Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Ibn e Rushd Meets Shaykh e Akbar | “Han” Aur “Nahi” Ka Muqalma | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- अंदुलुस के शहर कुर्तबा में फलसफी इब्ने रुश्त और एक नौजवान सूफी शेख-ए अकबर के दरमियान एक तारीख मुकालमा हुआ।
- शेख-ए अकबर ने इब्ने रुश्त के सवाल के जवाब में हां और नहीं कहा और समझाया कि अक्ल की अपनी एक फितरी हद है।
- इब्ने रुश्त ने शेख-ए अकबर के जवाब को सुनकर एक बावकार एतराफ किया क्योंकि मुशाहदे की वुसत में अक्ल का दाखिला ममनू है।

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Transcript
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जरा तसवुर कीजिए। अंदुलुस की सरजमी 12वीं सदी का कुर्तबा और दो ऐसी शख्सियत जिनके दरमियान होने वाला एक मुख्तसर मुकालमा तारीख फिक्र का एक अनोखा बाप बन गया। एक तरफ इबने रुश्त अपने जमाने के अजीम फलसफी व मंतकदान अरस्तु के इशारे और अक्ल के सबसे बड़े नुमाइंदे और दूसरी तरफ एक नौजवान मोहम्मद इबने अरबी जिन्हें दुनिया बाद में शेख अकबर के नाम
से जानेगी। रिवायत है कि जब यह मुलाकात हुई तो इबने रुश्त एक सवाल के मुंतजिर थे। वह यह जानना चाहते थे कि क्या [संगीत] कश यानी वह मारफत जो इंसान पर बाततिन में मुनकशिफ़ होती है, उसी हकीकत तक पहुंचती है जहां अक्ल और फलसफा पहुंचने की कोशिश करते हैं। मगर शेख-ए अकबर का जवाब इस कदर मुख्तसर और अमीक था कि इबने रुद्त जैसे फलसफी के लिए
भी वो एक नई हैरत बन गया। आपने फरमाया हां और नहीं। और फिर फरमाया इस हां और ना के दरमियान रूहें अपने मादे से और गर्दनें अपने जिस्मों से उड़ जाती हैं। मगर आखिर ऐसा क्या था इस मुख्तसर जुमले में? क्या शेख-ए अकबर अकल की नफी कर रहे थे या वो अकल की एक हद बयान कर रहे थे। आज की इस गुफ्तगू में हम शेख अकबर और इबने रुद के दरमियान होने वाली इस नादिर
मुलाकात को समझने की कोशिश करेंगे। जहां अक्ल, फलसफा, कशफ और हकीकत एक लम्हे के लिए आमने-सामने आ खड़े होते हैं। आइए आगाज करते हैं। तो अगर हम इस पूरे मंजर को और इसकी गहराई को समझना चाहें तो हमें इब्तदा कहां से करनी चाहिए?
देखिए इस मंजर की यानी इसकी असल हैबत को महसूस करने के लिए जरूरी है कि हम खुद को जरा उस 12वीं सदी के इल्मी माहौल में ले जाएं। जी कुर्तुबा के माहौल में बिल्कुल। कुर्तबा उस वक्त महज कोई ईंट और पत्थर का शहर नहीं था। वो तो इंसानी सोच, मंतिक और और फलसफे का एक धड़कता हुआ मरकज था। और इब्ने रुद उस
इल्मी कहकशा के सबसे रोशन सितारे थे। वह एक ऐसी उम्र और एक ऐसे मकाम पर थे जहां इंसान की सोच यानी उसकी पुख्तगी अपनी आखिरी हदों को छू रही होती है। उनका कामिल यकीन था कि इंसान का जहन उसकी मंतिक कायनात के हर राज को खोल सकती है। मतलब उनके नजदीक अक्ल ही वो वाहिद सीढ़ी थी जो इंसान को हकीकत मुतलक तक ले जा सकती थी।
सही कहा आपने। लेकिन फिर उसी इल्मी दरबार में एक नौजवान दाखिल होता है। शेख-ए-अकबर जिनकी उम्र तो कम थी मगर उनका बात पूरी तरह रोशन हो चुका था। और हैरत की बात यह है कि इबने रुक जैसा बुजुर्ग और मशहूर फलसफी वो इस नौजवान सूफी का तजस्स के साथ मंतजिर था। यही तो इस मुलाकात को एक एक तारीखी इस्तियारा बनाता है। जब अक्ल अपनी इंतहा पर पहुंचती है ना
