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Fusus al-Hikam Part 9: Your Reality is an Illusion | Ibn Arabi | Hazrat Yusuf (AS) | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि इस दुनिया में हमारी पूरी जिंदगी की कैफियत बिल्कुल ऐसी है जैसे ख्वाब के अंदर एक और ख्वाब।
- आलम ख्याल का उसूल यह है कि यहां हकायक अलामती लिबास पहनकर जाहिर होते हैं, जैसे हजरत युसुफ अल सलाम के ख्वाब में सितारे भाइयों की अलामत थे।
- इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलैह के मुताबिक यह कायनात अल्लाह का साया या जिल है जिसकी अपनी कोई खुदी या असल वजूद नहीं होता।

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Transcript
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जैसे ख्वाब देखने वाले को ख्वाब के दौरान 100 फीसद यकीन होता है कि वह जाग रहा है। जो कुछ हो रहा है वह हकीकत है और उसे उस पर कोई शक नहीं होता। इसी तरह हमें इस दुनियावी जिंदगी में अपनी बेदावी के हकीकी होने पर कामिल यकीन है। हम इस पर सवाल ही नहीं उठाते। वो फरमाते हैं कि यह कायनात अल्लाह का साया जिल है। जरा साईं की फितरत पर गौर करें। साए का अपना कोई वजूद होता है?
नहीं। उसकी अपनी कोई खुदी, कोई इरादा, कोई ताकत होती है? नहीं होती। वो अपने वजूद के लिए मुकम्मल तौर पर दो चीजों का मोहताज होता है। एक वो जिस्म जिसका वो साया है और दूसरी वो रोशनी जिसकी वजह से वो नजर आ रहा है। अगर आप जिस्म हटा दें तो साया फौरन खत्म। अगर रोशनी बंद कर दें तो साया गायब। यानी हम और यह पूरी दुनिया एक साए की तरह है जिसकी अपनी कोई खुद, कोई असल वजूद ही नहीं। जी।
तो फिर असल वजूद किसका है? असल वजूद [संगीत] सिर्फ और सिर्फ उस जात का है जिसका यह साया है। यानी अल्लाह सुभाना ताला। और बाकी सब बाकी सब उसी एक हकीकी वजूद का अक्स या साया है। लोग सोए हुए हैं और जब वो मरते हैं तो जाग उठते हैं। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह
वसल्लम का यह फरमान आलीशान हजरत यूसुफ अल सलाम के खुस की बुनियाद है। इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि इस दुनिया में हमारी पूरी जिंदगी की कैफियत बिल्कुल ऐसी है जैसे ख्वाब के अंदर एक और ख्वाब। जरा गौर करें। कभी ऐसा हुआ है कि आप ख्वाब में खुद को ख्वाब देखते हुए देख रहे हो?
फिर अचानक आप ख्वाब में ही जाग जाएं। मगर हकीकत में अभी भी सो रहे हो? तो सवाल यह है कि अगर आप ख्वाब में जाग भी जाएं तो क्या आप वाकई जागे? यहीं से इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अल का वह इंकलाब आफरीन जवाब शुरू होता है जहां वह हजरत यूसुफ अली सलाम के ख्वाब की तमसील के जरिए फरमाते हैं। तुम अभी तक ख्वाब ही में हो। चलिए यहां [संगीत] से उस सफर का आगाज करते
हैं जो ख्वाब और हकीकत के दरमियान छुपी लकीर को समझने में हमारी रहनुमाई करेगा। ये तो एक बहुत ही गहरी और जहन को झिंझोर देने वाली बात से आगाज हुआ है। जी बिल्कुल। आमतौर पर तो हम यही समझते हैं ना कि नींद ख्वाब है और यह जो जिंदगी है यह हमारी बेदारी यह हकीकत है। लेकिन नबी-ए करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम का यह
