tubetranscript.io

Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 15: Is Your Destiny Already Written? | Hazrat Uzair AS | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript

Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube

Summary

AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.

  • शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के नजदीक कजा अल्लाह ताला का मजमुई और कुल्ली फैसला है जबकि कदर उस फैसले के निफाज की वक्त पैमाइश का नाम है।
  • हजरत उज़ैर अल सलाम ने वीरान बस्ती से गुजरते वक्त तकदीर का पोशीदा राज जानने की ख्वाहिश की थी जिस पर उन्हें 100 साल की मौत देकर अमली मुशायदा कराया गया।
  • शेख-ए अकबर इबने अरबी के मुताबिक हजरत उज़ैर अल सलाम को दी जाने वाली तनबीह सजा नहीं बल्कि उनके मंसबे नबूवत और दुनिया के निजाम की हिफाजत के लिए थी।
Video thumbnail: Fusus al-Hikam Part 15: Is Your Destiny Already Written? | Hazrat Uzair AS | Ibn Arabi | Fikr Nama
Source video on YouTube · Transcript generated automatically and may contain errors.

Use this video with Pro

Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).

Transcript

Search ignores accents. All transcript text stays visible.

बिस्मिल्लाह रहमानिर्रहीम। फिक्रनामा में खुशामदीद। अजल से इंसानी शूर इस खोज में रहा है कि अगर सब कुछ पहले से तयशुदा है तो फिर हमारे इख्तियार की क्या हैसियत है?

जी बिल्कुल। शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत उज़ैर अल सलाम के इस बाब में तकदीर का एक ऐसा अनोखा फलसफा पेश करते हैं जो हमें मजबूरी के तसवुर से उठाकर एक गहरे राज की तरफ ले जाता है जिसे वो सिरल कदर कहते हैं। यह वो राज है जिसे जानने की तमन्ना जब हजरत उज़ैर अल सलाम ने की तो उन्हें तबीह की गई कि इस रास्ते पर

महज अक्ल के जोर पर नहीं चला जा सकता। और यही वह मकाम है जहां तकदीर का सवाल सिर्फ बाहर की दुनिया तक महदूद नहीं रहता बल्कि इंसान को अपनी ही हकीकत के सामने ला खड़ा करता है। आइए आज फिक्रनामा में हम तकदीर के इसी राज के पर्दे उठाते हैं और देखते हैं कि शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के नजदीक हमारी जिंदगी का नक्शा आखिर

तैयार कौन करता है। देखिए यह जब कदर का जो मसला है ना यानी इंसान का अपना इख्तियार कितना है और तकदीर क्या है? यह एक ऐसी उलझन है जो हम में से हर बाशूर इंसान को कभी ना कभी जरूर सताती है। हम मंतकी तौर पर यह सोचने लगते हैं कि अगर अल्लाह ताला हर चीज का इल्म रखता है और सब कुछ पहले से तयशुदा है तो तो फिर हम तो

महज कठपुतलियां हुए। एक ऐसी लिखी हुई किताब के किरदार जिनकी अपनी कोई मर्जी ही नहीं। सही कह रही हैं आप। लेकिन जब हम फुसूसुल हिकम का मुताला करते हैं। खासतौर पर फस हजरत उजैर अल सलाम यानी हिकमत कदरिया को पढ़ते हैं तो वो हमें इस रिवायती और आम सी सोच से हटाकर एक बहुत ही हैरतंगेज मकाम पर ले जाते हैं। मैं सोच

रही थी कि हम आज इस गु्थी को बिल्कुल बुनियादी सतह से सुलझाना शुरू करें। जरूर यह बहुत जरूरी है कि बुनियाद वाजे हो। सबसे पहले मुझे यह बताएं कि यह जो दो इस्तिलाहात हैं जिन्हें हम अक्सर रोजमर्रा गुफ्तगू में एक ही मायीने में इस्तेमाल कर जाते हैं। यानी कजा और कदर। शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के नजदीक इन दोनों का असल गहरा और अलग-अलग मफूम क्या

है? देखें यह वाकई इंसानी शूर का एक निहायत बुनियादी और बहुत ही नाजुक सवाल है। शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल कजा और कदर की जो तशरीह फरमाते हैं ना वो हमारे आम और सतही मफाहिम से बहुत मुख्तलिफ है। और इंतहाई लतीफ है। शेख के नजदीक कजा से मुराद अशिया पर अल्लाह ताला का वह

