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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 11: Is God's Command 'Be!' Really Enough? | Ibn Arabi on Creation | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलैह के मुताबिक कायनात में हर वजूद और इनफरादियत की बुनियाद तस्लीस यानी तीन के उसूल पर है।
  • हजरत सालेह अलैहिस्सलाम की कौम पर आने वाले अजाब से पहले मिले तीन दिन उनके चेहरे के रंगों के बदलाव के जरिए तबाही के मुस्तहिक होने का सबूत बने।
  • इस हिकमत से इंसान को यह अमली सबक मिलता है कि वह अपने साथ पेश आने वाले खैर और शर की जिम्मेदारी खुद पर ले।
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Transcript

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बिस्मिल्लाह रहमानिर्रहीम फिक्रेनामा में खुशामदीद आज हम शेख उल अकबर मुुद्दीन इबने अरबी रहमतुल्लाह अल की शहरा आफा किताब फसूसुल हिकम के 11वें फस पर बात करेंगे और यह फुस्क जिसका उनवान हिकमत फतूहिया फी कलिमतन सालहिया है एक बहुत ही गहरे सवाल से शुरू होता है। आज हम एक ऐसे उसूल पर बात करेंगे जिसे शेख इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह ने कायनात की बुनियाद करार दिया है।

जी। और सबसे हैरानक बात यह है कि वो इसूल को साबित करने के लिए हजरत सालेह अलैह ससलाम की कौम पर आने वाले अज़ाब की मिसाल देते हैं। बिल्कुल। आज हमारी कोशिश यही होगी कि इसी गु्थी को सुलझाया जाए कि कायनात के तखलीक का उसूल और एक कौम की तबाही यह आपस में कैसे जुड़े हैं। यह वाकई एक हैरानक ताल्लुक है जो शेख ने

कायम किया है। वो इस हुस् का आगाज एक बहुत बड़े दावे से करते हैं। वो फरमाते हैं कि कायनात में हर शय हर वजूद एक उसूल पर कायम है जिसे वह फर्दियत या इनफरादियत कहते हैं। और फिर वह कहते हैं कि हर इनफरादियत की बुनियाद तस्लीस पर है। तस्लीस का सादा मतलब है तीन का उसूल। यानी कोई भी चीज, कोई भी वाकया, कोई भी नतीजा वजूद में आने

के लिए कमस कम तीन अजा का मोहताज होता है। दो चीजों से कभी तीसरी चीज पैदा नहीं होती। जब तक कोई तीसरा उनसर उन्हें जोड़ ना दे। इसे थोड़ा आसान अल्फाज़ में समझाएंगे। जैसे कोई मिसाल हो। बिल्कुल। इससे आसान जुबान में समझते हैं। सोचें कि आपको आग जलानी है। आपको तीन चीजें चाहिए। ईंधन जैसे लकड़ी, हरारत जैसे माचिस की तीली और ऑक्सीजन यानी हवा। जी।

उनमें से कोई सी दो चीजें मिलकर आग नहीं जला सकती। लकड़ी और हवा को एक जगह रख दें, कुछ नहीं होगा। लकड़ी और माचिस को खला में ले जाएं, जहां हवा ना हो, आग नहीं जलेगी। तीनों का एक साथ होना जरूरी है। सही। शेख कहते हैं कि बिल्कुल इसी तरह कोई भी नतीजा चाहे वो दुनिया में हो या हमारे जहन में हमेशा तीन चीजों के मिलने से ही बनता है। बहुत खूबसूरत मिसाल है। तो यह कायनात की

तखलीक पर कैसे लागू होता है? शेख इबने अरबी इसकी बुनियाद कुरान मजीद की आयत पर रखते हैं। इनमा को शरदना अनकूल कु फकून यानी जब हम किसी चीज का इरादा करते हैं तो हमारा कॉल बस इतना होता है कि हम उसे कहते हैं हो जा और वह हो जाती है। बिल्कुल। अब अगर आप इस आयत में गौर करें तो तखलीक के इस अमल में अल्लाह की तरफ से

तीन चीजें जाहिर हो रही हैं। अच्छा वो क्या है? अव्वल अल्लाह की जात अकदस जो हुकुम दे रही है। दोम उस जात का इरादा यानी किसी खास चीज को वजूद में लाने की नियत और सोम उसका कॉल या हुक्म कुन यानी हो जा। जात इरादा और कॉल। जी। यह तीन सुतून हुए। इन तीनों के बगैर तखलीक का इलाही अमल शुरू ही नहीं हो सकता।

