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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 12: Why Your Heart is Greater Than God's Own Mercy | Ibn e Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह फसूसुल हिकम के बारहवें बाप में फरमाते हैं कि एक आरिफ का दिल अल्लाह की रहमत से भी ज्यादा वसी है।
  • हजरत शोएब अली सलाम की हिकमत कलबिया और उनके नाम के मादे शोब से मुराद अकायद की अनगिनत शाखें हैं जो एक ही तने और जड़ से निकली हैं।
  • शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह खलके जदीद के तहत बयान करते हैं कि कायनात हर लम्हा फना होकर नई सूरत में दोबारा पैदा हो रही है।
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Transcript

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सोचिए कि अगर अल्लाह का अर्श और यह पूरी कायनात किसी एक जगह रख दी जाए और उस जगह को उसके बोझ का एहसास [संगीत] तक ना हो तो उस जगह की वसत का आलम क्या होगा? शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह फसूसुल हिकम के 12व बाप में फरमाते हैं यह लामतनाही वसत कहीं बाहर नहीं बल्कि एक मोमिन का दिल है। वो दिल जो महज जिस्म का उज्व नहीं बल्कि

[संगीत] इंसान का बातनी जर्फ है। आज फिक्रनामा में हम हजरत शोएब अली सलाम की हिकमत कलबिया को समझेंगे। वो हिकमत जो दिल को कायनात से भी बड़ा बना देती है। तो यहीं से बात शुरू करते हैं। शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अलह कह रहे हैं कि एक आरिफ का दिल अल्लाह की रहमत से भी ज्यादा वसी है। रहमत तो अल्लाह की सबसे बड़ी सिफात में से है। बिल्कुल। यह कैसे मुमकिन है कि इंसान का दिल जो एक

मखलूक है, वो अल्लाह की रहमत से भी ज्यादा वसी हो जाए? यह तो एक तजाद सा लगता है। आपका यह सवाल बिल्कुल फितरी है। पहली बार जब कोई यह जुमला पढ़ता है, तो जेहन में यही ख्याल आता है कि यह कैसे हो सकता है?

ये महज कोई आप कह लें शायराना बात लगती है। जी बिल्कुल। लेकिन शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अलह वो एक बहुत गहरी हकीकत की तरफ इशारा कर रहे हैं। और इस ख्याल की जो बुनियाद है वो एक बहुत मशहूर हदीस कुदसी पर है। जिसमें अल्लाह ताला फरमाता है ना मेरी जमीन मुझको समा सकी और ना मेरा आसमान। लेकिन मेरे मोमिन बंदे का दिल मुझको समा गया। लेकिन यहां दिल का क्या मतलब है? जाहिर है

यह सीने में धड़कने वाले गोश्त के टुकड़े की बात तो नहीं हो रही? बिल्कुल नहीं। यहां कलब से मुराद इंसान का शोरी मरकज है। उसकी बातनी हकीकत। वो जगह जहां इदराक होता है। जहां एहसास जन्म लेता है। जहां मारफत उतरती है। एक जर्फ की तरह। एक जर्फ की तरह। बिल्कुल। वो बर्तन है जो हकायक को कबूल करता [संगीत] है। अब आपके सवाल पर वापस आते हैं कि यह रहमत से

ज्यादा वसी कैसे हो सकता है? इसे समझने के लिए जात और सिफात का फर्क समझना जरूरी है। ठीक है? रहमत जो है वह अल्लाह की एक सिफत है। एक एट्रिब्यूट है। यह उसका एक जुहूर है। एक तजल्ली है। जैसे सूरज की रोशनी उसकी एक सिफत है। रोशनी बहुत वसी है। पूरी दुनिया को घेर लेती है। लेकिन वो पूरा सूरज तो नहीं है। है ना?

नहीं बिल्कुल नहीं। दिल शेख अकबर रहमतुल्लाह अल के नजदीक वो मकाम है जो अल्लाह की किसी एक सिफत को नहीं बल्कि खुद अल्लाह की जात यानी एसेंस को कुबूल करने की सलाहियत रखता है। अच्छा तो सिफात महदूद हैं क्योंकि वो किसी एक पहलू को जाहिर करती हैं। रहमत, कहर, इल्म, कुदरत। लेकिन जात लाहदूद है। इसलिए वो बर्तन जो जात को कुबूल करने के लिए बनाया गया है, उसकी वसत किसी भी एक सिफ्त की वसत

से लामहाला ज्यादा ही होगी। वाह! यानी रहमत एक लहर की तरह है और दिल वो समंदर है जो इस लहर को अपने अंदर रखता है। बहुत खूबसूरत कहा आपने। अच्छा तो अगर यह दिल इतना वसी है तो क्या यह एक खाली जगह की तरह है या इसके अंदर कुछ होता भी है?