तो वह किसी अनदेखे सच की तस्दीक चाहती है। और इब्न रुश्त का बुनियादी सवाल भी यही था। वही सवाल कि क्या अक्ल और कशफ एक ही मंजिल पर पहुंचते हैं? लेकिन इससे पहले कि हम शेख-ए अकबर के जवाब की तरफ जाएं। हम इन दोनों लफ्जों को थोड़ा सादा कर लें। जी यह बहुत जरूरी है क्योंकि इन दोनों रास्तों का फर्क समझना ही हमारी इस गुफ्तगू की बुनियाद है।
तो अक्ल को तो हम समझ गए कि तसवुरात बनाने का नाम है ज़हन में खाका बनाने का। लेकिन यह कश क्या है? देखें [संगीत] कशफ का सीधा सा मतलब है पर्दे का हट जाना। बातनी मुशाहदा। कश में इंसान का जहन कोई दलाइल नहीं बनाता और और ना ही कोई खाका तराशता है। आप इसे यूं समझें कि अकल चीजों को हिस्सों में बांट कर समझती है। वो कायनात को मापती है,
तोलती है जबकि कश वो आपको अचानक मंजिल के ऐन वस्त में ला खड़ा करता है। एक तसवुराती फहम है और दूसरा बराहेरा मुशायदा। तो अगर मंतकी तौर पर देखा जाए तो दोनों का हदफ तो एक ही हकीकत की तलाश हुआ। लेकिन जब शेख-ए-अकबर से पूछा गया कि क्या दोनों एक ही मंजिल तक पहुंचते हैं? तो उन्होंने कहा, हां और नहीं। जी। बजाहिर यह तजा जरूर लगता है मगर दर
हकीकत यह इंसानी [संगीत] शूर की सबसे गहरी वजाहत है। जब शेख-ए अकबर ने हां कहा तो उसका मतलब यही था कि बेशक नियत और सिमत एक ही है। सही। दोनों सच्चाई खोज रहे हैं। जी। लेकिन जब उन्होंने नहीं कहा ना तो वह दरअसल अक्ल की खामी नहीं बल्कि उसकी एक फितरी हद की तरफ इशारा कर रहे थे। अगर आप अरबी जुबान में लफ्ज अक्ल के माध्य पर गौर करें तो उसका मतलब क्या है?
मैंने सुना है कि उसका ताल्लुक बांधने या कैद करने से है। बिल्कुल सही। बांधना, कैद करना या किसी चीज के गिर्द दायरा खींचना। सही। अक्ल हमेशा किसी भी हकीकत को एक तसवुर के अंदर कैद करके ही समझ सकती है। अक्ल के लिए जरूरी है कि वह चीजों को एक हद दे। वरना वो उसे समझ ही नहीं सकती। लेकिन क्या इस तरह कैद करना कोई बुरी बात है? हम रोजमर्रा की जिंदगी में चीजों को उनकी हुदूद और तारीफों से ही तो पहचानते हैं।
हम बिल्कुल। तो फिर हकीकत को तसवुरात में बांधने की इस कोशिश को मुस्तरद क्यों किया जा रहा है? यही वो बारीक फर्क है जिसे महसूस करना जरूरी है। शेख-ए-अकबर अक्ल और उलूम को हरगिज़ हरगिज़ मुस्तरद नहीं कर रहे। रोजमर्राह की दुनिया को समझने के लिए अक्ल एक अज़म नेमत है। मसला उस वक्त पैदा होता है जब यही महदूद अक्ल उस लामहदूद हकीकत मुतलक को यानी अल्लाह रब्बुल इज्जत की जात
को अपने बनाए हुए पैमानों में कैद करने की कोशिश करती है। हम लामहदूद को महदूद में लाने की कोशिश। जी। हकीकत मुतलक को किसी सांचे में नहीं डाला जा सकता। वो इतनी वसी और यक्ता है कि जब अक्ल उसे समझने के लिए उसका तसवुर बनाती है ना तो वो हकीकत का सिर्फ एक इंतहाई छोटा और महदूद रुख होता है। जैसे समंदर को एक छोटे से प्याले में भरने की कोशिश करना।
बिल्कुल दुरुस्त। शेख अकबर का नहीं दरअसल इस बात का ऐलान था कि तुम जिस हस्ती को जानना चाहते हो वो तुम्हारे तसवुरात की रस्सियों में कभी नहीं बन सकती। सही। इसका मतलब है कि अक्ल हकीकत मुतलक को नहीं सिर्फ अपने बनाए हुए एक खाके को समझ रही होती है। जी और शायद इसीलिए शेख अकबर ने अपना वो दूसरा और कहीं ज्यादा पुर असरार जुमला इरशाद
फरमाया कि इस हां और ना के दरमियान रूहें अपने मादे से उड़ जाती हैं। जी। तो यह जो परवाज है क्या इससे मुराद कोई जिस्मानी मौत है या यह शूर की कोई कैफियत है? क्योंकि इन दोनों के दरमियान आखिर यह कौन सी वादी है?
