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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 10: Ibn Arabi's Most Dangerous Chapter on Guidance | Hazrat Dawud | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख इबने अरबी हजरत हूद अलैहिस्सलाम की हिकमत का आगाज 586 हिजरी में कुर्तुबा के एक जाती मुशायदे से करते हैं जहाँ उन्होंने तमाम अंबिया और रसूलों की अरवाओं को एक साथ देखा।
  • शेख इबने अरबी सूरह हूद की आयत नंबर 56 के हवाले से समझाते हैं कि कायनात का हर जर्रा और हर मखलूक सीधे रास्ते पर चलने पर मजबूर है क्योंकि उसकी पेशानी का मुकम्मल इख्तियार अल्लाह के हाथ में है।
  • हकीकत इलाहिया एक ही है लेकिन हर शख्स अपनी इस्तेदाद, अपने जर्फ और अपने रूहानी मकाम के मुताबिक पानी की मिसाल की तरह उसका अलग जायका और तजुर्बा महसूस करता है।
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Transcript

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फिक्रनामा में खुशामदीद। आज हम फसूसुल हिकम के उस बाब को ज़रे बहस लाने जा रहे हैं जो इस तसनीफ का सबसे ज्यादा ज़रे बहस, सबसे ज्यादा मशहूर कुन और सबसे ज्यादा नाजुक और अमीक बाब समझा जाता है। हजरत हूद अलह सलाम की हिकमत का फुस। यह वो बाप है जो एक तरफ तो वाहद हकीकी का ऐसा समुंदर पेश करता है जिसकी गहराई दिलो दिमाग को

मुभूत कर देती है और दूसरी तरफ अगर इसे पूरे सिया सबाग पूरी एहतियात और पूरी जिम्मेदारी के बगैर समझा जाए तो यह गलतफहमियों के ऐसे तूफान बरपा कर सकता है जो इंसान को रूहानी रास्ते ही से भटका दे। यहां यह नजाकत किसी मुमानियत की अलामत नहीं बल्कि इल्म की गहराई की निशानानदेही है। यह उस चैलेंज की मानिंद है जो एक गहरे समुंदर में उतरने वाले गवास को दरपेश होता

है। अगर तरबियत हो, साजो सामान मुहैया हो और रहनुमाई मौजूद हो तो यही गहराई बेशकीमत मोती अता करती है और अगर यह सब ना हो तो यही गहराई हलाकत का सबब भी बन सकती है। तो आइए एहतियात, जिम्मेदारी और एक खुले दिल के साथ इस सफर का आगाज करते हैं। शेख इबने अरबी इस बाप का आगाज़ अपने एक जाती मुशायदे

से करते हैं जो उन्हें 586 हिजरी में कुर्तुबा में हुआ। वो बताते हैं कि उन्होंने तमाम अंबिया और रसूलों की अरवाओं को एक साथ देखा। आदम अल सलाम से लेकर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तक। लेकिन उन तमाम में से सिर्फ एक पैगंबर ने उनसे कलाम किया और वह थे हजरत हुद अलहसलाम। जी। जैसे उस हिकमत को बयान करने के लिए खासतौर

पर उन्हीं का इंतखाब किया गया हो। और यह इंतखाब ही इस पूरे फुसकी आप कह लें कि कुंजी है। फुस का मतलब है नगीना यानी किसी अंगूठी का मरकजी जोहर। तो यहां हर पैगंबर की हिकमत का जोहर बयान हो रहा है। हजरत हूद अली सलाम ने शेख से जो कलाम किया वो दरअसल एक कुरानी आयत की तरफ इशारा था जो इस पूरी बहस की बुनियाद है।

कौन सी आयत? सूद की आयत नंबर 56 कोई चलने फिरने वाला जानदार ऐसा नहीं जिसकी पेशानी उस अल्लाह के हाथ में ना हो। बेशक मेरा रब सीधे रास्ते सिराते मुस्तकीम पर है। यह आयत का दूसरा हिस्सा तो ज़हन को हिला कर रख देता है। जी। असल में शेख इबने अरबी हमें इस आयत को दो हिस्सों में देखने की दावत दे रहे हैं। पहला हिस्सा है कोई चलने वाला ऐसा नहीं

जिसकी पेशानी अल्लाह के हाथ में ना हो। यह एक बहुत बड़ा ऐलान है। इसका मतलब है कि कायनात में कोई भी शय, कोई भी वजूद चाहे वह फरिश्ता हो, इंसान हो, जानवर हो या एक बेजान पत्थर। वो अपनी मर्जी से हरकत नहीं कर रहा। उसका इख्तियार, उसकी सिमत, उसकी तकदीर, उसकी पेशानी अल्लाह के हाथ में है। यानी एब्सोल्यूट कंट्रोल। ठीक है। यह तो समझ में आता है यानी

