tubetranscript.io

Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fuss 23 | Hazrat Luqman Hakeem Kyun Kehlaye? | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript

Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube

Summary

AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.

  • शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत लुकमान अल सलाम की हिकमत में फरमाते हैं कि कसरत उसी एक हकीकत के बेशुमार ज़हूर हैं।
  • अल्लाह ताला ने अपने इसम लतीफ के जरिए हर तखलीक के रगो पे में सरायत किया हुआ है।
  • शर्क खफी यह है कि इंसान कायनात के असबाब और चीजों को खुद मुख्तार समझकर उन पर भरोसा करने लगे।
Video thumbnail: Fuss 23 | Hazrat Luqman Hakeem Kyun Kehlaye? | Ibn e Arabi | Fikr Nama
Source video on YouTube · Transcript generated automatically and may contain errors.

Use this video with Pro

Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).

Transcript

Search ignores accents. All transcript text stays visible.

दुनिया में हर चीज अलग-अलग दिखाई देती है। आसमान अलग, जमीन अलग, दरख्त अलग, इंसान अलग, रिज़्क अलग और अल्लाह सबसे अलग। मगर शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत लुकमान अल सलाम के हिकमत में फरमाते हैं यह जुदाई इतनी हकीकी नहीं जितनी हमें महसूस होती है। असल हकीकत एक है और कसरत उसी एक हकीकत के बेशुमार ज़हूर हैं। आज हम

हजरत लुकमान अल सलाम की हिकमत एहसानिया में इसी राज को समझने की कोशिश करेंगे। आइए आगाज करते हैं। जी बिस्मिल्लाह। आज के इस गहरे फिक्री मुताले यानी इस निशिस्त की बुनियाद फसूसुल हिकम का 23वां बाप है जिसे फुसे हजरत लुकमान अल सलाम कहा जाता है। हमारा मकसद यह है कि हम इस सूफियाना राज की गहराई में उतरें कि बजाहिर नजर आने वाली यह जो कसरत

है यानी हमारे इर्द-गिर्द जो बेशुमार अशिया का बिखराव है इसके पीछे दरअसल कौन सी एक वाहिद हकीकत कार फरमा है जी बिल्कुल और यह एक ऐसा मौजू है जो इंसानी सोच के बिल्कुल बुनियादी ढांचे को यानी हमारी रोजमर्रा की जो समझ है उसे चैलेंज करता है क्योंकि अगर हम इंसानी ज़हन और इसकी साख्त पर गौर करें तो पता चलता है कि हमारा शूर कायनात को टुकड़ों में

बांटकर ही समझने का आदि है। यानी अगर मैं इसे यूं कहूं कि हमारा ज़हन चीजों को बांटे बगैर काम ही नहीं कर सकता। हम देखते हैं कि यह मेज है, वो दरख्त है और वो इंसान है। जी हां बिल्कुल। ये सब अलग-अलग खानों में बंद है। तो फिर हजरत लुकमान अल सलाम के हवाले से उस हिकमत का असल मफूम क्या बनता है? अल्लाह ताला ने उन्हें कुरान मजीद में हकीम क्यों फरमाया

है? यही तो असल नुक्ता है। देखें आम इंसान का शूर अपने हवास यानी जाहिरी देखने और छूने की सलाहियतों का मोहताज है। और यह हवास कायनात को वजूद के एक बिखरे हुए मजमुए के तौर पर पेश करते हैं। हम सही। ज़हन इन जाहरी हुदूद में इस कदर कैद हो जाता है कि वह इसी बिखराव को मतलब कसरत को ही हत्मी हकीकत मान लेता है। मगर

शेख उल अकबर के नजदीक हिकमत यह नहीं है कि इंसान महज अशिया के जाहरी नामों को जान ले। सच्ची हिकमत यह है कि इंसान हकीकत को उसके असल रूप में देखना सीख ले। कसरत अपने आप में कोई मुस्तकिल वजूद नहीं रखती बल्कि यह उसी एक हकीकत के बेशुमार ज़हूर और तजलियात है। अच्छा यानी यह कसरत एक पर्दा है। जी उसे आप एक जाहिरी पर्दा कह सकती हैं।

हजरत लुकमान अल सलाम की हिकमत दरअसल इसी दुरुस्त बसीरत का नाम है। अल्लाह ताला ने उन्हें हकीम इसलिए फरमाया क्योंकि उनकी निगाह सूरतों के हुजूम में गुम नहीं होती थी। वो हकीकत को देख लेते थे। बिल्कुल। देखने वाला कायनात की रंगारंगी में उलझने के बजाय उस वाहिद हकीकत का मुशायदा करता है जो इन तमाम सूरतों को वजूद बखश रही है। अगर सूरतों के पीछे हकीकत एक ही है तो