यह तो हुई हुकुम देने वाले की तरफ की बात अल्लाह की तरफ से। लेकिन जिस चीज को वजूद में लाया जा रहा है, क्या उसकी तरफ से भी कुछ दरकार है? या यह सिर्फ एक यतफा अमल है। यही इस बहस का सबसे गहरा और आप कह ले इंखिलाबी नुक्ता है। शेख कहते हैं कि जिस तरह हुक्म देने वाले की तरफ तीन चीजें हैं, उसी तरह हुक्म कबूल करने वाली शय की तरफ भी तीन चीजों का होना जरूरी है ताकि वो वजूद में आ सके।

अच्छा। वो तीन चीजें क्या हैं? अवल उस चीज की अपनी हकीकत या शयत। दोम उसकी हुक्म इलाही को सुनने की सलाहियत और सोम वजूद में आने के हुक्म की तामील या कबूलियत हम यानी उसका जवाबन यह कहना के मैं हाजिर हूं तो तीन चीजें इधर से हुई शय की हकीकत उसका सुनना और उसकी तामील

एक मिनट ये शयत या थिंगनेस का तसवुर थोड़ा मुश्किल है। इसका क्या मतलब है कि एक चीज जो अभी वजूद में ही नहीं आई उसकी अपनी एक हकीकत है। बहुत अच्छा सवाल है। इसे ऐसे समझें कि अल्लाह के अजली इल्म में हर चीज का एक आइडियल ब्लूप्रिंट या एक तसवुर मौजूद है। चाहे वो चीज अभी उस मादी दुनिया में बनी ना हो। जैसे एक मेमार के ज़हन में इमारत का नक्शा होता है।

बिल्कुल। अल्लाह के इल्म में हर शय की जो असलियत है, जो उसकी सलाहियत है, वही उसकी शयत है। ठीक है, यह समझ में आया। लेकिन यहां एक और गहरा सवाल पैदा होता है। शेख यह कहते हैं कि अल्लाह का काम हुकुम देना है। लेकिन वजूद में आना यानी तकवीन उस शय का अपना फेल है। क्या इसका यह मतलब नहीं कि हम अल्लाह के हुकुम को महदूद कर रहे हैं कि

अगर कोई चीज वजूद में आने की सलाहियत ना रखती हो, तो अल्लाह भी उसे नहीं बना सकता। नाउजब्लाह आपने इस बहस की रूह को पकड़ लिया है। यह बजाहिर एक बहुत बड़ा दावा लगता है। लेकिन शेख इबने अरबी इसे अल्लाह की कुदरत की नफी के तौर पर नहीं देखते बल्कि इसके कमाल इल्म और हिकमत के इस बात के तौर पर देखते हैं। वो कहते हैं कि

अल्लाह ताला ने कुरान में फरमाया कु फयकून यानी हो जा बस वह हो जाती है। जी हां। यह नहीं फरमाया कि हो जा बस हम उसे कर देते हैं। वजूद में आने का फेल यानी यकनु खुद उस चीज से मंसूब किया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि शय अल्लाह से ज्यादा ताकतवर है। नाउजब्लाह बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ताला किसी चीज को

वही हुकुम देता है जो उसके इल्म में है कि वो शय कुबूल कर सकती है। हम अल्लाह का इल्म हर शय की हकीकत और सलाहियत का इहाता किए हुए है। वो लोहे को लकड़ी बनने का हुक्म नहीं देता क्योंकि उसके इल्म में है कि लोहे की हकीकत लोहा रहना है और लकड़ी की हकीकत लकड़ी। यह अल्लाह की हिकमत का कमाल है कि उसका हुकुम हमेशा शय की काबिलियत के ऐन मुताबिक होता है।

यानी यह कोई मजबूरी नहीं बल्कि एक इलाही निजाम है जिसमें हर चीज अपनी फितरी इस्तेदाद के मुताबिक अपना किरदार अदा कर रही है। बिल्कुल शेख रहमतुल्लाह ने इसे समझाने के लिए आका और गुलाम की मिसाल दी है। अच्छा आका हुकुम देता है खड़े हो जाओ। हुक्म देना आका का फेल है। लेकिन खड़ा होना गुलाम का फेल है। अगर गुलाम में खड़े होने

की ताकत ही ना हो या वो सुनने से कासिर हो या वो नाफरमानी करे तो वो खड़ा नहीं होगा। सही। इसी तरह अल्लाह का हुक्म कुन आता है और शय अपनी अंदरूनी इस्तेदाद और कुबूलियत की बिना पर वजूद की दुनिया में कदम रखती है। सही। अब मैं इस सवाल पर वापस आती हूं जो हमने शुरू में उठाया था। शेख इबने अरबी इस सारे फलसिफे को हजरत सालेह अल सलाम के

