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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 18: Kya Jahannam Hamesha Nahi Rahe Gi? | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख-ए-अकबर इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत यूनुस अली सलाम के वाक्य के हवाले से अल्लाह की रहमत और उसके गजब के ताल्लुक पर रोशनी डालते हैं।
  • हजरत दाऊद अली सलाम को खून बहाने की निस्बत की वजह से बैतुल मुकद्दस बनाने से रोका गया क्योंकि इंसान का वजूद अल्लाह का बनाया हुआ है।
  • आखिरत में अज़ाब और जहन्नुम की आग का मकसद रूह की बीमारियों को दूर करना है और आखिरकार गजब की वह आग भी रहमत ही में जम हो जाएगी।
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Transcript

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उमूमन हम यह समझते हैं कि अल्लाह की रहमत और अल्लाह का अज़ाब दो अलग-अलग हकीकतें हैं। रहमत अपने मुकाम पर और अज़ाब अपने मुकाम पर। हम यह भी समझते हैं कि जन्नत वालों का अंजाम अलग है और जहन्नुम वालों का अंजाम अलग। मगर शेख-ए-अकबर इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत यूनुस अल सलाम के बाप में एक ऐसा सवाल उठाते हैं जो सदियों से अहले फिक्र को हैरान करता आया है। वो

फरमाते हैं कि अगर अल्लाह की रहमत उसके गजब पर सबकत ले गई है तो फिर इसका आखिरी मतलब क्या है? क्या यह मुमकिन है कि हम रहमत की वसत को उससे कहीं कम समझते हो जितनी वह हकीकत में है और क्या यह भी मुमकिन है कि मौत, अज़ाब और अंजाम के बारे में हमारे बाज तस्सवुरात को एक नए जाविए से देखने की जरूरत हो। हजरत यूनुस अली सलाम की हिकमत में शेख-ए अकबर इंसानी

वजूद, मौत, जिक्र और रहमत के उन पहलुओं पर गुफ्तगू करते हैं जहां बहुत सी जाहिरी सरहदें धुंधली होने लगती हैं और एक वसी तर हकीकत सामने आती है। आइए आगाज करते हैं। जी। जब हम ये सुनते हैं कि अल्लाह की रहमत उसके गजब पर हावी है तो आमतौर पर हम उसे एक सिर्फ एक तसल्ली बख्श जुमला समझ लेते हैं। जी बिल्कुल एक दिलासा सा महसूस होता है। हां। लेकिन शेख अकबर के नजदीक यह कोई आम

दिलासा नहीं है बल्कि कायनात का सबसे बुनियादी और अटल कानून है। इसे समझने के लिए ना हमें सबसे पहले इंसानी वजूद की हकीकत को समझना होगा। इंसान कोई ऐसी शय नहीं है जो इत्तेफाकन पैदा हो गई हो और जिसे किसी भी वक्त हकीर समझकर मिटा दिया जाए। यानी [संगीत] इस वजूद का कोई खास मकसद है। बिल्कुल। शेख अकबर बताते हैं कि इंसान को अल्लाह ने अपनी सूरत पर पैदा किया है। इसका मतलब यह है कि इंसान का वजूद एक ऐसे

शफाफ आईने की तरह है जिसमें अल्लाह की सिफात मुनकिस होती हैं। सही जैसे कि खालिक, रहीम और करीम होने की सिफात। जी हां बिल्कुल वही। तो जब आप एक इंसान के वजूद को बचाते हैं तो दरअसल आप उस आईने की हिफाजत कर रहे होते हैं जिसमें इलाही सिफात का जुहूर हो रहा है। इसीलिए इंसानी जान की कद्रो कीमत का बराएरास्त ताल्लुक अल्लाह की रहमत से है। इस आईने को टूटने

से बचाना इसे तोड़ देने से कहीं ज्यादा अल्लाह को महबूब है। सही। लेकिन अगर इंसान वाकई इलाही सिफात का ऐसा शफाफ आईना है और इसकी [संगीत] हिफाजत अल्लाह को इतनी ही महबूब है तो फिर जब हम तारीख को देखते हैं तो ज़हन इलझन का शिकार होता है। देखिए ना दुनिया की तारीख तो जंगों और खूनरेजियों से भरी पड़ी है। अगर इस वजूद को बचाना ही मकसूद कायनात [संगीत] है। तो फिर इतनी बड़ी सतह पर इंसानों का

मिटाया जाना कैसे मुमकिन हुआ। हम इस तजाद को शेख अकबर की इस हिकमत की रोशनी [संगीत] में कैसे समझें। यह उलझन बिल्कुल फितरी है। और इसी उलझन को दूर करने के लिए शेख अकबर एक इंतहाई गहरा वाकया नकल करते हैं जो महज तारीख नहीं है बल्कि एक कायनाती उसूल की निशानदेही करता है। वो हजरत दाऊद अल सलाम का जिक्र करते हैं। हजरत दाऊद अल सलाम अल्लाह के नबी थे और वो बैतुल

