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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fuss 22 | Allah Ko Dekhne Ka Asal Tareeqa Kya Hai? | Hazrat Ilyasؑ | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • हजरत इलियास अलैहिस्सलाम की हिकमत उनसिया का सफर उरूज से शुरू होकर वापस जमीन की तरफ नजूल की सूरत में होता है।
  • शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलैह के मुताबिक खालिस अकल का मकाम मारफत का महज आधा हिस्सा है क्योंकि अकल सिर्फ तंजिया और फासला देख सकती है।
  • तजल्ली और तशबीह का तसवुर तथा नफ्स-ए-रहमानी का पैमाना इस आधी पहचान को मुकम्मल करके अजनबियत को उन्स में बदल देता है।
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Transcript

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कभी आपने गौर किया कि हम अल्लाह को पहचानने की कोशिश कैसे करते हैं? अकल से, इबादत से या सिर्फ उन लम्हों में जब दिल पर कोई खास कैफियत तारी हो। मगर शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत इलियास अलैहि ससलाम की हिकमत उनसिया [संगीत] में मारफत का एक ऐसा राज बयान करते हैं जो अल्लाह को देखने का तरीका नहीं बल्कि खुद देखने वाले को बदल देता

है। वो फरमाते हैं कभी असल मसला यह नहीं होता कि हकीकत हमसे कितनी दूर है बल्कि यह होता है कि हम उसे देख कैसे रहे हैं। हजरत इलियास अली सलाम की हिकमते उनसिया में शेख-ए-अकबर हमें एक ऐसे सफर पर ले जाते हैं जहां अजनबियत उन्स में बदल जाती है और पहचान सिर्फ इल्म नहीं रहती बल्कि मुशाहदा बन जाती है। आइए हिकमत उनसिया का आगाज करते हैं। जी

तो फिक्रनामा के इस तसलसुल में जहां फसूसुल हिकम के पहले 21 अबवाब मुकम्मल हो चुके हैं। आज हम 22वें बाप की तरफ आ रहे हैं। बिल्कुल। फुसिया हजरत इलियास अल सलाम जिसका उनवान हिकमते-ए-उंसिया है। और इस निशिस्त का मकसद सिर्फ कुछ नई मालूमात दिमाग में जमा करना नहीं है। बल्कि इस बसीरत का इस मुशाहदे का हिस्सा बनना है जो शेख-ए-अकबर रहमा ने बयान फरमाया है।

जी हम सब अपनी फितरत में किसी ना किसी तरह अल्लाह की तलाश में रहते हैं। कोई अकल के दलाईल से ढूंढता है। कोई इबादत के जरिए पहुंचना चाहता है। लेकिन एक सवाल उभरता है कि क्या पहचान का यह सफर यहीं आकर रुक जाता है और इस बाब में शेख-ए अकबर ने हजरत इलियास अल सलाम को हजरत इदरीस अल सलाम के साथ क्यों [संगीत] जोड़ा है? देखें यह एक

बहुत ही बुनियादी सवाल है। इसी मकाम से इस पूरे सफर की बुनियाद रखी जाती है। शेख-ए अकबर जब इन दोनों हस्तियों का जिक्र करते हैं तो वो किसी तारीखी बहस में नहीं पड़ते बल्कि वो एक ही रूह के दो मुख्तलिफ रूहानी मकामात बयान कर रहे हैं। हम यानी उरूज और नजूल की बात हो रही है यहां। जी बिल्कुल। उनके नजदीक हजरत इलियास अल सलाम दरअसल वही हैं जो हजरत इदरीस अल सलाम

थे। इस नुक्त को समझने के लिए हमें इस सफर की नोइयत को देखना होगा। हजरत इदरीस अल सलाम की हैसियत मकामे उरूज की है। उन्हें हजरत नूह अल सलाम से भी कब एक निहायत बुलंद मुकाम पर उठा लिया गया था। जिसे शेख-ए-अकबर आसमाने शमस कहते हैं। सही फरमाया आपने। वो आसमान शमस या सूरज का फलक है। सूरज रोशनी का, नूर का और रूहानी इर्तका का इस्तियारा है। यह कमाल उरूज था।

लेकिन कामिल मारफत का तकाजा यह है कि सफर सिर्फ बुलंदी पर जाकर रुक ना जाए। कमाल तब है जब वह हकीकत वापस जमीन की तरफ नजूल करे। और यही नजूल हजरत इलियास अलैहिस्सलाम की सूरत में होता है। है ना?

