Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Allah Ko Samajhna Itna Mushkil Kyun? | Shaykh Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- शेख-ए-अकबर इब्ने अरबी के मुताबिक इंसान अपनी महदूद अक्ल के जरिए उस लामहदूद जात को अपने फहम के घेरे में नहीं ले सकता।
- अक्ल का काम चीजों की हदबंदी करना और उन्हें किसी खाने में रखना है, जबकि हक ताला की जात मुतलक और लामहदूद है।
- मारफत का सफर अक्ल के दायरे से निकलकर कलब के दायरे में दाखिल होने और अल्लाह की सिफात के मुशाहिदे का नाम है।

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Transcript
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अजल से इंसान एक ही चीज करता आया है। समझने की कोशिश। वो हमेशा हर शय को समझने की कोशिश करता है। खुद को भी, दुनिया को भी और अपने रब को भी। मगर जब बात अल्लाह ताला की आती है तो इंसान अपनी अकल की एक हद से आ टकराता है। हम जानते हैं कि वह मौजूद है। हम उस पर ईमान भी रखते हैं। मगर उसे पूरी तरह समझ नहीं पाते। और यहीं एक
सवाल जन्म लेता है कि जो हस्ती हमारी शहर से भी ज्यादा करीब है वो इदराक से इतनी दूर क्यों है? क्या मसला हमारी अकल का है या यह कि हम समझने से कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगा लेते हैं? शेख अकबर इबने [संगीत] अरबी इसी नुक्त से बात शुरू करते हैं। आइए देखते हैं कि अल्लाह को समझना इतना मुश्किल क्यों है। जी ये एक बुनियादी और गहरा सवाल है जो
मेरा ख्याल है हर बाशोर इंसान के अंदर खामोशी से परवरिश पाता है। क्योंकि देखें इंसान की ये फितरत है कि वो कायनात की हर शय का एहाता करना चाहता है। वो समुंदरों की गहराई, सितारों के फासले और मादे की हकीकत को अपने इल्म के दायरे में लाना चाहता है। लेकिन जब इसी इल्म का रुख जात बारी ताला की जानिब होता है तो एक अजीब सी खामोशी तारी हो जाती है। शेख-ए अकबर इस मकाम पर एक इंतहाई नाजुक मगर [संगीत] बहुत
वाज़ फर्क बयान करते हैं। वो फरमाते हैं कि किसी हस्ती के वजूद को जानना और उस हस्ती का मुकम्मल एहाता करना यह दो बिल्कुल मुख्तलिफ हकीकतें हैं। हम अपने वजूद से कायनात के निजाम से और अंबिया अलहम्स सलाम की तालीमात से यह तो जान लेते हैं कि हक ताला मौजूद है। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि [संगीत] इंसान अपनी महदूद अक्ल के जरिए उस लामहदूद जात को अपने फहम के घेरे
में ले सकता है। सही। और यहां मैं इस फिक्री निशस्त का मकसद भी थोड़ा सा वाज़ कर दूं। हमारा मकसद इस गुफ्तगू में हरगिज यह नहीं है कि हम खुदा के वजूद पर कोई बहस करें [संगीत] या उसे किसी मंतख से साबित करने की कोशिश करें। जी बिल्कुल वो एक अलग दायरा है। जी हमारा दायराकार यह समझना है कि शेख-ए अकबर की तालीमात की रोशनी में जब इंसानी
अक्ल उस लामहदूद हस्ती को समझने के सफर पर निकलती है तो वह एक हद पर आकर क्यों रुक जाती है? दुरुस्त। लेकिन मैं यहां एक सवाल जरूर सामने रखूंगी। अगर अकल वाकई इतनी ही महदूद है और वह अल्लाह ताला का एहाता नहीं कर सकती तो फिर इंसानी तहजीब [संगीत] का सारा जोर अकल पर क्यों है? हम अकल ही के जरिए कायनात को समझ दें? क्या हम यह कह रहे हैं