मुकद्दस की तामीर करना चाहते थे। यह कोई आम इमारत नहीं थी बल्कि अल्लाह का घर था। लेकिन जब भी वह दीवारें उठाते वो गिर जाती। बार-बार ऐसा होने पर उन्होंने अल्लाह की बारगाह में इल्तजा की, तो वही नाजिल हुई कि ऐ दाऊद, यह मुकद्दस घर उन हाथों से तामीर नहीं होगा जिन्होंने खून बहाया हो। हम लेकिन यहां एक बहुत ही वाजे सवाल पैदा होता है। हजरत दाऊद अल सलाम ने जो भी जंगे

लड़ी, जो खून बहाया वो तो हक की खातिर था ना? जी बिल्कुल था। तो फिर एक नबी को जिसने अल्लाह की राह में जिहाद किया हो उन्हें अल्लाह का घर बनाने से क्यों रोका जा रहा है? यही वह मकाम है जहां बात हिकमत [संगीत] सामने आती है। हजरत दाऊद अली सलाम ने भी बारगाह इलाही में बाईने यही अर्ज की थी। उन्होंने पूछा कि ऐ मेरे रब क्या वह खून जो मैंने बहाया वह तेरी ही राह में नहीं था? अल्लाह की

तरफ से जो जवाब आया वो शेख-ए अकबर के इस पूरे फलसफे की बुनियाद है। अल्लाह ताला ने फरमाया हां लेकिन क्या वो मेरे बंदे नहीं थे? सुभान अल्लाह यानी इंसान की जान की क्या अहमियत है अल्लाह के यहां? बेशक इस एक जुमले की गहराई में उतरें। वह लोग जिनके खिलाफ जंग हुई, वह नाफरमान थे, बाततिल पर थे, लेकिन उनकी निस्बत किसकी तरफ थी? उनका

खालिक कौन था? वह वजूद किसने तराशा था? वह अल्लाह ही की सिफ़त तकलीक का मजहर थे। इंसान का वजूद चाहे जिस भी हाल में हो, वह अल्लाह का बनाया हुआ है। वाकई! इसीलिए बैतुल मुकद्दस की तकमील का यह शरफ हजरत दाऊद अल सलाम के बजाय उनके बेटे हजरत सुलेमान अली सलाम को बख्शा गया जिनके दौर में अमनो आमान था और वो मुकद्दस घर तामीर हुआ। यह वाकया हमें बताता है कि

अल्लाह के नजदीक उसके बनाए हुए इंसान का वजूद चाहे वह कैसा ही क्यों ना हो ईंट और पत्थर से बनी मुकद्दस तरीन इमारतों से भी ज्यादा मोहतरम है। सही। लेकिन अगर एक नाफरमान इंसान का वजूद भी इतना ही मोहतरम है तो फिर शरीयत के उन कवानीन का क्या जवाज बनता है जिनमें जान लेने का हुक्म है? मेरा इशारा कसा की तरफ है। यानी जान के बदले जान। जी एक अहम सवाल है।

एक तरफ हम कह रहे हैं कि वजूद को मिटाना [संगीत] अल्लाह को नापसंद है और दूसरी तरफ खुद शरीयत एक कातिल को कत्ल करने का हुक्म दे रही है। तो इस बजाहिर नजर आने वाले तजाद में रहमत का वो उसूल कहां छुपा है?

देखिए यह बहुत अहम नुक्ता है क्योंकि शेख- अकबर शरीयत और तरीकत को अलग नहीं करते बल्कि शरीयत ही के बात में मौजूद हिकमत को जाहिर करते हैं। कुरान मजीद [संगीत] का वाजी फरमान है किस में तुम्हारे लिए जिंदगी है। जब मुआशरे में यह कानून नाफिज होता है कि जान के बदले जान ली जाएगी तो यह खौफ बहुत से मुमकिना कातिलों को कत्ल से रोक देता है। एक कातिल को सजा देकर दरअसल हजारों बेगुनाह जानों को महफूज़

किया जाता है। तो किसा का हत्मी मकसद मौत नहीं है बल्कि बका है। लेकिन शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि इसी शरीयत के अगले कदम पर गौर करें। शरीयत ने किसास का हक तो दिया है लेकिन साथ ही मकतूल के बुरसा को यह इख्तियार भी दिया है कि वो दियत ले लें यानी खून बहा लें या फिर माफ कर दें। और कुरान माफ कर देने को बेहतरीन अमल करार देता है। यानी शरीयत हमें इख्तियार देकर दरअसल यह