बेशक। वही हकीकत इलाहिया हजरत इलियास अलैहिस्सलाम की सूरत में बाल बक की तरफ भेजी गई। बाल एक बुत का नाम था और बक के माना गलबे के हैं। यानी उन्हें एक ऐसी बस्ती की तरफ उतारा गया जो मादी और नफसानी गलबे का बदतरीन शिकार थी। तो यह कमाल रूहानियत के बाद दोबारा मादियत की दुनिया में आना है। [संगीत]

अच्छा यह उरूज और नजूल की बात तो समझ आती है। लेकिन इस नजूल के दौरान एक वाकया आता है हजरत इलियास अल सलाम का आग के घोड़े पर सवार होना। हम आग का काम तो जला देना है। तो इस आग के घोड़े की हकीकत क्या है?

बात यह है कि यह महज कोई जाहिरी मौजजा नहीं है बल्कि यह रूहानी ताकतवर अलामत है। आग की दो बुनियादी सिफात होती हैं। एक जलाकर खाक कर देना और दूसरा रोशनी देना। जी रोशनी और तपिश। बिल्कुल। जब हजरत इलियास अल सलाम इस आग के घोड़े पर सवार हुए तो मकसद उनके जिस्म को जलाना नहीं था बल्कि उनके अंदर मौजूद तमाम

बशरी कमजोरियों नफसानी ख्वाहिशात और मादे की तलब को जलाकर खाकिस्तर करना था जो चीजें इंसान को जमीन से चिपकाए रखती हैं आग ने उनका सफाया कर दिया हम तो जब ख्वाहिशात जल गई तो फिर बाकी क्या बचा शेख अकबर रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि इस अमल के बाद जो चीज खालिस हालत में बची वह उनकी अकल थी क्योंकि अकल की फितरत भी नूरानी है। वह रोशनी से मुशाबहत रखती है।

आग ने मादे को जला दिया और रोशनी ने रोशनी को कबूल कर लिया। इस मकाम पर उनकी अक्ल मुकम्मल तौर पर खालिस अक्ल बन गई। यानी उसमें किसी किस्म की नफसानी गज़ या कोई मिलावट नहीं रही। जी बिल्कुल। खालिस और मुजर्रद अकल और यहीं से हिकमत उनसिया का दरवाजा खुलता है। यह तो वाकई एक काबिल रक मकाम है कि इंसान एक खालिस और शफाफ अकल के मकाम पर खड़ा हो।

लेकिन जब मैं शेख-ए अकबर को आगे पढ़ती हूं तो मुझे थोड़ी हैरत होती है। वो फरमाते हैं कि यह खालिस अकल का मकाम भी मारफत का महज आधा हिस्सा है। तो खालिस अकल में ऐसी क्या तशनीकी रह गई कि उसे आधी पहचान कहा जा रहा है। आपकी हैरत बिल्कुल वजह है। और यह शेख-ए-अकबर का वो लतीफ नुक्ता है। जहां सूफियाना मुशाहदा आम फलसफे से अलग हो जाता है। देखिए खालिस अक्ल में कोई खराबी नहीं

[संगीत] है। वह एक निहायत मुअज्जिज़ और बुलंद मक़ाम है। लेकिन हमें अक्ल की फितरत को समझना होगा। अक्ल हदबंदी करती है। काटकर अलग करती है। जब अक्ल नफसानी आलूदिगियों से पाक होती है तो वह इंसान को सीधा तंजीहा की तरफ ले जाती है। तंजीहा का मतलब है अल्लाह ताला को हर शय से पाक, बालातर और मावरा मानना। यानी यह गवाही देना कि अल्लाह कायनात की किसी भी चीज जैसा नहीं है।

