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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fuss 21 | Rehmat Ka Asal Matlab Kya Hai? | Hazrat Zakariyaؑ | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख अकबर इबने अरबी फरमाते हैं कि रहमत महज एक जज्बा नहीं बल्कि इस कायनात की सबसे बुनियादी और ठोस हकीकत है।
  • हजरत जकरिया अलैहिस्सलाम का वाकया इस हिकमत मालिकिया का मजहर है जहाँ उनका यकीन असबाब पर नहीं बल्कि मुसबबुल असबाब पर था।
  • शेख अकबर रहमत की दो सूरतें बयान करते हैं पहली रहमत इम्तिनानी या आलमगीर रहमत और दूसरी रहमत वजूबी है।
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Transcript

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कभी-कभी एक ही हकीकत इंसान के पूरे देखने का जाविया बदल देती है। शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं अगर रहमत को उसके हकीकी मायने में समझ लिया जाए तो फिर यह कायनात यह जिंदगी यहां तक कि अल्लाह की सिफात भी पहले जैसी नजर नहीं आती। हजरत जकरिया अल सलाम की हिकमते

मालिकिया में शेख अकबर रहमत का एक ऐसा राज बयान करते हैं जहां वजूद इस्माए इलाहिहिया और अल्लाह की हाकमियत अलग-अलग हकीकतें नहीं रहती बल्कि एक ही हकीकत के मुख्तलिफ ज़हूर बन जाते हैं। आइए आगाज़ करते हैं। जी बिस्मिल्लाह। हम फिक्रनामा के इस इल्मी और रूहानी सफर में अब तक शेख-ए अकबर की खुसूसुल हिकम के पहले 20 अबब की हिकमतों पर गुफ्तगू कर चुके हैं।

जी अल्हम्दुलिल्लाह। और आज की जो हमारी ये फिक्री नशिस्त है इसका मरकज [संगीत] 21 मफुज़ है। जो कि जाहिर है हजरत ज़करिया अल सलाम और हिकमते मालकिया के हवाले से है। बिल्कुल सही। हमारा मकसद आज इस बुनियादी सवाल को समझना है कि रहमत हकीकत में है क्या? क्योंकि देखिए ना आमतौर पर जब कोई लफ्ज रहमत सुनता है तो जहन में फौरन एक मेहरबानी नरम दिली

या दरगुजर का ख्याल आता है। बिल्कुल एक इंसानी जज्बे की तरह। जी बिल्कुल। लेकिन शेख-ए अकबर का जो तसवुर है वो इस आम फहम बात से बहुत मुख्तलिफ और वसी मालूम होता है। तो आइए इस बात के मुख्तलिफ पहलुओं पर गौर करते हैं। शेख-ए-अकबर के नजदीक रहमत का वो मरकजी उसूल क्या है? देखें यह सवाल इस पूरे फलसफे की असल बुनियाद है। होता यह है कि हम रहमत को महज एक जज्बे या रद्दे अमर तक महदूद कर देते हैं।

सही। यानी जैसे किसी बैरूनी मुहरिक के नतीजे में रहम आ गया। मगर शेख अकबर इस तसवुर को इंसानी सतह से उठाकर एक इंतहाई बुलंद मुकाम पर ले जाते हैं। उनके नजदीक रहमत इलाही कोई वक्त कैफियत नहीं है। बल्कि यह इस कायनात की सबसे बुनियादी और सबसे ठोस हकीकत है। वो हदीस कुदसी का हवाला देते हैं जिसमें रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि

वसल्लम के वास्ते से इरशाद बारी ताला है कि बिलाशबा मेरी रहमत मेरे गजब पर सबकत ले गई है। सुभान अल्लाह। जी। और अब इस सबकत को ना महज वक्त के पैमाने पर नहीं समझना चाहिए। यह एक वजूदी सबकत है। इसका मतलब यह है कि रहमत का ताल्लुक अल्लाह की जात से किसी भी गजब के ज़हूर से बहुत पहले का है। कायनात में जो कुछ भी है वो उसी रहमत के समंदर में गौताजन है।

