Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript ·
Fusus al-Hikam Part 13: Ibn e Arabi's POV on the Reality of Spiritual Power | Hazrat Lut | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- इब्ने अरबी के मुताबिक जैसे-जैसे मारफत बढ़ती जाती है वैसे-वैसे मामलात को अपनी मर्जी से बदलने की ख्वाहिश कम होती जाती है।
- हजरत लूत अलै सलाम का यह फरमाना कि काश मुझ में ताकत होती किसी दुनियावी कमजोरी की अलामत नहीं था।
- इल्म हमेशा मालूम के ताबे होता है और कोई भी इंसान अपनी असल फितरत और अपनी अबदी इस्तेदाद से बाहर नहीं जा सकता।

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Transcript
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आमतौर पर रूहानी कमाल का मतलब यह समझा जाता है कि इंसान अपनी हिम्मत, मौजों या करामात के जरिए कायनाती मामलात में मुदाखलत कर सके। लेकिन शेख-ए अकबर इबने अरबी यहां एक ऐसी हकीकत बयान करते हैं जो इसके बिल्कुल बरअक्स है। वो फरमाते हैं कि जैसे-जैसे मारफत बढ़ती जाती है वैसे-वैसे मामलात को अपनी मर्जी से बदलने की ख्वाहिश
कम होती जाती है। यह मारफत का वह बुलंद मकाम है जहां खुद हुजूर अकरम सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की शदीद कलबी ख्वाहिश के बावजूद हिदायत का वो नक्शा जाहिर ना हुआ जो आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम अपने मोहसिन चाचा हजरत अबू तालिब के लिए चाहते थे। क्योंकि शेख के मुताबिक इल्म हमेशा मालूम के ताबे होता है। यानी हर फैसला उसी
हकीकत के मुताबिक जाहिर होता है जो बंदे की अपनी इस्तेदाद में पहले से मौजूद हो और कोई भी अपनी असल से बाहर नहीं निकल सकता। चुनांचे एक आरिफ कुदरत रखने के बावजूद मुदाखलत के बजाय तस्लीम और रजा को तरजीह देता है। आइए आज फिक्रनामा में हजरत लूत अल सलाम की हिकमत मालिकिया को समझते हैं और देखते हैं कि जाहिरी बेबसी के पीछे
हकीकी बातनी कुत कैसे पोशीदा होती है। आज हम फुसूसुल हिकम के 13वें बाप पर बात कर रहे हैं जिसे फुस हजरत लूत अल सलाम कहा जाता है। जी बिल्कुल। और शेख-ए-अकबर इबने अरबी ने इस फुस में ताकत और कंट्रोल की एक बिल्कुल ही नई और गहरी जहत मुतारिफ करवाई है। देखिए हम अमूमन ताकत को कंट्रोल के साथ जोड़ते हैं ना?
जी बिल्कुल। लेकिन शेख अकबर इबने अरबी इस फुस में ताकत की एक बिल्कुल मुख्तलिफ तारीफ पेश करते हैं। वो हजरत लूत अल सलाम की जिंदगी के खास वाक्य और कुरान मजीद में मौजूद उनके एक जुमले पर गौर करते हैं। जब हजरत लूत अल सलाम की कौम सरकशी की हदें पार कर रही थी तो उन्होंने एक बहुत ही दर्द मंदाने बात कही थी। उन्होंने फरमाया था काश मेरे पास तुम्हारे मुकाबले की ताकत
होती या मैं किसी मजबूत सहारे की पनाह लेता। अच्छा अब अगर कोई आमकारी इस जुमले को पढ़े तो उसे यही लगेगा कि एक पैगंबर अपनी कौम के सामने बिल्कुल बेबस हो चुके हैं। मतलब बजाहिर तो यह एक मायूसी और कमजोरी की पुकार लगती है ना। बजाहिर बिल्कुल ऐसा ही लगता है। लेकिन यहां हमारे प्यारे आका हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वह बसीरत अफरोज़ तशरी काम आती है जो पूरी बात का जाविया ही बदल देती है।
हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इंतहाई शफकत से इस वाक्य का जिक्र करते हुए फरमाया कि अल्लाह मेरे भाई लूत पर रहम फरमाए। वो दरअसल एक बहुत ही मजबूत सहारे की पनाह में ही थे। और वो मजबूत सहारा या कुरानी अल्फाज में कहें तो रुकने शदीद वो दरअसल खुद अल्लाह रब्बुल इज्जत की जात थी। यानी हजरत लूत अल सलाम का यह फरमाना किसी दुनियावी कमजोरी की अलामत नहीं था।
बिल्कुल नहीं। यह उनके उस आला रूहानी मकाम का इजहार था जहां वो जाहिरी और मादी असबाब को छोड़कर बराए रास्त अल्लाह की तरफ देख रहे थे। वो असबाब पर नहीं बल्कि [संगीत] मुसबबुल असबाब पर नजर रखे हुए थे। यानी जिसे दुनिया बेबसी समझ रही है वो दरअसल ताकत का सबसे बड़ा मरकज है। वहीं से असल ताकत आ रही है। बेशक। लेकिन इंसान हमेशा से ताकत हासिल करने की
दौड़ में लगा रहता है। तो फिर इंसान के अंदर ताकत और कमजोरी का यह जो कुदरती तसवुर है इसकी असल बुनियाद क्या है? और शेख अकबर इबने अरबी ने इस फलसफे को इंसानी तखलीक के साथ कैसे जोड़ा है?