जी। अक्ल कहती है कि मखलूक फानी है और खालिक बाकी है और यह सच है। मगर यह आधी पहचान इसलिए है क्योंकि अक्ल सिर्फ फासला देख सकती है। वो सिर्फ दूरी का मावरा होने का इदराक कर सकती है। कुर्बत को समझने से कासिर रहती है। अच्छा यानी अक्ल दो ही पैदा करती है कि खुदा वहां है और कायनात यहां है। बिल्कुल सही। अक्ल यह मानने से कासिर रहती

है कि वो जात जो हर शय से पाक है वही जात बेवक़ कायनात की हर शय में अपने नूर से जलवागर भी है। अक्ल का पैमाना इस ज़हूर को समेटने से कासिर रहता है। इसलिए शेख इसे आधी मारफत करार देते हैं। तो हम कह सकते हैं कि खालिस तंजी एक सर्द मेहरी है। इसमें कोई कुर्बत की हरारत नहीं है। तो अगर यह आधा सफर है, तो वह कौन सा राज है जो इस पहचान को मुकम्मल कर देता

है? वो राज जो इस आधे सफर को कमाल तक पहुंचाता है, वह तजल्ली का इदराक है। यानी अल्लाह का अपने आप को जाहिर करना। यहां शेख-ए-अकबर रहमतुल्लाह अल तशबीह का तस्सवुर को मुतारिफ कराते हैं। तशबीह हम जिसे आमतौर पर तो काफी मोहतात अंदाज में देखा जाता है। जी आम मजहबी गुफ्तगू में इसे शर्क के करीब समझा जाता है। लेकिन आरिफ के नजदीक तशबीह

का मतलब यह है कि कायनात में मौजूद हर सिफ्त, जिंदगी, इल्म, [संगीत] समात यह सब दरअसल उसी जात वाहिद के नूर का एक अक्स हैं। हम यानी शरीयत भी तो दोनों चीजें लेकर आई है। बिल्कुल शरीयत का कमाल देखें। वो एक तरफ तंजिया लाती है कि इस जैसी कोई शय नहीं और दूसरी तरफ तशबीह भी लाती है कि वो सुनने और देखने वाला है। कामिल आरिफ वो है जो

तंजिया और तशबीह दोनों को एक ही हकीकत के तकमीली पहलू मानता हो। वो बेवक़ पाकी भी देखता है और जुहूर भी देखता है। लेकिन एक मुतलाशी के जाविए से सोचूं तो एक उलझन पैदा होती है। अगर एक ही हकीकत हजारों मुख्तलिफ शक्लों में जाहिर हो रही है तो क्या देखने वाला कंफ्यूजन का शिकार नहीं होगा? यह बहुत फितरी सवाल है और शेख-ए-अकबर का कमाल यह है कि वो इस उलझन

को निहायत सादा मिसालों से दूर करते हैं। मसलन वो ख्वाब और वहम की मिसाल देते हैं। ख्वाब में इंसान इल्म को दूध की शक्ल में देखता है। जी जैसा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीसे मुबारका में भी है। बेशक हकीकत इल्म की होती है। ज़हूर दूध का होता है। इसी तरह वो एक और बहुत अमीक मिसाल देते हैं। आईने की मिसाल। आप फर्ज करें कि एक निहायत शफाफ आईना है। आईना

अपनी जात में एक ही है। मगर जो भी उसके सामने आता है उसे अपना अक्स नजर आता है। बिल्कुल। आईने में बनने वाली सूरतें देखने वाले की अपनी इस्तेदा, तैयारी और अकायद पर मुनसिर है। अल्लाह की जात उस बेमिसाल आईने की तरह है। वो एक ही रहती है। मगर कायनात में हर देखने वाले की इस्तेदाद के मुताबिक जाहिर होती है। और यह जो मुसलसल ज़हूर का अमल है, इसे

समझाने के लिए शेख अकबर नफ्स-ए- रहमानी यानी रहमान के सांस का तसवुर पेश करते हैं। वह हदीस कुदसी है ना कि मैं एक छुपा हुआ खजाना था और मैंने मोहब्बत की कि पहचाना जाऊं। सुभान अल्लाह। इस मोहब्बत ने एक इलाही शिद्दत पैदा की। शेख फरमाते हैं कि इस मोहब्बत के दबाव को राहत देने के लिए जो सांस लिया गया वो नफ्स रहमानी है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारा एक सांस मुख्तलिफ हुरूफ और अल्फाज

