Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Fusus al-Hikam Part 3: The Timeless Wisdom of Prophet Nuh AS | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- हजरत इबने अरबी के मुताबिक हजरत नूह की दावत में अल्लाह की दूरी और जलाल यानी तंजीहा का पहलू बहुत गालिब था।
- हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की दावत जामे थी जिसमें तंजीहा और तशबीह दोनों पहलू शामिल थे।
- हजरत इबने अरबी कौमे नूह की जाहिरी हलाकत को मारफत इलाही के समंदर में गर्क होने जैसी बातनी ताबीर देते हैं।

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Transcript
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बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम। फिक्रनामा में खुशामदीद। वो जगह जहां हम अकल के दरवाजे से दाखिल होते हैं और कोशिश करते हैं कि रूह के कुछ राज पा सक सके। पिछली निशिस्त में हम हजरत शीतस अल सलाम की हिकमत पर बात कर रहे थे और यह समझा था कि खुदा की अता तो एक जैसी है सबके लिए। फर्क हमारी अपनी अहलियत हमारी इस्तता में होता है। दिल जितना साफ होगा वो तजल्ली वो
रोशनी उतनी ही वाज़िर होगी। आज हम एक कदम आगे बढ़ रहे हैं। अगला फुस यानी हजरत नूह अल सलाम की हिकमत। जी हिकमते सुबूहिया कहते हैं उसे इलहामी पाकीजगी की हिकमत। मगर एक सवाल ज़हन में आता है कि आखिर हजरत नूह की कौम ने इतने लंबे अरसे तक उनकी आवाज क्यों नहीं सुनी? क्या वजह थी? जी यह सवाल तो अहम है और हजरत इबने अरबी इसका
जवाब बड़ा गहरा देते हैं। वो फरमाते हैं कि मसला सिर्फ कौम की हटधर्मी [संगीत] का नहीं था बल्कि दावत देने के अंदाज का भी था। उनकी दावत में [संगीत] आप कह लें कि अल्लाह की हैबत उसका जलाल उसकी दूरी यानी तंजिया का पहलू बहुत गालिब था। और वो जो शफकत है कुर्बत है तशबीह वो पहलू वो जरा कम था। और इबने अरबी का नुक्ता यह
है कि जब दावत में सिर्फ खौफ हो, सिर्फ दूरी का एहसास हो, तो दिल वह सुनने के बजाय ना बंद हो जाते हैं। यह अल्लाह की दूरी और कुर्बत, तंजिया और तशबीह यह क्या है असल में?
देखिए अल्लाह को जानने के या उसकी मारफत पाने के ना दो बुनियादी रास्ते या रुख समझे जाते हैं। ठीक। पहला है तंजी। तंजी। आसान लफ्जों में यह कि अल्लाह हर चीज से पाक है। हर ख्याल से बुलंद। वो हमारी तरह का नहीं है। वो बिल्कुल अलग है, जुदा है। यानी उसकी अजमत, उसकी बेमिसाली, उसका पाक होना। बिल्कुल। उसे आप अल्लाह की दूरी या बुलंदी
कह लें। और दूसरा रुख है तशबीह यानी अल्लाह को अपनी सिफात के जरिए अपने [संगीत] करीब महसूस करना। जैसे वो सुनता है, वो देखता है, उसकी रहमत है, मोहब्बत है। अच्छा। यह सिफात हमें बताती हैं कि अल्लाह हमसे जुड़ा है। हमारी सुनता है। [संगीत] गोया यह अल्लाह की कुर्बत का एहसास है। तो क्या ऐसा हो सकता है कि सिर्फ एक पहलू
पे जोर दिया जाए? मसलन सिर्फ अल्लाह की पाकी और बुलंदी ही बयान की जाए? हजरत इबने अरबी यही तो असल नुक्ता बयान करते हैं। वो फरमाते हैं कि सिर्फ तंजिया पर इत्तफा करना यानी सिर्फ अल्लाह की दूरी बताना यह भी अल्लाह को महदूद करना है। क्योंकि अल्लाह सिर्फ दूर तो नहीं वो तो करीब भी है। श रग से भी ज्यादा करीब और अगर कोई सिर्फ कुर्बत की बात करे सिर्फ तशबीहों की वो भी अधूरी बात है। वो भी अल्लाह को एक