यह दिल खाली नहीं रहता बल्कि मुसलसल बदलता रहता है। अरबी जुबान में कल्प का जो लफ्जी मादा है वह तकक्ल्लुब है। जिसका मतलब ही है पलटना बदलना। एक हालत से दूसरी [संगीत] हालत में जाना। इसीलिए कहा जाता है कि आरिफ का दिल किसी एक कैफियत पर ठहरता नहीं है। वह हर लम्हा एक नई इलाही तजल्ली यानी अल्लाह के एक नए जुहूर को कबूल कर रहा होता है। और जिस तरह की तजल्ली उस पर [संगीत] होती है, दिल उसी की शक्ल

इख्तियार कर लेता है। इसकी कोई मिसाल दे सकते हैं? शेख अकबर रहमतुल्लाह अल खुद एक बहुत हिस्सी मिसाल देते हैं। वह फरमाते हैं कि आरिफ का दिल एक साफ नरम मोम की तरह है जिस पर मोहर लगाई जा रही है। अगर मोहर गोल है तो मोम पर निशान भी गोल बनेगा। अगर मोहर चौकोर है तो निशान भी चौकोर होगा। यानी [संगीत] जिस लम्हे जो तजल्ली दिल पर वारिद होती है,

दिल मुकम्मल तौर पर उसी तजल्ली [संगीत] की सूरत बन जाता है। उस लम्हे उसमें उस तजल्ली के अलावा और कुछ बाकी नहीं रहता। ठीक है। लेकिन इससे एक और सवाल पैदा होता है। अगर दिल हर तजल्ली के साथ बदल जाता है तो इसका मतलब है कि एक आरिफ की कोई मुस्तकिल शख्सियत नहीं होती? क्या वह एक लम्हे में कुछ और अगले लम्हे में कुछ और होता है? यह तो एक तरह से बड़ा गैर

मुस्तहकिम अनस्टेबल लगता है। यह एक बहुत गहरा नुक्ता है और आमतौर पर लोग इस मुकाम पर आकर उलझ जाते हैं। हम शख्सियत को एक ठोस मुस्तकिल चीज समझते हैं। शेख-ए-अकबर रहमतुल्लाह अलह के नजदीक यह अदम इस्तेहकाम नहीं बल्कि कमाल की लचक और जिंदगी की अलामत है। अच्छा। यह शख्सियत का मिटना नहीं बल्कि शख्सियत का इतना वसी हो जाना है कि वह हर

हकीकत को बगैर किसी मुजाहमत के कुूल कर सके। लेकिन यहां एक बहुत ही बारीक बात है जो आम सूफियाना तसवुर से मुख्तलिफ है। वो क्या? आमतौर पर हम सुनते हैं कि अल्लाह की तजल्ली बंदे की इस्तेदाद या सलाहियत के मुताबिक होती है। यानी जैसा आपका बर्तन है वैसा ही उसमें पानी आएगा। जी। छोटा बर्तन है तो कम पानी, बड़ा है तो ज्यादा। बिल्कुल।

लेकिन शेख अकबर रहमतुल्लाह अल उस मामले को उलट देते हैं। वो फरमाते हैं कि मामला इसके बरक्स है। बंदा अल्लाह पर उस सूरत में जाहिर होता है जिस सूरत में अल्लाह खुद उस पर तजल्ली फरमाता है। अच्छा। वो इसकी वजाहत दो तरह की तजल्लियात से करते हैं। पहली है तजल्ली गैब। यह जात की वो [संगीत] तजल्ली है जिसे हम महसूस नहीं कर सकते। लेकिन यही वो तजल्ली है जो दिल

