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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

Fusus al-Hikam Part 5: The Deepest Secrets of Prophethood of Hazrat Ibrahim | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • हजरत इब्राहिम को खलील उल्लाह कहा गया है और इस लफ्ज की बुनियाद खुल्लत पर है जिसका अर्थ किसी चीज का दूसरी में पूरी तरह रच बस जाना या सरायत कर जाना है।
  • शेख अकबर इब्ने अरबी के नजदीक यह सरायत दो तरफा है जिसमें हजरत इब्राहिम अल्लाह की सिफात में सिरायत कर गए और हक ताला भी वजूद इब्राहिमी की सूरत में जलवाघर हुआ।
  • हिकमते हयाम वह शदीद मोहब्बत और बेखुदी की कैफियत है जो खुल्लत और गहरी सरायत के इदराक से पैदा होती है जहां आशिक और माशूक की जाहिरी सरहदें पिघल जाती हैं।

Key moments

  1. हजरत इब्राहिम अल सलाम का यह लकब खलील इसकी बुनियाद खुल्लत पर…
  2. होता है। वह सिफात जो वक्त के साथ पैदा होती हैं यानी…
  3. जरिए। यानी हमारे अंदर जो अजली इस्तेदाद होती है, जो हमारी ऐन…
  4. जलाल और फना का मकाम है। इसी बाहमी ताल्लुक और सिरायत को…
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Transcript

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हजरत इब्राहिम अल सलाम का यह लकब खलील इसकी बुनियाद खुल्लत पर है। इसी मुकाम खुल्लत की वजह से उन्हें खलील उल्लाह कहा गया है। हिकमते हियाम यह हयाम क्या चीज है और इसका इस खुल्लत से क्या ताल्लुक बनता है?

अगर हक ताला मखलूक की सूरत में सरायत करता है तो क्या उसका मतलब यह है कि वह उन सिफात [संगीत] के साथ भी जाहिर होता है जिन्हें हम नुक्स या कमजोरी समझते हैं? अलूहियत [संगीत] यानी खुदा का खुदा होना वो भी मखलूक के ताल्लुक से ही है। आयाने साबिता जरा इसको और वाज़ करेंगे। बस मैं उसी की हमद करता हूं और वो मेरी हमद करता

है। मैं उसी [संगीत] की इबादत करता हूं और वो मेरी इबादत करता है। यह इसी हैरतंगेज मकाम खुल्लत और हयाम की अक्कासी है। बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर रहीम। फिक्रनामा में खुशामदीद। जहां हम अक्ल के दरवाजे से दाखिल होकर रूह के राज

तलाश करते हैं। आज हम फुसूसुल हिकम के उस बाब में दाखिल हो रहे हैं जिसे शेख अकबर इबने अरबी हिकमत हयाम कहते हैं। यानी वो इश्क जो इंसान की शनाख्त को बदल देता है। हजरत इब्राहिम को खलील उल्लाह कहा गया है। आम तफसीर कहती है कि यह दोस्ती है। लेकिन इब्ने अरबी फरमाते हैं कि यह दोस्ती नहीं खुल्लत है। और खुल्लत का मतलब है सरायत

जैसे रंग कपड़े के रेशों में उतर जाए। यह वह मुकाम है जहां खालिक मखलूक में जाहिर होता है और मखलूक खालिक के औसाफ से जलवा। चलें इस दरवाजे पर दस्तक देते हैं। जी बिल्कुल। हजरत इब्राहिम अल सलाम का यह लकब खलील इसकी बुनियाद जैसे आपने फरमाया खुल्लत पर है और यह समझना बहुत जरूरी है कि यह आम दोस्ती वाला मामला नहीं है। देखें शेख अकबर हमें तवज्जो दिलाते हैं कि

यह लफ्ज निकला है तखल्लुल से। तखल्लुल का मतलब है किसी चीज का दूसरी में पूरी तरह आप कहिए रच बस जाना। सिरायत कर जाना। ओ जैसे कोई चीज दूसरी में मुकम्मल तौर पर घुलमिल जाए। बिल्कुल बिल्कुल यही बात है। शेख अकबर के नजदीक हजरत इब्राहिम खलील इसलिए हैं कि वो अल्लाह ताला की सिफात में आप कहिए पूरी तरह सिरायत कर गए। उन्होंने

