Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
The Spiritual Secret of Fasting: Ibn al-‘Arabi’s Futuḥāt al-Makkiyya | Fikr Nama – Transcript
Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube
Summary
AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.
- शेख-ए-अकबर इब्न अरबी रहमतुल्लाह अलैह के मुताबिक रोजा बाकी तमाम इबादतों से बिल्कुल मुख्तलिफ है क्योंकि यह कोई मुसबत अमल या एक्शन नहीं बल्कि अमल से रुक जाने का नाम है।
- रोजा रखने से इंसान अपनी बशरी जरूरतों से खुद को पीछे हटाकर अपने दिल के आईने पर जमी हुई मोहताजी और जरूरत के गुबार को साफ कर देता है।
- अल्लाह ताला ने हदीस-ए-कुदसी में फरमाया है कि रोजा मेरे लिए है, क्योंकि इस इबादत में कोई दिखावा या रियाकारी नहीं होती और यह खालिस तरीन राज है।

Use this video with Pro
Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).
Transcript
Search ignores accents. All transcript text stays visible.
रोजा एक ऐसी इबादत जिसके बारे में शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं कि जब बंदा शूरी तौर पर अपनी बशरी जरूरतों से दस्तरदार होता है तो वह दरअसल अपने आईने से एहतियाज यानी जरूरत के गुबार को साफ कर देता है ताकि उस खाली जगह में अल्लाह की सिफत ते समदियत यानी बेनियाजी
जलवागर हो सके। आज फिक्रनामा में हम फुतूहात मकिया के इस अमीक नुक्त को समझने की कोशिश करेंगे कि रोजा क्यों एक इलाही [संगीत] सिफत है और क्यों अल्लाह ने इसे कायनात की तमाम इबादतों में से चुनकर फरमाया। असोमुल्ली यानी रोजा मेरे लिए है। इससे पहले कि हम इनके इस हैरतंगेज फलसफे में गुम हो जाएं। मेरा ख्याल है थोड़ी सी
बात इस अजीमो शान किताब के बारे में भी हो जानी चाहिए। यानी फतूहात मकिया। देखें यह रूहानी और सूफियाना हिकमत का एक बेकरार समंदर है। जिसे शेख-ए अकबर इब्न अरबी रहमतुल्लाह अलह ने कई दहाइयों की रियाजत के बाद कलम बंद किया। और इसमें खालिक और इंसान की रूह के ताल्लुक की जो परतें खोली गई हैं, वह आज भी इल्म के मुतलाशियों को हैरान कर देती हैं। और आप
हैरान होंगी कि यह सफर कोई छोटा नहीं था। लगभग 30 साल का अरसा लगा इस किताब को मुकम्मल होने में। अगर हम इसकी वुसत की बात करें तो अपनी असल शक्ल में यह 37 जिल्दों पर मुश्तमिल है। और 560 अबवाब। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इसमें खालिक और इंसान के रिश्ते की [संगीत] कितनी गहरी हकीकतें बयान की गई होंगी। हम वाकई और आज हम इसी समुंदर के एक छोटे से हिस्से यानी रोजे के फलसफे पर बात कर रहे हैं।
जी। तो आमतौर पर इबादत का लफ्ज सुनकर ज़हन में कोई ना कोई अमल आता है। मतलब हम नमाज पढ़ते हैं तो खड़े होते हैं, रुकू करते हैं, सजदे में जाते हैं। एक हरकत हो रही है। बिल्कुल ऐसा ही है। इसी तरह हज को देखें। एक तवील सफर है, तवाफ़ है, सही है। जकात में हम अपना माल गिन के किसी को देते हैं। यानी हर जगह कुछ ना कुछ किया जा रहा है। हां। तो फिर रोज़े में ऐसा क्या मुख्तलिफ़ है?