हाकमियत आला का तसवुर। लेकिन इस आयत का दूसरा हिस्सा है जो सारी बहस को एक नया रुख देता है। मेरा रब सिराते मुस्तकीम पर है। हम तो हमेशा दुआ करते हैं कि ऐ अल्लाह हमें सीधे रास्ते पर चला। हम समझते हैं कि सिराते मुस्तकीम पर चलना हमारा यानी बंदों का काम है। यहां यह कहा जा रहा है कि खुद अल्लाह सिराते मुस्तकीम पर है। यह बात

सुनने में बहुत अजीब लगती है। आइए जरा इसको खोलते हैं। देखें यही वो नुक्ता है जो शेख इबने अरबी रहमतुल्लाह के पूरे निजाम फिक्र का दरवाजा खोलता है। यहां सिराते मुस्तकीम का मतलब वो रास्ता नहीं जिस पर [संगीत] चलने या ना चलने का हमें इख्तियार दिया गया है। बल्कि यहां उससे मुराद वह अटल, सीधा और कायनाती कानून है जिस पर पूरी कायनात और खुद निजाम

इलाही चल रहा है। मतलब यह है कि अल्लाह का हर फेल, हर हुक्म और हर फैसला एक ऐसे सीधे रास्ते पर है जिसमें कोई टेढ़, कोई कजी, कोई जुल्म या कोई बेजाब्तगी नहीं है। तो फिर इसका मतलब यह हुआ कि कायनात का हर जर्रा, हर मखलूक चाहे वो मोमिन हो या काफिर। जी चाहे हिदायत याफ्ता हो या गुमराह वह उसी सीधे रास्ते पर चलने पर मजबूर है क्योंकि उसकी पेशानी यानी उसका

मुकम्मल इख्तियार अल्लाह के हाथ में है। अच्छा तो आप यह कह रहे हैं कि यह कायनात एक अजीमो शान खुदकार निजाम की तरह है जो एक सीधे ट्रैक पर चल रहा है और हम सब इस ट्रेन के मुसाफिर हैं। चाहे हमें यह मालूम हो या ना हो। बिल्कुल। लेकिन यहां फौरन एक सवाल ज़हन में आता है जो शायद हर सुनने वाले को परेशान करेगा। जी जरूर अगर सभी एक ही रास्ते पर हैं अगर हर मखलूक

की पेशानी उसी एक हाथ में है तो फिर हिदायत याफ्ता और गुमराह में क्या फर्क रह जाता है? कुरान तो बार-बार इन दो ग्रहों का जिक्र करता है। उनके अलग-अलग अंजाम की बात करता है। यह दो अलग-अलग तजुर्बात कैसे हैं? अगर रास्ता एक ही है, यह तो एक बहुत बड़ा तजाद लगता है। यह तजाद नहीं बल्कि शूर के दो मुख्तलिफ दर्जात का फर्क है। शेख के मुताबिक फर्क रास्ते में नहीं है। मुसाफिर की आगाही में है।

आगाही में? वो फरमाते हैं कि लोग दो तरह के हैं। एक वह हैं जो उस रास्ते पर चल रहे हैं और साथ ही यह जानते और पहचानते भी हैं कि यह सीधा रास्ता है। यह किसकी तरफ जा रहा है और इसका अंजाम क्या है। यह आरिफीन है। और दूसरे दूसरे वह हैं जो चल तो उसी रास्ते पर रहे हैं मगर वह इस हकीकत से ना वाकिफ हैं। वह अंधेरे में सफर कर रहे हैं। उन्हें नहीं मालूम कि रास्ता कौन सा है और

मंजिल क्या है? गोया एक शख्स आंखें खोलकर सफर कर रहा है और दूसरा आंखें बंद करके। मगर दोनों हैं एक ही शाहरा पर। बिल्कुल। यानी एक को मालूम है कि हर मोड़, हर उतार-चढ़ाव उसी मंजिल की तरफ ले जा रहा है। जबकि दूसरा हर झटके पर चीखता है कि मैं भटक गया या मेरे साथ जुल्म हो गया। बिल्कुल। आरिफ बसीरत की बुनियाद पर अल्लाह की तरफ बुलाता है। वो जानता है कि हर शय

का अंजाम उसी की तरफ है। जबकि गैर आरिफ अपनी महदूद सोच और जहालत की बुनियाद पर चीजों को अच्छा [संगीत] या बुरा समझता है। सही। शेख फरमाते हैं कि इस पहलू से देखा जाए तो कोई भी मखलूक [संगीत] अपनी असल में ना गुमराह है और ना ही मगजूब। क्योंकि गुमराही और गजब यह आरजी कैफियात हैं जो हमारे महदूद तजुर्ब में आती हैं। तो हत्मी अंजाम क्या है?