मजमुई यानी वह कुल्ली फैसला है जो उसके इल्म कामिल पर मबनी है। मतलब यह एक हतमी फैसला है जो कायनात के मजमुई निजाम का मुकम्मल इहा किए हुए हैं। लेकिन जब हम कदर की बात करते हैं तो कदर से मुराद उन अशिया का अपने असल माखस से वजूद में आने का एक खास वक्त और उनकी एक मुकररा मिकदार। मुकररा मिकदार से आपकी क्या मुराद है?

यानी वो शय कब, कहां और किस हद तक जाहिर होगी? इसमें इस जुहूर में जर्रा बराबर भी कमी या बेशी की गुंजाइश नहीं होती। कजा एक जामे फैसला है और कदर उस फैसले के निफाज की यानी उसके लागू होने की तफसीली और वक्त पैमाइश का नाम है। सही। अगर मैं इसे एक जदीद मिसाल से समझना चाहूं तो क्या हम यह कह सकते हैं कि कजा

एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट का मास्टर ब्लूप्रिंट है जिसमें पूरी इमारत का हत्मी नक्शा मौजूद है? हां, यह तशबह बहुत करीब है। और कदर उस इमारत की तामीर के दौरान किसी एक खास लम्हे में एक खास मकाम पर एक मखसूस ईंट रखे जाने का नाम है। यानी कजा वह मजमूई उसूल है और कदर उसका अमली और निपातुल्ला ज़हूर है। बेशक मास्टर ब्लूप्रिंट और ईंट के रखे

जाने का वक्त बिल्कुल कजा और कदर के ताल्लुक को वाज़ कर देता है। लेकिन देखें इस ब्लूप्रिंट को समझने के लिए ना हमें इससे भी एक कदम पीछे जाना होगा। और यहीं पर शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल वो अज़म और बुनियादी उसूल पेश फरमाते हैं जिसे समझे बगैर हम तकदीर के राज तक पहुंच ही नहीं सकते। शेख फरमाते हैं, "अल्लाह ताला का फैसला उसके इल्म पर मबनी है। और उसका

इल्म उन चीजों को वैसा ही जानता है जैसी वह अपनी असल में है।" इल्म इलाही किसी शय पर जबरदस्ती कोई ऐसी सिफत या कैफियत मुसल्लत नहीं करता जो उस शय की अपनी असली माहिियत में मौजूद ना हो। यानी वो शय बजाते खुद जो है इल्म उसे वैसा ही जानता है। जी। इल्म तो महज उसका एहाता करता है। उसे जानता है कि वो शय अपनी जात में अपनी हकीकत में आखिर है क्या? जो चीज जैसी है

इल्म इलाही में वो बिल्कुल वैसी ही मालूम है। इल्म मालूम किताबे है। सही। कायनात और हकीकत का ज़हूर दरअसल चीजों की उसी अपनी अंदरूनी फितरत और माहियत के ऐन मुताबिक हो रहा होता है। अगर कायनात का यह सारा फैलाव और इसमें मौजूद हर शय की हरकत उनकी अपनी बाततिनी हकीकत का जुहूर है तो फिर इस पूरे निजाम में इल्म, इरादा और मशीयत का बाहमी रब्त कैसे बनता है? यह बहुत अहम सवाल है।

मतलब हम अक्सर सुनते हैं कि जो अल्लाह की मशीयत होती है वही होता है। तो अगर हकीकत अंदर से आ रही है तो फिर मशीयत इरादा और इल्म एक दूसरे के साथ कैसे जुड़े हुए हैं? देखें शेख-ए अकबर इबने अरबी इस बाहमी रब्त को निहायत सादगी मगर बारीक बीनी से खोलते हैं। वो फरमाते हैं कि यह सब एक ही जंजीर की कड़ियां हैं। लेकिन इनकी एक खास तरतीब है। वो तरतीब क्या है? सबसे पहले इल्म है।