अल्लाह के तमाम अस्मा वो सिफात को अपने वजूद में ऐसे जज्ब कर लिया कि गोया वो खुद उन सिफात का मजहर बन गए। यह तो इश्क की एक बिल्कुल नई तारीफ हुई। आमतौर पर तो हम इश्क को एक जज्बा समझते हैं। यहां आप कह रहे हैं कि इश्क एक वजूदी कैफियत है। एक सिरायत जी हां, यह महज जज्बा नहीं, यह एक वजूदी हकीकत है। एक वजूद का दूसरे में उतर जाना।

शेख अकबर खुद इस खुल्लत को समझाने के लिए रंग और कपड़े की मिसाल इस्तेमाल करते हैं। वह फरमाते हैं जब रंग कपड़े में उतरता है ना तो वह उसके हर रेशे में पहुंच जाता है। वो कपड़े की असल जात यानी जौहर तो नहीं बनता लेकिन एक ऐसी सिफत बन जाता है जो उससे जुदा नहीं हो सकती। यह ऐसा नहीं कि जैसे पानी गिलास में रखा है। वो तो अलग है। यह तो ऐसे है जैसे रंग ही कपड़ा बन

गया हो। रंग और कपड़े को आप अलग नहीं कर सकते फिर। वाह! इसका मतलब तो यह हुआ कि आशिक और महबूब की पहचान में दो ही बाकी नहीं रहती। लेकिन यह खुल्लत, यह सरायत क्या यह सिर्फ एक तरफ से होती है? यानी बंदा हक में सरायत करता है?

नहीं। यहीं पर शेख अकबर एक बहुत ही अहम और गहरा नुक्ता बयान करते हैं। वो फरमाते हैं कि यह सरायत दो तरफ है। एक तरफ तो यह है कि हजरत इब्राहिम अल्लाह की सिफात में सिरायत कर गए। उनको अपने अंदर जमा कर लिया। लेकिन दूसरी तरफ हक ताला भी वजूद इब्राहिमी की सूरत में अब कहें जलवाघर हुआ। उसमें सिरायत कर गया। यह दोनों पहलू दुरुस्त हैं और लाजिम और मलजूम है।

यह दो तरफ़ा सिरायत का तसवुर तो बड़ा इंकलाबी सा है। अगर हक ताला मखलूक की सूरत में सरायत करता है तो क्या उसका मतलब यह है कि वो उन सिफात के साथ भी जाहिर होता है जिन्हें हम नुक्स या कमजोरी समझते हैं। यह बात समझना थोड़ा मुश्किल है। जी यह नुक्ता वाकई दक है और शेख अकबर उसको पूरी वजाहत से लाते हैं। उनके नजदीक हक ताला मखलूकात की तमाम सिफात के साथ जाहिर

होता है। वह सिफात जो वक्त के साथ पैदा होती हैं यानी हादिस सिफात। यहां तक कि वो सिफात भी जिन्हें आम तौर पर काबिल मजम्मत समझा जाता है। यानी नुक्स वाली सिफात भी जी। वो फरमाते हैं कि हक ताला खुद अपनी किताब में कुरान में बाज ऐसी सिफात अपनी तरफ मंसूब करता है। यह दरअसल उसके कमाल एहाता और उसकी शान बेनियाजी की दलील है कि वो हर सूरत में जाहिर हो सकता है।

और इसके मुकाबिल मखलूक का मामला क्या है? मखलूक अपनी असल हकीकत में ओवल से आखिर तक हक ताला की ही सिफात का मजहर है। वो तमाम सिफाते कमाल जो हम अल्लाह से मंसूब करते हैं सुनना देखना जानना कुदरत वो सब मखलूक के जरिए ही तो जाहिर हो रही हैं। गोया मखलूक उन सिफात का आईना बन जाती है। तो इस दो तरफ़ा सरायत में कौन जाहिर होता है और कौन बाततिन रहता है।

देखिए शेख अकबर रहमतुल्लाह फरमाते हैं कि यह नुक्ता नजर पर मुनासर है। उसूल यह है कि जो चीज सरायत करती है यानी फाइल वह अमूमन बाततिन होती है पोशीदा और जिसमें सरायत की जाती है यानी मफूल वो जाहिर होती है तो अगर हम हक को जाहिर माने तो मखलूक उसमें पोशीदा है बाततिन है इस सूरत में मखलूक गोया हक की अपनी सिफात बन जाती है उसकी समात उसकी बसारत उसकी कुदरत

