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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Why Did Musa AS Go to the Fire? | Ibn Arabi's Deepest Secret | Fuss 25 | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलैह हजरत मूसा अल सलाम की जिंदगी के वाकात के जरिए जाहिर और बातिन के दरमियान रबत बयान करते हैं।
  • शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि कत्ल किए जाने वाले मासूम बच्चों की तमाम रूहानी तादाद और पाकीजगी वापस हजरत मूसा अल सलाम की जात में शामिल हो गई थी।
  • हजरत मूसा अल सलाम अंधेरी रात में आग की तलाश में गए थे जहां अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उसी आग की सूरत में तजल्ली फरमाई।
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Transcript

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हम अक्सर किसी वाक्य को सिर्फ उसकी जाहरी सूरत से देखते हैं। हजरत मूसा अल सलाम की विलादत के जमाने में जब फिरौन बनी इसराइल के बच्चों को कत्ल करवा रहा था तो बजाहिर यह सिर्फ जुल्म, खौफ और हलाकत का वाकया दिखाई देता है। मगर शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह इसी वाक्य के अंदर एक ऐसी हिकमत देखते हैं जिसमें उन मकतूल बच्चों

की जिंदगी भी हजरत मूसा अल सलाम की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। और फिर हजरत मूसा अल सलाम की हिकमत [संगीत] में शेख-ए अकबर हमें मौत और जिंदगी, जाहिर और बातिन, इल्म और जहल और हरकत व मोहब्बत के दरमियान एक ऐसा रब्त दिखाते हैं जिसके बाद हजरत मूसा अल सलाम की जिंदगी के बहुत से वाक्यात एक दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देने लगते हैं। आइए आगाज़ करते हैं।

जी। तो इस तफसीली जायज़ का जो बुनियादी मकसद है वो हजरत मूसा अल सलाम की हिकमते उलविया के उन बातनी हकायक को समझना है जो शेख अकबर ने बयान किए हैं। बिल्कुल और इस मुताले में हमारा मकसद महज कोई तारीख वाकया दोहराना नहीं है बल्कि हम शेख अकबर की निगाह से उन हकायक को देखेंगे जो कायनात के पसेपर्दा काम कर रहे हैं। मैं असल में वहीं से आगाज करना चाहती हूं

जो हमने शुरू में बात की कि बजाहिर कत्ल हो जाने वाले वो बच्चे वो कैसे हजरत मूसा अल सलाम की कुत का हिस्सा बन गए। जी यह उलझन बिल्कुल फितरी है क्योंकि देखिए आमतौर पर हम इंसान हलाकत को किसी चीज का मुकम्मल खात्मा समझ गए हैं यानी फना [संगीत] मान लेते हैं। हां बिल्कुल मौत का मतलब तो यही लिया जाता है। जी लेकिन शेख अकबर कायनात के एक बहुत ही बुनियादी उसूल की तरफ इशारा करते हैं कि यहां कोई चीज फना नहीं होती। वो सिर्फ

अपना रुख बदल लेती है। सही। शेख अकबर फरमाते हैं कि इन मासूम बच्चों कीियां [संगीत] जिन्हें खासतौर पर हजरत मूसा अल सलाम की तलाश में कत्ल किया गया था उनकी तमाम रूहानी इस तादाद उनकी पाकीजगी वो वापस हजरत मूसा अल सलाम की जात में शामिल हो गई अच्छा यानी वो जाया नहीं हुई बल्कि मुंतकिल हो गई बिल्कुल इसे कोई मादी मुंतकिली ही ना समझे यह एक रूहानी हकीकत है हजरत मूसा अल सलाम

महज एक फर्दे वाहिद नहीं [संगीत] रहे थे बल्कि वो बेशुमार जिंदगियों का एक मजमा बन गए थे और उन बच्चों की कुर्बानी रायगा नहीं गई। वही तो वह ताकत बनी जो बाद में फिरौन के सामने हक का इस्तियारा बनके उभरी। यह तो वाक्य का पूरा रुख ही बदल देता है। लेकिन मैं यह सोच रही थी कि एक छोटे बच्चे में ऐसी कौन सी रूहानी कुत होती है जो एक जलीलुल कदर पैगंबर की ताकत में इजाफे का सबब बन जाए। [संगीत] बजाहिर तो बच्चा एक

कमजोर वजूद होता है ना। असल में यही वह मकाम है जहां शेख अकबर की बसीरत इंसान को हैरान कर देती है। वो फरमाते हैं कि कायनात में जो छोटा या बजाहिर कमजोर नजर आने वाला वजूद है अपने अंदर तस्खीर की एक जबरदस्त कुत रखता है। वो कैसे?

