Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Fuss 19 | Hazrat Ayyubؑ — Allah Apne Mahboob Bandon Ko Aazmata Kyun Hai? | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript
Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube
Summary
AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.
- शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह फुसूसुल हिकम के 19वें बाब में हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम की आजमाइश के पसेपर्दा राज को बयान करते हैं।
- हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने अपनी शदीद तकलीफ के दौरान अदब के पेशेनजर उसे जाहिरी सबब यानी शैतान के मस करने से जोड़ा।
- हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम की आजमाइश को हिकमते गैबिया कहा गया क्योंकि इसके दो रुख थे जिसमें जाहिरी बीमारी के पीछे पोशीदा रूहानी हिकमत काम कर रही थी।

Use this video with Pro
Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).
Transcript
Search ignores accents. All transcript text stays visible.
कभी आपने गौर किया कि अगर अल्लाह अपने बंदों से मोहब्बत करता है तो फिर उन्हें तकलीफ क्यों देता है? बीमारी, तनहाई, बेबसी और वह दुआएं जो बजाहिर देर से कबूल होती हैं। हम अक्सर आजमाइश को सिर्फ एक मुसीबत समझते हैं जिससे जल्द जल्द निजात मिल जानी चाहिए। मगर शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम
की हिकमत में एक बिल्कुल मुख्तलिफ राज बयान करते हैं। वो फरमाते हैं कभी-कभी तकलीफ का मकसद सिर्फ तकलीफ नहीं होता। कभी वह एक ऐसी पुकार होती है जो अल्लाह अपने बंदे के अंदर से सुनना चाहता है और कभी बीमारी सेहत से ज्यादा कीमती चीज अता करने आती है। आज हम हजरत अय्यूब अल सलाम की हिकमते गैबिया में उस राज को समझने की
कोशिश करेंगे जहां सब्र, दुआ, फक्र और कुर्ब इलाही एक ही हकीकत के मुख्तलिफ रुख बन जाते हैं। आइए आगाज करते हैं। जी। यह दरअसल इंसान के वजूद का एक ऐसा बुनियादी सवाल है जिससे हर रूह को जिंदगी में कभी ना कभी वास्ता जरूर पड़ता है। सही। तो आज हम तसव्वुफ की एक इंतहाई अजीम और गहरी किताब यानी फुसूसुल हिकम के 19वेंस
मतलब 19वें बाप के समंदर में उतर रहे हैं। यह बाब हजरत अय्यूब अल सलाम की जात से मंसूब है। जी। और जब हम अंबिया इकराम कीिंदगियों का मुताला करते हैं तो बजाहिर वह वाकयात बस तारीख का हिस्सा लगते हैं। दुरुस्त कहा आपने मगर साहिब फुसूसुल हिकम उन वाक्यात के अंदर मौजूद उन रूहानी हकीकतों को बेनकाब करते हैं जो आम इंसानी निगाह से ओझल रहती हैं। सही। यानी इस गुफ्तगू का मकसद महज किसी
वाक्य को दोहराना नहीं है। बल्कि उस मुकाम तक पहुंचना है जहां हम यह समझ सकें कि खालिक कायनात जब अपने किसी इंतहाई मुकरब बंदे पर आजमाइश के दरवाजे खोलता है तो उसके पसेपर्दा कौन सा राज कार फरमा होता है। अच्छा जब इस पसेपर्दा राज की बात होती है ना तो हजरत अय्यूब अली सलाम का जिक्र आते ही जहन में सबसे पहले उनकी वो तवील और कठिन आजमाइश उभरती है। जी हां बिल्कुल। लेकिन इस बात के आवाज में
ही मैं देख रही थी कि एक बहुत लतीफ सा पहलू सामने आता है। जब हजरत अय्यूब अल सलाम ने अपनी इस शदीद तकलीफ के दौरान अपने रब को पुकारा तो उन्होंने फरमाया कि मुझे शैतान ने छुआ है। हम सही। तो एक आम कारी के ज़हन में यह सवाल पैदा होता है कि जब इस कायनात में हर शय का खालिक हर हालत का पैदा करने वाला अल्लाह ही है तो एक मुकरब नबी अपनी इस