यही तो वो बुनियादी फर्क है जो शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह अपनी फिकुल इबादत में बहुत वाज़ अंदाज में बयान करते हैं। वो बताते हैं कि रोजा बाकी तमाम इबादतों से यक्सर मुख्तलिफ है। क्योंकि यह कोई मुस्बत अमल या एक्शन है ही नहीं। यह अमल से रुक जाने का नाम है। अगर हम इसे अरबी इस्तलाह में समझे तो यह तर्क है। यानी किसी चीज को छोड़ देना।
जी। जब इंसान रोजा रखता है तो वह कोई नया काम सर अंजाम नहीं दे रहा होता। वो महज उन कामों से दस्तरदार हो जाता है जो वह आम रूटीन में करता है। खानापीना और दीगर तमाम बशरी तकाजे जो इंसान के वजूद का हिस्सा हैं रोजेदार उन सबको शहरी तौर पर मुत्तल कर देता है। यानी इंसान जानबूझकर अपनी बशरी एहतियात से
अपनी जरूरतों से खुद को पीछे हटा लेता है। उसमें कोई शोर नहीं है। किसी को बताने की जरूरत नहीं है। जी यह बस एक अंदरूनी जब्त है और यही वो मकाम है जहां मादी दुनिया की हदें खत्म होती हैं और रूहानी सफर का बाकायदा आगाज होता है। तो हमने अपनी एक शदीद जरूरत को रोक दिया। उससे एक खला पैदा हुआ। वक्त का खला,
तवज्जो का खला। अब इस खला का समदियत उससे क्या ताल्लुक बनता है? यह समदियत का तसवुर क्या है? इस ताल्लुक को समझने के लिए हमें पहले अल्लाह की सिफत अस समद पर गौर करना होगा। आपको सूर इलास तो याद होगी। अल्लाह ताला अपनी पहचान करवाते हुए फरमाता है अल्लाह समद बेशक यानी वो जात जो बेनियाज है बिल्कुल जो किसी की मोहताज नहीं जिसे ना नींद आती है ना भूख लगती है ना प्यास
सताती है वो इन तमाम बशरी तकाजों से अक्सर पाक है शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल एक बहुत ही खूबसूरत और गहरा तस्सवुर पेश करते हैं। वह इंसान की मिसाल एक आईने से देते हैं। सूफियाना रिवायत में एक तसवुर है जिसे इंसान कामिल कहा जाता है। यह कोई माफूक उल फितरत हस्ती नहीं है, बल्कि यह वह इंसान है जिसका दिल तमाम दुनियावी अलाइसों और नफ़्स के बोझ से पाक होकर एक [संगीत] बिल्कुल शफाफ आईने की तरह हो गया
हो। ताकि उसमें इलाही सिफात का अक्स पड़ सके। बिल्कुल। लेकिन आम हालात में क्या होता है? इंसान के इस आईने पर उसकी भूख, प्यास और ख्वाहिशात की वजह से एहतियाज यानी मोहताजी का गुबार चढ़ा रहता है। और जब इंसान रोजा रखता है और सारा दिन अपनी मर्जी से भूखा प्यासा रहता है तो वह दरअसल उस आईने से उसी जरूरत के गुबार को साफ कर रहा होता है।
तो जब वो गुबार साफ हो जाता है और आईना शफाफ हो जाता है तो फिर उसमें जो अक्स नजर आता है वो उसी बेनियाजी यानी समदियत का अक्स है। बिल्कुल समदियत का अक्स। लेकिन जब हम कहते हैं कि इंसान में समदियत झलकती है तो कहीं इससे यह मतलब तो नहीं निकलता कि इंसान और खुदा के दरमियान कोई बराबरी कायम हो रही है?
नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। और यह सवाल आपने बहुत अहम उठाया है। शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल इस मामले में हद दर्जा मोहतात हैं। वो किसी भी मकाम पर इंसान और खुदा की बराबरी का शायबा तक नहीं आने देते। इसीलिए वह एक मखसूस लफ्ज इस्तेमाल करते हैं। मुनासबत जिसका मतलब है एक रिेंबलेंस, एक ताल्लुक। यह बराबरी नहीं है। यह महज एक साया या एक अक्स है। इसे हम
एक बड़ी सादा सी मिसाल से समझ सकते हैं। फर्ज करें एक बिल्कुल साफ आईना है जिसे धूप में [संगीत] रख दिया जाए। अब इसमें सूरज की रोशनी पूरी चमक के साथ नजर आएगी। वो रोशनी इतनी तेज हो सकती है कि आंखों को खीरा कर दे। लेकिन इस सबके बावजूद क्या वो आईना सूरज बन जाता है? नहीं जाहिर है आईना तो आईना ही रहता है। ऐन इसी तरह इंसान तो मिट्टी से बना है।
उसके सृष्टि में ही भूख और कमजोरी लिखी है। लेकिन एक मादी इंसान का शोरी तौर पर अपनी भूख को तर्क करके उस रूहानी मुकाम तक पहुंचना यह एक बहुत गैर मामूली उरूज है। जब वो अपनी उस शिद्दत जरूरत को दबाता है ना तो बस एक लम्हे के लिए उसके आईने पर उस बेनियाजी का अक्स पड़ता है। बहुत खूबसूरत बात कही आपने और इस वजाहत के बाद ना एक
इंतहाई अहम हदीस कुदसी के मानी बिल्कुल एक नए जाविव से समझ में आने लगे हैं। वो हदीस जिसमें अल्लाह ताला फरमाता है असौमुली यानी रोजा मेरे लिए है। अब जब हमने यह जान लिया है कि रोजा दरअसल अमल के रुक जाने का नाम है। और इससे आईने पर समदियत का अक्स पड़ता है तो फिर इस हदीस की क्या शरा बनती है? मतलब तमाम इबादतें तो अल्लाह ही के
लिए होती है ना। तो फिर रोजे को ही इतनी खास फजीलत और इनफिरादियत क्यों दी गई [संगीत] कि अल्लाह फरमाए रोजा मेरे लिए है। इस सवाल का जवाब इबादत की जाहरी साख्त में छुपा है। अगर आप गौर करें नमाज, हज, जकात इन सबका एक जाहिरी पहलू है। जब कोई शख्स नमाज पढ़ता है, तो दूसरे उसे देख सकते हैं। हज के सफर पर जाने वाले की भी मुआशरे में एक पहचान बनती है। जकात देने का भी एक
अमल है जो नजर आ सकता है। और जहां भी यह जायरी अमल होता है ना, वहां इंसान के नब्स के लिए एक चोर दरवाजा हमेशा खुला रहता है। आपका मतलब है रियाकारी का? बिल्कुल। दिखावे का अंसर लाश तौर पर आ सकता है कि लोग मुझे नेक समझ रहे हैं। लेकिन रोजा इस लिहाज से बिल्कुल मुनफरिद है। यह इंसान और उसके पैदा करने वाले के दरमियान एक खालिस तरीन राज है। फर्ज करें एक शख्स सैरी खाकर घर से निकले और सारा
दिन किसी के सामने कुछ ना खाए पिए। और अगर वह किसी बंद कमरे में जाकर छुपकर पानी पी ले तो दुनिया की कोई ताकत उसे पकड़ थोड़ी सकती है। यही तो बात है। सिर्फ और सिर्फ एक ही जात गवाह होती है जो उस पोशीदगी को जानती है। उसमें रियाकारी की दिखावे की कोई गुंजाइश बचती ही नहीं। क्योंकि इस इबादत में कोई दिखावा [संगीत] नहीं और यह खालिस्तान एक अनदेखी जात से मोहब्बत की बुनियाद पर रखी जाती है। इसलिए अल्लाह ताला ने इसे अपने