कि जात बारी ताला के मामले में हम गलत औजार से दुरुस्त चीज तलाश करने की कोशिश कर रहे हैं? देखिए यह सवाल असल मसले की जड़ तक ले जाता है। शेख-ए-अकबर अक्ल की अफादियत से इंकार नहीं करते। वो तो अक्ल की फितरत और उसके काम करने के तरीकेकार को बेनकाब करते हैं। अरबी जबान में जो अकल का लफ्ज़ है ना यह इकाल से निकला है। जिसका मतलब है रस्सी से बांधना या किसी चीज को कैद करना। हम दिलचस्प है।
जी। और [गला साफ़ करने की आवाज़] इंसानी जहन या अक्ल काम ही इस तरह करती है कि वह चीजों की हदबंदी करती है। अक्ल किसी चीज को तब तक नहीं समझ सकती जब तक वो उसकी तारीफ मुतयन ना कर दे। यानी उसे किसी खाने में ना रख दे। सही मतलब एक कैटेगरी बना दे। बिल्कुल। मिसाल के तौर पर जब आप रोशनी को समझती हैं तो अकल फौरन अंधेरे को उससे अलग करके एक हद मुकरर कर देती है। यानी अक्ल
डब्बों में सोचती है, खानों में सोचती है। लेकिन हक ताला की जात मुतलक है। वो लामहदूद है। और लामहदूद [संगीत] की कोई हद नहीं होती। कोई किनारा नहीं होता और उसका कोई मुतजाद नहीं होता। तो फिर अक्ल वहां जाकर उलझ जाती है। बिल्कुल। जब आप अकल के उस औजार से जिसका काम ही बांधना और कैद करना है उस हस्ती को समझने की कोशिश करती हैं जो हर कैद से मावरा है तो अक्ल लामहाला टूट जाती है या
यूं कह ले नाकाम हो जाती है हम यह नुक्ता वाकई गौरतलब है अगर मैं इसे एक तमसील से समझने की कोशिश करूं तो क्या हम यह कह सकते हैं कि अकल का काम एक खिड़की के फ्रेम की तरह है मतलब अगर हम एक कमरे में बैठे हैं और एक छोटी सी चौकोर खिड़की से आसमान को देख रहे हैं तो हमें आसमान चौकोर नजर आएगा। लेकिन हकीकत में आसमान चौकोर नहीं है। तो मसला आसमान की
वुसत का नहीं है बल्कि उस फ्रेम का है जिसके जरिए हम उसे देख रहे हैं। जब हम आसमान को खिड़की के फ्रेम में कैद करते हैं तो हम दरअसल आसमान को नहीं खिड़की की शक्ल को देख रहे होते हैं। सुभान अल्लाह। यह एक निहायत [संगीत] वाज़ तमसील है। वाकई जब इंसान उस खिड़की के फ्रेम को ही मुकम्मल [संगीत] आसमान समझ बैठता है तो वह एक बहुत बड़ी फिक्री उलझन का शिकार हो जाता है। और इसी मकाम पर
कुरान मजीद एक इंतहाई गहरी हकीकत की तरफ इशारा करता है। कुरान कहता है वला युतना ही इलमा यानी वो अपने इल्म से उसका एहाता नहीं कर सकते। दुरुस्त यह कुरानी आयत इंसान को उसके अकल की हदिया दिलाती है। कायनात की अशिया के बारे में हमारा इल्म मुहित हो सकता है। हम एक दरख्त एक पत्थर या एक सितारे को समझ कर अपने इल्म के दायरे में ला सकते हैं। हम लेकिन हक ताला के मामले में इंसान उसकी
तरफ सफर तो करता है। उसकी सिफात का मुशाहदा तो करता है मगर उस पर अपना इहाता कायम नहीं कर सकता। लेकिन अगर हमारी अक्ल उस हस्ती का एहता नहीं कर सकती और हम सिर्फ एक महदूद फ्रेम से ही देख सकते हैं तो फिर इंसान इतने पुख्ता दावे कैसे करता है? हम देखते हैं कि इंसान अल्लाह की जात को समझने के मामले में अक्सर बहुत ज्यादा तनाजात और बहसों में घिरा रहता है। ये एक बड़ी हकीकत है हमारे मुआशरे की। इस
सवाल का जवाब शेख-ए अकबर के एक निहायत गहरे और फिक्री पहलू में पोशीदा है। अच्छा। देखें जब महदूद इंसान और लामहदूद हकीकत का सामना होता है तो इंसानी जहन एक लाशूरी दफाई निजाम अपनाता है। क्योंकि ज़हन लामहदूद को बर्दाश्त [संगीत] नहीं कर सकता ना। इसलिए वो अल्लाह ताला की चंद सिफात को जिन्हें वो इंसानी दायरे में थोड़ा बहुत समझता है। अपने ज़हन के सांचे में ढाल लेता है। यानी वो अपने हिसाब से एक तस्वीर बना लेता