देखना चाहती है कि हम किस रास्ते का इंतखाब करते हैं। क्या हम गजब चुनते हैं या रहमत। बिल्कुल ऐसा ही है। जब एक इंसान जिसके पास बदला लेने की मुकम्मल ताकत और शरई हक मौजूद हो वो [संगीत] किस के बजाय माफी का रास्ता चुनता है तो वह क्या कर रहा होता है? वह शख्स गजब के मुकाम पर खड़े होकर रहमत का इंतखाब करता है और यूं वह अल्लाह की उस सिफत का मजहर बन जाता है जहां रहमत

गजब पर हावी है। शेख-ए अकबर बताते हैं कि माफी का दर्जा इसलिए बुलंद है क्योंकि इसमें मिटाने के बजाय बचाने की हिकमत है और यही वो मुकाम है जो अल्लाह की रहमत कामिला से सबसे ज्यादा करीब है। सुभान अल्लाह। अब शेख अकबर ने इस बाप को को हिकमते नफसिया यानी सांस की हिकमत का नाम दिया है। जी हिकमते नफसिया। अब तक हमारी बात वजूद की बका, माफी और जान

बचाने पर हो रही है। इस सबका सांस से या हजरत यूनुस अल सलाम के वाक्य से क्या ताल्लुक बनता है? इस ताल्लुक को समझने के लिए हमें सांस लेने के अमल की नोइयत पर गौर करना होगा। जरा तसवुर करें कि जब आप सांस लेते हैं तो क्या होता है? सीने में एक तंगी होती है। एक दबाव पैदा होता है ना?

जी बिल्कुल। एक घुटन सी महसूस होती है अगर रोका जाए। और फिर जब आप हवा बाहर निकालते हैं तो आपको एक कुशादगी, एक सुकून महसूस होता है। यह तंगी और कुशादगी ही जिंदगी की अलामत है। अब हजरत यूनुस अल सलाम के वाक्य को देखें। जी। जब वो मछली के पेट में गए तो वो मकाम क्या था? वो एक शदीद तंगी का मकाम था। जिसे कुरान ने जुलमात यानी अंधेरों से ताबील किया है। रात का अंधेरा, समंदर की गहराई

का अंधेरा और मछली के पेट का अंधेरा। यह एक ऐसी कैफियत थी जैसे इंसान का सांस मुकम्मल तौर पर घुट गया हो। एक ऐसा मकाम जहां बजाहिर मौत यकीनी थी। यानी एक मुकम्मल तंगी की हालत। जी। यह वो तंगी है जो किसी भी इंसान पर आ सकती है। और फिर वहां से उनकी रिहाई उनका समंदर से बाहर आना एक अजीम कुशादगी थी। हजरत यूनुस अली सलाम का यह पूरा वाकया

दरअसल एक मुकम्मल सांस की तरह है। कायनात का हर जर्रा अल्लाह के नफस रहमानी यानी उसकी रहमत के सांस से जिंदा है। तंगी के बाद जो कुशादगी आती है वो उसी रहमत इलाही का ज़हूर है। हम जब वो मछली के पेट के उस शदीद तंगी में [संगीत] थे तो उन्होंने जो दुआ मांगी थी ला इलाहा इल्ला अंता सुभान का इन कुंत मिन जालिमीन। क्या यह दुआ उस घुटन में वो सांस

थी जिसका आप जिक्र कर रहे हैं? [संगीत] बेशक बिल्कुल यही बात है। आप इस दुआ के अल्फाज पर गौर करें। तेरे सिवा [संगीत] कोई माबूद नहीं। तू पाक है। बेशक मैं ही जालिमों में से था। जब हजरत यूनुस अल सलाम ने यह दुआ मांगी तो उन्होंने जाहिरी असबाब को नहीं पुकारा। उन्होंने किसी मादी मदद की उम्मीद नहीं रखी। उन्होंने अपने वजूद की मुकम्मल कमजोरी और तंगी का एतराफ किया। और इस रब की तरफ रुजू किया जो हर कैद से

आजाद है। यह दरअसल अपने असल की तरफ वापसी का ऐलान था। शेख अकबर समझाते हैं कि जब इंसान किसी शदीद तंगी में किसी रूहानी या मादी घुटन में मुब्तला होता है और वो अपने रब की तरफ सच्चे दिल से पलटता है तो यह पलटना महज चंद अल्फाज़ की अदायगी नहीं होता बल्कि यह रूह का एक नया सांस लेना होता है। सुभान अल्लाह। उस दुआ ने हजरत यूनुस अली सलाम के लिए वह कुशादगी पैदा की जिसने