देखिए सूरत रूम की वो आयत इस पूरे तसवुर की बुनियाद है। शेख अकबर इबने अरबी हवाला देते हैं कि अल्लाह ताला ने इंसान को कमजोरी की हालत में पैदा किया। फिर उस कमजोरी के बाद उसे जवानी की ताकत अता की और फिर इस आरजी ताकत के बाद दोबारा उसे कमजोरी और बुढ़ापे की तरफ लौटा दिया। कमजोरी फिर ताकत और फिर दोबारा कमजोरी। जी। तो अगर हम इस साइकिल को देखें तो
इंसान की असल इब्तदा भी अजज़ है और इंतहा भी अजज़ है। जवानी में मिलने वाली ताकत एक बहुत ही आरजी फेज है। यानी वो ताकत मुस्तहार ली हुई है। वो हमारी अपनी जाती मिल्कियत नहीं है। बिल्कुल सही कहा। और इसीलिए शेख अकबर इबने अरबी एक बहुत कमाल का नुक्ता बयान करते हैं। वो फरमाते हैं कि अगर आप तारीख पर गौर करें तो अंबिया इकराम को उमूमन 40 साल
की उम्र में मबूस किया जाता है। अब जिस्मानी लिहाज से देखा जाए तो 40 साल वो उम्र है जब इंसान की जाहरी और तबी ताकत अपने उूज को छूकर ज़वाल की तरफ जाना शुरू होती है। यानी जब इंसान का जिस्मानी जोर कम होने लगता है तब उस पर रूहानी हकायक पूरी तरह खुलते हैं। हजरत लूत अली सलाम का वह जुमला कि काश मुझ में ताकत होती। यह दरअसल उनकी मुकम्मल अबदीयत का उनकी कामिल
बंदगी का इजहार था। वो अपनी इस बशरी कमजोरी को पूरी तरह मान चुके थे और यह अज मान लेना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन हम तस्सवुफ के हवाले से अक्सर सुनते हैं कि कामिल रूहानी हस्तियों के पास हिम्मत होती है। जी। जिससे वह कायनात के जाहरी असबाब को बजाहिर बायपास कर सकते हैं। अब सवाल यह है कि जब इन हस्तियों के पास यह कायनाती मामलात को बदलने की ताकत मौजूद होती है तो वो मामलात को अपनी मर्जी से बदलते क्यों
नहीं है? यह जो आपने सवाल किया ना यह इस पूरे फुस का मगज़ है। इसे समझने के लिए हमें पहले तसरुफ़ के तस्सवुर को समझना होगा। तसरुफ का सादा लफ्जों में मतलब है कायनात के चलते हुए निजाम या मामलात में अपनी रूहानी कुत का इस्तेमाल करके कोई तब्दीली लाना या मुदाखलत करना। यानी मामलात को अपनी मर्जी से चलाने का इख्तियार। जी बिल्कुल। शेख-ए-अकबर इबने अरबी बड़ी सराहत से बताते हैं कि जो सच्चे और हकीकी
आरिफिन होते हैं जिन्हें अल्लाह यह तसरुफ की ताकत देता है। वो इसे इस्तेमाल करने से बहुत गुरज करते हैं। क्यों? मतलब अगर आपके पास एक इख्तियार है तो इसे इस्तेमाल ना करने की क्या वजह हो सकती है? कोई दुनियावी इंसान तो शायद एक पल ना लगाए इस ताकत को आजमाने में। क्योंकि वह मकाम अबियत पर फाइज होते हैं। जब एक इंसान को यह सच्ची पहचान मिल जाती है कि इस पूरी कायनात का हकीकी फाइल यानी
असल काम करने वाली जात सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की है तो वह अपनी मर्जी मुसल्लत करने की ख्वाहिश से ही आजाद हो जाता है। इसे हम तसवुफ में फाइल और मफूल की वैदत का इदराक कहते हैं। आरिफ को यह इल्म हो जाता है कि ठीक है अल्लाह ने मुझे एक रूहानी कुत दी है। लेकिन मेरा कमाल उस कुत को चलाकर दुनिया को दिखाने में नहीं है। बल्कि अल्लाह की मर्जी के सामने अपनी मर्जी को बिल्कुल खत्म कर देने में है।