साथ खास कर लिया के असौमुल्ली। लेकिन अगर हम इस सारी फिक्री और रूहानी बात को अपने बिल्कुल रोजमर्रा के इनफरादी तजुर्बे से जोड़ें तो रमजान में एक खास लम्हा आता है जिससे हम सब रोजाना गुजरते हैं। वो वक्त जब जिस्म की तवान्नाइयां बिल्कुल निचड़ चुकी होती हैं। होंठ खुश होते हैं और एक अजीब सी जिस्मानी कमजोरी तारी होती है। जी हां, एक गहरी निकाहत। उस वक्त जब एक
रोजेदार इस कमजोरी की हालत में तन्हाई में दुआ के लिए हाथ उठाता है तो उसके अंदर एक अजीब सी एक बहुत गहरी खामोशी होती है। इस लम्हे ऐसा लगता है जैसे दुनिया की कोई तलब ही बाकी नहीं रही। बिल्कुल। तो उस मखसूस लम्हे को इन रूहानी असरार की रोशनी में कैसे देखा जाए? वह लम्हा दरअसल उस पूरी इबादत की मेराज है। शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह इस जिस्मानी
कमजोरी को एक बहुत ही खूबसूरत नाम देते हैं। दिल का सैकल होना यानी पॉलिशिंग ऑफ द हार्ट। देखें आम दिनों में हमारा नब्ज़ बहुत तवाना होता है। वो हमें हर वक्त ख्वाहिशात के पीछे दौड़ाता है। अंदर एक शोर मचा रहता है कि मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए। बिल्कुल। हम हर वक्त कुछ ना कुछ हासिल करने की दौड़ में होते हैं। लेकिन जब सारा दिन जिस्म को कुछ नहीं मिलता ना तो वह नफ्स कमजोर पड़ने लगता है।
जिस्मानी निकाहत के साथ-साथ वो जो अंदरूनी शोर था वो भी थम जाता है। इंसान को बजाहिर यह लग रहा होता है कि वह कमजोर हो रहा है। लेकिन हकीकत में उसकी रूह का बोझ हल्का हो रहा होता है। इसी हालत में जब उसके दिल का आईना मुकम्मल तौर पर सैकल हो जाता है तो उसमें इलाही नूर सबसे ज्यादा शफाफियत के साथ मुनकिस होता है। सुभान अल्लाह। यह कितना हैरतंगेज तजा है ना? हम आमतौर पर
यही समझते हैं [संगीत] कि हम तब ताकतवर होते हैं जब हम पेट भरे हों, जब हमारे पास सब कुछ हो। लेकिन यहां इल्म तसवुफ हमें यह बता रहा है कि असल ताकत तो उस वक्त मिलती है जब हम अंदर से बिल्कुल खाली होते हैं। बेशक। जब हम अपनी जिस्मानी और मादी कमजोरियों की इंतहा पर होते हैं। फतूहात मकिया का यह मुतालिया वाकई इंसान के जाहिरी और बातनी वजूद के दरमियान एक पुल
तामीर करता है। और सोचने की बात यह है कि इंसान का रास्ता कितना मुख्तलिफ है। जिस लम्हे वह मेहरूमी की आखिरी हदों को छू रहा होता है। ऐन उसी लम्हे उसका रूहानी वजूद कायनात की सबसे बड़ी ताकत और रोशनी से जुड़ जाता है। सबसे बड़ी कमजोरी का लम्हा ही दरअसल सबसे बड़ी रूहानी मेराज का लम्हा बन जाता है। मैं चाहूंगी कि हमारे सुनने वाले इस गहरे ख्याल पर जरूर गौर करें।
या रब्बुल आलमीन [संगीत] इस मुबारक महीने में हम तुझसे दुआ गो हैं कि हमारे दिलों के उन आईनों को दुनियावी तलब के हर उस गुबार से साफ फरमा दे। जो हमें तेरी जात से दूर करता है। हमारी इस जायरी भूख और प्यास को हमारी रूह की दायमी सेराबी का जरिया बना दे। और हमारे इस आरजी रुक जाने को अपनी सिफत समदियत के नूरानी अक्स से मुनववर फरमा दे। आमीन।