मुझे कुरान मजीद की वो मशहूर आयत याद आ रही है जहां हजरत लुकमान अल सलाम ने अपने बेटे को नसीहत करते हुए राई के दाने की मिसाल दी है। जी सूर लुकमान में जी उन्होंने फरमाया कि अगर कोई चीज राई के दाने के बराबर भी हो और वह किसी चट्टान के अंदर या आसमानों में या जमीन में छुपी हो तो अल्लाह उसे ले आएगा। अब इस राई के हकीर से दाने का इस वहदत और कसरत की बहस से

क्या ताल्लुक है? हजरत लुकमान अल सलाम की इस नसीहत में दरअसल उसी वैदत का एक अजीम राज पोशीदा है। राई का दाना कायनात की छोटी से छोटी और बजाहिर निगाहों से ओझल शय की अलामत है। हम वो दाना चाहे किसी सख्त चट्टान के अंधेरे में पोशीदा हो या आसमानों की वसतों में गुम हो या जमीन की तहों में दबा हो। यह इस बात की तरफ इशारा है कि अल्लाह ताला ही वो जात है जो हर शय को अदम से वजूद में

लाती है और उसे जाहिर करती है। लेकिन किसी चीज को वजूद में लाना या जाहिर करना एक बात है और इस शय के अंदर एक रब्त होना बिल्कुल अलग बात है। क्या शेख अकबर का मतलब यही है कि कायनात के जर्रेजर्रे में वो हकीकत हर वक्त कार फरमा है। आपने बिल्कुल दुरुस्त जगह निशानानदेही की और यहीं पर शेख अकबर हमें अल्लाह ताला के एक निहायत खूबसूरत और गैरे इस्म यानी इसमें

लतीफ की तरफ ले जाते हैं। जी आयत के आखिर में भी फरमाया गया है कि बेशक अल्लाह लतीफ है, खबीर है। बिल्कुल। हम आम जबान में लतीफ का मतलब निहायत बारीक या नरम लेते हैं। मगर यहां इसका मफूम बहुत गहरा है। अल्लाह ताला की लताफत का मतलब यह है कि वो अपनी कुदरत और तजल्ली के साथ हर तखलीक के रगो पे में सरायत किए हुए हैं। सरायत करने को थोड़ा और खोलिए। मतलब, क्या

वह उस तख़्लीक का ऐन हिस्सा बन जाता है? नहीं, नहीं, और यही तो इसमें लतीफ का कमाल है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] वह हर शय के साथ इस कदर करीब और पोशिदा है कि हर शय का वजूद उसी के दम से कायम है। मगर वो इस तखलीक के ऐन मुताबिक नहीं हो जाता। यानी वो शय खुदा नहीं बन जाती। बिल्कुल नहीं। वो जात कायनात की हर शय को इसका वजूद और उसकी सूरत अता कर रही है। आसमान को आसमान की सूरत, दरख्त को दरख्त की सूरत, इंसान को इंसान की।

और रिज़्क को रिज़्क की। जी। कसरत के पर्दे में यह सब बजाहिर अलग-अलग हैं। लेकिन वो लतीफ जात जो इन सबको वजूद बखश रही है, वो एक है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जात हर शय का एहाता किए हुए है। लेकिन फिर भी वो शय वो जात नहीं बनती। दरख्त अपने अंदर खुदाई तजल्ली रखने के बावजूद खुदा नहीं बन जाता बल्कि वो महज एक मजहर रहता है। हम वो एक जाहिरी पर्दा रहता है।

जी यही राई के दाने और इसमें लतीफ का वो गहरा रब है कि चाहे राई का दाना कितना ही मामूली क्यों ना हो उसका वजूद भी उसी लतीफ मौजूदगी का मोहताज है। ठीक है। यह बात वाज़ हो गई कि हर शय में उसी की तजल्ली है। मगर शय उसके ऐन मुताबिक नहीं होती। लेकिन अगर हम यह मान रहे हैं कि कायनात की हर सूरत एक ही हकीकत का जुहूर है तो क्या यह उन इल्मुल कलाम वालों

की बात जैसी नहीं बन जाती जो कहते हैं कि कायनात महज एक बुनियादी जोहर से बनी है बस उसकी शक्लें बदल रही हैं बजाहिर अल्फाज की हद तक शायद ऐसा महसूस हो लेकिन इन दोनों के दरमियान जमीन और आसमान का फर्क है। जब कुछ लोग यह कहते हैं कि कायनात एक ही जौहर का नाम है जो मुख्तलिफ शक्लों में जाहिर होता है तो उनकी तमामतर बहस एक तबई हुदूद के अंदर रहती है। हम यानी मादी हवाले से

