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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 1: The Secret Wisdom Allah Gave Only to Adam A.S. | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख अकबर मोहद्दीन इब्न अरबी की किताब फसूसुल हिकम के पहले फुस में हजरत आदम अली सलाम के कलमे में समोई गई हिकमत इलाहिया पर बात की गई है।
  • इब्न अरबी के मुताबिक कायनात वो आईना बनी जिसमें अल्लाह ने अपनी सिफात का अक्स देखना चाहा और हजरत आदम अली सलाम इस कायनाती आईने की असल सियाकल थे।
  • फरिश्तों के मुकाबले में आदम की फजीलत की बुनियादी वजह उनकी जामियत और तमाम अस्मा का इल्म थी जो फरिश्तों को हासिल न था।
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Transcript

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[संगीत] यानी इंसान वो मकाम है जहां अल्लाह की सिफात जाहिर होती हैं। रहमत, इल्म, सब्र, जमाल, जलाल यह सब हमारे जरिए नजर आता है। इंसान वो आईना बन जाता है जिसमें हक ताला अपनी सिफात का जलवा देखता है। मसलन मसलन जब हम किसी में बेपनाह रहम दिली

देखते हैं तो यह दरअसल अल्लाह की सिफत रहमी का एक अक्स होता है। जब हम किसी को सब्र करते, इल्म फैलाते या कोई खूबसूरत तखलीक करते देखते हैं तो वो अनजाने में उसी इलाही आईने का किरदार अदा कर रहा होता है। जी जिसमें हक अपनी सिफात को देख रहा है। यह सोच कर तो जिम्मेदारी का एहसास बहुत बढ़ जाता है। अगर हम वो आईना हैं तो हम

क्या दिखा रहे हैं? आज हम एक नए गहरे इल्मी और रूहानी सफर का आगाज कर रहे हैं। एक ऐसा सफर जो हमें रोजमर्रा की जाहिरी सतह से परे ले जाएगा। जी और यह सफर हमें उस बुनियादी हकीकत की तरफ ले जाने की कोशिश करेगा जो शायद हर शय के वजूद की असास है। यह सफर है शेख अकबर मोहद्दीन इब्न अरबी की

शहरा आफाक किताब फसूसुल हिकम के साथ बिल्कुल एक ऐसी तसनीफ जिसने सदियों से इल्म और इरफान के मुतलाशियों के लिए नए दरवाजे खोले हैं। इसके तसवुरात गहरे समंदर की तरह हैं। लेकिन इनमें इनमें अपने वजूद को समझने की बेशबाह कुंजियां आप कह लें कि चाबियां पोशीदा हैं। फसूसुल हिकम यानी हिकमत के नगीने तो आज हम

इस खजाने के पहले नगीने पहले फुस पर बात करेंगे। हिकमत इलाहिया फी कलमा आदमिया। यानी वो खास खुदाई हिकमत जो हजरत आदम अली सलाम के कलमा में समो दी गई है। यह उनवान फस इसका क्या मतलब है? यह खुद बड़ा दिलचस्प है। फुस जिसकी जमा फुसूस है। इसका मतलब है नगीना।

नगीना जैसे अंगूठी का नगीना। जी या फिर मेहर का वो खाना जिसमें कोई कीमती पत्थर जड़ा होता है। तो गोया हर नबी अल्लाह की किसी खास हिकमत का मजहर है। यानी जैसे हर नगीना अपनी मुनफरित चमक रखता है। वैसे ही हर नबी में एक खास हिकमत जलवागर है। बिल्कुल दुरुस्त। जैसे मूसिकी में हर सास का अपना एक सुर होता है ना जी

एक खास आवाज जो मजमुई नगमे में अपना मुनफरीद रंग भरती है वैसे ही शेख अकबर के नजदीक हर पैगंबर का एक मुनफरीद कलमा है एक खास हिकमत की मोहर जो वजूद की तफीम में एक नया पहलू रोशन करती है जी और आदम अली सलाम वो बुनियादी सुर है जिससे इंसानियत का यह नगमा शुरू होता है वो सिर्फ एक तारीखी किरदार नहीं है बल्कि एक वजूदी क्लीद मेटाफिजिकल की बिल्कुल जिससे कायनात और इंसान के कई राज