है। बिल्कुल। इंसान अपने फहम, अपने इल्म और अपने तजुर्बात की बुनियाद पर अल्लाह का एक तसवुर तराशता है। और फिर उस तसवुर को अपने ज़हन में मुकम्मल और हत्मी करार दे देता है। और शेख-ए-अकबर निहायत नरमी मगर कतई अंदाज में बताते हैं कि उस मुकाम पर इंसान दरअसल अल्लाह की हकीकी जात को नहीं पहचान रहा होता बल्कि वो वो उस ज़हनी तसवुर को पहचान रहा होता है जो उसने [संगीत] खुद बनाया है। और उसे शेख-ए अकबर अपने ही
अकीदे का खुदा की इस्तलाह देते हैं। हम यह एक इंतहाई संजीदा मकाम है। क्या हम यह कह रहे हैं कि इंसान लाश तौर पर हक ताला की नहीं बल्कि अपने ही तराशे हुए एक जहनी तसवुर या एक तरह के जहनी बुत की परस्तिश करने लगता है। जी उसे जहनी बुत भी कहा जा सकता है। तो मैं इसकी मजीद गहराई चाहूंगी। यह जहनी
बुत या तसवुर बनता कैसे है? मतलब क्या इंसान [संगीत] इरादतन ऐसा करता है जानबूझकर? नहीं। यह इरादतन नहीं होता। यह दरअसल हमारी अक्ल की साख्त का नतीजा है। [संगीत] इसे यूं समझे कि इंसान अदिल का, रहम का या गुस्से का एक महदूद इंसानी तसवुर रखता है। हम अपने तजुर्बे की बुनियाद पर। जी। तो जब वो इन सिफात को खुदा से मंसूब करता है तो वो ला शशरी तौर पर खुदा की
सिफात को अपने इंसानी पैमाने पर मापने लगता है। वो चाहता है कि खुदा बिल्कुल वैसे ही काम करे जैसे इंसान के नजदीक दुरुस्त है। सही यानी हम खुदा को अपनी शरायत पर समझना चाहते हैं। बिल्कुल दुरुस्त। और जब हक ताला की जात उसके बनाए हुए इस महदूद ज़हनी खाके से बाहर कोई तजल्ली फरमाती है तो इंसान उसे तस्लीम करने से इंकार कर देता है क्योंकि वो वो उसके फ्रेम में फिट नहीं आती। शेख अकबर के
नजदीक अकायद के दरमियान जो टकराव हम दुनिया में देखते हैं ना वो दरअसल हकीकत के दरमियान टकराव नहीं है। वो इंसानों के अपने बनाए हुए ज़हनी तसवुरात या उन्हीं फ्रेम्स के दरमियान का टकराव है। मतलब हर कोई अपने फ्रेम को ही पूरा आसमान कह रहा है। जी। हर शख्स अपने महदूद बर्तन को कायनात की वाहिद [संगीत] हकीकत समझ बैठता है और दूसरे के बर्तन को रद्द कर देता है। मसला कभी भी अल्लाह की वसत का नहीं है। हमेशा
जानने वाले इंसान की महदूद फितरत का है। तो इसका मतलब तो यह हुआ कि अगर हम सिर्फ अक्ल के सहारे चलते रहे तो हम हमेशा फ्रेम्स और ज़हनी तस्सवुरात ही बनाते रहेंगे। [संगीत] और कभी भी हकीकत मुतलक तक नहीं पहुंच पाएंगे। जी अक्ल का सफर तो यहीं तक है। तो फिर इस बंद गली से निकलने का रास्ता क्या है? अगर ज़हनी मालूमात और तसव्वुरात
काफी नहीं है तो वो हकीकी पहचान जिसे तसवुफ में मारिफत कहा जाता है। वो क्या चीज है और यह मारिफत अक्ल से कैसे मुख्तलिफ है? मारफत के तस्सवुर को समझने के [संगीत] लिए हमें अक्ल के दायरे से निकलकर कलब यानी दिल के दायरे में दाखिल होना पड़ता है। हकीकी पहचान या मारफत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप मालूमात की तरह इकट्ठा करें। किताबों में पढ़ें और ज़हन की अलमारी में सजा लें। हम
अक्ल जो है वह फासले से चीजों का तजिया [संगीत] करती है। जबकि कलब इस हकीकत के साथ एक जिंदा और गहरा रिश्ता बनाता है। शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि कलब की वसत लाहदूद है। अकल बांधती है लेकिन कलब का मादा ही बदलते रहना और कुशादा होना है। जब इंसान को यह गहरा इदराक हो जाता है कि उसकी अकल महदूद है और वह अपने बनाए हुए तसवुरात के खोल को तोड़ देता है तब वह