उनके मिटते हुए वजूद को एक नई जिंदगी बखश दी। यह इस बात की सबसे बड़ी दलील है कि अल्लाह की रहमत मौत और हलाकत के अंधेरों पर भी सबकत ले जाती है। यह बात बहुत वाज़ हो रही है कि सांस का जारी रहना और तंगी से निकलकर कुशादगी में आना दरअसल रहमत ही की एक शक्ल है। लेकिन अगर हर सांस एक नई जिंदगी है और वजूद का बचाया जाना ही मकसूद है तो फिर इंसान पर

मौत क्यों तारी होती है? बजाहिल तो मौत उस सांस के मुस्तकिल तौर पर टूट जाने और वजूद के बिखर जाने का नाम है। तो अगर अल्लाह की रहमत गजब पर हावी है तो [संगीत] क्या मौत उस रहमत के उसूल की नफी नहीं करती? हम मौत को कुशादगी कैसे कह सकते हैं? यह एक ऐसा मकाम है जहां हमारे आम इंसानी तस्सवुरात और शेख-ए-अकबर की बातिनी निगाह में एक वाज़ फर्क नजर आता है। हम अमूमन मौत को फना

समझते हैं। हम समझते हैं कि मौत का मतलब महदूम हो जाना या बिल्कुल खत्म हो जाना है। लेकिन शेख-ए-अकबर फरमाते हैं कि ऐसा हरगिज़ नहीं है। मौत अदम का [संगीत] नाम नहीं है। मौत महज एक तब्दीली है। सेपरेशन है। हमारे यह जो मादी जिस्म है ना यह दरअसल रूह के लिए एक लिबास की तरह है। और यह दुनियावी वजूद बहुत सी पाबंदियां और तंगियों का शिकार है। जब अल्लाह इंसान को मौत देता है तो वह उसे मिटाता नहीं है

बल्कि रूह को इस तंग खोल से आजाद करके एक वसीतर हकीकत की तरफ ले जाता है। यानी वो तंगी से कुशादगी की तरफ का सफर है। बिल्कुल जिसे हम मौत कहते हैं वो दरअसल अपने खालिक की तरफ लौटना है। एक ऐसी अगली मंजिल की तरफ जिसे दारुल बका कहा जाता है। वहां इंसान को एक नया लतीफ और मुतवाजन वजूद अता किया जाता है। जो इस दुनिया की बीमारियों और टकराव से पाक होता है। तो

मौत फना नहीं बल्कि एक तंग कमरे से निकल कर एक वसी आंगन में कदम रखने का नाम है और चूंकि खालिक सरापा रहमत है तो उसकी तरफ लौटना भी एक बहुत बड़ी रहमत है। सुभान अल्लाह। इसका मतलब यह हुआ कि जिसे हम इख्तताम समझ रहे हैं वो दरअसल एक नई और ज्यादा वसी इब्तदा है। जी बिल्कुल। लेकिन अगर मौत के जरिए हम अपने खालिक की तरफ लौटते हैं तो क्या इस आरजी दुनिया में रहते हुए उस वापसी या

अल्लाह के साथ जुड़े रहने का कोई तरीका है? शेख-ए-अकबर बार-बार जिक्र की बात करते हैं। हम भी जिक्र करते हैं, तस्बीहात पढ़ते हैं। लेकिन क्या सिर्फ जुबान से अल्फाज़ अदा कर देना, हमें वह हुजूरी या वो कुशादगी दे सकता है, जिसकी बात हजरत यूनुस अली सलाम के वाक्य में हुई। शेख-ए-अकबर जिक्र के मामले में एक इंतहाई नाजुक और गहरी हकीकत की तरफ तवज्जो दिलाते हैं। वह फरमाते हैं कि जिक्र सिर्फ जुबान

के हिलने का नाम नहीं है। एक हदीस कुदसी है जिसमें अल्लाह ताला फरमाता है कि जो मेरा जिक्र करता है मैं उसका हमनशी होता हूं। हम हमनशी होना। जी। अब जरा सोचिए अगर आप किसी बादशाह के पहलू में बैठे हो लेकिन आपका ध्यान कहीं और हो। आपकी नजरें भटक रही हो और आपके ख्यालात किसी बाजार में उलझे हो तो क्या आप वाकई उस बादशाह की हुजूरी में हैं?

Frequently asked questions

अल्लाह की तरफ से वही नाजिल हुई कि यह मुकद्दस घर उन हाथों से तामीर नहीं होगा जिन्होंने खून बहाया हो।

जब आग रूह की तमाम बीमारियों और कसाफतों को जला देती है और सजा का दौरानिया मुकम्मल हो जाता है, तो बिलिखिर गजब की वो आग भी रहमत ही में जम हो जाती है।