tubetranscript.io

Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 4: How Prophet Idrees Ascended to God | The Soul's Ultimate Journey | Fikr Nama – Transcript

Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube

Summary

AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.

  • इब्ने अरबी की किताब फसूसुल हिकम के चौथे फुस में हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम की हिकमत तकदीस और दो तरह की बुलंदी यानी मकान और मर्तबा का जिक्र किया गया है।
  • अल्लाह की बुलंदी किसी दूसरे के मुकाबले में नहीं है क्योंकि हकीकी वजूद सिर्फ उसी का है और कायनात की हर शय उसी एक अल अली जात की तजल्ली या जहूर है।
  • हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम की हिकमत तकदीस सिखाती है कि असल बुलंदी आसमानों की सैर या दुनियावी मकाम में नहीं बल्कि दिल की सफाई और रूह की पाकीजगी में है।
Video thumbnail: Fusus al-Hikam Part 4: How Prophet Idrees Ascended to God | The Soul's Ultimate Journey | Fikr Nama
Source video on YouTube · Transcript generated automatically and may contain errors.

Use this video with Pro

Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).

Transcript

Search ignores accents. All transcript text stays visible.

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम फिक्रनामा में खुशामदीद जहां हम अकल के दरवाजे से दाखिल होकर रूह के राज तलाश करते हैं। आज हम फसूसुल हिकम यानी इबने अरबी की शहरा आफाक किताब के चौथे फुस की तरफ बढ़ रहे हैं। हर फुस या बाब एक नबी की मखसूस हिकमत से जुड़ा है। आज का फुस हजरत इदरीस अल सलाम की हिकमत तकदीस के बारे में

है। सूर मरियम में इरशाद है व रफानाहु मकानन अलिया और हमने उसे एक बुलंद मकाम पर उठा लिया। मगर सवाल यह है आखिर यह बुलंदी है क्या? क्या यह कोई जगह की बुलंदी है या यह रूह की कोई कैफियत है?

जी। इबने अरबी उसी नुक्त को खोलते हैं। वह फरमाते हैं कि बुलंदी दो तरह की है। एक है बुलंदी मकान यानी जगह की बुलंदी और दूसरी है बुलंदी मर्तबा यानी दर्जे या मकाम की बुलंदी। अमल जो [संगीत] है वो इंसान को जगह में बुलंद करता है और इल्म वो मर्तबा बुलंद करता है और यही दो रास्ते हैं जो इंसान को उस बुलंद मकाम तक पहुंचा सकते

हैं जहां तकदीस का राज खुलता है। तो आइए इस गहरे समंदर में उतरते हैं। तो कुरान पाक में जो हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम [संगीत] के लिए मकानन अलिया का जिक्र आया है। एक बुलंद मकाम [संगीत] आमतौर पर तो ज़ैन आसमानों की तरफ यानी जगह की तरफ ही जाता है। जी बिल्कुल। पहला तासुर वही बनता है और इब्ने अरबी इस जाहरी माना को रद्द नहीं

करते। वह उसे बुलंदी मकान कहते हैं। वो एक तरह से उसे फलकुल अफलाक या सूरज के मदार से भी तशबीह देते हैं। यानी एक मरकजी ऊंचा मकाम जहां तक हजरत इदरीस को आप कह लें जिस्मानी तौर पर उठाया गया। और यह गोया उनके आमाल, उनकी रियाजत, उनकी जाहरी इबादत की इंतहा थी। लेकिन वो फौरन ही हमें दूसरी

और शायद ज्यादा अहम बुलंदी की तरफ लाते हैं। और वो है बुलंदी मर्तबा की मकाम की बुलंदी रुतबे की बुलंदी और यह हासिल होती है इल्म से मारफत से। यह अंदर की रिफत है। शूर की बुलंदी है। जैसे कुरान में अहले ईमान के लिए खासतौर पर अहले मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के लिए फरमाया गया के व अनंत तुमुल आलूना व्लाहु माकुम

यानी तुम ही सर बुलंद रहोगे और अल्लाह तुम्हारे साथ है। अब यहां जो सर बुलंद होना है यह मर्तबे की बुलंदी है। और अल्लाह का साथ होना यह भी तो कुर्बत और मर्तबे ही की अलामत है। तो गोया अल्लाह ने इस उम्मत के लिए इल्म और अमल दोनों के जरिए से मकान और मर्तबा दोनों बुलंदियां जमा कर दी हैं। यह तो बहुत ही दिलचस्प बात है कि बुलंदी

सिर्फ बाहर नहीं अंदर भी है। जगह की भी दर्जे की भी। अच्छा अब अगर अल्लाह ताला के अपने नाम अल अली पर गौर करें। जिसका मतलब है सबसे बुलंद। तो उसकी बुलंदी का क्या मतलब है? जाहिर है वह तो किसी जगह में महदूद नहीं है। तो वो किस पर बुलंद है या किसके मुकाबले में बुलंद है?