तकलीफ को शैतान से क्यों मंसूब कर रहा है? मतलब इस तज़ तखातुब के पीछे क्या हिकमत है? यह सवाल बराहेरास्त रूहानी आदाब की बुनियादों से जुड़ा हुआ है। यहां कमाल अदब का एक ऐसा मुजायरा मिलता है जो अंबिया इकराम का खासा है। अब देखिए ना उसूल तो यह है कि कायनात का हर फेल चाहे वो राहत हो या तकलीफ उसका हकीकी खालिक सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की जात है। बेशक। लेकिन अदब बंदगी यह तकाजा करता है कि बंदा
किसी भी ऐसी चीज की निस्बत जो बजाहिल नाखुश गवार हो या जिसमें किसी किस्म का नुक्कस नजर आता हो उसे बराहेरास्त अपने रब की तरफ मंसूब ना करे। यानी अदब को मलहूजे खातिर रखा गया। बिल्कुल। हजरत अय्यूब अल सलाम का मकाम कुर्ब इस कदर बुलंद था कि उनके और अल्लाह के दरमियान कोई हिजाब नहीं था। लेकिन जब दर्द की शिद्दत बयान करने का वक्त आया तो
उन्होंने अदब के पेशजर इसे एक जाहिरी सबब यानी शैतान के मस करने से जोड़ दिया। सही। दूरी और कुर्ब दरअसल वजूदी एतबारात हैं। वो इस तवील आजमाइश में अल्लाह के इंतहाई करीब थे। मगर बंदगी का तकाजा यह था कि शिकवे के अल्फाज में रब्बे जुलजलाल का नाम बराए रास्त उस तकलीफ के साथ ना जोड़ा जाए। वाह। और फिर हम देखते हैं कि इस अदब और
पुकार के जवाब में खालिक की तरफ से जो शिफा का तरीका बताया जाता है वह भी आम फहम से कुछ मुख्तलिफ है। जी वो पानी वाला वाकया। जी हां, अल्लाह ताला की तरफ से निदा आती है कि अपना पांव जमीन पर मारो। यह नहाने और पीने का ठंडा पानी है। अब जाहिरी सतह पर तो हम इसे बस एक मौजजा तस्लीम करते हैं। बिल्कुल। लेकिन जिस गहराई में हम आज सफर
कर रहे हैं, वहां पानी का यह इंतखाब यकीनन महज इत्तेफाक नहीं हो सकता। इस रूहानी तनाजुर में दर्द और ठंडे पानी का मतलब क्या ताल्लुक बनता है? इस ताल्लुक को समझने के लिए हमें पहले दर्द की माहियत पर गौर करना होगा। देखिए दर्द चाहे वो जिस्म का हो या रूह का। अपने अंदर एक शदीद हिद्दत, एक तपिश और जलन रखता है। जी, एक बेचैनी सी होती है।
बिल्कुल। जब इंसान किसी बीमारी या आजमाइश में मुब्तला होता है तो उसका पूरा वजूद इस तपिश से गुजरता है। दूसरी जानिब पानी इस कायनात में एतदाल और हयात की सबसे बड़ी अलामत है। कुरान मजीद भी तो गवाही देता है कि हर जिंदा शय पानी से पैदा की गई है। सुभान अल्लाह। बिल्कुल दुरुस्त। जब हजरत अय्यूब अल सलाम का जिस्म और उनकी कैफियत दर्द की इस इंतहा को पहुंच गई जहां हरारत
ने उनके वजूद को अपनी लपेट में ले लिया था तो अल्लाह ताला ने उस आग को बुझाने के लिए पानी का इंतखाब किया ताकि एतदाल आ सके जी और पांव मारने का हुक्म इस बात की तरफ इशारा है कि सबब पैदा करना इंसान के जिम्मे लेकिन इस मादी हरकत के नतीजे में जो ठंडक पैदा होती है वो खालिसतन अल्लाह की रहमत सही। पानी ने इस रूहानी और जिस्मानी बुखार को
तोड़ा और वजूद को वापस उसकी असल हालत यानी एतदाल की तरफ लौटा दिया। यह बात बहुत हद तक वाज़ करती है कि शिफा का अमल किस तरह ज़हूर पजीर हुआ। लेकिन एक आम तसवुर जो शायद हम सबके ज़हनों में कहीं ना कहीं है कि जो शख्स रूहानी तौर पर जितना बुलंद होता है वो दुनियावी तकालीफ से उतना ही बेनियाज हो जाता है। हम ये एक बहुत आम ख्याल है। हां हम सोचते हैं कि अल्लाह के मुकर्रब