फरमान तो जैसे हमारी पूरी समझ को ही उलट देता है। इसका असल मतलब क्या है? यह हमारी रोजमर्रा की जो समझ है उसके बिल्कुल बरक्स है। और इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अल इसी नुक्त को खोलते हैं। वो फरमाते हैं कि जिसे हम बेदारी कहते हैं वो हकीकत में एक और तरह का ख्वाब ही है। वो इसके लिए आलम ख्याल की इस्तलाह इस्तेमाल करते हैं। यानी हमारी नींद के ख्वाब और हमारी यह जागती हुई जिंदगी। अच्छा। यह दोनों ही ख्याल की दुनिया के
मुख्तलिफ दर्जे हैं। यानी दोनों में फर्क सिर्फ आप कह लें कि इस्तेहकाम का है कि हमारी बेदारी वाला ख्वाब ज्यादा ठोस और देरपा लगता है। जी फर्क सिर्फ कैफियत का है। जैसे ख्वाब देखने वाले को ख्वाब के दौरान 100 फीसद यकीन होता है कि वह जाग रहा है। जो कुछ हो रहा है वह हकीकत है और उसे उस पर कोई शक नहीं होता। इसी तरह हमें इस दुनियावी जिंदगी में अपनी बेदारी के हकीकी होने पर कामिल यकीन है। हम इस पर सवाल ही नहीं
उठाते। बिल्कुल। और कभी-कभी तो ख्वाब इतने हकीकी लगते हैं कि आंख खुलने के बाद भी कई मिनट तक इंसान उसी कैफियत में रहता है। जी। दिल की धड़कन तेज होती है या खुशी का एहसास बाकी रहता है। मुझे याद है एक बार मैंने ख्वाब में देखा कि मैं किसी बहुत ऊंची जगह से गिर रही हूं। और जब आंख खुली तो मेरा जिस्म पसीने से शराबूर था और दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। हम
तो यह ख्याल कि शायद हमारी यह जिंदगी भी वैसी ही एक कैफियत हो जो हमें बहुत हकीकी लग रही है। यह बहुत गहरा है। जी। और इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह इसी को समझाने के लिए वही की मिसाल देते हैं। हजरत आयशा रदी अल्लाह अन्हा फरमाती हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम पर वही का आगाज सच्चे ख्वाबों से हुआ था। जो सुबह की रोशनी की तरह वाज़ होते थे। जी। लेकिन इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह फरमाते
हैं कि यह कैफियत सिर्फ इब्तदाई छ महीनों तक महदूद नहीं थी बल्कि आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की पूरी दुनियावी जिंदगी और इसी तरह हर इंसान की जिंदगी एक ख्वाब दर ख्वाब की सी कैफियत है। यहां तक कि जब वही नाजिल होती थी वो भी इसी आलम ख्याल का एक हिस्सा था। वो आलम ख्याल की एक बहुत बुलंद और गहरी सतह थी। जब आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम
पर वही नाजिल होती थी तो आप इस आम हिस्स दुनिया से निकलकर हजरत उल खयाल यानी आलम खयाल की बारगाह में तशरीफ ले जाते थे। अच्छा यह नींद नहीं थी। यह हकीकत को एक और सतह पर उसके खालिस तरीन रूप में महसूस करने का अमल था। यानी यह आम ख्वाबों और आम बेदारी दोनों से बुलंद एक मुकाम था। बिल्कुल। गोया आप एक ख्वाब से निकलकर एक ज्यादा हकीकी ख्वाब में दाखिल हो रहे हो।
[संगीत] तो अगर यह जिंदगी एक ख्वाब है तो फिर इसमें नजर आने वाली हर चीज का कोई मतलब भी होना चाहिए जैसे ख्वाबों की ताबीरर होती है। जी इस उलझन से निकलने का कोई रास्ता है? क्या हजरत युसुफ अल सलाम की हिकमत हमें इसी बारे में कुछ सिखाती है?