जी बहुत अच्छा सवाल है। और यहीं से दरअसल हजरत इदरीस अल सलाम की हिकमत यानी हिकमत तकदीस का दरवाजा खुलता है। तकदीस का मतलब है पाकी पाक होना। तो अल्लाह की जो बुलंदी है उसका अल अली होना वो किसी दूसरे के मुकाबले में नहीं है। क्योंकि हकीकी वजूद तो सिर्फ उसी का है। कोई दूसरा है ही नहीं जिसके मुकाबले में वो बुलंद हो। उसकी बुलंदी उसकी अपनी जात से है। बाय हिज वेरी

एसेंस। वो अपनी जात में बुलंद है। एक ट्रांसेंडेंस वो तमाम हुदूद से मावरा है। यानी यह कहना कि वो बुलंद है। उसका मतलब यह नहीं कि कोई चीज पस्त है। बिल्कुल बल्कि कायनात की हर शय जिसे हम अपनी नजर में पस्त समझें या बुलंद। वो हकीकत में उसी एक बुलंद जात का जहूर है। उसी की तजल्ली है। कोई चीज खुद से बुलंद

या पस्त नहीं होती बल्कि उस एक अल अली के ताल्लुक से ही अपना मुकाम पाती है। यह बात कि हर शय उसी एक जात का ज़हूर है। यह समझने में गहरी तो है लेकिन कभी-कभी ज़हन उलझ भी जाता है। खासतौर पर जब हम दुनिया में इतने तजादात देखते हैं। रोशनी है, तारीखी है, जिंदगी, मौत, अव्वल, आखिर। कुरान खुद फरमाता है हु अव्वलु व आखिरू व

जाहिर व बातिन वही अव्वल वही आखिर वही जाहिर वही बातिन तो एक ही जात में यह सारे आप कह ले मुखालिफ पहलू कैसे [संगीत] जमा हो सकते हैं जी तकदीस का इस पाकी का गहरा राज है अल्लाह की पाकीजगी और उसकी बुलंदी इसी में है कि वो इन तमाम जाहिरी तजादात को अपनी जात में इस तरह रखता है कि वह उनसे

मुतासिर नहीं होता उनमें महदूद नहीं होता। एक बड़े आरिफ गुजरे हैं अबू सैद अल खराज। उनका एक मशहूर कॉल है कि मैंने अल्लाह को दो जिद्दों को जमा करने से पहचाना। दो जिद्दों को जमा करने से जी। और कुरान की आयत जो आपने पढ़ी सूरतुल हदीद की यह [संगीत] तो तौहीद की आप समझे बुनियाद है। वही अव्वल है। वही आखिर वही

जाहिर वही बातिन। यानी हर चीज का आगाज भी वही, अंजाम भी वही। कायनात की शक्ल में जाहिर भी वही और इस जाहिर के पीछे छुपा हुआ बातिन भी वही। वो खुद ही देखने वाला है और खुद ही वो हकीकत है जो हमारी नजर से ओझल है। गोया वो खुद पर जाहिर है और खुद से ही पोशीदा भी। यह तो अकल को हैरान करने वाली बात है। यह तजाद हमारी महदूद अक्ल को लगता है।

हकीकत में यह एक ही नूर के मुख्तलिफ रंग है। इबने अरबी इसको समझाने के लिए अद की मिसाल देते हैं। देखें जितने भी आदाद हैं दो, तीन, 10,000, लाख, करोड़। यह सब कहां से आते हैं?

एक से। उसी एक से। एक को एक में जमा करें तो दो बनता है। इसी तरह आगे चलते जाए तो एक ही तमाम आदाद की असल है। उनका सर चश्मा है। ठीक। मगर क्या 10 का अद सिर्फ 10 एक का मजमुआ है? नहीं ना? 10 अपनी जगह खुद एक हकीकत है। एक मर्तबा है। उसकी अपनी खुसूसियात है। हां ये बात तो है।

बिल्कुल इसी तरह कायनात की तमाम मौजूदात, तमाम शक्लें, तमाम नाम उसी एक जात अहद यानी द वन सोर्स से जाहिर हुए हैं। वो एक ही हकीकत है जो लातदाद आईनों [संगीत] में यानी मखलूकात में अपना अक्स दिखा रही है। हर अक्स मुनफरिद है। अपनी जगह एक हकीकत है। मगर असल में वह है उसी एक चेहरे का परतो।

तो यही इरफान इदरा की है। जब आरिफ यानी अल्लाह की मारफत रखने वाला इस मुकाम पर पहुंचता है तो उसकी निगाह पाक हो जाती है। वो चीजों के जाहरी फर्क और तजाद में नहीं उलझता। वो कसरत में वहदत को और वहदत को कसरत में जलवागर देखता है। इसके लिए यह तजादात खत्म हो जाते हैं। क्योंकि वह जान

लेता है कि हर रंग हर सूरत उसी एक बेरंग हकीकत का जुहूर है। वो हर शय में उसी अलकद्दूस यानी पाक जात का नूर उसी अल अली बुलंद जात की शान देखता है। यही वह अंदरूनी सफाई वो तकदीस है जो रूह को हकीकी बुलंदी अता करती है। यह वह बुलंदी है जो आसमानों की गर्दिश या सितारों के इल्म से भी मावरा है। यह शहूर की बुलंदी है।