किस्से से कैसे जोड़ते हैं? जी अब हम इस फुस्फ के नुक्त उरूज पर आते हैं। शेख फरमाते हैं कि जब हजरत सालेह अल सलाम की कौम ने अल्लाह की निशानी यानी ऊंटनी को मार डाला तो अल्लाह ने उन्हें अज़ाब से पहले तीन दिन की मोहलत दी। तीन दिन? ये तीन दिन शेख कहते हैं कि यह तीन का अद कोई इत्तेफाकी नहीं है। तो आप यह कह रहे हैं कि वह तीन दिन सिर्फ

इंतजार की मोहलत नहीं थे बल्कि वो उसी मंतकी दलील की तरह थे जिसके मुकम्मल होने पर एक नतीजा जाहिर होता है। बिल्कुल वो तीन दिन एक तरह से उस बात का नाकाबिले तरदीद सबूत बन रहे थे कि अब यह कौम अज़ाब की मुस्तहिक हो चुकी है। कुरान इन तीनों दिनों की तफसीलात बयान नहीं करता। लेकिन रिवायत की रोशनी में शेख इब्ने अरबी उनके वाक्यात बयान करते हैं। रिवायत के मुताबिक पहले दिन उस कौम के

तमाम लोगों के चेहरे जर्द हो गए। दूसरे दिन उनके चेहरे सुर्ख हो गए और तीसरे दिन उनके चेहरे स्याह हो गए। जर्द, सुर्ख और फिर स्याह। जी। जब यह तीन दिन का अमल मुकम्मल हुआ, यानी उनकी तबाही की अहलियत और इस्तेदार पूरी तरह साबित हो गई, तो नतीजा यानी अज़ाब एक हैबतनाक चीख की सूरत में जाहिर हुआ। और वह अपने घरों में औंधे पड़े रह गए।

यानी उनकी रूहानी मौत तीन मराहिल में उनके चेहरों पर जाहिर हुई। यह तो गोया उनके बाततिन का एक्सरे था जो तीन दिन तक चलता रहा। हम शेख इन रंगों की बहुत गहरी रूहानी ताबीरर करते हैं। वो इन बदबख्तों के चेहरों की कैफियात का मुआजना अहले जन्नत के चेहरों की उन कैफियात से करते हैं जो कुरान में बयान हुई है। वजू हुई यदि मुसफरतु

मुस्तबशरा इस दिन कुछ चेहरे रोशन होंगे हंसते हुए खुशी मनाते हुए। बिल्कुल। यह मुआजना कैसे किया गया है? पहला रंग जर्दी है। शेख कहते हैं कि यह अहले जन्नत के रोशन यानी मुस्फिरा चेहरों के मुकाबले में है। जिस तरह सुबह की रोशनी यानी असफार हर चीज को सफेद और रोशन कर देती है। इसी तरह यह जर्दी उनके लिए अज़ाब की सुबह की पहली अलामत थी।

और दूसरा रंग सुर्खी। यह अहले जन्नत के हंसते हुए यानी दाहका चेहरों के मुकाबले में है। जब इंसान खुशी और मसरत से हंसता है तो उसके गालों पर सेहतमंद सुर्खी आ जाती है। उनके चेहरों की सुर्खी खुशी की नहीं बल्कि गजब इलाही और आने वाली तबाही की अलामत थी। और आखिर में सिया रंग सिया रंग अहले जन्नत के खुश यानी मुस्तबशिशरा चेहरों के मुकाबले में है।

यहां शेख रहमुल्लाह एक इंतहाई लतीफ नुक्ता बयान करते हैं। वह फरमाते हैं कि लफ्ज मुस्तबिरा और बशारत का मादा है बशर। जिसका एक मतलब है इंसान की जिल्द या स्किन। तो बशारत या खुशखबरी दरअसल वो खबर है जो इतनी गहरी हो कि इंसान की जिल्द पर असर अंदाज हो। उसका रंग बदल दे। वाह!

