Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Agar Allah Har Jagah Hai, To Nazar Kyun Nahi Aata? | Ibn Arabi Ka Jawab | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- शेख-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के नजदीक अल्लाह इसलिए पोशीदा नहीं है कि वो बहुत दूर है बल्कि शिद्दत ज़हूर की वजह से निगाहों से ओझल हो जाता है।
- शेख-ए-अकबर के मुताबिक कायनात खुद अपने ऊपर एक पर्दा है क्योंकि यह कसरत और रंगों में उलझ जाती है और अपने खालिक को नहीं देखती।
- शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि हकीकत का असल इदराक जाहिर की आंख से नहीं बल्कि कल्ब यानी दिल की वसत से होता है।

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Transcript
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हम बचपन से सुनते आए हैं कि अल्लाह ताला हमसे बहुत करीब है। वो हमारी शहरक से भी ज्यादा करीब है। वो हर लम्हा हमारे साथ है। वो हर चीज का इहाता किए हुए हैं। मगर अगर ऐसा है अगर अल्लाह इतना करीब है तो नजर क्यों नहीं आता? क्या वह हमसे पोशीदा है? क्या हमारे और उसके दरमियान कोई पर्दा हायल है या मसला कुछ और है? शेख अकबर इबने
अरबी रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं कि शायद हमने सवाल ही गलत अंदाज में पूछा है क्योंकि हकीकत यह नहीं कि अल्लाह कहां है बल्कि असल सवाल यह है कि हम देख किस चीज को रहे हैं। शेख-अकबर के नजदीक अल्लाह इसलिए पोशीदा नहीं कि वो बहुत दूर है। बल्कि बाज औकात एक हकीकत अपनी शिद्दत ज़हूर की वजह से भी निगाहों से ओझल हो जाती है।
और यही वह मकाम है जहां कुर्ब, हिजाब, मारफ़त और वजूद के कई राज एक दूसरे से जुड़ने लगते हैं। [संगीत] आइए इस सवाल को शेख-ए अकबर की निगाह से समझने की कोशिश करते हैं। जी, शेख अकबर की जो तालीमात है ना, वो हमें बिल्कुल इसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देती हैं जहां हमें अपनी बसारत यानी अपनी देखने की सलाहियत पर ही दोबारा गौर करना पड़ता है।
हम सही। क्योंकि आमतौर पर जब हम कहते हैं कि कोई शय नजर नहीं आ रही है तो हमारा ज़हन फौरन यह फर्ज कर लेता है कि या तो वो चीज वहां मौजूद ही नहीं है या फिर वो हमसे इतने फासले पर है कि हमारी निगाह वहां तक पहुंच नहीं पा रही। बिल्कुल मतलब हमारा आम जाविया निगाह यही होता है कि फासला है। जी लेकिन कुरानी हकायक तो हमें बताते हैं कि अल्लाह जाहिर भी है और बाततिन भी वो अव्वल भी है और आखिर भी। मतलब कायनात की
हर एक शय दरअसल उसी हक का जुहूर है। तो जब हर चीज उसी की तजल्ली है यानी उसी के सिफात का ज़हूर है तो फिर वो गायब कैसे हो सकता है? वो तो मुसलसल [संगीत] अपनी निशानियों के जरिए खुद को जाहिर कर रहा है। हम ये जो लगातार जुहूर का अमल है ना सूफिया की इस्तलाह में इसे तजल्ली कहा जाता है। अच्छा लेकिन मैं यह सोच रही थी कि अगर हम देखने के अमल के मतलब मैकेनिज्म पर गौर
करें तो हमारी आंख उसी वक्त थाम करती है जब देखने वाले और देखी जाने वाली चीज के दरमियान कुछ फासला हो। एक दूरी दरकार होती है ना ताकि निगाह उस शय का एहाता कर सके। बेशक एक हदबंदी चाहिए। जी। तो अगर हक ताला जैसा कि आपने कहा हर शय की हकीकत है और हर शय पर मोहित है तो फिर दूरी तो खत्म हो गई। हम उससे कटकर अलग खड़े होकर उसे किसी बैरूनी चीज की तरह
