसी बैरूनी पुकार के जवाब में अदा किया जाता है। जैसे कोई हाकिम अपने महकूम को आवाज दे और महकूम जवाबन लब्बक कहे। बिल्कुल एक बैरूनी सिमत होती है। तो यहां हल्लाज के कलाम के बिल्कुल आगाज में ही यह तसवुर बदलता हुआ क्यों महसूस होता है? ऐसा लगता है जैसे उनका लब्बक किसी बैरूनी सिमत की तरफ नहीं बल्कि किसी
और ही जहद में देख रहा है। यह क्या माजरा है? यही वो मकाम है जहां से हल्लाज के तसवुर हकीकत में बाकायदा हैरत का आगाज होता है। हल्ला जब इस कलाम का आगाज करते हैं ना तो उनके अल्फाज़ बहुत चौका देने वाले हैं। वह कहते हैं लब का लब्ब का या सिर वंजुवाई यानी लबक ऐ मेरे राज और मेरी सरगोशी जी हां अब जरा गौर कीजिए कि यहां पुकारा
किसे जा रहा है सिर यानी इंसान का अपना गहरा तरीन बाततिन और नजवा यानी वो खामोश सरगोशी जो इंसान अपने ही वजूद के अंदर महसूस करता है। हम तो पुकारने वाला और जिसे पुकारा जा रहा है वो एक हो रहे हैं। बिल्कुल हल्लाज के नजदीक इस मुकाम पर इन दोनों के दरमियान जो दुई या फासला है वह मिटता हुआ महसूस होता
है। यह कोई ऐसी पुकार नहीं जो आसमानों से नाजिल होकर मादी कानों में पड़ रही हो बल्कि यह इंसान की अपनी गुमनाम गहराइयों से उठने वाली सदा है। इसी कलाम का एक और बहुत अहम मिश्रा इस गु्थी को मजीद खोलता है। हल्ला कहते हैं अधू का बल अंत तदूनी इलाई मतलब क्या मैं तुझे पुकारता हूं या तू ही मुझे अपनी तरफ पुकार रहा है?
बिल्कुल हल्ला के यहां यह वाज़ इशारा मिलता है कि तलब और मतलूब दोनों एक ही मरकज पर आकर मिल जाते हैं। सही लेकिन आम जिंदगी की बंदगी में तो ऐसा है जैसे कोई बाहर से दरवाजा खटखटाए और हम अंदर से जवाब दें। सही। लेकिन हल्लाज के कलाम में जो नक्शा खींचा गया है ऐसा महसूस होता है जैसे कोई शख्स फोन उठाए हेलो कहे और अचानक देखे कि
दूसरी तरफ से जो आवाज आ रही है वो किसी और की नहीं बल्कि उसकी अपनी ही आवाज की गूंज है। बहुत खूब हम तो क्या हल्लाज के नजदीक जाहिरी बंदगी और बातनी हकीकत के दरमियान लकीर इसी मकाम पर आकर धुंधली पड़ जाती है? देखिए यह तमसील एक हद तक तो सुरते हाल की अकासी करती है। लेकिन अगर हम हल्लाज के फलसफे की गहराई में जाएं तो मामला उससे भी ज्यादा पेचीदा है। वो कैसे?
फोन वाली तमसील में कम से कम एक तार, एक राबता और दो सिरे तो मौजूद रहते हैं ना। चाहे आवाज एक ही हो। हल्लाज के हां बेदारी का पहला कदम ही इन दो सुरों के वहम का टूटना है। जब तक इंसान यह समझता है कि तालिब अलग है और मतलूब कहीं दूर है तब तक वह फासले के सराब में कैद है। हल्ला के नजदीक जिस लम्हे इंसान पर यह इंकशाफ होता है कि पुकार तो अंदर से है। वह महज जानने के दायरे से निकल आता है।
यानी वह अकीदे से तजुर्बे की तरफ आ जाता है। बिल्कुल वो इसे बराहेरा तजुर्बा करने लगता है। यह महज अपनी आवाज की गूंज सुनना नहीं है बल्कि यह जान लेना है कि वह हस्ती जिसकी वह बाहर तलाश कर रहा था उसके अपने वजूद में पोशीदा थी। यही वजह है कि जब यह लकीर महदूम होती है तो इंसान का असल रिश्ता उस सरगोशी से जुड़ जाता है जो उसके बाततिन में जारी है। लेकिन अगर मंजिल बाततिन में है तो औजार
कौन से इस्तेमाल होंगे? क्योंकि हम तो दुनिया को इर्द-गिर्द के माहौल को हमेशा अक्ल और हवास से ही समझते हैं। सही। हमारी पूरी तहजीब, हमारे उलूम, मंतिक सब इसी जाहिरी इल्म पर खड़े हैं। अगर सफर बाततिन का है तो जाहिर है यह जाहिरी औजार नाकाम होंगे। जी। मगर तजाद यह है कि हल्लाज यह सब समझाने के लिए जो जबरदस्त शायरी कर रहे हैं, वो खुद