अहले जन्नत को अल्लाह की रहमत की बशारत मिलती है जिससे उनके चेहरे खुशी से खिल उठते हैं और उन बदबख्तों को दर्दनाक अज़ाब की बशारत दी गई और इस खबर के असर ने उनके चेहरों को स्याह कर दिया। दोनों सूरतों में खबर ने उनकी जिल्द पर अपना असर जाहिर कर दिया। अल्लाह हू अकबर। तो गोया उनके अंदर की हालत, उनके बाततिन का इंकार और बगावत, तीन दिन के अरसे में मुकम्मल तौर पर उनके

जाहिर पर, उनके चेहरों पर आ गई। जी बिल्कुल। उनके अंदर जो कुछ साबित हो चुका था, वह बाहर भी जाहिर हो गया। उनकी इस्तेदा अज़ाब मुकम्मल हो गई और नतीजा जाहिर हो गया। तो इस सारी बहस का इस गहरे और सच कहूं तो खौफजदा कर देने वाले किस्से का हमारे लिए अमली सबक क्या है? इस हिकमत से हमें क्या हासिल करना चाहिए? इस सारी बहस का अमली सबक इंसानी जिम्मेदारी का गहरा शूर है।

शेख इबने अरबी फरमाते हैं कि जो शख्स इस हिकमत को इस तीन के उसूल को अपनी जिंदगी में समझ लेता है वो जान लेता है कि खैर और शर यानी अच्छाई और बुराई उसी की जात से फूटते हैं। खैर और शर से यहां क्या मुराद है? क्या यह कोई अखलाकी तारीफ है? यहां वो खैर और शर की एक अमली और जाती तारीफ करते हैं। खैर वो चीज है जो इंसान के मिजाज, उसकी फितरत

और उसके मकसद के मुफिक हो। और शर वो चीज है जो उसके मिजाज और मकसद के खिलाफ हो। यह समझ इंसान को दूसरों पर इल्जाम तराशी की आदत से निजात दिलाती है। वह जानता है कि जो कुछ उसे पेश आ रहा है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उसकी बुनियाद कहीं ना कहीं खुद उसके अंदर उसकी अपनी इस्तेदा और कुबूलियत में मौजूद है। यह तो जिम्मेदारी का एक बहुत ऊंचा मुकाम है। इसका मतलब है कि हम अपनी जिंदगी में

पेश आने वाले वाक्यात की जिम्मेदारी मुकम्मल तौर पर कुबूल करना सीखें। यानी अपनी खुशी का जिम्मेदार भी खुद को समझे और अपने गम का भी। जी। और ऐसा शख्स जिसे शेख आरिफ कहते हैं वो तमाम मखलूकात के लिए उज़्र तलाश करता है। उज़र जी। क्योंकि वह जानता है कि हर कोई अपनी फितरत और अपनी सलाहियत के मुताबिक ही अमल

कर रहा है। यह इरफान इंसान को एक अजीब सुकून और वसत अता करता है। जब उसे कोई नागवार बात पेश आती है तो वह दूसरों को कोसने या हालात का शिकवा करने के बजाय खुद से कहता है यह तुम्हारी अपनी इस्तेतात का नतीजा है। लिहाजा इसे कबूल करो और इसे सीखो। इसका मतलब यह नहीं कि इंसान जुल्म को बर्दाश्त करे बल्कि यह कि वो वाक्यात की जड़ अपने अंदर तलाश करे।

बिल्कुल यह बेअली की दावत नहीं बल्कि गहरे यानी सेल्फ रिफ्लेक्शन की दावत है। जब इंसान यह जान लेता है कि हर चीज अपनी असल की तरफ लौटती है और हर अमल की जड़ खुद अमल करने वाले के अंदर है तो फिर गिले शिकवे और दूसरों से शिकायतें खत्म हो जाती हैं। जी। वह समझता है कि बैरूनी हालात उसकी अंदरूनी कैफियत और कुबूलियत का ही अक्स हैं। तो हजरत साले अलह सलाम से मंसूब यह हिकमत

Frequently asked questions

शेख इब्ने अरबी के मुताबिक हर इनफरादियत की बुनियाद तस्लीस यानी तीन के उसूल पर है, जिसका मतलब है कि किसी भी चीज के वजूद में आने के लिए कम से कम तीन अजजा का होना जरूरी है।

हजरत सालेह अलैहिस्सलाम की कौम को अजाब से पहले तीन दिन की मोहलत दी गई थी, जिनके दौरान उनके चेहरों के रंग पहले जर्द, फिर सुर्ख और तीसरे दिन स्याह हो गए थे।

इस हिकमत का अमली सबक इंसानी जिम्मेदारी का गहरा शूर है, जिससे इंसान यह जानता है कि खैर और शर उसी की जात से फूटते हैं और वह अपने वाक्यात की जिम्मेदारी कबूल करता है।