Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
The Universe Is the Breath of God | Ibn Arabi’s Secret of Fasting | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- शेख अकबर इबने अरबी फरमाते हैं कि यह कायनात अल्लाह की वह सांस है जिसने अदम की खामोशी को जिंदगी की धड़कन बख्शी।
- रमजान का महीना और रोजे की भूख इंसान के जिस्मानी शोर को शांत करके उसे अपनी सांस और रूहानी गहराई महसूस कराने में मदद करती है।
- हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वही वसल्लम की हदीस के मुताबिक रोजेदार के मुंह की सांस अल्लाह के नजदीक कस्तूरी की खुशबू से भी ज्यादा पसंदीदा है।

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Transcript
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बिस्मिल्लाह रहमान रहीम फिक्रनामा में एक बार फिर खुशामदीद। शेख अकबर इबने अरबी फरमाते हैं कि यह कायनात अल्लाह की वह सांस है जिसने अदम की खामोशी को जिंदगी की धड़कन [संगीत] बख्शी। आज फिक्रनामा में हम समझेंगे कि यह नफ्स-ए रहमानी क्या है और क्यों रमजान की तड़प हमें उस इलाही रहमत के और भी करीब कर देती [संगीत] है जिसके
बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वही वसल्लम ने फरमाया मैं रहमान की सांस को महसूस करता हूं। जी एक आम इंसान दिन भर में मेरा ख्याल है कोई 20,000 मर्तबा सांस लेता होगा और यह एक ऐसा खुदकार हयातियाती अमल है जिस पर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता लेकिन जिंदगी के दौड़ धूप में यह जो ये जो चलती हुई सांस है इसके अंदर एक बहुत बड़ा इलाही राज
पोशीदा है। बेशक मसला यह है कि हम आमतौर पर कायनात को और अपने वजूद को सिर्फ एक ठोस मादी जाविव से देखने के आदि हो चुके हैं। और दर हकीकत यही वो मादी जाविया है जिसने इंसान को अपनी असल हकीकत से दूर कर दिया है। लेकिन जब हम शेख अकबर इबने अरबी के फलसफे के इस पहलू पर बात करते हैं तो यह कोई कोई खुश्क माबादुल तबियाती या फलसफियाना बहस नहीं रहती। यह तो बाकायदा एक दाखिली तजुर्बा बन जाता
है। बिल्कुल एक रूहानी तजुर्बा। उनका यह तसवुर कि कायनात कोई ठोस, मुस्तकिल और आजाद हस्ती नहीं है। यह बात इंसानी सोच के धारे ही बदल देती है। जरा इस बात पर गौर करें कि हम जिसे अपनी सांस समझते हैं, वो दरअसल इस रहमत इलाही का तसलसुल है जो हमें हर पल अदम के अंधेरे से निकालकर वजूद के उजाले में ला रही है। लेकिन यहां जहन में एक सवाल उभरता है। जब
शेख ए अकबर इबने अरबी नफ्स ए रहमानी यानी कायनात को अल्लाह के सांस करार देते हैं तो एक आम इंसान इस गहरे इस्तियारे को कैसे समझे यानी कायनात के बनने का उस सांस से क्या ताल्लुक है?