वाह! गजब या सजा तो आरजी कैफियत है ना जो किसी खास सबब से जाहिर होती हैं। लेकिन रहमत वो दायमी उसूल है जो कायनात की बुनियाद है। यानी रहमत महज एक रवैया नहीं कायनात का बुनियादी माद्दा है। बिल्कुल देखें हर शय को जो सबसे पहली चीज [संगीत] अता होती है वो उसका वजूद है। यानी उसका महज मौजूद होना शयत। जी [संगीत] बिल्कुल। शेख इंतहाई बारीक बीनी से यह फरमाते हैं कि रहमत ने सबसे

पहले जिस चीज का इहाता किया वो खुद रहमत की अपनी जात थी और फिर उसने हर शय के वजूद का इहाता किया। जरा गौर कीजिए जब एक शय अदम में थी, [संगीत] अंधेरे में थी तो उसे वहां से निकालकर वजूद बखशना, उसे होना अता करना यह अल्लाह की सबसे पहली रहमत है। बिल्कुल। क्योंकि अदम पर तो कोई हुकुम नहीं लगाया जा सकता ना। जी सवाब, अज़ाब या माफी ये सब तो [संगीत] बाद की बातें हैं। ये तब होंगी जब कोई शय

मौजूद होगी। सही। [संगीत] इसीलिए शेख के नजदीक वजूद बजाते खुद अल्लाह की सबसे आलमगीर रहमत है। चाहे वो कायनात का कोई सितारा हो या कोई [संगीत] इंसान। उसका होना ही इस बात की दलील है कि रहमत ने उसे अपनी आगोश में ले रखा है। यानी मेरा या किसी भी शय का मौजूद होना ही एक बहुत बड़ी रहमत है। लेकिन गुफ्तगू को

अगर हम आगे बढ़ाएं तो यह आलमगीर रहमत हजरत जकरिया अल सलाम की हयात मुबारका में किस तरह जाहिर होती है? जी। खासतौर पर हिकमते मालिकिया के हवाले से। [संगीत] हम उसे एक जिंदा हकीकत के तौर पर कैसे समझें? हम हजरत जकरिया अल सलाम का वाकया दरअसल इसी हिकमत मालिकिया का एक जीता जागता मजहर है। हम जब हम उनकी जिंदगी देखते हैं तो बजाहिर वो असबाब की दुनिया में ऐसी जगह खड़े थे जहां कोई उम्मीद नहीं थी।

हम उनका बुढ़ापा और उनकी ज़ौजा मोहतरमा का बांझपन यह जाहिरी असबाब कह रहे थे कि वारिस मुमकिन नहीं है। जी। लेकिन हजरत जकरिया अल सलाम का यकीन असबाब पर नहीं मुसबबुल असबाब पर था। उन्होंने वारिस की दुआ की और उनकी यह दुआ इस बात का इकरार था कि अल्लाह की हाकमियत जिसे हम हिकमते मालकिया कहते हैं वो किसी दुनियावी कानून की मोहताज नहीं है। यानी अल्लाह की हाकमियत तमाम असबाब से

बालातर है। जी जब इसका ज़हूर होता है तो वो तमाम तबी रुकावटों को चीर कर जिंदगी अता करती है। अल्लाह ने उन्हें वारिस दिया और उस वारिस का नाम खुद अल्लाह ने याहिया रखा। याहिया जिसके माने ही जिंदगी पाने वाले के हैं। जी बिल्कुल वो जिसने जिंदगी पाई यह नाम ही ऐलान है कि यह वजूद तबी असबाब से नहीं बल्कि बराहे रास्त अल्लाह की रहमत वजूदिया

और हिकमते मालकिया से अता हुआ है। यह कितना खूबसूरत नुक्ता है कि हाकिमियत का कमाल ही यह है कि कोई तभी कानून इसके सामने रुकावट नहीं बन सकता। बिल्कुल यही वो हकनियत है जो मुर्दापन से जिंदगी निकाल लाती है। यहां यह बात इंतहाई दिलचस्प हो जाती है। एक तरफ हम कह रहे हैं कि वजूद रहमत एक ही है और सब कुछ उसी का ज़हूर है। लेकिन जब हम अल्लाह के अस्मा-ए हुसना की तरफ देखते हैं

तो वहां हमें मुख्तलिफ नाम नजर आते हैं। सही। एक तरफ अर रहीम है और दूसरी तरफ अल मुंतकिम है या अल कहार है तो अगर रहमत एक ही हकीकत है तो इन अलग-अलग नामों का क्या मफूम है? क्या यह मुतजाद हकीकत हैं?