इसका ताल्लुक जिस्मानी मौत से नहीं है। यह शूर का एक इंतहाई लतीफ सफर है। इसे समझने के लिए हमें सूफियाना फिक्र की तीन बुनियादी कैफियात को देखना होगा। और इस सफर की पहली सीढ़ी है हैरत। शेख अकबर के नजदीक हैरत वो अजीम मकाम है जहां इंसान की अकल को पहली बार अपनी बेबसी का एहसास होता है। मतलब जब इस्तदलाल और मंतिक के सारे रास्ते
खत्म हो जाए। जी जब अकल यह देख लेती है कि हकीकत इतनी वसी है कि वो उसे किसी तस्सवुर में नहीं बांध सकती तो अकल खामोश हो जाती है। यह अकल की शिकस्त नहीं यह इसका वो मकाम है जहां वो हकीकत के जलाल के सामने सजदा रेज हो जाती है। सुभान अल्लाह हैरत अकल का सजदा है। और क्या यही वो नुक्ता है जहां से इस कैफियत का आगाज होता है जिसे जिसे तसवुफ [संगीत]
में फना कहा जाता है। बिल्कुल क्योंकि जब अकल काम करना छोड़ दे तो फना का मरहला आता है और फना दरअसल तबई तौर पर मिट जाने का नाम नहीं है। यह उस वहम के टूट जाने का नाम है कि हमारी अपनी कोई अलग हैसियत है। जब हैरत तारी होती है और कशफ के जरिए हक ताला की रोशनी दिल पर पड़ती है तो देखने वाले का अपना एहसास बाकी नहीं रहता। यानी वह रोशनी में जम हो जाता है।
इसे यूं समझें जैसे रात के वक्त चिराग की रोशनी बहुत वाज़ होती है। लेकिन जब सूरज पूरी आबोताब [संगीत] से निकल आए तो क्या चिराग बुझ जाता है? नहीं वो वहीं रहता है। जी। मगर सूरज की बेपनाह रोशनी में उसकी अपनी रोशनी फनाह हो जाती है। उसका अपना एहसास मिट जाता है। इसी कैफियत में रूह मादे से परवाज करके एक नए मकाम में दाखिल
होती है जिसे बरजख कहा जाता है। यह लफ्ज बरजख हमने अक्सर सुना है। लेकिन उमूमन उसे मौत के बाद वाली कैफियत के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यहां बरजख का क्या मतलब है? तस्सवुफ के इस्तलाह में बरजख एक इंतहाई वसी दरमियानी कैफियत है। यह दो मुख्तलिफ हकीकतों के मिलने की जगह है। जैसे दिन और रात के दरमियान की शाम जो ना पूरी तरह दिन है और ना रात। अच्छा एक दरमियानी पुल।
जी। यहां बरजख से मुराद मादी दुनिया यानी अक्ल की दुनिया और रूहानी दुनिया यानी मुशाहदे की दुनिया के दरमियान का पुल है। जब रूह यहां होती है तो सारे पर्दे उठ जाते हैं। लेकिन जब इंसान इस बरजख में खड़ा होकर हकीकत का मुशाहदा करता है तो उसके पास क्या सबूत है कि यह कोई वहम नहीं। मेरा मतलब है अकल के पास तो हर बात की दलील होती है। बातन के इस तजुर्बे उस मुशाहदे
की सच्चाई को कैसे परखा जाए? यह सवाल हर मंतकी जेहन में पैदा होता है और इसी के जवाब में सूफियाना रिवायत एक इंतहाई खूबसूरत इस्तिला लाती है जिसे ज़क या तजव्वुक कहा जाता है। तजवुक यानी चखना। जी चखना। हम इसे अकल के दलाइल से नहीं परख सकते क्योंकि अक्ल सिर्फ मालूमात देती है जबकि कश तजुर्बा देता है। एक रिवायती मिसाल से समझें। फर्ज करें आपके सामने प्याले में खालिस शहद रखा है।
जी। अब अकल क्या करेगी? वह उस शहद को देखकर उसकी कीमियाई साख्त बता देगी। उसकी मिठास की पूरी तारीख बयान कर देगी। मतलब वो शहद के बारे में सब कुछ जान लेगी। बिल्कुल। मगर क्या अकल आपको यह बता सकती है कि शहद की मिठास का असल एहसास क्या है?