जी लेकिन शेख-ए अकबर के नजदीक यह जौहर अल्लाह की जात नहीं है। असल बात वो नूरी तजल्ली और इल्म है जो महसूस किया जाता है। तो यह महज कोई अकली या फलसफियाना बहस नहीं है। बिल्कुल नहीं। शेख अकबर जिस हकीकत की बात कर रहे हैं, वह अकल की मंतिक से नहीं बल्कि कल्ब के हुजूर और मुशायदे से जानी जाती है। और यहीं से अल्लाह ताला के दूसरे इस्म यानी इसमें खबीर का असल मफूम रोशन

होता है। इसमें खबीर खबीर का मतलब तो आमतौर पर हम यह लेते हैं कि जो खबर रखने वाला हो। क्या यहां इसका कोई खास सुफियाना मफूम है? जी। आमतौर पर हम जानने को अकली खबर मानते हैं। लेकिन हिकमत एहसानिया में खबीर होने का मतलब महज दूर से जानना या मालूमात रखना नहीं है। बल्कि यह ज़ौक का इल्म है। ज़ौक का इल्म वो होता है जो महज दिमाग में ना रहे

बल्कि इंसान के बातिन और उसके वजूद का हिस्सा बन जाए। जैसे शहद की मिठास का इल्म उसे चखने से ही आ सकता है। उसके बारे में महज सुनने से नहीं। इसी ज़ौकी इल्म और इस्म खबीर के राज को खोलने के लिए शेख अकबर रसूल्लाह सल्लल्लाह अल वसल्लम की एक मशहूर हदीस कुद्सी का हवाला देते हैं। उसमें अल्लाह ताला अपने बंदे के बारे में फरमाता है कि जब मैं उससे मोहब्बत करता हूं तो मैं उसकी समात बन जाता हूं जिससे वह सुनता

है। मैं उसकी बसारत बन जाता हूं जिससे वह देखता है। इसका अमली मतलब क्या है? क्या बंदे के अपने हवास खत्म हो जाते हैं? बंदे के तबई हवास खत्म नहीं होते बल्कि उनका रुख और उनकी हकीकत बदल जाती है। जब कोई शख्स इस सच्चाई को पा लेता है कि कसरत में वाहदत छुपी है तो उसके हवास अल्लाह की मौजूदगी से मुनव्ववर हो जाते हैं। सुभान अल्लाह। उसका देखना, उसका सुनना

दरअसल अल्लाह की तजल्ली के ज़रे असर आ जाता है। यह वह मकाम ज़ौक है जहां बंदा यह तजुर्बा करता है कि उसकी अपनी कोई मुस्तकिल हस्ती नहीं बल्कि वो उस वाहिद हकीकत का एक मजहर बन गया है। यानी उसे हकीकत का ज़ौकी तौर पर तजुर्बा हो जाता है। जी। इस्म खबीर का फैज यह है कि बंदा इस बात से बा खबर हो जाता है कि उसके कामों के पीछे फाइले हकीकी कौन है। यह कोई खुश्क अकली नजरिया नहीं है बल्कि यह मोहब्बत और

तजल्ली का वह जिंदा रिश्ता है जो बंदे और रब के दरमियान कायम होता है। तो अगर हम इन सारी बातों को समेटे मतलब यह कसरत में वाहदत इस्म लतीफ इस्म खबीर का ज़ौकी तजुर्बा तो हजरत लुकमान अल सलाम की उस हिकमत को जिसे हिकमत एहसानिया कहा गया है। हम जामे तौर पर कैसे बयान कर सकते हैं? यह एहसान दरअसल क्या है?

देखिए, एहसान की वो मशहूर तारीफ जो हदीस में आई है, वह यह है कि तुम अल्लाह की इबादत इस तरह करो गोया तुम उसे देख रहे हो। जी बिल्कुल। हिकमत एहसानिया दरअसल इसी मकाम का नाम है। यह वो हालत है जहां इंसान का कलब इस कदर बेदार हो जाता है कि वो कायनात के हर जर्रे में अल्लाह ताला की लतीफ मौजूदगी और उसकी तजल्ली का मुशाहदा करता है। लेकिन क्या उसमें यह खतरा नहीं है कि

इंसान दरख्त को या आसमान को ही खुदा मानने लग जाए। यही वह इंतहाई नाजुक शर्त है जो हिकमत एहसानिया को मुकम्मल करती है। इस हिकमत का कमाल यह है कि इंसान तजल्ली का मुशाहदा तो करे लेकिन साथ ही साथ अल्लाह ताला की बेनियाजी और उसकी पाकीजगी को भी पूरी तरह बरकरार रखे। यानी वो जात को इन सूरतों से मावरा भी जाने। बिल्कुल। वो जानता है कि तजल्ली दरख्त पर पड़ रही है। मगर वह दरख्त को खुदा नहीं