में इस्तेहदाद और कबूल करने की सलाहियत पैदा करती है। ठीक है? और दूसरी है तजल्ली-ए शहूद। यह वो तजल्ली है जिसे दिल अपनी उसी इस्तेहदाद की सूरत में देखता और पहचानता है। अच्छा अगर दिल इतना डायनामिक है, हर लम्हा बदल रहा है, नई तजलियात को कुबूल कर रहा है, तो फिर एक जामिद ठोस अकीदे की क्या हैसियत रह जाती है। बिल्कुल। जो लोग कहते हैं कि बस यही एक सच है और

बाकी सब गलत। उनके बारे में क्या आपने इस गुफ्तगू के मरकजी नुक्ते को पकड़ लिया है। इसीलिए शेख अकबर रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि यह याद दिहानी उन लोगों के लिए जिनके पास दिल है। दिल है। जी वो यह नहीं कहते कि जिनके पास अकल है। क्योंकि अकल और कलब का काम बिल्कुल मुख्तलिफ है। वो कैसे?

अरबी में अकल का मादा अकयाल से निकला है। अकयाल वो रस्सी होती है [संगीत] जिससे ऊंट के घुटने को बांधा जाता है। ताकि वह भाग ना जाए। तो अकल का काम ही चीजों को एक तारीफ में एक दायरे में बांधना [संगीत] है। ताकि वह हमारी समझ से बाहर ना निकल जाए। जैसे हम कहते हैं पानी गीला होता है। यह अकल का फैसला है। एक तारीफ है। सही। लेकिन एक आरिफ शायद कहे कि पानी तो

तवानाई की एक शक्ल है या बादल बनकर हवा है या बर्फ बनकर ठोस है। अकल एक ही शक्ल पर इसरार करती है। वो हकीकत को कैद करना चाहती है। जबकि कलब जैसा हमने देखा हकीकत के साथ-साथ बदलने और वसी होने के लिए बना है। तो क्या शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह यह कह रहे हैं कि अकीदा रखना या अकल का इस्तेमाल करना गलत है? यह एक बहुत आम गलतफहमी है। वो अकल के खिलाफ नहीं है। वो अकल को उसकी

हद में रखने की बात कर रहे हैं। अच्छा। वो अकीदे के खिलाफ नहीं बल्कि एक अकीदे में कैद हो जाने के खिलाफ है। वो इसे अकायद का खुदा कहते हैं। इलाहल मोतकादात इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हर शख्स हर गुरोह अपने जेहन में खुदा का एक तसवुर बनाता है जो उसके अकायद उसकी नफसियात और उसकी तरबियत के मुताबिक होता है और फिर वो उसी तसवुर की इबादत करता है हम

और जब वो किसी दूसरे शख्स को देखता है जिसका तसवुर खुदा उससे मुख्तलिफ है तो वो उसका इंकार कर देता है वो कहता है कि मेरा खुदा सच्चा है और तुम्हारा झूठा जी जबकि आरिफ वो है जो जानता है कि अल्लाह इन तमाम तसवुरात से मावरा है। वो हर अकीदे, हर सूरत और हर मजहब में उसी एक हकीकत को पहचानता है। क्योंकि उसका दिल किसी एक

शक्ल में कैद नहीं होता। वो कुरान की उस आयत के माना को जीता है। फ्लू फस समज्लाह यानी तुम जिधर भी रुख करो वहीं अल्लाह का चेहरा है। उसके लिए कोई एक सिम कोई एक अकीदा कोई एक रास्ता मखसूस नहीं। अच्छा। [संगीत] लेकिन फसूसुल हिकम में हर हिकमत किसी नबी से मनसूब है। शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अलह ने दिल की इस मुसलसिल तब्दीली, वसत और

अकायद से बालातर हकीकत को हजरत शोएब अल सलाम के साथ ही क्यों जोड़ा? उनकी शख्सियत में ऐसी क्या खास बात थी? यह बहुत लतीफ इशारा है। हजरत शोएब अल सलाम के नाम में शोब का मादा है। शोब जी। अरबी में शॉप का मतलब होता है शाख दर शाख होना, फूटना जिसे अंग्रेजी में ब्रांचिंग आउट कहते हैं। जैसे दरख्त की शाखें। बिल्कुल। जैसे एक दरख्त से कई शाखें