भी तो अक्ल और जबान की पैदावार है। क्या हल्ला यहां इंसानी अक्ल को मुकम्मल तौर पर मुस्तरद कर रहे हैं? इस मकाम पर हल्लाज के कलाम में इल्म की दर्जाबंदी का एक बहुत दकी तसवुर सामने आता है। हल्लाज अकल को सिरे से बातिल नहीं कर रहे हैं। बल्कि वो उसकी हुदूद का ताुन कर रहे हैं। इनके कलाम में मिलता है व इल्म इल्मानी मनबूजुन व मु्तसब यानी इल्म की दो
किस्में हैं। एक हासिल किया हुआ और एक तर्क कर दिया जाने वाला। अब यहां यह समझना जरूरी है कि हल्लाज के नजदीक यह हासिल करदा जाहरी इल्म रुकावट क्यों बनता है। क्यों बनता है रुकावट? मसला यह है कि इंसानी अक्ल हमेशा चीजों को हदबंदियों और तजादात में समझती है। अक्ल को काम करने के लिए फासला और पैमाना चाहिए। लेकिन हकीकत मुतलक की तो कोई हद नहीं ना। हम इसका कोई पैमाना नहीं हो सकता। इसलिए
हल्लाज के यहां इल्म मनबूस का तसवुर चीजों को भूल जाना नहीं है। बल्कि यह इंसानी अक्ल से उसका वो गुरूर छीन लेने का नाम है जिसके तहत वो समझती है कि वो हर शय का एहाता कर सकती है। अच्छा यानी अक्ल का दायरा महदूद है। जी और हलाज इस बातनी तजुर्बे में हवासे खमसा की सरी नफी करते हैं। वह फरमाते हैं खुद तू बहरन वम यस सब ही कदमी मैं एक ऐसे समंदर में उतरा जिसमें मेरे कदम नहीं डूबे
हम और फिर फरमाते हैं शबन माही रिया बगैर फम मैंने उसका पानी पिया मगर बिना मुंह के तो इसका मतलब है बातिनी हकीकत मादी हवास के दायरे से बाहर है क्या इसको हम यूं समझ सकते हैं जैसे कोई शख्स बुखार नापने वाले थर्मामीटर से दो शहरों का फासला नापे जी अच्छी मिसाल है यानी थर्मामीटर या इंसानी अकल बुरी चीज
नहीं दुनियावी मामलात में कारामद है। लेकिन बातनी हकीकत को नापने के लिए महज एक गलत औजार है। यह तमसील अक्ल की महदूदियत को तो जाहिर करती है। लेकिन हल्लाज के नजदीक मामला महज गलत औजार से कहीं ज्यादा खतरनाक है। खतरनाक कैसे? अगर हम बातनी सफर में अकल के इस्तेमाल की बात करें तो हल्लाज के अफकार की रोशनी में यह ऐसा है जैसे कोई समुंदर
की गहराई में सांस लेने के लिए खुर्दबीन यानी माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल करे। खुर्दबीन बेहतरीन औज़ है। लेकिन पानी के अंदर यह बेकार ही नहीं बल्कि इंसान को डुबो देगी। अकलो हवास इंसान को इस फरेब में मुब्तला कर देते हैं कि वह हकीकत का इदराक कर रहे हैं। हम वो एक शराब बनाते हैं। बिल्कुल। हल्लाज का कलाम कारी को खबरदार करता है कि इस बातनी समंदर में मादी कदम
काम नहीं आते बोझ बन जाते हैं। जब तक इंसान इन अकली सहारों को तर्क नहीं करता वो बिना मुंह के सिराब नहीं हो सकता। यानी वो बहरे फिक्र में नहीं उतर सकता। जी इसी नफी के बाद इंसान इस दुनिया में कदम रखता है जिसे हल्लाज बहरे फिक्र या सोच का समंदर करार देते हैं। तो जब अकल के साहिल छूट जाते हैं और इंसान इस बहरे फिक्र में उतरता है तो यह मंजर कशी हल्लाज के यहां बहुत हैरानक और मैं
कहूंगी किसी हद तक खौफनाक महसूस होती है। आमतौर पर तो हम रूहानियत को एक बहुत पुरसुकून राहत बख्श तजुर्ब के तौर पर सुनते आए हैं। जैसे आंखें बंद करके एक दायमी सुकून में चले जाना। लेकिन हल्ला यहां दिल को एक ऐसे परिंदे से तजबीह दे रहे हैं जो बुरी तरह घबराया हुआ है। हम एक वैहशतजदा परिंदा जी। वो कहते हैं कि यह परिंदा पंजों में