अच्छा उसे एक बहुत ही लतीफ और रोजमर्रा की तमसील से समझा जा सकता है। जब इंसान बात करता है तो क्या होता है? फेफड़ों से हवा निकलती है। बिल्कुल। फेफड़ों से हवा का एक रेला निकलता है जो बजाते खुद एक बेआज और गैर मरी सांस होती है। वो महज एक सांस है। लेकिन जब वो सांस हल्क, तालू, जुबान और होठों के मुख्तलिफ हिस्सों से गुजरती है। वो मुख्तलिफ मखारज से टकराकर अल्फाज़ की
शक्ल इख्तियार कर लेती है। अब देखें सांस एक ही है जो अंदर से आ रही है। मगर जब वो जाहिर होती है तो कहीं वह मोहब्बत का लफज़ बनती है। कहीं इल्म का इजहार और कहीं हैरत की सदा। हम शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह बिल्कुल इसी तमसील को कायनात की तखलीक पर लागू करते हैं। वह फरमाते हैं कि जब अदम की कैफियत थी जब कुछ भी जाहिर नहीं था तो रब्बे कायनात की सिफत रहमत जोश में आई।
अल्लाह की रहमत ने उस अदम की खामोशी को तोड़ने के लिए एक नफ्स या सांस खारिज की जिसे नफ्स ए रहमानी कहा जाता है। और कायनात के तमाम मजाहिर जो इल्म इलाही में मौजूद थे वो इसी एक सांस के अंदर छुपे हुए इमकानात थे। जिस तरह बोलने वाली की एक सांस मुख्तलिफ हुरूफ और अल्फाज में ढलती है। इसी तरह रहमान की यह सांस कायनात की मुख्तलिफ सूरतों और मजाहिर में जाहिर हुई।
इसका मतलब यह हुआ कि यह पूरी कायनात, यह चांद, सितारे, कहकशाएं, समंदर, पहाड़ और खुद हम इंसान यह सब उसी एक सांस से बने हुए मुख्तलिफ अल्फाज़ हैं। बिल्कुल ऐसा ही है। और सबसे अहम नुक्ता इस पूरी बहस में यह है कि कोई भी लफ्ज सिर्फ उस वक्त तक कायम रहता है जब तक बोलने वाले की सांस उसमें शामिल हो। जैसे ही वह सांस टूटती है, लब्ज फना हो जाता है और खामोशी
छा जाती है। अगर एक लम्हे के लिए भी वह इलाही रहमत अपना फैज रोक ले, तो कायनात वापस अदम के अंधेरे में डूब जाए। और मेरे ख्याल से इसी इदराक का नाम ही तो रूहानी बेदारी है। जब यह एहसास दिल में उतर जाता है कि हम कोई अलग थलग खुद कफील वजूद नहीं है बल्कि हर लम्हा एक इलाही रहमत के धारे में बह रहे हैं तो फिर इंसान का तकबुर और मादी गुरूर खुद ब खुद खत्म हो जाता है।
बिल्कुल ऐसा ही है। फिर इंसान का हर सांस लेना महज एक हयातियाती अमल नहीं रहता बल्कि इस बात की गवाही बन जाता है कि रब की रहमत अभी तक उसे थामे हुए है। सुभान अल्लाह। अच्छा यह जो हमने बात की कि कायनात रब की सांस की मोहताज है तो क्या यही वजह है कि जब हम रोजे की हालत में होते हैं और अपने जिस्म को दुनियावी गजा से काटते हैं तो हमें वो इलाही सांस ज्यादा महसूस होने लगती है?
यह बहुत खूबसूरत रब है जो आपने जोड़ा है। क्योंकि आम दिनों में तो हम अपनी भूख, प्यास और दुनियावी जिंदगी के शोरगुल में मतलब इतने उलझे रहते हैं कि इस लतीफ हकीकत की तरफ कभी ध्यान ही नहीं जाता। जी रमजान का महीना दरअसल इसी शोर को कम करने के लिए आता है। इस रब को समझने के लिए हमें रोजे की जाहरी मशक्कत और बातनी सुकून दोनों को एक साथ देखना होगा। हम
जब मैदा खाली होता है तो जिस्म की वह सारी तवानाई जो आमतौर पर हाजमे के इंतहाई पेचीदा और तवील अमल में सर्फ हो रही होती है वो बच जाती है। जिस्म की मशीनरी जो हर वक्त कुछ ना कुछ जलाने में लगी रहती है वो एक तरह के ठहराव में आ जाती है। यानी जिस्म का अंदरूनी शोर थम जाता है। बिल्कुल और इस शोर के थमने से इंसान के अंदर एक अजीब सी लताफत और एक गहरी और पुरसकून खामोशी पैदा होती है। और शायद इसी
