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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 16: The Throne of Bilqis Never Really Flew? | Ibn e Arabi's secret | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलैह बयान करते हैं कि हजरत सुलेमान अलैहिस्सलाम का तख्त हवाओं में सफर करके नहीं आया था।
  • मलका बिलकीस के दरबार में तख्त के मामले में आसिफ बिन बरखिया का कमाल उसे फौरी तौर पर अदम से वजूद में लाना था।
  • मलका बिलकीस ने शीशे के सहन को गहरा पानी समझकर एहतियातन अपने कपड़े समेट लिए थे।
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Transcript

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तसवुर करें कि हजरत सुलेमान अलैहिस्सलाम का दरबार सजा है और मलिका बिलकीस का तख्त मंगवाने की बात हो रही है। एक ताकतवर जिन दावा करता है कि आपके अपनी जगह से उठने से पहले मैं उसे ले आऊंगा। मगर वहीं किताब का इल्म रखने वाला एक इंसान कहता है कि आपकी पलक झपकने से पहले वो तख्त यहां मौजूद होगा और ऐसा ही हुआ। हम उसे महज मौजाती

रफ्तार समझते हैं। मगर शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह इसकी एक ऐसी हकीकत बयान करते हैं जो अकल को दंग कर देती है। वो फरमाते हैं कि वो तख्त हवाओं में सफर करके आया ही नहीं था। वो इस वाक्य को एक ऐसे पोशीदा भेद से जोड़ते हैं [संगीत] जो कायनात की हकीकत के बारे में हमारे तमाम अंदाजे बदल देता है। हम इस वाक्य की गहराई और उस भेद तक

पहुंचने से पहले यह बहुत जरूरी है कि हम हजरत सुलेमान अली सस्लाम की इस बेमिसाल जाहिरी सल्तनत का एक वाज़ नक्शा रखें। अल्लाह ताला ने उन्हें एक खास फजल अता फरमाया था। हजरत सुलेमान अली सलाम की जो सल्तनत थी उसकी नज़र उनके बाद किसी को नहीं मिली। हवाएं उनके हुक्म के मुकम्मल ताबे थी। परिंदे उनके लश्कर का हिस्सा थे और वह ताकतवर जिन्नात जो आम निगाह से ओझल हैं वो

सब उनके अहकामात के सामने सर निगू थे। सुभान अल्लाह यानी एक मुकम्मल कायनाती तस्खीर। बिल्कुल मुकम्मल मगर देखिए इस जाहिरी जाहो जलाल के पीछे एक कायनाती हकीकत थी। यह तमाम अशिया और मखलूकात किसी मादी दबाव के तहत नहीं बल्कि महज अल्लाह के एक बराहेरास्त [संगीत] अम्र से उनकी फरमाबरदारी में दे दी गई थी। मगर अनासरे फितरत और जिन्नात का एक इंसान

के लिए इस हद तक मुती हो जाना क्या यह किसी खास रूहानी मशक का नतीजा था या इसके पीछे कोई और हकीकतकार फरमा। यही वह मकाम है [संगीत] जहां शेख अकबर रहमतुल्लाह अल इस तस्खीर की हकीकत को निहायत बारीक बीनी [संगीत] से खोलते हैं। उनके नजदीक यह तस्खीर किसी ज़हनी मश, रियाजत या जिसे [संगीत] आमतौर पर हिम्मत या बातनी तवज्जो कहा जाता है, उसका कतई नतीजा नहीं थी।

क्योंकि अगर यह हिम्मत का नतीजा होती, उसमें सबब और वक्त का दखल होता। सही। शेख रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं कि हजरत सुलेमान अल सलाम का मकाम इससे कहीं बुलंद था। यह महज और महज अल्लाह ताला के बराहेरास्त हुकुम और बखशीश का नतीजा था। बगैर किसी जाहिरी सबब के जी। उन्हें सिर्फ उस शय के हक में लफ्जी हुक्म अदा करना होता था और वो शय बिला ताखर ताबे हो जाती थी। यह वो खालिस इलाही

अतिया है जो बगैर किसी हिसाब के उनके हवाले कर दिया गया। और कमाल यह था कि वो उसे अपना कमाल नहीं बल्कि खालिसतन अल्लाह का अम्र समझते थे। वाह! इस अजीमोशान सल्तनत के इदराक के बाद जब गुफ्तगू का रुख इस तारीख खत की जानिब मुड़ता है जो मलका बिलकीस को भेजा गया तो वहां भी एक अजीब हिकमत नजर आती है। इतनी वसी सल्तनत का हुक्मरा बजाहिर लश्कर

कशी नहीं करता बल्कि एक खत रवाना करता है। शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह इस खत के आगाज यानी बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर्रहीम में किन हकायक की निशानानदेही फरमाते हैं?