मानता। वो जानता है कि जात हर सूरत को समाए हुए है। मगर जात उस सूरत के अंदर कैद नहीं है। वो जात पाक और बेनियाज है। अच्छा अब मुझे एक बात समझ आ रही है। हजरत लुकमान अलैहिस्सलाम ने इसीलिए अपने बेटे को नसीहत करते हुए शर्क से इतनी सख्ती से मना फरमाया था। जी। इसे जुल्म अजीम कहा गया है। तो अगर सब कुछ एक ही हकीकत का जुहूर है।

तो शर्क तो दरअसल उस हकीकत से बगावत का नाम हुआ। क्या मैं सही समझ रही हूं? आप बिल्कुल दुरुस्त सिमंत में जा रही हैं। आरिफ यानी अल्लाह को पहचानने वाला शख्स जब बेशुमार सूरतों और कसरत को देखता है तो वो उनके पीछे मौजूद वाहदत को हरगिज़ नहीं भूलता। उसे पता होता है कि यह सब एक ही जात के मोहताज हैं। तो फिर शर्क कब पैदा होता है? शर्क उस वक्त पैदा होता है जब हम इस एक हकीकत से

बिल्कुल गाफिल हो जाते हैं और इन जाहिरी सूरतों को अपने आप में अलग और खुद मुख्तार मान लेते हैं। यानी अगर मैं यह समझूं कि मेरी कोई कामयाबी महज मेरी अपनी मेहनत का नतीजा है। और मैं इसके पीछे अल्लाह की जात की तजल्ली या इसमें लतीफ को भूल जाऊं तो यह भी शर्क की एक किस्म है। बिल्कुल। और इसे ही शर्क खफी या छुपा हुआ शर्क कहा जाता है। जाहिरी शर्क तो यह है

कि इंसान बाकायदा किसी और ताकत की पूजा करे। लेकिन शर्क खफी यह है कि इंसान कायनात के असबाब और चीजों को खुद मुख्तार समझकर उन पर भरोसा करने लगे। जब इंसान यह समझता है कि फला शय में अपनी जाती ताकत है या फला सूरत अपने वजूद में अल्लाह की मोहताज नहीं है तो वह दरअसल कायनात के इस कमाल तवाजुन और वाहदत को तोड़ने की कोशिश करता है। वो एक हकीकत के टुकड़े करके उन्हें

अलग-अलग ताकतें बनाने की कोशिश करता है। दुरुस्त और क्योंकि यह कायनात की असल साख्त के सरासर खिलाफ है और इस वाहिद जात के हक पर सबसे बड़ी ज्यादती है। इसलिए शर्क को जुल्म अजीम कहा गया है। हिकमते एहसानिया इंसान को इसी शर्क चाहे वह जाहरी हो या खफी दोनों से बचाती है। यह कितना ही गहरा और जुड़ा हुआ फिक्री सफर था। हमने आगाज किया था अपने इस आम मुशाहदे

से कि हमें हर चीज बजाहिर अलग-अलग दिखाई देती है। हमारा ज़हन कायनात को हिस्सों में बांटता है। जी। फिर हमने हजरत लुकमान अलह सलाम की हिकमत को समझा। राई के दाने की वो मिसाल देखी जो जाहिर करती है कि कोई भी चीज अल्लाह की गिरिफ्त और तजल्ली से बाहर नहीं है। हमने देखा कि अल्लाह ताला का इस्म लतीफ कैसे कायनात के रगो पे में मौजूद है। बिल्कुल।

और फिर हमने इसमें खबीर के ज़ौकी इल्म को समझा जो महज अल्फाज़ का नहीं बल्कि बातनी तजुर्बे का नाम है। और आखिर में हमने मकामे एहसान को जाना। जो हमें बताता है कि कसरत के अंदर उस एक जात को कैसे पहचानना है और हर तरह के शर्क से कैसे बचना है। यह सारी गुफ्तगू हमें इस मकाम पर ला खड़ी करती है जहां हमारा कायनात को देखने का चश्मा ही बदल जाता है। लेकिन इस निशिस्त

Frequently asked questions

अल्लाह ताला ने उन्हें हकीम इसलिए फरमाया क्योंकि उनकी निगाह सूरतों के हुजूम में गुम नहीं होती थी और वो हकीकत को देख लेते थे।

अल्लाह ताला की लताफत का मतलब यह है कि वो अपनी कुदरत और तजल्ली के साथ हर तखलीक के रगो पे में सरायत किए हुए हैं।

शर्क खफी यह है कि इंसान कायनात के असबाब और चीजों को खुद मुख्तार समझकर उन पर भरोसा करने लगे।