खामोशी में इंसान को अपनी वह सांस और धड़कन ज्यादा वाजे सुनाई देती है जो वैसे दुनिया के हंगामों में दब चुकी होती है। ऐसा लगता है कि भूख इंसान के अंदर एक अजीब सा खला पैदा करती है जो दरअसल रूहानी भरपूरपन का आगाज होता है। आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया। दुनिया के तमाम सूफिया और रूहानी रहनुमाओं ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि भूख में एक ऐसा नूर है जो पेट भरने की हालत में कभी हासिल
नहीं हो सकता। हम इस खालीपन और खामोशी में इंसान की तवज्जो बैरूनी दुनिया मादी ख्वाहिशात और अना की सरकशी से हटकर अपने बाततिन की तरफ हो जाती है। वो अपनी ही चलती हुई सांसों के बारे में बहुत ज्यादा हसास और बाशूर हो जाता है। यह भूख दरअसल नफ्स के बोझ को हल्का कर देती है। जी ताकि रूह परवाज कर सके। इसी मकाम पर
मुझे हुजूर अकरम सल्लल्लाहो अलै वही वसल्लम की वह मशहूर और निहायत प्यारी हदीस याद आ रही है। जिसका मफहूम है के रोजेदार के मुंह की ब या उसकी सांस अल्लाह के नजदीक मुश्क यानी कस्तूरी की खुशबू से भी ज्यादा पसंदीदा है। सुभान अल्लाह। अगर हम इसे सिर्फ मादी दुनिया के हिसाब से देखें तो खाली पेट की वजह से मुंह से निकलने वाली सांस में बजाहिर कोई मादी
कशिश नहीं होती। लेकिन रूहानी एतबार से इसी सांस को रब के हां सबसे महबूब करार दिया गया है। इस हदीस के अंदर पोशीदा हिकमत नफ्स-ए- रहमानी के इस तसवुर के साथ किस तरह जुड़ती है। देखें इस हदीस की अगर हम रूहानी तशरीह पर गौर करें तो वाकई रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब इंसान का मेदा खाली होता है और वह दुनियावी गजा से कट जाता है तो उसके मुंह से निकलने वाली सांस दुनियावी कसाफतों से
पाक होती है। वह सांस सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की रजा के लिए रोकी गई ख्वाहिशात का नतीजा होती है। आम हालात में इंसान की सांस में उसकी अना का शोर होता है। दुनियावी मिलावट होती है। लेकिन भूख की मशक्कत के नतीजे में इंसान का मादी पर्दा इतना बारीक हो जाता है कि वो बिल्कुल खालिस हो जाता है। यानी वो सांस एक तरह से दुनियावी आलाशों से धुल चुकी होती है। बिल्कुल धुल चुकी होती है। अल्लाह को
रोजेदार की सांस इसलिए मुश्क से ज्यादा पसंद है क्योंकि उसमें सिर्फ एक आज बंदे की बंदगी और रब की रहमत का वह खालिस ताल्लुक होता है जो वजूद को कायम रखे हुए हैं। रोज़े की मशक्कत दरअसल वो जंगार साफ करती है जो आम दिनों की बेहतियाती से रूह के आईने पर लग जाता है। जब आईना साफ होता है तो इंसान अपने ही अंदर उस लतीफ रहमत को उस नफ़्स-ए-र रहमानी को महसूस करने के
काबिल होने लगता है। भूख का यह अमल इंसान को उसके खालस तरीन वजूद के करीब ले आता है। यह बात किस कदर दिल को छू लेने वाली है कि भूख दरअसल हमारी समातों को और हमारे एहसास को इस काबिल बनाती है कि हम उस रब्बानी पुकार को महसूस कर सकें। बेशक। अब इस फिक्री सफर को अगर हम रोजमर्रा की जिंदगी के उन तजुर्बात और महसूसात से जोड़ें जिनसे रमजान के महीने में हम सब गुजरते हैं क्योंकि रूहानियत
महज किताबों में पढ़ने की चीज तो नहीं है। यह तो जीने का नाम है। बिल्कुल। रोजे की हालत में खासतौर पर दोपहर के बाद का वक्त जब होता है तो जिस्म में शदीद नकाहत होती है। कामकाज बोझल लगने लगता है। लेकिन अगर इस वक्त चंद लम्हे निकालकर खामोशी से बैठा जाए और सिर्फ अपनी सांसों पर गौर किया जाए तो उन पुरसुकून सांसों में थकावट के बावजूद एक अजीब सी लज्जत महसूस होती है।
और इस लज्जत और सुकून की बुनियादी वजह यह होती है कि उस वक्त इंसान का वजूद मुजाहमत नहीं कर रहा होता। आप एक तरह से अल्लाह की रजा के सामने मुकम्मल तौर पर सरेंडर कर चुके होते हैं। और इस तस्लीमो रजा का सबसे उरूज वो वक्त होता है जो इफ्तार से जरा पहले का होता है। जरा इस मंजर की मंजर कशी करें। सूरज गुरूब होने के करीब होता है। दस्तरखान चुन दिया गया है। भूख और प्यास