कैसे देख सकते हैं? क्या इसका मतलब यह है कि हमारी निगाह ही इस काबिल नहीं है? आपने बिल्कुल दुरुस्त मुकाम पर उंगली रखी है। हमारी जो आम निगाह है, उसका मैकेनिज्म कसरत को यानी बिखरी हुई और अलग-अलग चीजों को देखने का आदि है। हमारी आंखें, हदें, फासले और शक्लें पहचानती हैं। लेकिन जब हम हक ताला की बात करते हैं तो शेख-ए अकबर के नजदीक यहां दो तसवुरात एक साथ चलते हैं। तंजीहा और तजबीहा। [संगीत]
तंजीहा और तजबीहा। जी। तंजिया का मतलब है अल्लाह को कायनात की हर शय से मावरा और पाक जानना। जबकि तजबिया का मतलब है उसी के ज़हूर को कायनात की हर शय में देखना। अच्छा। तो अगर हम सिर्फ तंजिया पर जोर दें मतलब उसे बिल्कुल ही मावरा और अलग मान लें तो हम उसकी तजल्ली से कट जाते हैं जो वो हर लम्हे इस कायनात में कर रहा है। हमारी [संगीत] मुश्किल ही यह है कि हम जब कायनात
को देखते हैं तो चीजों को एक दूसरे से अलग और अपने खालिक से मुनकते समझते हैं। हम शक्लों में खो जाते हैं और उस वैदत को नहीं देख पाते जो इन सबको कायम रखे हुए हैं। तो अगर हम इन अलग-अलग अशकाल में खो जाते हैं तो फिर इसका मतलब तो यह हुआ कि यह कायनात [संगीत] जो हमें उस खालिक की पहचान करवाने के लिए बनाई गई थी वो बजाय खुद एक मतलब एक रुकावट बन गई है क्योंकि हम बचपन से सुनते हैं कि अल्लाह और बंदे के दरमियान पर्दे हैं, हिजाब हैं।
जी बिल्कुल। तो क्या यह पर्दे कोई खारिजी चीज हैं? कोई अलग से बनाई गई दीवारें हैं या शेख-ए अकबर के नजदीक इन हिजाबात की नौयत कुछ और है? देखिए शेख-ए-अकबर के यहां हिजाब का जो तस्सवुर है वह इंतहाई मुनफिद है। आमतौर पर हम इंसान पर्दे का मतलब लेते हैं कोई अंधेरा या कोई सिया खिलाफ या कोई दीवार जो हमें हकीकत से [संगीत] जुदा करे। लेकिन शेख-ए अकबर फरमाते हैं कि पर्दा हमेशा कोई
ऐसी चीज नहीं होती जो हक से अलग हो। बाज औकात खुद ज़हूर यानी मैनिफेस्टेशन ही पर्दा बन जाता है। कायनात खुद अपने ऊपर एक पर्दा है। क्योंकि यह खुद [संगीत] को देखती है। अपनी कसरत और रंगों में उलझ जाती है। अपने खालिक को नहीं देखती। और इस बात को समझाने के लिए शेख-ए अकबर नूर की [संगीत] यानी रोशनी की एक बहुत गहरी तमजील बयान करते हैं। आप खुद देखें कि बसारत का अमल कैसे होता है। हमें रोशनी कभी बराए रास्त नजर
नहीं आती। अगर आप किसी ऐसी जगह खला में हो जहां कोई मादी शय ना हो तो सूरज की रोशनी मौजूद होने के बावजूद आपको वहां अंधेरा महसूस होगा। रोशनी हमें सिर्फ इस वक्त नजर आती है जब वह किसी हद से किसी रुकावट से टकराकर हमारी आंखों की तरफ लौटे। रंग और शक्लें तभी बनती हैं, जब रोशनी को किसी कसाफत से रोका जाए। सही। अगर रोशनी के सामने कोई रुकावट ना हो, तो वह हमारी आंख के लिए अंधेरे के बराबर है।
शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि वजूद-ए-हक का ज़हूर इस कदर शदीद, इस कदर खुला और बेपनाह है कि यह खुलापन और यह शिद्दत ज़हूर ही उसका हिजाब बन गई है। सुभान अल्लाह। गोया जो रोशनी हमें कायनात की चीजें दिखा रही है, वही रोशनी इस शिद्दत पर है कि हम उसके मनबे को बराहेरा नहीं देख सकते। हमारी आंखें अंधेरे की वजह से नहीं बल्कि हद से ज्यादा उजाले की वजह से देखने से कासिर हैं।
जी बिल्कुल ऐसा ही है। तो हम जिन्हें दरख्त, पहाड़, सितारे या कायनात के मुख्तलिफ शक्लें कहते [संगीत] हैं। क्या वो दरअसल उसी खालिस नूर के मजाहिर हैं जो हदों के अंदर जाहिर हो रहे हैं? यानी क्या यह कायनात इस खालिस रोशनी का महज एक अक्स है जो हमें नजर आता है?