नहीं वो तो चखने से ही पता चलेगा। यही बात है। मिठास की हकीकत जानने का एक ही तरीका है शहद का एक कतरा जुबान पर रखना। और जब आप उसे चख लेते हैं तो क्या आपको किसी [संगीत] दलील या मंतिक की जरूरत रहती है? बिल्कुल नहीं वो चखना खुद ही सबसे बड़ी दलील बन जाता है। [संगीत] यही कश और तसव्वुख है। हकीकत को तसवुरात में पढ़ने के बजाय [संगीत] बाततिन की आंख
से चख लेना। और जब इंसान चख लेता है ना तो उसका यकीन किसी भी मंतकी दलील से करोड़हा दर्जे मजबूत हो जाता है। यह शहद की मिसाल से तो अक्ल और कशफ का फर्क मुकम्मल तौर पर वाज़ हो गया। तो अगर हम वापस उस मुलाकात की तरफ लौटें जब शेख-ए अकबर ने यह जवाब दिया तो इबने रुशद का रद्दे अमल क्या था?
रिवायत बताती है कि यह सुनकर इब्ने रुद का चेहरा जर्द पड़ गया था। वो लरस गए थे और बेसाख्ता उन्होंने ला हौला वला कुता इल्ला बिल्लाह पढ़ा और बैठ गए। तो क्या एक आम ज़हन इसे इस तरह देखे के कि एक अजीम फिलॉसफर ने अपनी शिकस्त तस्लीम कर ली। क्या तसवुफ ने फलसफे को नीचा दिखा दिया? नहीं बिल्कुल नहीं। इस वाक्य को हार या जीत के पैमाने पर देखना बहुत बड़ी
ज्यादती होगी। यह लम्हा शिकस्त का नहीं था बल्कि यह एक बेपनाह एहतराम और हकीकत के एतराफ का लम्हा था। एक बावकार एतराफ। जी। इब्ने रुद की अक्ल इंतहाई रोशन थी। जब शेख-ए-अकबर ने अक्ल की हद को बेनकाब किया तो उनकी दयानतदारी ने फौरन इस सच्चाई को पहचान लिया। यानी वो समझ गए कि मुशाहदे की
वो वुसत है जहां अक्ल का दाखिला ममनू है। बिल्कुल उनका लज़ना उस जलाल का असर था जो हकीकत मुतलक की हैबत से पैदा होता है। उनका वो कलमा पढ़ना उस बात का एतराफ था कि अल्लाह की जात के सामने इंसान की अपनी अक्ल और मंतिक आजादाना तौर पर खड़ी नहीं हो सकती। यह किसी फिलॉसफी की तजलील नहीं थी। यह तो एक अजीम जहन का एतराफ था कि एक हद ऐसी
जरूर आती है जहां इंसान को अपने अकली तसव्वरात एक तरफ रखकर सजदे में गिरना पड़ता है। जी बिल्कुल ऐसा ही है। तो गोया यह कोई फलसफा बा मुकाबला तसवुफ की जंग नहीं थी। यह इस्तदलाल और मुशाहदे का एक इंतहाई पुरकार मुकालमा था। इंसानी अक्कल कायनात पर गौर करने के लिए यकीनन एक लाजमी और मोहतरम शय है।