अल्लाह का इल्म किसी शय के उस हकीकत को जानता है जो वह शय अपनी जात में होती है। फिर इस इल्म की बुनियाद पर मशीयत यानी अल्लाह की चाहत हरकत में आती है जो उस शय के ज़हूर का तकाजा करती है। अच्छा इल्म के बाद मशीयत जी। और फिर इरादा उस मशीयत को एक खास वक्त और खास सूरत में नाफिज करता है। यानी

इरादा मशीयत के ताबे है। मशीयत इल्म के ताबे है और इल्म उस शय की अपनी असल हकीकत के ताबे है। सही। और यह जो शय अपनी जात में जो कुछ है जो उसकी असल हकीकत है क्या शेख- अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल उसे ही ऐनने साबिता कहते हैं क्योंकि फिक्रेनामा की पिछली निशिस्तों में भी हमने आया साबितता का

जिक्र किया है। जी, वो शय अपनी जात में जो कुछ है, वजूद की दुनिया में कदम रखने से पहले इल्म इलाही में जिस हालत में अजल से मौजूद है, शेख की इस्तलाह में उसे ही ऐनने साबितता कहते हैं। तो आया साबितता वो अजली और गैर मुतबद्दल हक़यक हैं जो अल्लाह के इल्म में हमेशा से मौजूद हैं। है ना?

बेशक। और उनमें कोई तब्दीली नहीं होती। बिल्कुल। अगर मैं इसे यानी रोजमर्रा की किसी मिसाल से समझने की कोशिश करूं तो क्या यह किसी बीज की तरह है? मतलब जैसे अगर एक सेब का बीज मिट्टी में बोया जाए तो वो सेब का दरख्त ही बनेगा ना?

जी बिल्कुल। तो मिट्टी, पानी या सूरज उस पर जबरदस्ती तो नहीं कर रहे कि तुम सेब ही बनो। बल्कि वो बीज यानी वो खुद अपने अंदर सेब के दरख्त का पूरा नक्शा और तकाजा लेकर आया है। क्या ऐसा ही है?

बिल्कुल दुरुस्त। और यहीं पर शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह अदले इलाही के अज़म तरीन तसवुर को वाज़ करते हैं। शेख फरमाते हैं कि अल्लाह ताला कायनात के निजाम में कामिल अदल फरमाता है। और वो अदल क्या है इस तनाज़िर में?

अदल यह है कि अल्लाह ताला किसी पर कोई चीज जबरदस्ती मुसल्लत नहीं करता। हर शय को वही कुछ अता किया जाता है। उसे वजूद के उसी मुकाम पर रखा जाता है जिसका तकाजा उसकी अपनी ऐसा साबता उसका अपना अंदरूनी सच कर रहा होता है। यानी कोई जबर नहीं। बिल्कुल कोई जबर नहीं। वो शय यानी वो बीज अपनी इस्तेदा के मुताबिक जो मांग रहा होता है। फैज इलाही उसे बस वही अता कर देता है।

कोई जबरदस्ती नहीं। लेकिन यहां एक मतलब थोड़ी हैरत और उलझन भी हो रही है। जी जी बताइए। अगर हम इस बात को मान ले ना तो यहां तो एक और बहुत बड़ी और झुंझोर देने वाली उलझन खड़ी हो गई। वो कैसे?

वो ऐसे के अगर मैं वह सेब का बीज हूं, और मेरा एनेसा साबता या मेरी अंदरूनी हकीकत यह तय कर रही है कि मैंने जिंदगी में क्या फैसले करने हैं और मेरा अंजाम क्या होगा, तो वह हकीकत मेरी तो बनाई हुई नहीं है ना। वजा फरमाया। मैंने तो अपना एन ए साबता खुद डिजाइन नहीं किया। तो फिर अगर मैं सिर्फ अपनी ही अंदरूनी हकीकत का एक पहले से लिखा हुआ स्क्रिप्ट प्ले कर रही हूं तो मुझसे मेरे आमाल का हिसाब किस बात का लिया जाएगा?