देखिए ये एक बहुत ही नाजुक और गहरा इल्मी नुक्ता है। फसूसुल हिकम और खासतौर पर अबुल कासिम बिन कुस्सी के हवाले से शेख-ए अकबर ने इसे बहुत लतीफ अंदाज में वाज़ किया है। जी। वो फरमाते हैं कि तमाम अस्माइलाहिया किसी अलग-अलग या बिखरी हुई हकीकतों की तरफ इशारा नहीं करते। यह सब के सब नाम दरअसल उसी एक जात वाहिद की तरफ लौटते हैं। हर नाम अपनी इनफरादियत में खड़े होने के

बावजूद बाकी तमाम नामों की सिफात को भी समेटे हुए हैं। क्योंकि जात तो एक ही है। तम हर नाम का अपना एक खास दायरेकार और हाकिमियत है। जब वो अर रजाक के नाम से तजल्ली फरमाता है तो अता जाहिर होती है। हम और जब अल मुंतकिम के नाम से तजल्ली होती है तो कायनात में अदल और तवाजुन कायम होता है। अच्छा यानी मुंतकिम होना रहमत के खिलाफ नहीं है। बिल्कुल नहीं। जैसे एक तबीब मरीज के जिस्म

से खराब हिस्सा काटता है। अमल तकलीफ देह है लेकिन [संगीत] बुनियाद रहमत पर है। तो अदल का कयाम भी एक वसीर रहमत है। यह तमाम नाम एक ही रहमत के लामहदूद रंग हैं। सुभान अल्लाह। हर नाम एक दरवाजा है जो उसी एक हकीकत की तरफ खुलता है। बिल्कुल। तो इस्तसार की तरफ आते हैं कि कायनात में यह रहमत बुनियादी तौर पर किन दो मुख्तलिफ तरीकों से जाहिर होती है। जी

और इसी में यह भी बताइएगा कि आम लोग जो रहमत मांगते [संगीत] हैं और जो अहले कश हैं उनके मांगने में क्या फर्क है? शेख-ए-अकबर रहमत की दो बुनियादी सूरतें बयान करते हैं। पहली है रहमत इम्तिनानी यानी आलमगीर रहमत। जो सबके लिए है। बिल्कुल। जो हर मखलूक को बिला तफरीक महज फजल से वजूद बखशती है। कुरान में जो आया है कि मेरी रहमत हर शय पर मुहीदत है। यह उसी का जिक्र है।

और दूसरी सूरत दूसरी सूरत है रहमत वजूबी। यह वो रहमत है जो तकवा इबादत और फरमाबरदारी के जरिए मांगी जाती है। अच्छा यानी यह अमल से मशरूत है। जी बिल्कुल। अब आते हैं आपके दूसरे सवाल की तरफ कि मांगने वालों में क्या फर्क है?

हम्म। आम लोग अल्लाह से रहमत मांगते हैं एक इनाम के तौर पर कि तकलीफ दूर हो जाए, जन्नत मिल जाए। उनकी नजर रहमत के नताज पर होती है। जी बिल्कुल हम सब अमूमन ऐसे ही मांगते हैं। लेकिन जो अहले कशफ हैं उनकी तलब बहुत बुलंद होती है। वो दुआ करते हैं कि अल्लाह की रहमत उनके बाततिन में उनकी रूह में इस तरह रच बस जाए कि वो खुद उस रहमत का मजहर बन जाए। अल्लाहू अकबर। जी। वो चाहते हैं कि उनके वजूद के जरिए

कायनात में रहमत का फैज जारी हो। वो रहमत [संगीत] पाना नहीं रहमत बनना चाहते हैं। तो फिर इस सब का असल मफूम क्या निकलता है? मेरा मतलब है कि अगर महज वजूद पाना ही रहमत है तो क्या कोई भी ऐसी शय जो कायनात में मौजूद है जिसमें शायद तकलीफ या बीमारियां भी शामिल हो क्या वो रहमत से बाहर खड़ी हो सकती है? देखें यह वह मकाम है जहां इंसान को बहुत ठहराव के साथ तफक्कुर करना पड़ता है। जी हकीकत यह है कि अल्लाह की रहमत तमाम