और अगर मखलूक जाहिर हो तो फिर हक उसमें पोशीदा यानी बाततिन होता है इस सूरत में हक मखलूक की समात बन जाता है। उसकी बसारत, उसका हाथ, उसका पांव, उसकी तमाम कुतें। वही मशहूर हदीस कुदसी जब मैं उस बंदे से मोहब्बत करता हूं। जी जी बिल्कुल। तो मैं उसकी समात बन जाता हूं जिससे वो सुनता है। उसकी बसारत बन जाता हूं जिससे वो देखता है। यह वही दो तरफ़ा सरायत है। यही खुल्लत का

मकाम है। सुभान अल्लाह। तो क्या इसका मतलब यह है कि अलूहियत यानी खुदा का खुदा होना वो भी मखलूक के ताल्लुक से ही है। शेख अकबर के नजदीक जी हां, उलूहियत का तसवुर ही इन निस्बतों और ताल्लुकात से कायम है। हम अपनी मोहताजी के जरिए, अपनी जरूरत के जरिए उसे खुदा बनाते हैं। यानी हमारी एहतियाज ही उसकी उलूहियत को जाहिर

करती है। जब तक हम यानी मखलूक पहचाने ना जाएं वो यानी खालिक अपनी उलूहियत की शान के साथ नहीं पहचाना जाता। यहां फौरन ज़हन में नबी-ए करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम का वो फरमान आता है जिसने अपने नफ्स को पहचाना उसने अपने रब को पहचाना। तो गोया अपनी हकीकत को जानना ही रब की मारफत का रास्ता है।

बिल्कुल। और शेख अकबर के नजदीक ऐसा शख्स ही अल्लाह का सबसे बड़ा आरिफ है। वो यहां आप देखिए बाज दूसरे हुकमा जैसे इमाम गजाली का एक नजरिया है कि अल्लाह की मारफत दुनिया या नफ्स से मुंह मोड़कर हासिल होती है। इससे इख्तलाफ करते हैं। शेख अकबर फरमाते हैं कि यह मुमकिन नहीं है। खालिक को पहचानने के लिए मखलूक को पहचानना जरूरी है। क्योंकि मखलूक ही तो उसकी दलील है। उसका आईना है। आप मखलूक को नजरअंदाज करके

खालिक तक कैसे पहुंच सकते हैं? लेकिन क्या यह मारफत की आखिरी मंजिल है या इससे आगे भी कुछ है? क्या यह निस्बत बदलती भी है? जी, यह मारफत की एक अहम मंजिल है। शेख अकबर रहमतुल्लाह अल फरमाते हैं कि एक दूसरी हालत कश भी है। वो क्या है?

दूसरी हालत में यह मुंतकशफ होता है कि हक ताला खुद अपनी जात की दलील है और अपनी उलूहियत की भी। कायनात और मखलूक तो बस उसकी एक तजल्ली हैं। उन आयाने साबिता की सूरतें हैं जो अजल से उसके इल्म में थी। आयाने साबिता ये इस्तलाह पहले भी आई थी। जरा इसको और वाज़ करेंगे। जी आया साबिता आप यूं समझे कि यह चीजों की अजली हकीकतें

हैं। उनके नक्श हैं जो अल्लाह के इल्म में हमेशा से मौजूद हैं। इनका अपना कोई खारिजी वजूद नहीं है। यह इल्म इलाही में मौजूद चीजों के आप कह लें ब्लूप्रिंट्स या सोर्स फॉर्म्स हैं। अच्छा अल्लाह हम पर जो भी फैसला करता है ना वो दरअसल हमारे अपने नायाने साबता के जो तकाजे हैं उन्हीं के मुताबिक करता है। हकीकत तो यह है कि हम खुद ही अपने ऊपर फैसला कर रहे होते हैं मगर अल्लाह के

जरिए। यानी हमारे अंदर जो अजली इस्तेदाद होती है, जो हमारी ऐन साबता होती है, वही जाहिर होती है। इसीलिए कुरान कहता है, "अल्लाह ही की हुज्जत कतई है।" यानी यह उन लोगों के खिलाफ दलील है जो अपनी हालत से बेखबर होकर अल्लाह से शिकवा करते हैं कि तूने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?