खुलते हैं। तो आइए इस पहले फुस हजरत आदम अली सलाम से वाबस्ता हिकमत की तरफ चलते हैं। उसका मरकजी ख्याल क्या है? वो कौन सी बुनियादी इलाही हिकमत है जो यहां बयान हो रही है। इस फुस का मरकजी और बुनियादी नुक्ता आप यूं समझे कि यह है कि अल्लाह ताला जो अपनी जात में एक पोशीदा खजाना था। जैसे हदीस कुसी में आता है जी कुतु कजन मखफियन तो अल्लाह ने चाहा कि

वो पहचाना जाए उसके अस्मा उल हुस्ना उसके खूबसूरत नाम और सिफात वो जाहिर हो यानी वो चाहता था कि उसका अपना अक्स उसकी अपनी मखफी हकीकत किसी मजहर में देखी जाए जी हां किसी ऐसी चीज में जोर से मुनकिस कर सके अगर अल्लाह कामिल है हर शय पर कादिर है तो उसे खुद को देखने या पहचाने जाने की जरूरत क्यों महसूस हुई यह समझना थोड़ा देखें यह ये एक बहुत अहम सवाल है। शेख

अकबर के नजदीक ये जरूरत हमारी वाली जरूरत नहीं है। यह कोई कमी नहीं थी जिसे पूरा करना था। तो फिर क्या थी? ये उसकी शान करीमी और मोहब्बत का इजहार है। जैसे एक अजीम फनकार अपनी सलाहियत को जाहिर करना चाहता है। ये या जैसे एक खजाने का मालिक चाहता है कि उसके जवाहरात की कदर पहचानी जाए। यह चाहत दरअसल कायनात पर रहमत और मोहब्बत का बायस बनी।

अच्छा। तो खुद को जाहिर करने के लिए एक आईने की जरूरत थी। जी एक मजहर की, एक आईने की। यानी कायनात वो आईना बनी जिसमें अल्लाह ने खुद को देखना चाहा। बिल्कुल। शेख अकबर बयान करते हैं कि अल्लाह ने पहले कायनात को एक वजूद तो बख्शा। मगर इब्तिदा में ये एक आप कह लें गैर सयाकलशुदा आईने की तरह थी। अनपॉलिश्ड मिरर।

इसमें सूरत तो थी मगर वो चमक नहीं थी। वो रूह नहीं थी। जी वो रूह नहीं थी जो अक्स को बिल्कुल वाज़ कर सके। फिर अल्लाह के हुक्म से इस आईने को सयाकल करने उसे चमकाने और उसमें रूह फूंकने का मरहला आया। और वो सियाकल वो चमक हजरत आदम अल सलाम थे। जी हां। शेख अकबर के मुताबिक आदम अली सलाम

ही इस कायनाती आईने की असल सियाकल थे। उसकी पॉलिश और इस बेजान सूरत की रूह थे। अल्लाह ने अपनी रूह उसमें फूंकी जिससे यह आईना देखने के काबिल हुआ। आदम वो जामे वजूद थे जिसमें हक ताला ने अपनी तमाम सिफात का अक्स एक जगह मुजतम देखना चाहा था। तो इबने अरबी के मुताबिक हमारा वजूद इत्तेफाकी नहीं।

बिल्कुल नहीं। यह एक अजीम इलाही अमल खुद शनासी का हिस्सा है। कायनात और बिलखसूस इंसान का वजूद खुदा के अपने मखफी इमकानात को जाहिर करने और देखने का एक जरिया है। सुभान अल्लाह। ये तो वजूद को देखने का बिल्कुल नया जाविया है। यानी इंसान वो मकाम है जहां अल्लाह की सिफात जाहिर होती हैं। रहमत, इल्म, सब्र, जमाल, जलाल यह सब

हमारे जरिए नजर आता है। यही नुक्ता है। इंसान वो आईना बन जाता है जिसमें हक ताला अपनी सिफात का जलवा देखता है। मसलन मसलन जब हम किसी में बेपनाह रहम दिली देखते हैं तो यह दरअसल अल्लाह की सिफत रहमी का एक अक्स होता है। जब हम किसी को सब्र करते, इल्म फैलाते या कोई खूबसूरत तखलीक करते देखते हैं। तो वो अनजाने में उसी इलाही आईने का