तरह से महदूद करना है कि जैसे हम उसे सिर्फ अपनी ही सिफात के आईने में देख रहे हो तो कामिल पहचान क्या हुई फिर? कामिल मारफत वो है जो दोनों को जमा करे। अल्लाह को बेवक़ हर शय से बुलंद पाक बेमिसाल भी जाने यानी तंजीहा। जी। और साथ ही अपनी रहमत अपनी सिफात के साथ बहुत करीब भी महसूस करें। यानी तशबीह दूरी भी हो, कुर्बत भी, अजमत भी हो, मोहब्बत भी।
तो हजरत नूह अल सलाम की दावत में यह तवाजुन यह जमा करने वाला पहलू कम था। हालांकि उन्होंने तो दिन रात पुकारा था। जी हां कुरान पाक गवाह है। कोशिश में तो कोई कमी नहीं थी। दिन रात खुलेआम छुपकर हर तरह से बुलाया। मगर इबने अरबी इशारा करते हैं कि दावत का जो गालिब रंग था ना जी। वो तंजिया का था। अल्लाह की अजमत, उसका
जलाल, उसका कहर, मखलूक से उसका फासला जी। इस पर जोर ज्यादा था। और वो जो मोहब्बत, शिफकत, कुर्बत का पहलू है तशबीह वाला वो कम था। ऐसा महसूस होता है। वो जो जमा करने वाला पहलू होता है ना जो अल्लाह की दूरी और नजदीकी, जलाल और जमाल दोनों को साथ लाए वो पहलू नुमाया नहीं था। इब्ने अरबी इसके लिए खास इस्तिला इस्तेमाल करते हैं। फुरकान का
गलबा। फुरकान यानी फर्क करने वाला। जी। फुरकान का मतलब ही है फर्क करना, जुदाई डालना। गोया उनकी दावत में अल्लाह और बंदे के दरमियान जो एक फर्क है, जो फासला है उस पर जोर ज्यादा था। तो क्या यही वजह बनी कि कौम ने सुना नहीं?
लेकिन कुरान में जो उनका रद्दे अमल है, वह बड़ा अजीब है। वो सिर्फ इंकार नहीं करते। वो तो कहते हैं कानों में उंगलियां ठूंस लें और कपड़े ओढ़ लिए। यह क्यों? इबने अरबी यहां एक बहुत ही लतीफ बहुत गहरा नुक्ता निकालते हैं। वो फरमाते हैं कि कौम ने अनजाने में हजरत नूह की दावत के अंदाज का ही जवाब दिया। वो कैसे?
देखें हजरत नूह ने अपनी दावत में क्या कहा था। एक जगह आता है अपने रब से माफी मांगो ताकि वह तुम्हें बखश दे। यफर लकुम। अब अरबी में यह जो लफ्ज है ना मगफिरत जिसका तर्जुमा हम बख्शीश करते हैं इसका एक बुनियादी मतलब है ढांप लेना पर्दा डाल देना अच्छा मगफिरत यानी ढांप लेना तो कौम ने जी बिल्कुल कौम ने उस दावत का जवाब अपने
अमल से दिया कुरान क्या कहता है उन्होंने अपनी उंगलियां अपने कानों में डाल ली और अपने ऊपर अपने कपड़े लपेट लिए ओ यानी उन्होंने खुद को ढांप लिया बिल्कुल गोया वो उसी ढांपने और पर्दे को कुबूल कर रहे थे। जिसकी तरफ मगफिरत में इशारा था। वो अल्लाह के जलाल से उसकी दूरी से बचने के लिए खुद को छुपा रहे थे। खुद पर पर्दा डाल रहे थे। यानी इंकार से ज्यादा उस दावत के अंदाज से
पैदा होने वाले खौफ का घबराहट का रद्दे अमल था। दिल का खुद को बचाना बंद कर लेना। जी इबने अरबी का इशारा इसी तरफ है कि दावत का अंदाज ही ऐसा था कि उसने दिलों को खोलने के बजाय बंद होने पर मजबूर कर दिया। सुभान अल्लाह। तो फिर कामिल दावत कैसी होती है? इसके मुकाबले में कोई मिसाल?