जी बिल्कुल। शेख अकबर के नजदीक वह जो आयत है जिस दिन पिंडली खोल दी जाएगी उसका इशारा भी इसी हकीकत की तरफ है जो आरिफन पर यहीं दुनिया में मुनकशिफ हो जाती है। वह देख लेते हैं कि जो कुछ उनके साथ हुआ वो उनकी अपनी अजली हकीकत उनके ऐन साबितता का ही तकाजा था। अल्लाह ने उन्हें सिर्फ वही जानने दिया जो वह खुद अपने आप में थे। जब यह इदराक हो जाता है तो फिर शिकवे की गुंजाइश कहां रहती है? अल्लाह की हुज्जत

तमाम हो जाती है। लेकिन यहां एक सवाल फिर ज़हन में आता है। कुरान में यह भी तो है कि अगर वो अल्लाह चाहता तो तुम सबको हिदायत दे देता। अगर मामला हमारी आया साबितता पर ही मुनसिर है तो फिर इस आयत का क्या मतलब है? क्या अल्लाह की चाहत हमारे आयान की पाबंद है?

शेख अकबर रहमतुल्लाह अल इस आयत में जो अगर है अरबी में लो उसे अदम इमकान के लिए करार देते हैं। यानी यह आयत यह बता रही है कि ऐसा होना मुमकिन ही नहीं था कि वह सबको हिदायत दे। क्योंकि सबके अयान साबिता ने हिदायत कबूल नहीं की थी। अल्लाह ने सिर्फ वही चाहा जो हकीकत में हुआ और जो हुआ वह अयान साबिता के ऐन मुताबिक था। तो गोया हर

ऐने साबिता में हर अजली नक्श में मुख्तलिफ इमकानात कबूल करने की सलाहियत तो होती है लेकिन वाक्य वही होता है जो इसकी असल हालत में लिखा है। देखिए मंतकी तौर पर तो आईने साबता में शय और उसकी ज़िद कबूल करने का इमकान हो सकता है। लेकिन अल्लाह का इल्म अजली है। वह जानता है कि कौन सा आइन क्या कबूल करेगा और क्या नहीं। लिहाजा वाक्य वही होता है

जो उस आईन की अजली हालत में उसके इल्म में मुजमिर है। तो अल्लाह सबकी बातनी आंख नहीं खोलता। जी नहीं वो हर एक की बात आंख को हकीकत हाल के इस मुकम्मल इदराक के लिए नहीं खोलता। कुछ जानने वाले होते हैं और कुछ जाहिल रहते हैं। अल्लाह ने सबकी हिदायत इसलिए नहीं चाही कि उनके आया ने उसे कबूल नहीं किया था। लिहाजा सबको हिदायत नहीं मिली।

तो इरादा यानी विल वो मालूम के ताबे है। जी इरादा हमेशा मालूम के मुताबिक होता है। और मालूम कौन है? मालूम आप हैं। और आपकी हालतें यानी आपके अयान साबिता इल्म मालूम पर असर अंदाज नहीं होता बल्कि मालूम इल्म को वो देता है जो उसके अपने अंदर है। यह तो तकदीर और इख्तियार की बहस को एक बिल्कुल ही मुख्तलिफ जाविया दे दिया। यानी

हमारा वजूद, हमारे आमाल सब हमारी अजली हकीकत का ही जुरूर हैं। शायद इसीलिए कुरान कहता है हम में से हर एक का एक मालूम मकाम है। यह वही मकाम है जो हमारी ऐन साबितता का है। जी हां, शेख अकबर के नजदीक यह आयत बिल्कुल इसी तरफ इशारा करती है। यह वही मकाम है जो आप अपनी हालत सबूत में, अपनी असली हकीकत में रखते हैं और जिसे आप अपने खारिजी वजूद

में जाहिर करते हैं। इन तमाम बातों को समझने के बाद अब हम वापस उस बाप के उनवान की तरफ आते हैं। हिकमते हयाम यह हयाम क्या चीज है और इसका इस खुल्लत से क्या ताल्लुक बनता है?

Frequently asked questions

हजरत इब्राहिम के लकब खलील की बुनियाद खुल्लत पर है। तखल्लुल का मतलब किसी चीज का दूसरी में पूरी तरह रच बस जाना या सिरायत कर जाना है।

शेख अकबर के नजदीक यह सरायत दो तरफा है, जिसमें एक तरफ हजरत इब्राहिम अल्लाह की सिफात में सिरायत कर गए और दूसरी तरफ हक ताला भी वजूद इब्राहिमी की सूरत में सरायत कर गया।

यह कैफियत खुल्लत यानी गहरी सिरायत के इदराक से पैदा होती है, जब खालिक और मखलूक एक दूसरे में इस तरह सिरायत कर जाते हैं कि दुई का एहसास मिट जाता है।