हर शय का हत्मी अंजाम और उसकी वापसी उसी एक रहमत की तरफ है जो हर चीज पर मोहित है और जो जैसा कि हदीस में आया उसके गजब पर सबकत ले गई। यह तसवुर में लाना फिर भी बहुत मुश्किल है कि हकीकत एक ही है। लेकिन उसका तजुर्बा इतना मुख्तलिफ कैसे हो सकता है। एक के लिए वही रास्ता सुकून का बायस है और दूसरे के लिए आज़ियत का। क्या शेख इसको समझाने के लिए कोई ठोस मिसाल देते

हैं ताकि यह बात सिर्फ फलसफा ना रहे बल्कि हमारे तजुर्बे के करीब आ जाए? जी बिल्कुल। और यह उनकी तालीमात का एक बहुत ही खूबसूरत पहलू है। वो इसे इल्म ज़ॉक कहते हैं। यानी चख कर जानने वाला इल्म या एक्सपीरियंशियल नॉलेज। यह वो इल्म है जो किताबों से नहीं बल्कि बराएरा तजुर्बे से हासिल होता है। वो पानी की [संगीत] मिसाल देते हैं। पानी अपनी हकीकत में एक ही शय

है। H2O लेकिन मुख्तलिफ जगहों पर मुख्तलिफ हालात में उसका जायका, उसकी तासीर और उसका तजुर्बा बदल जाता है। दरिया का पानी मीठा होता है। समंदर का खारा, चश्मे का साफ और शफाफ, जोहड़ का गदला। मगर हकीकत में यह सब पानी ही हैं। उनकी असल हकीकत तब्दील नहीं होती। यानी हकीकत इलाहिया भी उसी एक पानी की तरह है। लेकिन हर शख्स अपनी इस्तेदाद, अपने

जर्फ और अपने रूहानी मकाम के मुताबिक उसका अलग जायका महसूस करता है। बिल्कुल। हकीकत इलाहिया यानी अ डिवाइन रियलिटी एक ही है। लेकिन हर शख्स हर मखलूक, अपनी इस्तेदाद, अपनी हालत और अपने जर्फ के मुताबिक उसका तजुर्बा करता है। एक आरिफ के लिए वो तजुर्बा मीठे पानी जैसा है। यानी कुर्बत और मोहब्बत का। एक गाफिल के लिए वो तजुर्बा खारे पानी जैसा है।

यानी दूरी और तकलीफ का। लेकिन दोनों सूरतों में वह उसी एक हकीकत का तजुर्बा कर रहे होते हैं। और इसकी बुनियाद वह मशहूर हदीस कुदसी है जिसमें अल्लाह फरमाता है जब मेरा बंदा नवाफिल के जरिए मेरे करीब होता है तो मैं उसके कान बन जाता हूं जिससे वह सुनता है और उसकी आंख जिससे वह देखता है। यानी सुनने वाला, देखने वाला, पकड़ने वाला हाथ तो अलग-अलग नजर आ रहा है। लेकिन इन

सबके पीछे जो असल सोर्स है वह एक ही जात है। यह कसरत में वाहदत का एक बेमिसाल नमूना है। ठीक है। यह मंतिक यहां तक तो समझ आ [संगीत] रही है। एक निजाम और उसमें हमारे शूर के मुताबिक मुख़्तलिफ तजुर्बे। लेकिन शेख इबने अरबी इस मंतिक को उसके सबसे ज्यादा इंतहाई और सच कहूं तो सबसे ज्यादा मुतनाजा नतीजे पर ले जाते हैं। जब

वो कौमे आद की तबाही का जिक्र करते हैं। यह वो मकाम है जहां अक्सर लोगों के लिए उसे कुबूल करना बहुत मुश्किल हो जाता है। जी क्योंकि यहां वो एक ऐसे वाक्य की तशरी कर रहे हैं जिसे हम सिर्फ और सिर्फ अज़ाब और सजा के तौर पर देखते हैं। ये एक आरिफ के मुशाहदे की इंतहा है। कुरान कहता है कि जब कौमे आद ने तूफान को अपनी तरफ आते देखा तो खुश होकर कहा यह बादल है जो हम पर