की शक्ल ले लेता है। हम सांस एक ही होता है मगर अल्फाज बेशुमार बन जाते हैं। बिल्कुल सही। यह कायनात, यह सितारे, इंसान यह सब इस नफ्स-ए रहमानी में अदा होने वाले कलमात हैं। हर लम्हा यह सांस एक नई तजल्ली ला रहा है। हर लम्हा एक नई सूरत पैदा हो रही है। कोई तजल्ली दो बार दोहराई नहीं जाती। यह तो वाकई रोंगटे खड़े कर देने वाला तसवुर है कि हम और हमारा वजूद इसी

नफ्स रहमानी के कलमात हैं। तो अब अगर इस पूरे सफर को समेटे हम उरूजो नजूल से गुजरे अकल और तंजिया को देखा फिर तजल्ली तजबीह और नफ्स-ए रहमानी को समझा तो इस मुकाम पर आकर जो इस बाब का असल उनवान है यानी हिकमते उनसिया इस उनस का हकीकी मतलब क्या है?

यहीं आकर दरअसल [संगीत] इस सफर का फल बेनकाब होता है। उन्स का खालिस मतलब है अजनबियत का खत्म हो जाना। बेगानगी का मिट जाना। याद करें जब तक अकल कायनात को खुदा से काट कर देख रही थी। कायनात में एक शदीद अजनबियत थी। एक फासला था। जी एक तन्हाई और दूरी का एहसास था। मगर अब क्या हुआ? अब मुतलाशी पर हकीकत खुल गई है कि हर जर्रा हर मजहर उसी हकीकत

वाहिदा की तजल्ली है। अब वो कायनात को खुदा से काट कर नहीं देखता और तंजिया की बदौलत कायनात को खुदा मानने की गलती भी नहीं करता। यानी वो बिल्कुल एक कामिल तवाजन में आ गया है। बिल्कुल वो जिस तरफ भी रुख करता है उसे अपने महबूब का चेहरा नजर आता है। और जब हर तरफ उसी का नूर हो तो फिर अजनबियत कहां बाकी रहती है? हर अजनबी शय उन्स में और हर फासला कुर्बत में बदल जाता है। यही वो मकाम उन्स है।

सुभान अल्लाह। तो हजरत इलियास अली सलाम का यह सफर दरअसल मालूमात में इजाफे का नाम नहीं है। यह तो हमारे निगाह हमारे जाविया नजर को अंदर से बदल देने का अमल है। उरूज से शुरू होकर नजूल पर आना और फिर हर शय में उसी की बेपाया तजल्ली को देखना। बेशक इससे बड़ी और कोई सच्चाई नहीं हो सकती। और इस वजूद को बदल देने वाले सफर के

इख्तताम पर हमारे पास अल्फाज खत्म हो जाते हैं और सिर्फ दुआ बचती है। हम यही इल्तजा करते हैं कि अल्लाह रब्बुल इज्जत अपने हबीब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के सदके हमें वो निगाहे बसीरत अता फरमाए जो जाहिर के पर्दों में हकीकत की तजल्ली को देख सके। आमीन। जो मालिक हमें तंजिया और तशबीह के इस कामिल और नाजुक तवाजुन में साबुत कदम रखे और हमारे दिलों से हर तरह की अजनबियत

को खत्म करके हमें अपनी जात के सच्चे उन्स और मारफत से सरफराज फरमाए। आमीन। आमीन।

Frequently asked questions

खालिस अकल का मकाम आधी पहचान इसलिए है क्योंकि अकल सिर्फ फासला देख सकती है और वह केवल तंजीहा की तरफ ले जाकर कुर्बत को समझने से कासिर रहती है।

नफ्स-ए-रहमानी मोहब्बत के दबाव को राहत देने के लिए लिया गया वह सांस है जिससे कायनात के तमाम कलमात और सूरतें हर लम्हा जाहिर होती हैं।