लटका हुआ है। यह सफर इतना पुरार, इतना बेचैन करने वाला और हैबत ना क्यों महसूस होता है? क्या रूहानियत में सुकून नहीं होना चाहिए? यह सवाल तसव्वफ और हल्लाज की फिक्री सफर को समझने के लिए बहुत गीली दी है। रूहानियत को महज एक सुकून आवर दवा समझ लेना हल्लाज के फलसफे के बिल्कुल बरक्स है। अच्छा हल्लाज के नजदीक हकीकत मुतलक का इंकशाफ कोई मीठा तजुर्बा नहीं बल्कि यह एक ऐसा
शदीद वजूदी जलजला है जो इंसान की पूरी शनाख्त को ढाकर रख देता है। जब हल्लाज उस समंदर का जिक्र करते हैं तो उनके अल्फाज़ हैं बहर फिक्री तजरीब ही फी लजिन लताफ़ कुदरत कादर। यानी यह फिक्र का वो समंदर है जिसमें कादरे मुतलक की कुदरत के लताइय बहते हैं। हम जब इंसान जिसने जिंदगी भर खुद को एक महदूद जिस्म समझा था उस लामहदूद समंदर में गिरता
है तो हल्लाज दिल को महज परिंदा नहीं कहते। वो कहते हैं तारुन मुल्लकुन फी मखलब एक परिंदा जो पंजों में जकड़ा और लटका हुआ है बिल्कुल और उसकी कैफियत क्या है मुद्लान हैरान मुस्ताहिश या रब कुफिन इला आखिर एक ऐसा परिंदा जो खौफजदा है हैरान है और एक वीराने से दूसरे वीराने की तरफ भाग रहा है हम यह हैबत क्यों है
यह हैबत इसलिए है कि जिस पिंजरे को वह परिंदा अपनी पूरी कायनात समझता था ना यानी उसकी अक्ल उसकी अना वह टूट चुका है। अब सामने एक लामहदूद वीराना और बेकरा समुंदर है। तो यहां आकर फलसफा और मंतक खत्म हो जाते हैं। जी तमाम इमारतें जमीन बोस हो जाती हैं और सिर्फ एक लरजा देने वाली हैरानी बाकी रहती है। बंदगी का यह तस्सवुर एक ऐसी आग में
कूदने के मुतरादिफ है जो जाहिरी शनाख्त को जला देती है। और यही वो कर्ब है जो इस वारदात को हैबतनाक बनाता है। जी हां। सही। यह बिल्कुल ऐसा महसूस होता है जैसे कोई इंसान रात के वक्त एक बहुत ताकतवर दूरबीन से खला की तारीख और लामहदूद वसतों को देखे। जब वह इन अरबों कहकशाओं की बेकरार हुसत को देखता है, तो वह सुकून
महसूस नहीं करता बल्कि एक शदीद वहशत का शिकार हो जाता है। क्योंकि उसे पहली बार अपनी दुनिया की बेवकारत का एहसास होता है। क्या हल्लाज के कलाम में यह परिंदा इसीलिए भटक रहा है कि इसके अंदर का समंदर उसे अपनी जात की बेवकारत का एहसास दिला रहा है। आपने इस कायनाती वैशत की जो तमसील दी है वो वाकई हल्लाज के तसवुर हैरत के बहुत करीब है। बस फर्क यह है कि खला की वसतें
बाहर हैं और हल्लाज का बहरे फिक्र अंदर है। जब इंसान अपनी जात के अंदर इस लामहदूद हकीकत का सामना करता है तो वजूद की बुनियादें हिल जाती हैं। अना के हिसार का तहफुज शराब साबित होता है। सही। इसीलिए हल्लाज के कलाम में एक मिश्रा है कसरतुल वहमी लिमन वहमू यानी वहम करने वाले के वहम की तेजी की तरह। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इंसानी अक्ल जिस तेजी से दफा के लिए जाल बनती है, हकीकत का समंदर उतनी ही तेजी से
वो जाल तोड़ देता है। सही। यह सब सुनकर मुझे लग रहा है कि हमने हमेशा हल्लाज को बस उनके आखिरी अंजाम या उस अनल हग के नारे से ही पहचाना है। हमने उस फिक्री तूफान और उस दर्द को तो नजरअंदाज ही कर दिया जो उन्हें वहां तक लाया था। आज के इस मुताले में हमने जो देखा वो यह है कि हल्लाज का यह सफर किसी बागियाना दावे से नहीं बल्कि अपने ही अंदर