बेशक और आपने अक्स का लफ्ज इस्तेमाल करके गुफ्तगू को एक और अजीम तमसील की तरफ मोड़ दिया है। आईने की तमसील जब खालिस नूर निगाह से मावरा है और शिद्दत ज़हूर ही पर्दा है। तो फिर इंसान इसका मुशायदा कैसे करे? शेख-ए अकबर इसके जवाब [संगीत] में आईने की मिसाल लाते हैं। जब आप किसी शीशे के सामने खड़ी होती हैं तो आपकी निगाह किस चीज पर मरकूज होती है?
जाहिर [संगीत] है मुझे अपना अक्स नजर आता है। मेरी सारी तवज्जो अपने चेहरे पर अपने खदोखाल पर होती है। बिल्कुल आपको अक्स नजर आता है और आप उस शीशे को बिल्कुल नजरअंदाज कर देती हैं जो इस अक्स को कायम रखे हुए है। इंसान भूल जाता है कि यह अक्स तो खुद कुछ नहीं। इसका वजूद [संगीत] तो इस आईने की वजह से है। सही। इसी तरह यह कायनात एक आईना है। तखलीक उस इलाही जुहूर का आईना बन जाती है और हम
जब इस दुनिया को देखते हैं तो हम सिर्फ अक्स में खो जाते हैं और उस हकीकत को भूल जाते हैं जो इस अक्स का सबब है। [संगीत] तो अगर कायनात के इस आईने की बात की जाए तो क्या इसका मतलब यह है कि हम हक को देखने के बजाय हमेशा अपनी ही जात और अपने ही मफादात का अक्स देखते रहते हैं। ये बहुत अहम सवाल है। शेख अकबर फरमाते हैं कि अल्लाह ताला वो आईना है जिसमें हम अपना
अक्स देखते हैं लेकिन हम आईने को नहीं देख पाते। यह रिश्ता दो तरफ़ा है। इंसान [संगीत] जब इस आईने को देखता है तो वो सिर्फ अपनी सलाहियत और अपने फहम के मुताबिक ही चीजें वसूल करता है। यानी हर इंसान को आईने में [संगीत] एक मुख्तलिफ चीज नजर आती है। जी। और इसी फर्क को समझाने के लिए शेख अकबर इ्तेदाद का तसवुर पेश करते हैं। इ्तेदाद यानी कैपेसिटी। जी। एक ही हकीकत मुख्तलिफ दिलों पर
मुख्तलिफ अंदाज में जाहिर होती है। इसको समझाने के लिए सूफिया के यहां पानी की एक बड़ी खूबसूरत मिसाल दी जाती है। पानी का रंग वही होता है जो उस बर्तन का होता है जिसमें वो डाला जाए। सही। इसका मतलब है कि जब तक हम अपनी जात के अपने फहम और तासुबात के [संगीत] इस बर्तन में कैद हैं। हम कभी भी हकीकत को उसकी खालिस शक्ल में नहीं देख सकते। जो कुछ भी हम देखते हैं वो मतलब हकीकत और हमारे अपने बर्तन के रंग का मिक्सचर होता है।
जी बेशक। तो फिर सवाल यह है कि क्या इस बर्तन को तोड़ा जा सकता है? क्या हम उस जाहिर की आंख से आगे बढ़ सकते हैं जो सिर्फ रंगों को देखती है? शेख अकबर के नजदीक वो कौन सा मकाम है जहां इंसान हकीकत को पाता है?