यानी वह यह सोचते हैं कि अगर मैं इस निजाम में अपनी मर्जी से कोई तब्दीली करूंगा तो यह तो इस कायनात को बनाने वाले की हिकमत पर शक करने वाली बात हो जाएगी। जैसे कोई कहे कि मुझे तुमसे बेहतर पता है कि ये काम कैसे होना चाहिए। बिल्कुल सही समझे आप। एक सच्चा आरिफ कायनात में मुदाखलत करने को कादिर मुतलक की हिकमत पर अदम एतमाद समझता है। उसे पता होता है कि जो हो रहा है वह किसी बहुत
बड़ी और गहरी हिकमत के तहत हो रहा है। इसलिए वह तसरुफ करने यानी ताकत इस्तेमाल करने के बजाय तस्लीमो रजा को तरजीह देता है। यानी वो समझता है कि जिसने मुझे नायब बनाया है वो खुद कायनात का बेहतरीन मुंतजिम है। तो मैं खामखा अपनी अधूरी समझ के साथ इसके कामों में क्यों दखल अंदाजी करूं। बिल्कुल। और यह सोचना ही कितना सुकून देता है कि असल कंट्रोल आपका मसला है ही नहीं। लेकिन
जब हम इस तस्लीमो रजा की और अल्लाह की मर्जी के आगे सरेंडर करने की बात करते हैं तो मुझे लगता है कि इसकी सबसे बड़ी और सबसे शानदार मिसाल हमें अपने प्यारे आका हजूर अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की सीरत मुबारका से मिलती है। बेशक इससे बड़ी और कामिल मिसाल कोई हो ही नहीं सकती। अगर हम तारीख देखें तो हुजूर अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का मकाम और उनकी रूहानी हिम्मत तो इस कायनात में सबसे
बुलंद है। वह चाहते तो क्या कुछ नहीं बदल सकता था। लेकिन हम देखते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की अपने मुहसिन चाचा हजरत अबू तालिब के लिए कितनी शदीद कलबी ख्वाहिश थी कि वो किसी तरह हिदायत कबूल कर लें। उनकी तड़प बिल्कुल वाज़ थी। जी बिल्कुल। लेकिन इस शदीद ख्वाहिश के बावजूद हिदायत का वह नक्शा जाहिर ना हुआ जो आप सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम चाहते थे। तो क्या
हम यह कह सकते हैं कि यहां भी वही तस्लीम और रजा और दखल अंदाजी ना करने का उसूल लागू हो रहा था। 100 फीसद यह नुक्ता तसव्वफ के मुश्किल तरीन लेकिन खूबसूरत तरीन राजों में से एक है। देखिए अगर रूहानी हिम्मत के जरिए किसी की तकदीर जबरदस्ती बदली जा सकती तो हुजूर अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की हिम्मत से बढ़कर कायनात में किसकी हिम्मत हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां आकर
शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह एक इंतहाई गहरा उसूल बयान करते हैं। यह उसूल इस पूरी बहस की जान है। वो फरमाते हैं कि इल्म हमेशा मालूम के ताबे होता है। इल्म मालूम के ताबे है। इसूल को हम आम फहम अंदाज में कैसे डिकोड कर सकते हैं? इसे हम एक बहुत सादा सी मिसाल से समझते हैं। फर्ज करें आपके हाथ में सेब का एक बीज है। ठीक है?