देखिए जाहिरी ऐतबार से तो यह एक दावती पैगाम था। मगर शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह इसके आगाज में मौजूद दो अजीम रहमतों के राज से पर्दा उठाते हैं। खत का आगाज अल्लाह के नाम से हुआ और साथ दो सिफात बयान हुई अर रहमान और अर रहीम। जी दो मुख्तलिफ मगर जुड़ी हुई रहमतें। बिल्कुल। शेख रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि

एक रहमत इम्तिनानिया है जो इसमें अर रहमान से वाबस्ता है। यह वो वसी और बेपाया रहमत है जो बिला तफरीक हर शय को पूरी कायनात को अदम से वजूद बखशती है। कायनात का हर जर्रा महज इसलिए मौजूद है कि उस पर अर रहमान की यह रहमत इम्तिनानिया साया फिगन है। यानी वजूद का मिल जाना ही एक रहमत है।

जी। और दूसरी रहमत वजूबिया है जो इसमें अर रहीम से जुड़ी है। यह वो रहमत है जिसे अल्लाह ताला ने अपने फजलोकरम से खुद पर लाजिम कर लिया है। हम उन लोगों के लिए जो ईमान लाते हैं और हिदायत की पैरवी करते हैं। जी हां, हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व आह वसल्लम की उम्मत पर और तमाम अहले ईमान पर यह खास करम है। तो हजरत

सुलेमान अली सलाम ने [संगीत] इन दो रहमतों का जिक्र करके मलका बलकीस के सामने पूरी कायनात के वजूद और अंजाम को एक ही नुक्त में समेट दिया। तो गोया रहमत उमतिनानिया वो बुनियादी फजल है जिसने सबको वजूद का लिबास पहनाया। जैसे एक बंजर जमीन पर बारिश का बरस जाना। वाह बिल्कुल। और रहमत वजूबिया वो खास फजल है जो उस बारिश के बाद सही सिमत में

नश्वनुमा पाने वाले दरख्त की तरह है। बिल्कुल यही वो तफरीक है जो शेख रहमतुल्लाह अलह वाज़ करते हैं। मलका बलकीस को यह खत भेजकर हजरत सुलेमान अल सलाम उसे महज जाहरी वजूद की सतह से उठाकर हिदायत और कमाल की सतह पर दावत दे रहे थे। यह एक निहायत गहरा दावती अंदाज है। [संगीत] लेकिन जब यह पैगाम मलका बलकीस के दरबार में पहुंचता है तो वहां का मंजरनामा बड़ा दिलचस्प है। उसने दरबार में खत लाने वाले

का नाम क्यों जाहिर नहीं किया? यहां मलका बिलकीस की आला दर्जे की सियासी और रूहानी फरासत सामने आती है। जब उसने खत पेश किया तो परिंदे का जिक्र बिल्कुल नहीं किया। उसने महज कहा कि मेरी तरफ एक इज्जत वाला खत डाला गया है। यानी जरिया पोशीदा रखा। जी। शेख अकबर रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि यह दानिस्ता था। अगर उमरा को जरिए का इल्म

हो जाता तो वह शायद अपनी मादी सोच के तहत उसे रोकने या साजबाज करने की कोशिश [संगीत] करते। इस नामालूम जरिए ने पूरे दरबार पर एक हैबत और रब तारी कर दिया। उन्हें एहसास हुआ कि मलका एक ऐसी ताकत से मुखातिब है जो उनकी [संगीत] आम समझ से बहुत बुलंद है। नामालूम श की हैबत वाकई इंसानी ज़हन पर गहरा असर छोड़ती है। बिल्कुल। इसी रब के ज़रे असर वो तारीखी सफर शुरू

होता है जो बिलिखिर हमें तख्त की मुंतकिली की तरफ लाता है। तो जब तख्त लाने की बात होती है एक जिन और किताब का इल्म रखने वाला इंसान [संगीत] यानी आसिफ बिन बरखिया उनके फेल में क्या तफरीक पाई जाती है?