देखिए आपने गौर किया होगा कि एक बुजुर्ग शख्स अपने इल्म और मर्तबे के बावजूद जब एक छोटे बच्चे के साथ खेलता है तो क्या होता है? वो बिल्कुल बच्चे के लेवल पर आ जाता है। जी हां। वो अपनी सतह से नीचे उतर कर उस बच्चे की तोतली जुबान में बात करता है। यह दरअसल उस बच्चे की कुर्बत इलाही का असर है जो उसने अपने रब से नया-नया पाया होता है। अपनी तहारत की वजह से वह बड़ों को मुसखर

कर लेता है। शेख-ए-अकबर यहां रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वही वसल्लम की एक अजीम सुन्नत का भी हवाला देते हैं। जी वो बारिश के पानी वाली सुन्नत। बिल्कुल। रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि व आही वसल्लम बारिश के पानी को अपने सर और जिस्म पर लेते थे और फरमाते थे कि इसका अपने रब से नया-नया अहद है। बारिश का वो कतरा जो अभी आसमान से उतरा है वो पाकीजगी का नमूना

है। बिल्कुल इसी तरह उन मकतूल बच्चों की अपने रब से जो कुर्बत थी वो हजरत मूसा अल सलाम की ताकत बनी। सुभान अल्लाह। क्या खूबसूरत रब है। यानी पानी का वह कतरा जिसका अपने रब से नया अहद है। वह हमें जिंदगी की हकीकत समझा रहा है। और अगर हम पानी ही की बात करें तो हजरत मूसा अल सलाम की विलादत के बाद उनकी वालदा उन्हें एक लकड़ी के ताबूत में रखकर दरिया में बहा देती हैं।

जी। बजाहिर तो यह एक लकड़ी का संदूक है और लहरें हैं। लेकिन शेख-ए अकबर इसे इंसान की अंदरूनी दुनिया से कैसे जोड़ते हैं? मेरा [संगीत] मतलब है कि इस जाहरी वाक्य के पीछे क्या मैकेनिज्म है। शेख-ए अकबर फरमाते हैं कि यह जो ताबूत था जिसमें हजरत मूसा अल सलाम को रखा गया यह दरअसल इंसान का नासूत है। यानी इसका इंसानी जिस्म और उसकी मादी फितरत। अच्छा,

ताबूत से मुराद जिस्म है और दरिया, और दरिया जिसमें इसे बहाया गया, वह इल्म का दरिया है, जो इंसान को उसकी हिस्स्याती और तली कुतों के जरिए हासिल होता है। जिस तरह ताबूत लहरों पर तैरता है, बिल्कुल उसी तरह इंसानी रूह अपने नासूत यानी जिस्म के अंदर रहते हुए इस इल्म के समंदर में सफर करती है। आमतौर पर तसव्वफ में तो हम यह

सुनते हैं कि जिस्म एक कैदखाना है जिससे रूह को आजाद होना है। मगर यहां तो शेख-ए अकबर के तसवुर में ताबूत या जिस्म कैदखाना नहीं बल्कि एक सवारी लग रही है। जी [संगीत] आप बिल्कुल दुरुस्त समझी हैं। यह जिस्म कोई रुकावट नहीं है। बल्कि यह एक नागुजीर जरिया है। एक सवारी है जिसके अंदर रहकर इंसान अपने रब की तजलियात का मुशाहदा करता है। अगर यह ताबूत ना हो ना, तो इंसान इस दुनियावी इल्म के दरिया में सफर ही

नहीं कर सकता। सही। और इसे अगर हम थोड़ा और वसी तनाजुर में देखें तो जिस तरह अल्लाह ताला इस ताबूत का इंतजाम फरमाता है उसे डूबने से बचाता है बिल्कुल उसी तरह वो पूरी कायनात का इंतजाम अपने असबाब सूरतों और अपने अस्मा इलाहिया के जरिए फरमा रहा है। कायनात बजाते खुद अल्लाह की तजलियात का मजहर है। यह सफर बजाहिर कितना खौफनाक है। एक नौजायदा बच्चे को ताबूत में बंद करके

दरिया में फेंक देना यह तो देखने में सरहन हलाकत लगती है। तो यह हलाकत निजात कैसे बन गई? शेख-ए अकबर मौत और जिंदगी को किस तरह देखते हैं? असल में शेख अकबर इसी मकाम पर इल्म और जहल और जिंदगी और मौत के दरमियान एक निहायत लतीफ सा रब्त कायम करते हैं। हम शेख अकबर कुरान मजीद की उन आयात का हवाला देते हैं जहां जहालत को मौत और इल्म को