निकलती हैं। यह अकायद की अनगिनत शाखों की तरफ इशारा है। हर अकीदा, हर नजरिया, हर मजहब हकीकत के दरख्त की एक शाख है। महदूद अक्कल वाला इंसान सिर्फ अपनी शाख को ही पूरा दरख्त समझता है और बाकी शाखों का इंकार करता है। जबकि आरिफ जिसका दिल वसी है, वह जानता है कि यह तमाम शाखें एक ही तने और एक ही जड़ से निकली हैं। वह कसरत में वाद को देखता है। यानी मुख्तलिफ

रास्ते जो बजाहिर अलग-अलग समतों में जा रहे हैं। लेकिन उन सबका मनबा एक ही है। और जब पर्दा हट पाए तो हकीकत शायद इन तमाम अकायद और शाखों से मुख्तलिफ हो। जैसा कि कुरान में है वदा मिनल्लाह मालम यकु यतसबून यानी और उन पर अल्लाह की तरफ से वो कुछ जाहिर होगा जिसका वो गुमान भी नहीं करते थे। बिल्कुल।

और इसकी सबसे गहरी वजह कायनात का वो अजीम राज है जिसे शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह खलके जदीद यानी नई तखलीक कहते हैं। खलके जदीद यह क्या है? वो फरमाते हैं कि यह कायनात और इसमें मौजूद हर शय साके नहीं है। यह हर लम्हा हर सांस हर आन में फना होकर एक नई सूरत में दोबारा पैदा हो रही है। हर लम्हे

हर लम्हे हमें यह तब्दीली महसूस नहीं होती क्योंकि हर नई सूरत पिछली सूरत से इतनी मिलती जुलती होती है कि हमें तसलसुल का गुमान होता है। अच्छा। जैसे फिल्म की पट्टी पर हजारों साकिन तस्वीरें होती हैं। लेकिन जब उन्हें तेजी से चलाया जाता है तो हरकत का एहसास होता है। है ना?

जी जी। कायनात भी ऐसी ही है। इसलिए अल्लाह की तजल्ली कभी खुद को दोहराती नहीं। ला तकरार फित तजल्ली हकीकत हमेशा नई ताजा और जिंदा रहती है और दिल इसी मुसलसल नई तजल्ली को कुबूल करने के लिए बनाया गया है। अगर कायनात और उसमें मौजूद हर चीज बिशमूल मेरे हर लम्हा फनाह होकर दोबारा पैदा हो रही है तो फिर मैं कौन हूं? क्या वह शख्स

जिसने यह गुफ्तगू शुरू की थी, अभी वजूद रखता है? उसका हमारी जिंदगी, हमारी शनाख्त, हमारी याददाश्त, यहां तक कि माज़ी के पछतावों पर क्या असर पड़ता है? आपने बिल्कुल दुरुस्त सवालात उठाए हैं। यही वह मुकाम है जहां यह फलसफा हमारी जिंदगी से जुड़ता है। इस नजरिए के मुताबिक हमारी शनाख्त कोई ठोस मुस्तकिल चीज नहीं बल्कि एक पैटर्न है जो हर लम्हे ताजा हो रहा है।

मैं एक दरिया की तरह हूं जो हर लम्हे बह रहा है लेकिन उसका नाम वही रहता है। इससे माजी के बोझ से आजादी मिलती है। पछतावा इसलिए नहीं कि मैंने माजी में कुछ गलत किया था क्योंकि वह मैं अब वजूद ही नहीं रखता बल्कि इस अजम के लिए है कि तखलीक के अगले लम्हे में इस पैटर्न को बेहतर बनाया जाए। यह तो मुकम्मल तौर पर हाल में जीने की दावत है। बिल्कुल। यह हमें बताता है कि तब्दीली ही

कायनात की वाहिद मुस्तकिल हकीकत है। तो इस सारे गुफ्तगू का खुलासा यह है कि दिल एक ऐसी लामहदूद सलाहियत का नाम है जो हर लम्हे नई इलाही तजल्ली को कुबूल करने के लिए तैयार रहता है और ऐसा करने के लिए उसे अक्ल के बनाए हुए महदूद अकायद के पिंजरों को तोड़ना पड़ता है। जी बिल्कुल शेख-ए अकबर इबने अरबी

Frequently asked questions

खलके जदीद का मतलब है कि कायनात और उसमें मौजूद हर शय साकित नहीं है, बल्कि हर लम्हा हर सांस में फना होकर एक नई सूरत में दोबारा पैदा हो रही है।