यहीं से अकल इंसानी की हुदूद टूटने का मुकाम शुरू होता है। जिनने कहा कि आपके अपनी जगह से उठने से पहले मैं ले आऊंगा। यह एक जिस्मानी हरकत और मसाफत तय करने का वक्त था। मगर जिसके पास किताब का इल्म था उसका फेल निहायत कामिल और लतीफ था। उसने पलक झपकने की बात की। जी। निगाह के लौट कर आने से पहले। हम शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह बताते हैं कि निगाह

की मुद्दत जिस्म की हरकत से कहीं ज्यादा तेज होती है। आंख खुलते ही शुअ सितारों तक पहुंचती है। मगर इस सब में सबसे हैरतंगेज बात यह है कि इस कलील मुद्दत में भी [संगीत] तख्त ने फिजा में कोई सफर तय किया ही नहीं। हम लेकिन हम मादी दुनिया के बासी हैं। सबब और मुसबेब के आदि हैं। बिल्कुल हम मुसाफत को देखते हैं। तो अगर तख्त ने कोई सफर किया ही नहीं।

हवाओं को नहीं चीरा। मकाम या स्पेस को उबूर नहीं किया तो वो एक मकाम से दूसरे मकाम तक इतने कम वक्त में पहुंचा कैसे? उसकी असल कायनाती हकीकत क्या है? देखिए इसी मकाम पर शेख उल अकबर रहमतुल्लाह अल कायनात की [संगीत] सबसे गहरी और लतीफ हकीकत खोलते हैं। उसे तजदीद खल्क बहर सांस कहा जाता है। यानी एक जैसी सूरतों के साथ तखलीक का नया होना

बिल्कुल वो निहायत सादगी से बयान करते हैं कि तख्त अपनी असल जगह यानी यमन में जिस लम्हे माधूम हुआ यानी नॉन एकिस्टेंट हुआ। [संगीत] बिल्कुल उसी लम्हे वो दरबार सुलेमानी में दोबारा वजूद में आ गया। सुभान अल्लाह। यानी कोई मादी सफर था ही नहीं। कोई सफर नहीं, कोई ताखीर नहीं। यह तजद्दुद हमसाल का वो कानून है जिसके तहत कायनात का हर जर्रा हर शय हर लम्हा नई तखलीक पा रही

है। अल्लाह की हर सांस जिसे नफ्स रहमानी की तजल्ली कहा जाता है उसके साथ कायनात फना होती है और फरी तौर पर उसी की मिस्ल नई कायनात वजूद में आ जाती है। यानी जिस लम्हे यमन में तख्त अदम में गया ऐन उसी लम्हे दरबार में उसकी ब ऐनो मिस्ल तखलीक पा गई। जी आसिफ बिन बरखिया का कमाल उसे उड़ा कर लाना नहीं था बल्कि उनका कमाल इस इलाही इल्म पर रिसाई और इस तखलीक नौ को

अपने इल्म से जाहिर करना था। यह खालिसतन अल्लाह का अम्र था जो अशिया को अदम से वजूद में लाता है। तो अगर कायनात हर लम्हे नई बन रही है तो जाहिरी हवास को यह सब मुस्तकिल और जुड़ा हुआ क्यों महसूस होता?

शेख अकबर रहमतुल्लाह अल इसकी बहुत खूबसूरत वजाहत फरमाते हैं। कायनात एक जामिद शय नहीं बल्कि अल्लाह के अमर का एक मुतवातिर बहाव है। जमाना आदम यानी शय के गायब होने का वक्त वही वक्त [संगीत] है जिसमें उसकी मिस्लत दोबारा वजूद में आ जाती है। जैसे एक बहते हुए दरिया की मिसाल दी जाती है। बिल्कुल या जैसे अंधेरे में अगर एक मशल को तेजी से गोलाई में घुमाया जाए तो वह एक मुसलसल दायरा महसूस होती है। हालांकि वो

एक ही नुक्ता जो हरकत कर रहा है। हवास इस बेपनाह तेजी को नहीं पकड़ सकते इसलिए उसे मुस्तकिल समझते हैं। मगर अहले बसीरत जानते हैं कि कायनात हर लम्हा नया लिबास वजूद पहन रही है। सिवाय अल्लाह की जात के किसी शय को बका नहीं। वाह! इस हकीकत की रोशनी में तो मलका बलकीस का तख्त को पहचानने वाला वाकया बहुत दिलचस्प हो जाता है। जब दरबार में उसके सामने तख्त पेश किया गया तो उसका जवाब