जिंदगी करार दिया गया है। सच्ची मौत यह नहीं कि इंसान का सांस रुक जाए बल्कि सच्ची मौत यह है कि इंसान हकीकत की पहचान से महरूम रहे यानी जहालत में रहे। हम यानी बाततिन की मौत। दुरुस्त जब अल्लाह किसी को हिदायत देता है तो वह उसे जहल की मौत से निकालकर इल्म की जिंदगी अता करता है। मगर यहां शेख अकबर एक कदम मजीद आगे जाते हैं। वो कहते हैं कि इल्म का मतलब यह

नहीं कि इंसान किसी एक मकाम पर पहुंचकर मुतमई हो जाए। हकीकी इल्म तो इंसान को हैरत के मकाम तक ले जाता है। हैरत? सूफियाना लुगत में हैरत दरअसल हरकत और बेचैनी का नाम है और हरकत ही हकीकी जिंदगी है। जब सालिक को यह इदराक होता है कि अल्लाह की जात और उसकी तज्लियात की कोई हद नहीं है। वो एक तजल्ली देखता है और जब दूसरी देखता है तो वह पहली से मुख्तलिफ होती है। क्योंकि तजल्ली कभी दोहराई नहीं जाती।

सुभान अल्लाह। यह लामहदूदियत उसके दिल में एक ऐसी हैरत पैदा करती है जो उसे कभी रुकने नहीं देती। शेख अकबर उसकी मिसाल जमीन और पानी से देते हैं कि जब खुश्क जमीन पर पानी बरसता है तो जमीन हरकत में आ जाती है। उससे जिंदगी फूटने लगती है। यानी वो बेचैन होकर मजीद जानने की तलब में रहता है। जी मजाहिर की कसरत उसे हैरत में डालती है

और यही हैरत उसे मजबूर करती है कि वो इस कसरत के पीछे उस एक हकीकी रब की पहचान करे। वो खुदा के रास्ते पर मुस्तकिल महवा सफर रहता है। बेशक। और अगर हम इसी हरकत और बेचैनी को हजरत मूसा अल सलाम की वालिदा के दिल की कैफियत में देखें तो वह एक अजीब कशमकश का शिकार थी। एक तरफ बच्चे को दरिया में

डालने का खौफ था और दूसरी तरफ एक उम्मीद। उनके दिल में खौफ और उम्मीद के इस मिलाप को शेख अकबर किस तरह बयान करते हैं? वालदा मूसा का दिल उस वक्त इंसानी जज्बात और इलाही तसल्ली के बिल्कुल संगम पर खड़ा था। फिरौन का खौफ उन्हें मजबूर कर रहा था कि बच्चे को छुपाएं। मगर फिर अल्लाह ताला ने उनके कल पर इलहाम नाजिल किया। वो इलहाम कोई जाहिरी आवाज नहीं थी।

नहीं बल्कि उनके दिल में उतरने वाला एक ऐसा यकीन था जिसने उम्मीद का बीज बो दिया। उन्होंने बजाहिर अपने बच्चे को तुगियानी वाले दरिया के सुपुर्द कर दिया जो कि बजाहिर तकरीब थी। मगर बातनी तौर पर उन्हें यकीन था कि यह दरिया ही उसकी पनागाह बनेगा। यह तवकक्कुल का कमाल है। बिल्कुल। यह इस बात की दलील है कि बजाहिर नजर आने वाला नुकसान अगर अल्लाह के हुकुम के तहत हो तो वह बातिन में अजीम तामीर का

पेशखमा होता है। और इसी जाहिरी तखरीब और बातनी हिफाजत की एक कड़ी हमें हजरत मूसा अल सलाम की जवानी के उस वाक्य ने भी नजर आती है जब उनके हाथों नादानिस्ता तौर पर एक किब्ती कत्ल हो गया। जी बिल्कुल। यह वाकया बजाहिर एक जुर्म या बहुत बड़ी गलती नजर आता है। खासतौर पर एक नबी के लिए शेख अकबर इसकी तह में क्या बातनी हिकमत देखते हैं।

शेख-ए अकबर यहां एक इंतहाई लतीफ उसूल वजा करते हैं कि नबी का बातिन नबूवत अता होने से कब्ल भी अल्लाह की खास हिफाजत में होता है। इससे जो बजाहिर लज़िश नजर आती है, वो दरअसल किसी अजीम इलाही तदबीर का हिस्सा होती है। यानी वो कत्ल कोई इरादी जुर्म नहीं था। हरगिज़ नहीं। शेख- अकबर उसकी वजाहत बाद में आने वाले हजरत खिज्र अल सलाम के वाक्य से