अपनी शिद्दत के आखिरी किनारे पर होती है। लेकिन उस वक्त रोजेदार के दिल में कोई बेसब्री या गुस्सा नहीं होता बल्कि एक ऐसा ठहराव एक ऐसा गहरा सुकूत छा जाता है जिसकी मिसाल आम दिनों में नहीं मिलती। वो जो खामोशी उस वक्त दस्तरखान के गिर्द होती है वो बजाहिर होठों की खामोशी लगती है। मगर महसूस यूं होता है जैसे इंसान के अंदर का सारा शोर खत्म हो गया हो।
वो महज होठों की खामोशी नहीं होती। वो हकीकत में रूह की खामोशी होती है। इस वक्त दिल एक ऐसी अजीब तमानियत से भरा होता है कि यूं महसूस होता है जैसे इंसान का सारा वजूद एक शफाफ प्याले की तरह हो गया है। जिसमें रहमत इलाही का नूर कतरा-कतरा टपक रहा है। सुभान अल्लाह। इस लम्हे की खामोशी में अगर इंसान अपनी सांस के अंदर उतरने वाली हवा को महसूस करे तो उसे शेख-ए अकबर इबने अरबी
की वह बात समझ आने लगती है कि वो हवा महज ऑक्सीजन नहीं है। वो रब्बे रहमान की भेजी हुई जिंदगी है। वो नफ्स-ए रहमानी है जो उसके वजूद को हर सेकंड सहारा दिए हुए हैं। बेशक ऐसा ही है। और वो इफ्तार से पहले का खामोश लम्हा जब हाथ दुआ के लिए उठे होते हैं। लेकिन जुबान से अल्फाज़ अदा करना भी मुश्किल लग रहा होता है। वह जो खामोश दुआएं मांगी जाती है मगरिब से कब्ल उनमें एक अनोखी तासीर होती है। जी क्योंकि वह दिल की गहराई से निकल रही
होती है। और फिर इफ्तार के बाद की कैफियत भी मुनफरिद है। तरावीह की सफों में जब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं कुरानी आयात की तिलावत सुनी जाती है तो वो जो एक इज्तमाई सांसों का रिदमम बनता है वो भी कमाल होता है। बिल्कुल कमाल होता है। खासतौर पर सजदे की हालत में जब माथा जमीन पर होता है और सांसे चल रही होती हैं तो इंसान को वाकई यूं महसूस होने लगता है कि वो इलाही रहमत
के एक घने साए में सांस ले रहा है। यही वो तजुर्बाती मकामात है जहां इल्म, अमल और हाल आपस में यकजा हो जाते हैं। तरावीह के दौरान कयाम, रुकू और सुजूद में या रात के पिछले पहर खामोश जिक्र की हालत में इंसान माजी के पछतावों और मुस्तकबिल के अंदेशों से आद होकर सिर्फ और सिर्फ हाल के लम्हे में मौजूद होता है। और हाल का वो लम्हा इसी चलती हुई सांस के साथ बंदा है। जब इंसान मुकम्मल तौर पर उस लम्हे में
हाजिर होता है तो उसे कायनात के जर्रे-जर्रे में वही एक धड़कन महसूस होती है जिसने अदम से वजूद का सफर तय किया था। यानी वो नफ्स रहमानी को महसूस करने लगता है। जी। रमजान के यह रात, दिन, यह भूख, यह प्यास, यह कयाम और यह ठहराव यह सब उसी एक हकीकत को मुनकशिफ करने के जराए हैं कि हम अल्लाह के मोहताज हैं और उसकी रहमत हर सिम से हमें घेरे हुए हैं। यह बात इंसान को वाकई एक नए जाविए से
सोचने पर मजबूर करती है कि रमजान की यह भूख और प्यास कितनी बड़ी नेमत है जो हमें अपने असल से जोड़ती है। हमारी हर सांस जो अंदर जाती है और बाहर आती है, वह किसी खुदकार मशीन का हिस्सा नहीं है और ना ही वह किसी मादी खुद मुख्तारी का नतीजा है। बल्कि वो हर सांस उस इलाही रहमत की एक अनमोल अमानत है जो हमारे वजूद को थामे हुए
हैं जो हमें हर पल अदम से खींच कर वजूद बखश रही है। लेकिन इस सारी गुफ्तगू को समेटते हुए अगर शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह के इस फलसफे को पूरी तरह तस्लीम कर लिया जाए कि कायनात की हर शय और हर इंसान उसी एक नफ्स रहमानी से वजूद पा रहा है तो फिर हमारे सामने बैठा हुआ वो शख्स जिसे हम शदीद नाराज हैं जिसने हमारे