इसके मुकाबले में हजरत इबने अरबी हमारे आका हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की दावत को पेश करते हैं। वो फरमाते हैं कि आप सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की दावत जामे थी। हर पहलू को समेटने वाली। उसमें जलाल भी था। अल्लाह की अजमत का बयान और जमाल भी था। उसकी रहमत और मोहब्बत का जिक्र। तंजीहा भी और तशबीहा भी। बिल्कुल तंजीहा
भी थी अल्लाह की बुलंदी और पाकी का बयान और तशबीहा भी थी उसकी कुर्बत उसके सुनने देखने का एहसास खौफ भी दिलाया गया मगर साथ ही उम्मीद का दरवाजा हमेशा खुला रखा गया यानी वो सिर्फ फर्क करने वाली फुरकान नहीं थी बल्कि जोड़ने वाली जमा करने वाली थी। जी इसीलिए तो इस किताब को कुरान कहा गया जिसका एक माना ही जमा करना है। इबने अरबी
कहते हैं कि कुरान में फुरकान तो है यानी हक और बाततिल का फर्क वाज़ है मगर फुरकान में पूरा कुरान नहीं यानी सिर्फ फर्क और दूरी का बयान मुकम्मल सच्चाई नहीं सिर्फ एक रुख है। बिल्कुल तस्वीर का सिर्फ एक रुख है। शायद इसीलिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जवाम उल कलम भी कहा गया। वो छोटी बातें जिनमें मायने के समंदर हो जो हर पहलू का जमा कर लें।
यकीनन और एक और लतीफ फर्क देखें। इबने अरबी इशारा करते हैं कि हजरत नूह ने रात को अलग पुकारा, दिन को अलग। गोया बाततिन को अलग, जाहिर को अलग। लेकिन हमारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रात को दिन में और दिन को रात में पुकारा। यानी जाहिर बाततिन, रूह और जिस्म सबको एक साथ एक ही वक्त में मुखातिब किया। दावत मुकम्मल थी। यजा थी।
क्या कुरान करीम में कोई ऐसी खास आयत है जो इस तवाजुन को तंजीहा और तशबीह के एक साथ होने को वाज़ करती हो? जी हां, बहुत ही खूबसूरत और जामे आयत है। सूरत शुरा की 11वीं आयत लसा कमली [संगीत] ही शून व समी उल बसीर। इसका क्या मतलब हुआ?
आयत के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा [संगीत] लसा कमि श यानी उस अल्लाह जैसी कोई शय नहीं। यह तो हुई कामिल तंजीहा [संगीत] अल्लाह की बेमिसाली हर चीज से पाकी। जी बिल्कुल। यह है खालिस तंजीहा कि कोई चीज, कोई ख्याल, कोई तसवुर उस जैसा नहीं। इबने अरबी तो यहां काफ और मिस्ल के दो बार आने से नफी दर नफी का नुक्ता भी निकालते
हैं। यानी उसकी बेमिसाली पर शदीद जोर है। अच्छा। और आयत का दूसरा हिस्सा वह समसीर। यह दूसरा हिस्सा है और वह सुनने वाला देखने वाला [संगीत] है। अब यह क्या है? यह तशबीह है। तशबीह कैसे?