हम्म। यह तो फिर वही बात आ गई कि इंसान मजबूर है महज। बस फर्क यह है कि पहले हम बैरूनी मजबूरी को रो रहे थे। अब हम अपनी ही अंदरूनी हकीकत के कैदी बन गए। यह सवाल वाकई इंतहाई शानदार है और हकीकत यह है कि इंसानी शूर जब भी तकदीर पर गौर करता है ना तो वह इसी मकाम पर आकर एक बंद गली में फंस जाता है। शेख- अकबर इब्ने अरबी इस उलझन को फौरन किसी मतलब सतही जवाब से हल करने की

कोशिश नहीं करते। वह इस उलझन को उसकी आखिरी हद तक गहरा होने देते हैं। वह वाज़ करते हैं कि यह वह मुकाम है जहां दरअसल इंसानी अक्ल की सरहद खत्म हो जाती है। अक्ल की सरहद यानी हम उसे सोच कर नहीं समझ सकते। बिल्कुल नहीं। हमें यह समझना होगा कि हमारी अक्ल कैसे काम करती है। अक्ल की साख्त ही ऐसी है कि वह हमेशा जमानो मकान यानी टाइम और स्पेस के दायरे में काम करती

है। इल्लत और मालूल यानी कॉज एंड इफेक्ट। अक्ल कहती है कि पहले एक काम हुआ फिर उसका नतीजा निकला। सही। लेकिन यह जो ऐसा साबता और सिर्रे कदर का राज है यह तो जमानो मकान की इन हुदूद से मावरा है। यह तो वजूद में आने से पहले की हकीकत है। अच्छा यानी जब टाइम और स्पेस था ही नहीं। बिल्कुल। तो अक्ल इस मकाम पर आकर बेबस हो जाती है। क्योंकि जिस औज़ार से यानी अक्ल

से हम इस राज को मापने की कोशिश कर रहे हैं वो औज़ार तो इस दुनिया के लिए बना है ना। हम जबकि तकदीर का राज इस दुनिया से बाहर का है। तो अगर अकल यहां आकर जवाब दे जाती है तो फिर इंसान इस राज को कैसे समझे? क्या हम इस सवाल को यूं ही अधूरा छोड़ दें?

नहीं अधूरा नहीं छोड़ना। शेख फरमाते हैं कि जब अक्ल की हद खत्म हो जाती है तो वहां से इल्म का एक नया जरिया शुरू होता है जिसे वह ज़क कहते हैं। ज़ॉक मतलब वो जो हम आम जुबान में कहते हैं कि फलाह का ज़ौक बड़ा अच्छा है। नहीं नहीं इस ज़ॉक से मुराद कोई जिस्मानी जायका या वो आम कसम नापसंद नहीं है। और ना ही यह कोई फलसफियाना इस्तलाह है। तो फिर शेख के नजदीक ज़ौक क्या है? है।

ज़ौक एक बात तजुर्बा है। एक रूहानी मुशायदा है। जहां इंसान हकायक को बराहेरा उनकी असल हालत में देखता है। अच्छा यानी डायरेक्ट एक्सपीरियंस। जी। ये अकली दलाइल से हासिल नहीं होता। हम्। बल्कि यह एक कैफियत है जिसमें इंसान मकान की कैद से निकल कर यह मुशायदा करता है कि हकीकत में वजूद सिर्फ एक ही है। हम और उसकी अपनी हस्ती उसके सामने मादूम हो जाती है। एहतेसाब और मजबूरी का ये जो सवाल

आपने पूछा ना यह उस वक्त तक हल नहीं हो सकता जब तक इंसान अकल के दायरे से निकल कर ज़क के उस मुकाम तक ना पहुंचे। जहां वो अपनी ही हकीकत को एक बिल्कुल मुख्तलिफ तनाजुर में देख सके। बिल्कुल। एक वसीतर तनाजुर में। तो अकल की इसी बेबसी और ज़ौक की इसी जरूरत को अगर हम सामने रखें तो क्या यही वजह थी कि जब हम कुरान मजीद में सूरतुल बकरा में हजरत उज़ैर अल सलाम का वाक्या पढ़ते हैं तो हमें एक अजीब सी सुरते हाल नजर आती है

Frequently asked questions

कजा से मुराद अल्लाह ताला का मजमुई कुल्ली फैसला है जबकि कदर उस फैसले के निफाज की तफसीली और वक्त पैमाइश है।

हजरत उज़ैर अल सलाम तकदीर का पोशीदा राज यानी सिरल कदर और उसके मैकेनिज्म को जानना चाहते थे।

वह तनबीह सजा नहीं बल्कि उनके मंसबे नबूवत के फराइज़ और दुनिया के निजाम को बचाने के लिए थी।