यहीं पर जाहिर की आंख और दिल की आंख का फर्क वाज़ होता है। जाहिरी आंख यानी हमारी जो [संगीत] जिस्मानी बेनाई है वो तो सिर्फ शक्लों और हदों को ही देख सकती है। वो जिस्म की हद से बाहर नहीं जा सकती। लेकिन शेख-ए अकबर फरमाते हैं कि हकीकत [संगीत] का असल इदराक आंख से नहीं होता। कल्ब यानी दिल से होता है। दिल की वसत से जी यहां वह मशहूर हदीस
कुर्सी बयान की जाती है जिसमें हक ताला फरमाता है ना मेरी जमीन मुझे समा सकती है ना मेरा आसमान [संगीत] लेकिन मेरे मोमिन बंदे का दिल मुझे अपने अंदर समा लेता है सुभान अल्लाह तो शेख अकबर के यहां यह दिल ही वो मकाम है जो इन बेपनाह तजलियात का इहाता कर सकता है। यानी जाहिर की आंख से ना देख पाना दरअसल आंख की अपनी मजबूरी है। क्योंकि जिस्म की
आंख यखताई और हकीकत को देखने की अहल ही नहीं। उसके लिए दिल की वुसत दरकार है। लेकिन दिल पर यह तजलियात किस सूरत में वारिद होती हैं? हम इस दुनिया में चलते फिरते हैं। चीजें तो हमें वैसी ही लगती हैं जैसी कल थी। तो क्या दिल की आंख बेदार होने से यह कायनात कुछ मुख्तलिफ नजर आने लगती है? यह शेख-ए अकबर के अफकार का एक इंतहाई हैरतंगेज पहलू है। [संगीत] आम इंसान तो यही समझता है कि यह दुनिया और
उसकी चीजें मुस्तकिल हैं। लेकिन शेख-ए अकबर कुरानी आयत की रोशनी में फरमाते हैं कि हक ताला की तजल्ली कभी खुद को दोहराती नहीं है। हर लम्हे एक नई तजल्ली [संगीत] है। कायनात का हर जर्रा हर लम्हे एक नए ज़हूर के साथ दोबारा पैदा हो रहा है। यह बिल्कुल ऐसा है कि [संगीत] तजल्ली का एक धारा है जो तसलसुल से बह रहा है। जिस तरह एक बहते हुए दरिया में आप दूसरी बार कदम नहीं रख सकते क्योंकि वह पानी गुजर चुका होता है। इसी तरह कायनात हर सांस के साथ
नहीं है। सही इसका तो मतलब यह हुआ कि हमने कायनात के जिस मंजर को या खुद अपने आप को पिछले लम्हे जो देखा था वो मतलब अब गुजर चुका। अब इस लम्हे में हक की एक नई जलवागरी है। बिल्कुल। हम एक तजल्ली को पकड़ने की कोशिश करते हैं तो एक नई सामने आ जाती है। तो फिर इंसान उसे जानने का दावा कैसे कर सकता है? वह तो हमेशा हैरत में ही खड़ा रहेगा। और शेख-ए अकबर के यहां यही हैरत इल्म की
मेराज है। हम तो हैरत को उलझन समझते हैं ना। लेकिन सूफियाना फहम में हैरत वहां आती है जब इंसान मान लेता है कि वह अपने महदूद बर्तन से उस लामहदूद समुंदर को नहीं घेर सकता। तब उसकी अना और दावे खत्म हो जाते हैं। वह इस मुसलसल और बेपनाह नूर के सामने सरे तस्लीम खम कर देता है। फिर उसे समझ आती है कि अल्लाह इसलिए पुशीदा नहीं कि वो
गायब है बल्कि हमारी आंखें उस जात का अहाता नहीं कर सकती जिसका ज़हूर हर शय को घेरे हुए है। यहां आकर बहस खत्म हो जाती है और शुक्र का मौका आता है। सुभान अल्लाह। तो अगर हम आज की सारी फिक्री जुस्तजू को समेटें तो कुर्ब, तजल्ली, हिजाब, नूर, आईना, [संगीत] इस्तेदाद यह तमाम तसवुरात एक ही हकीकत के
गिर्द घूमते हैं। हमारा सवाल था कि अगर वह शहर रग से ज्यादा करीब है तो नजर क्यों नहीं आता? और हमें यह समझ आया कि वो इतना करीब और शिद्दत के साथ जाहिर है कि हम [संगीत] अंधेरे की वजह से नहीं बल्कि बेपनाह नूर की वजह से देखने से कासिर हैं। जी बेशक। [संगीत] उसका नूर ही दरअसल उसका पर्दा है। जाहिर की आंख का काम सिर्फ कसरत और रंग देखना है। जबकि जात हक का मुशाहदा दिल की वसतों
में ही मुमकिन है। इस सारी गुफ्तगू के बाद अब हमें हर मंजर को एक नई निगाह से देखना होगा। शेख अकबर की यह बात हमारे ज़हनों में रहनी चाहिए कि तजल्ली कभी दोहराई नहीं जाती। हम हर सांस के साथ उस [संगीत] हक की एक नई जलवागरी से रूबरू हैं। हमें अपनी निगाहें दिल को बेदार करना है। अल्लाह ताला हमें सही फहम, नूर बसीरत, अपनी रहमत
की पहचान, हकीकी हुजूरी और अपने कुर्ब की सच्ची तलब अता फरमाए। आमीन। [संगीत]