और जो इस हकीकत को नहीं समझ पाता वो फिर कसरत के जंगल में आप कह लें भटकता रहता है। वह चीजों की अलग-अलग पहचान, नामों, सूरतों में उलझा रहता है। इबने अरबी इसको हैरत या परेशानी कहते हैं। इल्म खासतौर पर यह इरफानी इल्म इसी हैरत को दूर करता है। यह दिल को सुकून देता है। निगाह को वजाहत बखशता है।

हम यह बात वाकई बहुत अहम है कि यह वाली बुलंदी यह जो इरफानी बुलंदी है यह दुनियावी मर्तबों से बिल्कुल मुख्तलिफ है। जी हां। अक्सर लोग तो बुलंदी का मतलब बड़ा ओहदा, ताकत, शोहरत यही समझते हैं। और इब्ने अरबी फरमाते हैं कि दुनियावी बुलंदी जैसे किसी बादशाह का तख्त हो या

किसी काजी का मंसब यह आरजी है। यह एक हाल है। एक कैफियत है जो बदल सकती है। जब वो शख्स उस ओहदे से हटता है, तो उसकी वो जाहिली बुलंदी भी खत्म हो जाती है। वो बुलंदी उसकी जात का हिस्सा नहीं थी। वो तो ओहदे से जुड़ी हुई थी। वो तो आरजी हुई। बिल्कुल। लेकिन इल्म और मारफत से जो बुलंदी मर्तबा हासिल होती है वो जाती और

हकीकी है। वो इंसान की रूह में उसके शूर में कायम होती है। उसे कोई छीन नहीं सकता। यह इंसान की अपनी कमाई होती है। उसकी जात का जोहर बन जाती है। तो फिर हकीकी बुलंदी तो यही हुई। जी। और इसीलिए फरमाया कि जो आलिम अपने इल्म में आजजी इख्तियार करता है यानी यह जानता है कि यह इल्म, यह समझ, यह मर्तबा

सब कुछ उसी एक अल आली की अता है। मेरा अपना कुछ नहीं। वही हकीकी मानों में बुलंद है। क्योंकि वह अपनी जात की नफी करके असल सरचश्मे से जुड़ जाता है। तकदीस में फक्र और तकब्ुर की कोई गुंजाइश नहीं। तकदीस तो सरापा सुकून है, इत्मीनान है, पाकीजगी है। यह झुकने में बुलंद होना है। तो गोया हजरत इदरीस अल सलाम से मनसूब यह

हिकमत तकदीस हमें यही सिखा रही है कि असल बुलंदी आसमानों की सैर करने में या सितारों का इल्म जानने में या दुनिया में कोई ऊंचा मकाम पाने में नहीं है। बिल्कुल नहीं बल्कि असल बुलंदी तो दिल की सफाई में है। रूह की पाकीजगी में और निगाह की वैदत में तख्तीस ही असल उरूज है। बाततिन की पाकी ही हकीकी मेराज है। वाह।

जब दिल इस मारफत से पाक और साफ हो जाता है। जब निगाह हर चीज में उसी एक का जलवा देखने लगती है तो वो दिल खुद गोया एक मकाने अली एक बुलंद मकाम बन जाता है। वो इंसान खुद अल्लाह के इस्म मुबारक अल अली का मजहर उसका आईना बन जाता है। उसकी रूह हकीकी बुलंदी पा लेती है। वो बुलंदी जो

जमानो मकान की कैद से आजाद है। यह तो एक ऐसी बुलंदी हुई जो बाहर से नहीं आती बल्कि अंदर से फूटती है। यह कुछ हासिल करने वाली चीज नहीं बल्कि यह एक कैफियत है। हो जाने की कैफियत। बिल्कुल। अपनी जात की जो महदूदियतें हैं उनसे पाक होकर उस लामहदूद जात से जुड़ जाने का नाम है। और यह सफर इल्म से शुरू होता है। तकमील इश्क और मारफत में होती है। यह

जानना [संगीत] कि मैं कुछ नहीं और सब कुछ वही है। यही वो नफी है जो इस बात का दरवाजा खोलती है। यही वो पस्ती इख्तियार करना है जो असल में बुलंदी अता करती है। हजरत इदरीस अल सलाम की हिकमत का निचोड़ खुलासा यही है। सफाई में बुलंदी है। पाकी ही उरूज है। अगर आप भी इस रूहानी सफर का हिस्सा बनना चाहते हैं तो फिक्रनामा को सब्सक्राइब कीजिए।

क्योंकि यह सफर समझने का नहीं बदल जाने का है।

Frequently asked questions

इबने अरबी के मुताबिक बुलंदी दो तरह की होती है। एक बुलंदी मकान यानी जगह की बुलंदी और दूसरी बुलंदी मर्तबा यानी दर्जे या मकाम की बुलंदी है।

तकदीस का मतलब पाकी और पाक होना है।