क्योंकि सुनना और देखना यह सिफात हम मखलूक में भी पाते हैं। मगर फर्क यह है कि अल्लाह का सुनना और देखना उसकी शान के लायक है। हमारी तरह नहीं। यह सिफात अल्लाह का मखलूक से ताल्लुक, उसकी कुर्बत और उसकी तवज्जो को जाहिर करती हैं। सुभान अल्लाह। यानी एक ही आयत में पहले कहा कि उस जैसा कोई नहीं। बिल्कुल पाक, बुलंद। और फौरन बाद कहा कि वह सुनता भी है, देखता भी है यानी करीब भी है,
मुतवज्जे भी है। क्या कमाल का तवाजुन है। अच्छा अब यह बताइए कि दावत के अंदाज के इस फर्क से नतीजे में क्या फर्क पड़ा? हजरत नूह की कौम और उम्मते मोहम्मददिया सल्लल्लाहु ताला वसल्लम में। फर्क बहुत वाज़ है। क्योंकि हजरत नूह की दावत में तंजिया यानी अल्लाह की दूरी, जलाल और एक तरह से कहर का रंग गालिब था। जी। तो कौम में अल्लाह से फासले का एहसास गहरा हुआ। उन्होंने अल्लाह को ज्यादातर एक
दूर की हस्ती गिरफ्त [संगीत] करने वाली ताकत समझा। चुनांचा उनके लिए जो ताकीदी हुक्म आया उसमें भी एक तरह की अलदगी थी। मेरे सिवा किसी को कारसाज ना बनाना। और हमारे आका सल्लल्लाहो ताला वसल्लम की दावत का नतीजा हमारे आका सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की जामे दावत ने जिसमें तंजिया और तशबीह दोनों थे। रहमत और कुर्बत का पहलू बहुत नुमाया था। उसने अल्लाह से कुर्बत का,
ताल्लुक का, मोहब्बत का एहसास दिया। इसीलिए तो देखिए उम्मते मोहम्मदिया को जमीन पर अल्लाह का खलीफा कहा गया। नायब जानशीन जैसे कुरान में आया और इस माल में से खर्च करो जिसमें उसने तुम्हें जानशीन बनाया है। खलीफा होना तो बहुत बड़ी कुर्बत की अलामत है। जी बिल्कुल। खिलाफत, [संगीत] नियाबत यह गहरे ताल्लुक, कुर्बत और एतमाद की अलामत है। यह फर्क दावत के अंदाज से पैदा होने
वाले नतीजे का फर्क है। तो इस सारी गुफ्तगू का हजरत इब्ने अरबी के इस गहरे तजिए का सबक क्या है हमारे लिए? सबक बहुत सादा भी है और बहुत गहरा भी। वो यह कि दावत की कामयाबी का राज चाहे वह अल्लाह की तरफ बुलाने की दावत हो या जिंदगी में किसी भी खैर की तरफ। उसके तवाजुन में पोशीदा है। अंदाज ही फैसला करता है कि दिल खुलेगा या बंद हो जाएगा।
बिल्कुल अंदाज ही कुंजी है। यानी हकीकी मुअसर दिल में उतर जाने वाली दावत वो है जो बेवक़ मुखातिब को अल्लाह की अजमत और रहमत उसकी बेनियाजी और शफकत उसकी दूरी और कुर्बत उसके जलाल और जमाल दोनों का एहसास दिलाए। जो सिर्फ डराए नहीं मोहब्बत भी दे। सिर्फ उम्मीद ना दिलाए, जिम्मेदारी भी याद दिलाए।
बिल्कुल जो अकल को भी मुतम करे और रूह को भी सेराब करे। ऐसी दावत दिलों को खौफ से बंद नहीं करती बल्कि मोहब्बत और मारफत की रोशनी से खोल देती है। जी बिल्कुल। वो इंसान की पूरी शख्सियत को मुखातिब करती है। और चलते-चलते इबने अरबी यहां एक और बहुत ही हैरानक नुक्ता बयान करते हैं। हजरत नूह अल सलाम की वो दुआ याद है ना जो उन्होंने कौम के लिए की थी?
जी। और काफिरों के लिए हलाकत यानी तबाह के सिवा कुछ ना बढ़ा। जी तबाह इसका आम मतलब तो हम हलाकत, बर्बादी, टूटफूट ही लेते हैं। हां तबाही। लेकिन हजरत इबने अरबी इस तबाह को महज जाहरी तबाही नहीं समझते। वो उसकी एक बात ताबीरर करते हैं। वो उसे अल्लाह के इल्म और मारफत के लामहदूद समंदरों में डूब जाना, गर्क हो जाना करार देते हैं।