बिल्कुल। यहीं पर हजरत युसुफ अल सलाम की हिकमते नूरी हमारे लिए मशले राह बनती है। हम उनका वो मशहूर ख्वाब याद कीजिए कि मैंने 11 सितारों और सूरज चांद को अपने आगे सजदा करते देखा। जी। उस ख्वाब की सबसे अहम बात यह है कि इसमें चीजें अपनी असल शक्ल में नहीं आई बल्कि एक रमज एक अलामत बनकर आईं। यानी सितारे हकीकत में सितारे नहीं थे और
ना [संगीत] ही सूरज चांद असल फलकीय अम थे। बिल्कुल नहीं। सितारे उनके 11 भाइयों की अलामत थे और सूरज चांद वालिदैन की सही। ताबीरर का मतलब ही यही है कि जाहिरी सूरत से गुजर कर उसके पर्दे के पीछे छुपी असल हकीकत तक पहुंचा जाए। तो आलम ख्याल [संगीत] का उसूल ही यही है कि यहां हकायक अलामती लिबास पहनकर जाहिर होते हैं। जी बिल्कुल। यानी इसूल के मुताबिक हमारी इस बेदारी वाली दुनिया में भी चीजें महज वही नहीं है
जो वो नजर आती हैं। जी। बल्कि वो किसी गहरी हकीकत की अलामतें हैं। इसकी और क्या मिसालें हैं जो इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अल ने दी हो। जी। उन्होंने कई मिसालें दी हैं। जैसे नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने ख्वाब में इल्म को दूध की शक्ल में देखा जिसे आपने पिया। अच्छा। यहां दूध इल्म की अलामत बनकर आया। और इससे भी ज्यादा वाज़ मिसाल हजरत जिब्राइल अल सलाम का एक इंसान की सूरत में सहाबा इकराम
के सामने आना है। हां वो मशहूर हदीस जिब्राइल जहां एक अजनबी शख्स आकर आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम से ईमान इस्लाम और एहसान के बारे में सवाल करता है। जी और यह बहुत अहम नुक्ता है। जब वो शख्स चला गया तो नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा से पूछा जानते हो यह कौन था? हम फिर खुद ही फरमाया यह जिब्राइल थे जो तुम्हें तुम्हारा दीन सिखाने आए थे। अच्छा।
अब यहां दो सच्चाइयां एक साथ मौजूद हैं। सहाबा की हिस्सी आंख का सच यह था कि वो एक आदमी था और यह बात गलत नहीं थी। सही। लेकिन नबी की बात बसीरत का सच यह था कि उस आदमी की सूरत के पीछे की हकीकत हजरत जिब्राइल अल सलाम थे। एक जाहिरी सूरत थी। एक बात हकीकत। लेकिन यहां एक बहुत लतीफ नुक्ता भी बताया गया है। जब 40 साल बाद हजरत युसुफ अल सलाम के ख्वाब की ताबीरर सामने आई
जी। और उनके वालिदैन और भाई मिस्र में उनके सामने झुके तो उन्होंने फरमाया कि ए मेरे अब्बा जान यह मेरे उस ख्वाब की ताबीरर है जिसे मेरे रब ने सच कर दिखाया। हम इसमें और नबी-ए करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के इदराक में क्या फर्क है? बजाहिर तो ऐसा लगता है कि दोनों एक ही बात कर रहे हैं। यह फुस का सबसे नाजुक और गहरा मकाम है। इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं कि
हजरत युसुफ अल सलाम यहां ऐसे बात कर रहे हैं जैसे कोई ख्वाब से बेदार होकर उसकी ताबीरर बयान करे। अच्छा। उन्होंने ख्वाब यानी 11 सितारे और हकीकत यानी भाइयों का सजदा इनमें फर्क किया। उन्होंने इस दुनियावी वाक्य को सच कहा। तो इसमें क्या हर्ज है? वो तो सच ही था। वाकया हुआ था। वो अपनी सतह पर सच था। लेकिन मोहम्मददी विरसे का इल्म हमें एक और गहरी सतह पर ले जाता है।
वो क्या? हिस्सी दुनिया जिसे हजरत यूसुफ अल सलाम सच कह रहे हैं वह खुद भी आलम ख्याल का ही एक हिस्सा है। यह एक ख्वाब की ताबीरर एक दूसरे ख्वाब में पूरी होने जैसा है। हकीकी बेदारी तो मौत के बाद है। यह इदराक की वो बुलंदी है जो खातमुन नबीन सल्लल्लाहु अलैह वही वसल्लम का खासा है।
यह बात तो इंसान को हिला देती है कि हमारी हकीकत भी एक ख्वाब है। लेकिन इससे एक बहुत बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर यह पूरी कायनात ही एक ख्वाब जैसी है, तो फिर इसकी असल हकीकत क्या है? उस ख्वाब का देखने वाला कौन है?