किरदार अदा कर रहा होता है। जी। जिसमें हक अपनी सिफात को देख रहा है। यह सोच कर तो जिम्मेदारी का एहसास बहुत बढ़ जाता है। अगर हम वो आईना हैं तो हम क्या दिखा रहे हैं? बिल्कुल। हमारे किरदार, हमारे आमाल, हमारी नियतें, यह सब मिलकर उस आईने पर क्या नक्श बना रहे हैं? यह सवाल तो वाकई गहराई से गौरतलब है। यकीनन यह खुद एहतेसाबी की एक मुस्तकिल

दावत है। क्या हमारा वजूद उस इलाही हुस्न का अक्स पेश कर रहा है जिसके लिए उसे तखलीक किया गया था या हमने उस आईने को गर्दालूद कर दिया है। इसी जिम में शेख अकबर इंसान कामिल का तसवुर भी पेश करते हैं। इससे क्या मुराद है? क्या यह कोई खास तबका है इंसानों का?

इंसान एमिल से मुराद वह मुकम्मल इंसान है जो अल्लाह के तमाम अस्मा और सिफात का जामे मजहर हो। जामे मजहर मतलब? मतलब वो वजूद जो अपनी जात में कायनात की तमाम हकीकतों और अल्लाह की सिफात दोनों का अक्स बेवक़ रखता हो। यह कोई नस्ली या ग्रोही तसवुर नहीं है। अच्छा तो यह एक रूहानी मर्तबा है। जी एक रूहानी मर्तबे का नाम है जो हर

इंसान के लिए एक मुमकिना इसबुल आइन है। यह वो मुतवाजिन वजूद है जिसमें हक यानी अल्लाह की सिफात और खल्क यानी कायनात की हकीकतें दोनों की सूरतें पूरी तरह जलवागर हो। शेख अकबर आदम की फरिश्तों पर फजीलत का भी जिक्र करते हैं। कुरान में भी इसका जिक्र है। बिल्कुल। हर फरिश्ता अपनी खास सिफत या इबादत में कामिल है। मसलन जिब्राइल अल

सलाम इल्मो वही में मिखाईल अल सलाम रिज़्क में लेकिन वो जामे नहीं है। वो अल्लाह के कुछ नामों को जानते थे। जी और उनके मुताबिक तस्बीहो तकदीस करते थे। लेकिन वो इन तमाम अस्मा से वाकिफ नहीं थे। जिनका इल्म अल्लाह ने आदम अल सलाम को अता किया था। आदम अल सलाम का वजूद कायनात की तमाम हकीकतों और अल्लाह की तमाम सिफात का मजमआ था।

तो जब फरिश्तों ने वो सवाल किया था कि क्या तू जमीन में उसे खलीफा बनाएगा जो फसाद फैलाएगा और खून बहाएगा तो वो दरअसल अपनी महदूदियत का इजहार कर रहे थे। वो पूरी तस्वीर नहीं देख पा रहे थे। वो सिर्फ जायरी सूरत या मुमकिना मनफी पहलू को देख रहे थे। उन्हें अंदाजा नहीं था कि इस मिट्टी के पुतले में कौन से अजीम इलाही राज और इमकानात पोशीदा हैं। जी हां। यह नुक्ता तो आज भी कितना अहम है। हम

अक्सर लोगों को उनके किसी एक अमल से किसी एक पहचान या लेबल से परखते हैं। बिल्कुल। और उनकी पूरी शख्सियत, उनकी अंदरूनी गहराई, उनके मुमकिना मुस्बत पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। शेख अकबर का पैगाम यही है कि किसी को समझने के लिए उसकी एक निशानी पर मत रुक जाओ। बल्कि उसकी पूरी हकीकत, उसके पूरे अक्स

को, उसकी जामियत को देखने की कोशिश करनी चाहिए। आदम की फरिश्तों पर फज़ीलत इसी जामियत में थी। कुरान में एक और जगह अल्लाह ताला फरमाता है कि उसने आदम को अपने दोनों हाथों से बनाया। जी यह अलामती है। शेख अकबर इसकी क्या तशरी करते हैं? इस दो हाथों से क्या मुराद है?