करते हैं। जिस तरह हजरत खिज्र [संगीत] अल सलाम ने एक गरीब की कश्ती में सुराख कर दिया जो बजाहिर तकरीब थी। मगर बाततिन में उस [संगीत] कश्ती को बचाना था। जी जालिम बादशाह से। यह वो सबब बनना था जिसने उन्हें मदियन की तरफ हिजरत पर मजबूर करना था। जहां उनकी रूहानी तरबियत होनी थी। हिजरत की बात हुई [संगीत] तो मुझे एक बात पर बहुत तजसुस है। जब हजरत मूसा अल सलाम मिस्र से निकले तो

बजाहिर तो वह खौफ के मारे भाग रहे थे। मगर शेख-ए अकबर इस शहर से निकलने को खौफ की बजाय मोहब्बत का नाम देते हैं। यह कैसे मुमकिन है? यही तो शेख अकबर की निगाह का कमाल है। वह फरमाते हैं कि कायनात में होने वाली हर हरकत चाहे वह बजाहिर कैसे ही क्यों ना नजर आए उसकी असल बुनियाद मोहब्बत पर है। मतलब अदम से वजूद में आना भी।

जी। वो भी अल्लाह की उस मोहब्बत का नतीजा था कि वो पहचाना जाए। जब हजरत मूसा अल सलाम शहर से निकले तो जाहरी आंख देखती है कि वह फिरौन से डर कर भाग रहे हैं। लेकिन हकीकत में वह मौत से इसलिए भाग रहे थे क्योंकि उन्हें अपनी बका और निजात से मोहब्बत थी। सुभान अल्लाह। यानी वो राहत की मोहब्बत में हरकत कर रहे थे। बिल्कुल। लिहाजा वो सफर खौफ की तारीकी में

लिपटा हुआ मोहब्बत का सफर था। और इसी मोहब्बत और बका के सफर के दौरान वो मुदियन पहुंचते हैं। थके हुए हैं, अजनबी हैं। फिर भी बगैर किसी उजरत के लड़कियों के लिए जानवरों को पानी पिलाते हैं। और साए में बैठकर कहते हैं, परवरदिगार तू जो खैर भी मुझ पर नाजिल करे, मैं उसका मोहताज हूं। यह मकाम फक्र है। यह सच्चा फक्र इंसान को

सिर्फ अल्लाह से जोड़ देता है। बेशक इसी फक्र की मनाजिल तय करते हुए उनकी मुलाकात हजरत खिज्र अल सलाम से होती है। शेख अकबर इन दोनों के उलूम के फर्क और उनके दरमियान अदब के रिश्ते को किस तरह वाज़ करते हैं। यह वाकया दरअसल जाहिरी शरीयत और बातिनी तकवीन के उलूम के दरमियान एक इंतहाई खूबसूरत तवाजुन है। शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि हजरत [संगीत] मूसा अल सलाम के पास

शरीयत और रिसालत का इल्म था। जबकि हजरत खिज्र अल सलाम के पास इलाही तकवीन का ज़ौकी इल्म था। जी दोनों के उलूम मुख्तलिफ थे। बिल्कुल। जब ये मिले तो हजरत खिज्र अल सलाम ने इब्तदाई ही में यह अदब कायम कर दिया कि ऐ मूसा अल्लाह ने आपको जो इल्म दिया है वो मेरे पास नहीं। और जो मुझे दिया है वो आपके पास नहीं। हम मर्तबे का एहतराम। जी। और जब हजरत मूसा अल सलाम ने जाहरी

शरीयत के मुताबिक सवालात उठाए तो हजरत खिज्र अल सलाम का जुदा हो जाना किसी नाराजगी का नतीजा नहीं था बल्कि यह उस मर्तबे की नजाकत थी। दोनों ने इलाही अदब की तकमील की। सही। यानी यह मकाम अदब है कि दूसरे के इल्म और मर्तबे का एहतराम किया जाए। अब जरा इनकी जिंदगी के सबसे बड़े मार्गे की तरफ आते हैं। जब वह वापस मिस्र आते हैं और

Frequently asked questions

शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि उन मासूम बच्चों की तमाम रूहानी तादाद और उनकी पाकीजगी वापस हजरत मूसा अल सलाम की जात में शामिल हो गई थी।

शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि ताबूत इंसान का नासूत यानी इंसानी जिस्म और मादी फितरत है, और वह दरिया इल्म का समंदर है।

हजरत मूसा अल सलाम अंधेरी रात में रास्ता भूल चुके थे और सर्दी से बचने के लिए आग की हाजत थी, जहां अल्लाह ने उसी आग की सूरत में तजल्ली फरमाई।