क्या था? जब उससे पूछा गया कि क्या तुम्हारा तख्त ऐसा ही है? तो उसने यह नहीं कहा कि हां यह वही पुराना तख्त है और ना यह कहा कि [संगीत] यह कोई और है। उसने एक सच्चा और मुतवाजन जवाब दिया गोया यह वही है। का अन्नाहुआ गोया [संगीत] यह वही है। जी शेख-ए-अकबर रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि उसने बिल्कुल सच कहा। क्योंकि तजद्दुदे अमसाल के तहत वो [संगीत] अदम से वजूद में

लाया गया था। इसलिए वो मादी एतबार से ऐन वही तख्त नहीं था। बल्कि इसकी एक नई मगर बिल्कुल वैसी ही सूरत थी। इसका जवाब कमाल इल्म का मजहर था। इस कमाल-ए-इल्म के बाद एक और हैरतंगेज मकाम आता है जिसे शीशे का महल या आबगीने का सहन कहा गया है। बिल्कुल वो वाकया अंदरूनी बसीरत की मुकम्मल सफाई की तमसील है।

तो वो सहन का वाकया उस बातनी हकीकत को मुकम्मल तौर पर कैसे वाज़ करता है? मलका के इल्म को कमाल तक पहुंचाने के लिए हजरत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने उसे एक शफाफ शीशे के सहन में दाखिल होने का हुकुम दिया। मलका ने इस बेपनाह शफाफियत को देखा तो उसे मौजे मारता हुआ गहरा पानी समझी। एहतियातन उसने अपने कपड़े समेट लिए। जाहिरी हवास ने फिर धोखा दिया। जी। तब हजरत सुलेमान अली सलाम ने फरमाया

कि यह तो शीशे का हमार सेन है। शेख रहमतुल्लाह फरमाते हैं कि जो कायनात जाहरी निगाह को जमानो मकान में फैली हुई और तसलसुल वाली महसूस होती है बिल्कुल पानी की लहरों की तरह। वो दर हकीकत अल्लाह के बराए रास्त अम्र से चलने वाली फरी और हमार हकीकत है। बिल्कुल शीशे की तरह। हवास तसलसुल का धोखा खाते हैं। जबकि हकीकत इलाहिया फौरी और शफाफ है। सुभान अल्लाह। यानी जब मलिका पर यह हकीकत मुनकशिफ हुई तो उससे वह अंदरूनी बसीरत

हासिल हो गई। बिल्कुल। इसी मकाम पर उसने कामिल सुपुर्दगी इख्तियार की और कहा कि उसने हजरत सुलेमान अल सलाम के साथ रब्बुल आलमीन की फरमाबरदारी कबूल [संगीत] कर ली। इस तमाम गुफ्तगू और शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अल की तालीमात का जो निचोड़ सामने आता है वो वाकई एक गहरे सुकूत और ठहराव का मुतकाजी है। जी। यह उस हकीकत का एतराफ है कि हम सब हर सांस और हर लम्हे अल्लाह की रहमत और उसके अम्र के मोहताज हैं।

जी बिलाशबा हमारा कोई मुस्तकिल मादी वजूद नहीं। हम महज उसकी रहमत इम्तिनानिया के सहारे हर लम्हा अदम के अंधेरे से निकलकर नया वजूद पा रहे हैं। यह जानना कि यह ठोस नजर आने वाली कायनात दरअसल उसकी कुदरत के शीशे का एक फर्श है। इंसान को आजजी की एक ऐसी मंजिल पर ला खड़ा करता है जहां सर तस्लीम खम करने के सिवा कोई चारा नहीं।

Frequently asked questions

तख्त हवाओं में सफर करके नहीं आया था बल्कि यमन में अदम होने के साथ ही दरबार सुलेमानी में उसकी ब ऐनो मिस्ल तखलीक हो गई थी।

अर रहमान से रहमत इम्तिनानिया मुराद है जो हर शय को वजूद बख्शती है, जबकि अर रहीम से रहमत वजूबिया जुड़ी है जो अल्लाह ने ईमान लाने वालों पर लाजिम की है।

मलिका ने शीशे की बेपनाह शफाफियत को देखकर उसे मौजे मारता हुआ गहरा पानी समझ लिया था और एहतियातन अपने कपड़े समेट लिए थे।