मारफत के रास्ते पर कदम रखता है। हम यानी मारफत मालूमात का नाम नहीं है। नहीं मारफत अल्लाह ताला की सिफात और उसकी तजलियात के मुशाहिदे का नाम है। अच्छा यहां एक लम्हे के लिए रुकते हैं। हमने तजल्ली का लफ्ज इस्तेमाल किया। जी हां। जो लोग इस इल्म से बराहेरास्त वाकिफ नहीं है उनके लिए इस तसवुर को थोड़ा सादा करते हैं। क्या हम इसे यूं समझ सकते हैं कि तजल्ली हक ताला की किसी सिफत का जाहिर
होना है। इस अमल को हम कैसे समझें? देखिए तजल्ली दरअसल जात बारी ताला का अपने आप को जाहिर करना है। यानी उसका सेल्फ डिस्क्लोज़र है। हम खुद को जाहिर करना। जी। हक ताला [संगीत] खुद को कायनात की हर शय में हर लम्हे में अपनी किसी ना किसी सिफत के जरिए जाहिर फरमा रहा है। कभी वो अपने जलाल के साथ जाहिर होता है तो कभी अपने जमाल के साथ। सुभान अल्लाह। कभी वो खालिक के तौर पर सामने आता है। कभी
रजाक के तौर पर। और यह जो तजल्ली है ना यह कोई माद्दी रोशनी नहीं है जो हमारी इन जाहिरी आंखों को नजर आए बल्कि यह हकीकत का वो इदराक है जो कलब पर वारिद होता है। सही और अकल इन तजलियात के साथ क्या करती है? अकल इन तजलियात को किसी एक तारीफ में कैद करना चाहती है। लेकिन कलब क्योंकि खुद तगुर पजीर है। उसमें कुशादगी है। वो इन
तजलियात को उनकी तमामतर रंगारंगी और वसत के साथ तबूल करने की सलाहियत रखता है। हम यानी कलब उस समंदर को अपने अंदर महसूस कर सकता है। जी। और जब कलब इन लामहदूद तजलियात का मुशाहदा करता है ना तो एक कैफियत पैदा होती है जिसे शेख अकबर हैरत का नाम देते हैं। हैरत [संगीत] दुनियावी मामलात में तो जब हम किसी चीज को समझ नहीं पाते या किसी मसले में फंस जाते हैं तो हम कहते हैं कि
हम हैरत और उलझन का शिकार हैं। जी आमतौर पर ऐसा ही समझा जाता है। क्या शेख-ए-अकबर के यहां भी इसका यही मतलब है? बिल्कुल नहीं। और यह शेख-ए-अकबर के फलसफे का एक निहायत ही खूबसूरत और लतीफ मकाम है। दुनियावी और मादी सतह पर हैरत यकीनन लालमी की निशानी हो सकती है। लेकिन जात बारी ताला के मामले में हैरत सरासर एक मुख्तलिफ हकीकत है।
वो कैसे? उनके नजदीक यह हैरत नाकामी का निशान नहीं है। बल्कि यह तो इंतहाई गहरी समझ का आगाज है। जब एक इंसान पर यह हकीकत खुलती है ना कि अल्लाह ताला की तजलियात की कोई हद नहीं है और वह उस हस्ती को किसी एक तसवुर में कैद नहीं कर सकता तो उस पर एक गहरी खामोशी और हैरतारी हो जाती है। जितना इंसान हकीकत के करीब होता चला जाता है उसे
अपनी अक्ल की महदूदियत और हक की वसत का उतना ही गहरा एहसास होता है। यह हैरत इसलिए पैदा होती है कि इंसान बेवक़ अल्लाह की उन सिफात का मुशायदा कर रहा होता है जो बजाहिर मुतजाद लगती हैं। जैसे उसका बेहद करीब होना जो शहरग वाली बात आपने शुरू में की और साथ ही [संगीत] अकल की पहुंच से बेहद दूर होना। सुभान अल्लाह। यानी यह हैरत लाइल्मी का
अंधेरा नहीं है बल्कि यह तो उस मकाम की बात है जहां रोशनी इस कदर ज्यादा और खालिस होती है कि [संगीत] अकल की आंखें खीरा हो जाती हैं। वाह! बहुत खूबसूरत अंदाज में आपने बात समेटी। बिल्कुल ऐसा ही है। वह समझ नहीं पाती कि इतनी वसत को कैसे समेटे। बेशक इस हैरत में एक सरशारी है। और इस मकाम की बुलंदी को समझने के लिए रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की एक निहायत गहरी दुआ की तरफ देखना जरूरी है।