बंदे पत्थर की तरह मजबूत हो जाते हैं। उन्हें दर्द महसूस ही नहीं होता या कम से कम वो इस दर्द का इजहार तो बिल्कुल नहीं करते। सही। तो फिर एक जलीलुल कदर नबी जो रूहानियत की मेराज पर है वो इस तकलीफ की शिद्दत को महसूस क्यों कर रहा है? क्या कुर्ब इलाही का तकाजा यह नहीं होना चाहिए कि इंसान हर किस्म के जिस्मानी दर्द से बेपरवाह हो जाए? यह सवाल दरअसल उन रवायती
तस्सवुरात की निशानानदेही करता है जो सूफियाना तालीमात को समझे बगैर हमारे माशरे में राइज हो चुके हैं। यानी ये तसवुर गलत है? जी बिल्कुल यह समझना कि मुकरब बंदा दर्द महसूस नहीं करता। दरअसल रूहानियत की नहीं बेहसी की तारीफ है। यानी दर्द महसूस ना करना कोई कमाल नहीं है। जी कमाल यह है कि इंसान दर्द की इस भट्ठी
में जलते हुए उसकी पूरी शिद्दत को महसूस करते हुए अपने रब के साथ अपना ताल्लुक किस तरह निभाता है। अगर उन्हें दर्द का एहसास ही ना होता तो फिर इस आजमाइश का कोई माना ही बाकी ना रहता। हम तकलीफ का एहसास ही तो वह कठाली है जिसमें उनकी बंदगी का सोना कुंदन बनता है। सुभान अल्लाह बिल्कुल यही बात है। अच्छा अगर दर्द को महसूस करना और उसके बोझ
तले दबना ऐन इंसानियत है तो फिर वो जो तस्सवुर सब्र है जो हमें नस्ल दर नस्ल सिखाया गया है कि सब्र का मतलब है हंठ सी लेना। किसी भी हाल में जुबान पर हरफ शिकायत ना लाना और बस खामोशी से सहते जाना। वो कहां जाता है? हम लेकिन हम देखते हैं कि हजरत अय्यूब अल सलाम ने तो दुआ मांगी और इल्तजा की। अगर तकलीफ का इजहार करना और मदद मांगना सब्र
के मुनाफी नहीं है तो फिर सब्र की असल तारीफ क्या है? यहां आकर हमारी मरवजा सोच और शेख-ए-अकबर के गहरे रूहानी फहम के दरमियान एक वाज़ लकीर खिंच जाती है। सब्र का यह तसवुर कि इंसान अपने दर्द पर बिल्कुल खामोश रहे। दरअसल एक सतही सोच है। सब्र का हकीकी मफूम यह नहीं है कि बंदा तकलीफ महसूस ना करे या उसके इजाले की दुआ ना करे। असल सब्र यह है
कि इंसान अपने दर्द, अपनी तकलीफ और अपने शिकवे को गैर अल्लाह यानी मखलूक के सामने पेश करने से अपने नफ्स को रोके। यानी शिकवा मखलूक से ना करे। बिल्कुल। असल सब्र यह है कि जब बोझ बर्दाश्त से बाहर होने लगे तो इंसान दुनिया वालों के दरवाजे खटखटाने के बजाय सिर्फ और सिर्फ उस एक जात के सामने जाकर गिरे जो इस तकलीफ को दूर करने पर कादिर है। अपना हालेल दिल अल्लाह को सुनाना उसके सामने रोकर इल्तजा करना यह सब्र का टूटना
नहीं है। यह ऐन सब्र है। गोया शिकवा करना मना नहीं है। बल्कि शिकवा किससे किया जा रहा है यह असल मयार है। जी। और यही वजह है कि हजरत अय्यूब अल सलाम के उस शिकवे और अपनी तकलीफ को दूर करने की इल्तजा के बावजूद कुरान मजीद उन्हें नमुल अब्द यानी क्या ही बेहतरीन बंदा और साबिर करार देता है। सही अगर उनकी दुआ सब्र के खिलाफ होती तो अल्लाह उनके सब्र की गवाही कभी ना देता।
इस मुकाम पर एक इंतहाई अहम इस्तिला सामने आती है और वो है फकर्र। फक्र आम बोलचाल में तो फक्र का मतलब गुर्बत या जाहिरी तौर पर फटे पुराने कपड़े पहनना समझा जाता है। जी जाहिरी माने तो वही है लेकिन इस रूहानी लुगत में फक्र का मतलब है अपनी मुकम्मल मोहताजी का गहरा शूर। इंसान का यह जान लेना कि वो अपनी जात में कुछ भी नहीं। वह