हम इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह इस बारे में क्या कहते हैं? यहीं से गुफ्तगू एक और गहरी वादी में दाखिल होती है। इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह उस ताल्लुक को समझाने के लिए एक और बेहद ताकतवर तमसील इस्तेमाल करते हैं। वो क्या है? वो फरमाते हैं कि यह कायनात अल्लाह का साया जिल है। साया इसका क्या मतलब है?
जरा साई की फितरत पर गौर करें। साए का अपना कोई वजूद होता है? नहीं। उसकी अपनी कोई खुददी, कोई इरादा, कोई ताकत होती है? नहीं होती। वो अपने वजूद के लिए मुकम्मल तौर पर दो चीजों का मोहताज होता है। एक वो जिस्म जिसका वो साया है और दूसरी वो रोशनी जिसकी वजह से वो नजर आ रहा है। बिल्कुल। अगर आप जिस्म हटा दें तो साया फौरन खत्म। अगर रोशनी बंद कर दें तो साया
गायब। यानी हम और यह पूरी दुनिया एक साए की तरह है जिसकी अपनी कोई खुदी, कोई असल वजूद ही नहीं। जी। तो फिर असल वजूद किसका है? असल वजूद सिर्फ और सिर्फ उस जात का है जिसका यह साया है। यानी अल्लाह सुभाना ताला। और बाकी सब बाकी सब उसी एक हकीकी वजूद का अक्स या साया है। हम जिसे अपनी हस्ती समझते हैं वो दरअसल हमारी नहीं उसी की है। हमारी अपनी कोई हकीकत नहीं।
जी। हम उससे एक लम्हे के लिए भी जुदा नहीं हो सकते जैसे साया अपने जिस्म से जुदा नहीं हो सकता। जी बिल्कुल। कुरान पाक की एक आयत भी शायद इसी तरफ इशारा करती है। अलम तर इला रब्बे का कैफा मदजिल। क्या तुमने अपने रब को नहीं देखा कि उसने कैसे साया फैलाया। बिल्कुल सूर फुरकान आयत 45 यह बहुत गहरी आयत है। [संगीत] इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के मुताबिक यह साया किस
चीज पर पड़ रहा है? यह एक बहुत अहम सवाल है। वो फरमाते हैं कि यह साया अयान साबितता यानी मुमकिनात [संगीत] के अजली उसूलों पर पड़ता है। अच्छा। और इस साए को देखने और समझने के लिए अल्लाह के इस्म अल नूर की जरूरत है। यह अयान साबितता एक बहुत मुश्किल तसवुर है। क्या आप इसे किसी आसान मिसाल से समझा सकते हैं?
जरूर। उसे ऐसे समझें जैसे एक माहिर मेमार या इंजीनियर के जहन में किसी अजीमो शान इमारत का मुकम्मल नक्शा हो। ठीक है। इमारत अभी जमीन पर मौजूद नहीं है। लेकिन उसका पूरा वजूद, उसकी एक-एक तफसील, लंबाई, चौड़ाई, कमरे, दरवाजे सब कुछ इंजीनियर के इल्म में मौजूद है। यानी एक तरह का ब्लूप्रिंट। जी। यह इल्मी वजूद ही इसका ऐसा साबता है।
अब जब इंजीनियर अपने इल्म और इरादे से इस इमारत को बाहर की दुनिया में तामीर करता है तो वह इस इल्मी नक्शे का जुहूर होता है। इसी तरह यह सारी कायनात और इसकी हर शय अपने वजूद में आने से पहले अजल से अल्लाह के इल्म में मौजूद थी। यह इल्मी हकीकतें ही अयाने साबता [संगीत] हैं। और फिर जब अल्लाह ने अपने इस्म अन नूर से तजल्ली फरमाई
तो इन इल्मी हकीकतों का साया इस कायनात की शक्ल में जाहिर हो गया। सुभान अल्लाह। गोया यह दुनिया इन अली हकीकतों का अक्स है जो अल्लाह के नूर की बदौलत हमें नजर आ रहा है। यानी रोशनी के बगैर ना साया नजर आ सकता है ना ही अल्लाह के नूर के बगैर इस कायनात का इदराक मुमकिन है। बिल्कुल। तो इसका मतलब यह हुआ कि हकीकी बेदारी या जागना यह नहीं कि हम सुबह बिस्तर से उठ जाएं।