अब आपको यह इल्म है कि जब यह बीज बोया जाएगा तो उसमें से सेब का दरख्त ही निकलेगा। आम का नहीं। अब क्या आपके इस इल्म ने उस बीज को मजबूर किया है कि वो सेब बने। हम्म। नहीं। बीज को अपनी फितरत के हिसाब से ही उगेगा। बिल्कुल। इस बीच के अंदर जो हकीकत जो खासियत पहले से मौजूद थी आपका इल्म सिर्फ उस हकीकत को जाहिर कर रहा है। आपका इल्म बीच की हकीकत के ताबे है। इल्म कोई नई चीज
मुसल्लत नहीं करता। अच्छा यानी जो चीज अपनी असल में जैसी है इल्म उसी को पहचानता है। जी। अल्लाह ताला का जो इल्म है वह बंदों पर कोई चीज जबरदस्ती नहीं थोपता। अल्लाह के इल्म में हर वो चीज है जो एक बंदे की अपनी असल उसकी अपनी इस्तदाद या उसकी नेचर में रोजे अजल से मौजूद है। हम हजरत अबू तालिब की जात के अंदर जो इस्तेदाद या जो हकीकत मौजूद थी अल्लाह का
इल्म उसी के मुताबिक दुनिया में जाहिर हुआ। शेख अकबर इबने अरबी कहते हैं कि कोई भी शय कोई भी इंसान अपनी असल फितरत और अपनी अबदी [संगीत] इस्तेदाद से बाहर नहीं जा सकता। कायनात का हर फैसला उसी बुनियाद पर सामने आता है। तो इसका मतलब है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम इस गहरे कायनाती निजाम और अल्लाह की इस हिकमत को मुकम्मल
तौर पर समझते थे। उन्हें मालूम था कि किसी भी शय को जबरदस्ती उसकी असल हकीकत से हटाकर कुछ और नहीं बनाया जा सकता। बिल्कुल। और इसीलिए अपनी बेपनाह शफकत और शदीद दिली ख्वाहिश के बावजूद उन्होंने अल्लाह की रज़ा पर राजी रहने का इंतखाब किया। यही वो कमाल है। यही मारफत की मेराज है। जब एक आरिफ इस बात को देख लेता है कि हर चीज वैसे ही
जुहूर में आ रही है जैसी वो अपनी असल हकीकत में है। तो उसके अंदर की वह कशमकश खत्म हो जाती है कि मैं चीजों को जबरदस्ती बदल दूं। वो इस निजाम से लड़ना छोड़ देता है। उसे समझ आ जाती है कि जबरदस्ती किसी का रुख मोड़ना दरअसल निजामे कायनात की हममाहंगी के खिलाफ है। और यही वो मकाम है जहां आरिफ का दिल हर किस्म की परेशानी और बेचैनी से बिल्कुल आजाद होकर एक दायमी
सुकून में चला जाता है। अगर हम इस सारी गुफ्तगू को इस पूरे तफसीली जायजे को समेटे तो बात बिल्कुल साफ हो जाती है। उस हजरत लूत अल सलाम में हमें ताकत की असल हकीकत यानी रियलिटी ऑफ़ पावर समझाई गई है। और वह हकीकत यह है कि असल ताकत दुनियावी मामलात को कंट्रोल करने में नहीं है। अपनी हिम्मत और रूहानी कुतों को कायनात पर आजमाने में नहीं है। सच्ची ताकत यह है
[संगीत] कि इंसान अपनी कमजोरी मान ले। ताकतवर होने के बावजूद अपना सब कुछ अल्लाह की मर्जी के हवाले कर दे। बेशक जो चीज हमें जाहिरी तौर पर बेबसी लगती है दरअसल उसी के पीछे वो असल बातनी ताकत छुपी है जो इंसान को कभी टूटने नहीं देती। जी हां। और अगर हम इसे अपनी रोजमर्रा जिंदगी से जोड़कर देखें तो बात और भी वाज़ हो जाती है। शेख-ए अकबर इबने अरबी हमें जिस मुकाम
तस्लीम और रजा की तरफ बुला रहे हैं वो आज के दौर में इंतहाई जरूरी है। हम अपनी इस मुख्तसर सी जिंदगी में चीजों को कंट्रोल करने के लिए किस कदर तवानाइयां जाया कर देते हैं। हर इंसान चाहता है कि हालात बिल्कुल उसकी मर्जी और उसकी प्लानिंग के मुताबिक चलें। हम आज की दुनिया में तो रोज सुनते हैं कि मैनिफेस्टेशन करो। हर चीज को अपने जोरे बाजू और इरादे की ताकत से हासिल करो जिसे