बारिश बरसाएगा। शेख यहां एक नुक्ता पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि उस कौम ने अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान किया कि यह रहमत की बारिश है और हदीस कुदसी है कि मैं अपने बंदे के गुमान के साथ होता हूं। लेकिन उन पर तो बारिश नहीं बरसी। उन पर तो अज़ाब आया। वह तबाह हो गए। यह अच्छे गुमान का क्या नतीजा निकला? शेख कहते हैं कि अल्लाह ने उन्हें वह नहीं दिया जो उन्होंने मांगा बल्कि उससे भी बेहतर चीज

[संगीत] अता की। कुरान में अल्लाह का जवाब है नहीं बल्कि यह वो चीज है जिसकी तुम जल्दी मचा रहे थे। एक हवा यानी री जिसमें दर्दनाक अज़ाब यानी अज़ाबुन अलीम है। अब यहां शेख इबने अरबी अल्फाज़ के बातिन में खोता लगाते हैं। आप यहां अरबी अल्फाज़ की जड़ों यानी रूट्स की बात कर रहे हैं। जैसे लफ्ज, रीख यानी हवा, एक आम सुनने वाले को यह लग सकता है

कि यह महज अल्फाज़ को तोड़ मरोड़ कर अपनी मर्जी का मतलब निकालने की कोशिश है। क्या आप वजाहत कर सकते हैं? देखें शेख इबने अरबी के नजदीक अरबी जुबान खासतौर पर कुरान की जुबान कोई हादसाती या आर्बिट्रेरी जुबान नहीं है। वो इसे एक मुकद्दस जुबान मानते हैं जिसमें अल्फाज के हुरूफ और उनकी जड़े गहरी और बातनी हकीकतों को जाहिर करती हैं। उनके लिए यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि

लफज़ रिया जिसका मतलब हवा है। इसी जड़ से निकला है जिससे लफज़ राह निकला है। जिसका मतलब सुकून या कंफर्ट है। उनके नजदीक यह एक इलाही इशारा है कि उस हवा की जाहिरी तबाही में एक बात सुकून छुपा हुआ था। तो इस रीह में राह या सुकून क्या था?

सुकून यह था कि इस हवा ने उनकी रूहों को यानी अरवाह को उनके तारीख और गुनाह आलूद जिस्मों की कैद से आजाद कर दिया। उनके लिए यह एक तरह की प्यूरिफिकेशन थी। और फिर वह दूसरा लफ्ज अज़ाब को लेते हैं। आमतौर पर इसका मतलब तकलीफ या सजा है। लेकिन अरबी में अजब, मीठे और खुशगवार पानी को भी कहते हैं। तो वह कहते हैं कि उनके लिए यह

तजुर्बा बातनी तौर पर मीठा था। क्योंकि यह उन्हें उनकी असल की तरफ लौटा रहा था। उनकी वाहिद तकलीफ यह [संगीत] थी कि उन्हें अपनी जानी पहचानी दुनिया, अपने घरों और माल से जुदा होना पड़ा। यह एक ऐसा मुशायदा है जो जाहिर से आगे हकीकत को देखता है। लेकिन इससे तो यह मतलब निकल सकता है कि गुनाह की कोई सजा ही नहीं। यह तो गुनाह की वकालत करने के मुतरादिफ हो सकता है।

बिल्कुल नहीं। और शेख इस बारे में बहुत वाज़ हैं। [संगीत] यह गुनाह की वकालत नहीं बल्कि इलाही निजाम की वसत का बयान है। यह इस बात का ऐलान है कि अल्लाह की रहमत इतनी वसी है कि वो इन चीजों को भी अपनी लपेट में ले लेती है जिन्हें हम अपनी महदूद नजर से महज अज़ाब समझते हैं। यह एक आरिफ का मुशाहदा है। आम इंसान का कानून नहीं यह शरीयत को रद्द नहीं करता बल्कि हकीकत की

एक गहरी परत को खोलता है। तो फिर इस सारी गहरी और पेचीदा गुफ्तगू का निचोड़ क्या है? यह सारी बातें हमें अमली जिंदगी में कहां लेकर जाती हैं? हजरत हूद अलहसलाम की हिकमत हमें क्या आखिरी नसीहत देती है?

Frequently asked questions

शेख इबने अरबी ने सूरह हूद की आयत नंबर 56 को इस पूरी बहस की बुनियाद बनाया है जिसके मुताबिक कोई चलने फिरने वाला जानदार ऐसा नहीं जिसकी पेशानी अल्लाह के हाथ में न हो।