हर सांस का, हर धड़कन का और हर राहत का मोहताज है। जब इंसान अल्लाह के सामने इस फक्र का, अपनी बेबसी और मोहताजी का इजहार करता है तो यह अदा खालिक को बेहद पसंद है। आजमाइश भेजी ही इसीलिए जाती है ताकि इंसान इन तमाम जाहिरी सहारों, दौलत, रिश्तों और ताकत से मायूस हो जाए जिन पर वह तकिया किए बैठा था और पलट कर अपने हकीकी मोहताज होने
का इकरार करें। मोहताजी का यह इकरार तो मेरी समझ में आता है लेकिन यहां एक और तफक्कुरी उलझन सर उठाती है। जी बताइए। तसवुफ ही में एक और तसवुर बहुत नुमाया है जिसे रजा बिल कजा कहा जाता है। यानी अल्लाह के हर फैसले पर राजी रहना। सही। तो एक आम इंसान यह सोच सकता है कि अगर एक तरफ मेरा यह ईमान है कि यह बीमारी
खालिसतन अल्लाह की तरफ से आई है और मैं उसकी रिजा पर राजी हूं तो क्या इस मुसीबत को दूर करने की दुआ मांगना इस रिजा को चैलेंज करने के मुतरादिफ नहीं। यानी क्या दर्द को हटाने की इल्तजा करना इस बात की दलील नहीं कि मैं अल्लाह के इस फैसले को अंदर से तस्लीम नहीं कर रही। यह एक ऐसा बजाहिर मुतजाद नजर आने वाला मुकाम है जहां अक्सर लोग ठोकर खा जाते हैं। लेकिन जब इसकी गिरा खुलती है तो बंदगी का एक नया
रुख सामने आता है। कजा पर राजी होने का हरगज़ यह मतलब नहीं है कि इंसान दुआ मांगना छोड़ दे। दुआ मांगना अल्लाह की रजा के खिलाफ नहीं है। बल्कि यह तो खुद अल्लाह के सरी हुक्म की तामील है। क्योंकि अल्लाह ने खुद फरमाया है कि मुझसे दुआ करो मैं कबूल करूंगा। बिल्कुल। अब जरा गौर कीजिए। जिस चीज से इंसान के जिस्म या रूह को तबी तौर पर तकलीफ पहुंच रही हो, उस दर्द को दूर करने
की दुआ ना करना। और यह सोचना कि आहां मैं तो राजी हूं यह दरअसल बंदगी नहीं बल्कि एक किस्म की बात जहालत और तकब्बुर है। तकब्ुर? एक शख्स जो बजाहिर यह कह रहा है कि ऐ अल्लाह जो तूने दिया मैं उसी में खुश हूं। इसमें तकुर का पहलू कैसे शामिल हो गया? यह तो इंतहाई आजजी महसूस होती है। यह बातनी तकुर इसलिए है क्योंकि वो शख्स
नादानिस्ता तौर पर अल्लाह की एक सिफात यानी समदियत या बेनियाजी को अपने ऊपर तारी करने की कोशिश कर रहा है। वो अपने अमल से यह दावा कर रहा है कि उसे किसी चीज की हत्ता कि राहत की भी कोई हाजत नहीं रही और वह अपनी इंसानी हुदूद से मावरा हो चुका है। जबकि हकीकत यह है कि इंसान सरतपा मोहताज है। बहुत गहरा नुक्ता है। इस नुक्त को वाज़ करने के लिए फसूसुल हिकम में एक आरिफ यानी
अल्लाह की पहचान रखने वाले एक बुजुर्ग का वाकया दर्ज है जो इस सारे फलसफे को खोल देता है। बयान किया जाता है कि वह आरिफ एक मर्तबा भूख की शदीद तकलीफ के बायस रो रहे थे। किसी देखने वाले को हैरत हुई और उसने टोक दिया कि आप तो आरिफ हैं। अल्लाह के इतने करीब हैं और आप एक मामूली सी तबई भूख की वजह से बच्चों की तरह रो रहे हैं। तो उस आरिफ ने क्या जवाब दिया? उस आरिफ का जवाब हमारी आज की इस पूरी गुफ्तगू का निचोड़ है। उन्होंने निहायत सुकून से
फरमाया, "तुम क्या समझते हो कि मैं भूख से रो रहा हूं।" अल्लाह ने मुझे भूखा रखा ही इसीलिए है ताकि मैं उसके सामने रोऊं और गिड़गिड़ाऊं। सुभान अल्लाह। उन्होंने कहा कि वो मुझे आजमाता ही इसीलिए है ताकि मैं उससे अपनी तकलीफ दूर करने का सवाल करूं। इस एक जुमले में उबूदियत की पूरी रूह सिमट आई है। सही। वो चाहता है कि बंदा उस दर्द को महसूस करे। अपनी बेपसी का एतराफ करें और फिर अपने रब के सामने गिड़गिड़ाए। इस