कायनात और तमाम वजूद में सरायत किए हुए है। अगर वजूद ही रहमत है तो जो शय भी मौजूद है वो रहमत के दायरे में है। हत्ता के तकलीफ भी जी। यहां तक कि तकलीफ या मुसीबत जब अदम से निकलकर वजूद में आती है ना तो उसके वजूद पाने में भी वही रहमत कार फरमा है। जो कोई इस हकीकत को पहचान लेता है उसका जाविया निगाह बिल्कुल बदल जाता है। वह जान लेता है कि कायनात का हर मजहर अल्लाह की रहमत

और हिकमत का ज़हूर है। क्योंकि रहमत से बाहर होने का वाहिद मतलब अदम है। और जो मौजूद है वो अदम तो नहीं हो सकता। बिल्कुल। और यही पहचान इंसान को वो सुकून देती है जो कोई और चीज नहीं दे सकती। यह तो वाकई बहुत पुरसकून कर देने वाली बात है। बिल्कुल। तो इन तमाम बातों की रोशनी में गुफ्तगू को समेटते हुए मैं पूछूंगी कि हिकमत मालिकिया को किस तरह समझा जाए? क्या अल्लाह की

हाकमियत महज एक स्वाब दीदी या मनमानी ताकत का नाम है? नहीं बिल्कुल नहीं। और यही शेख-ए-अकबर रहमतुल्लाह अल की तालीम का मगज़ है। हिकमत मालिक या महज किसी बेरब ताकत का नाम कतई नहीं है। सही। बल्कि यहू मुसलसल और कामिल निजाम हाकिमियत है जिसके जरिए हर शय का वजूद और हर इलाही ज़हूर कायम है। यह वो हाकिमियत है

जो कायनात के हर जर्रे को वजूद बखशने वाली रहमत के साथ जुड़े रखती है। सुभान अल्लाह। जब हजरत जकरिया अल सलाम ने असबाब के कटने के बावजूद दुआ की तो उन्होंने दरअसल इसी हाकिमियत को पुकारा था। मालिक अपनी [संगीत] मिल्कियत में जो चाहे तसर्रुफ करे मगर उसका हर तसर्रुफ इसी लामहदूद रहमत वजूद के साए में होता है। सही आज के इस फिक्री मुताले में हमने बहुत

खूबसूरती और सुकून के साथ देखा कि रहमत महज एक जज्बा नहीं कायनाती हकीकत है। जी बिल्कुल। वजूद अस्माइलाहिया हजरत जकरिया अल सलाम का वाकया और अल्लाह की हाकिमियत यह अलग-अलग मौजात नहीं है बल्कि एक ही हकीकत इलाहिया के मुख्तलिफ ज़हूर है। हर बात उसी एक मरकज की तरफ आ रही है। बिल्कुल और इसके इख्तताम पर मैं बस एक

फिक्रंगेज ख्याल छोड़ना चाहूंगा। जी जरूर। अगर इस कायनात का हर लम्हा और हर सांस अल्लाह की रहमत वजूद का बराहेरास्त जहूर है तो फिर इंसान का महज मौजूद होना ही इस बात की दलील है कि वो हर वक्त अल्लाह की अता और फजलल के साएने हैं। इसे सिर्फ समझिए मत। इस पर गहरा तफक्कुर कीजिए। अल्लाह ताला हमें सही फहम, नूर

बसीरत, अपनी रहमत की सही पहचान, अपनी सिफात के नूर को समझने की तौफीक और अपने कुर्ब की सच्ची तलब अता फरमाए। आमीन। [संगीत]

Frequently asked questions

शेख अकबर के नजदीक रहमत इलाही कोई वक्ती कैफियत नहीं है बल्कि यह इस कायनात की सबसे बुनियादी और सबसे ठोस हकीकत है।

हजरत जकरिया अलैहिस्सलाम का यकीन असबाब पर नहीं बल्कि मुसबबुल असबाब पर था और उन्होंने वारिस की दुआ की थी।

शेख-ए-अकबर रहमत की दो बुनियादी सूरतें रहमत इम्तिनानी यानी आलमगीर रहमत और रहमत वजूबी बयान करते हैं।