यहां दो हाथ से मुराद कोई जिस्मानी आजा नहीं बल्कि दो जेहतें हैं। दो सूरतें हैं। शेख अकबर फरमाते हैं कि आदम में अल्लाह ने दो सूरतें जमा फरमाई। एक आलम खल्लक की सूरत यानी कायनात की तमाम हकीकतें मादी और गैर मादी वजूद शक्ल सूरत और दूसरी हक की सूरत यानी अल्लाह की अपनी सिफात और अस्मा का अक्स

बिल्कुल तो इंसान बेवक़ कायनात का खुलासा भी है और अल्लाह की सिफात का मजहर भी और यह जो इलाही सिफात हैं क्या यह सिर्फ अच्छे और मुजबत पहलू हैं जैसे रहमत इल्म जमाल या उनमें वो सिफात भी शामिल है जो हमें मुश्किल लगती है जैसे गजब या कहर नहीं शेख अकबर फरमाते हैं कि अल्लाह ने खुद को मुतजाद सिफात से भी मुतसिफ किया जैसे

जैसे वो अलजाहिर भी है और अल बातिन भी वो अल जमील जमाल वाला भी है और अल जलील जलाल वाला भी वो अल रहीम रहम करने वाला भी है और अल मुंतकिम इंतकाम लेने वाला भी है और इसी तरह उसने कायनात को भी बनाया जी यहां उम्मीद भी है और खौफ खौफ भी, मोहब्बत भी है और नफरत भी, सुकून भी है और हैबत भी। तो क्या यह मुतजाद सिफात भी उन्हीं दो

हाथों की तरफ इशारा है? एक लिहाज से कह सकते हैं। और क्या यह हमारे अंदर भी झलकती हैं? बिल्कुल। इंसान क्योंकि जामे है इसलिए उसमें इन तमाम मुतजाद सिफात के अक्स पाए जाते हैं। हम उम्मीद भी रखते हैं और खौफ भी खाते हैं। मोहब्बत भी करते हैं और कभी गुस्सा और नफरत भी महसूस करते हैं। हम में नरमी भी है और सख्ती भी। ये जानकर कुछ तसल्ली सी हुई कि मनफी समझे जाने वाले जज्बात भी शायद हमारी इंसानी साख्त का हिस्सा हैं। लेकिन फिर सवाल यह

पैदा होता है जी। कि जब हम अपने अंदर मनफी जज्बात जैसे हसद या शदीद गुस्सा महसूस करें तो उन्हें कैसे समझें? क्या उन्हें बस कबूल कर लें? नहीं। शेख अकबर के नुक्त नजर से देखें तो यह जज्बात भी इशारे हैं। सिग्नल्स हैं। अच्छा। तो इन्हें दबाना या नजरअंदाज करना हल नहीं बल्कि उनके मनबा को समझना और उन्हें इलाही सिफात के ताबे लाने की कोशिश करना है।

मसलन मिसाल के तौर पर जब हसद महसूस हो तो शायद यह दिल आपसे कह रहा है कि शुक्र का चिराग जलाओ ताकि आईना साफ हो और तुम अपनी नेमतों को देख सको बजाय दूसरों की नेमतों पर कड़ने के। और शदीद गुस्सा शदीद गुस्सा शायद अदल कायम करने की शदीद ख्वाहिश या नाइंसाफी पर रद्दे अमल की तरफ इशारा हो जिसे मजबत और तामीरी रुख देने की

जरूरत है। अहम यह है कि हम इन जज्बात के गुलाम ना बने। बल्कि इनके मालिक बनकर इन्हें दुरुस्त समत दें। बिल्कुल। यह तो वाकई एक मुसलसल अंदरूनी सफर है। खुद को जानना, अपनी कमजोरियों और ताकतों को पहचानना, अपने जज्बात के मनबा को समझना। और फिर शूरी तौर पर अपने वजूद को इलाही सिफात जैसे रहम, इल्म, अदल, सब्र और शुक्र से आरास्ता करने की कोशिश करना।

Frequently asked questions

इस फुस का मरकजी नुक्ता यह है कि अल्लाह ताला जो अपनी जात में एक पोशीदा खजाना था, चाहता था कि उसके खूबसूरत नाम और सिफात जाहिर हों और उसकी मखफी हकीकत किसी मजहर में देखी जा सके।

इंसान कामिल से मुराद वो मुकम्मल इंसान है जो अल्लाह के तमाम अस्मा और सिफात का जामे मजहर हो और अपनी जात में कायनात की तमाम हकीकतों और अल्लाह की सिफात दोनों का अक्स रखता हो।

दो हाथों से मुराद कोई जिस्मानी आजा नहीं बल्कि दो जेहतें हैं, जिनमें आदम के अंदर आलम खल्क की सूरत और हक की सूरत जमा फरमाई गई।