Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Fusus al-Hikam Part 8: Do Your Actions Actually Shape Your Destiny? Yaqub AS | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript
Video by Fikr Nama | فکر نامہ · Watch the original on YouTube
Summary
AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.
- इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत याकूब अल सलाम के फुस की बुनियाद पर फरमाते हैं कि दीन हमारे अपने आमाल की पैदावार है जो आखिरत में जजा या सजा बनता है।
- शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह के मुताबिक अल्लाह का अदल यह है कि उसने हर शय को एक खासियत और हकीकत अता की है और वह शय अपनी उसी हकीकत के मुताबिक नतीजा पाती है।
- अंबिया और उनके वारिसीन जैसे औलिया और उलमा अम्रे इलाही के खादिम हैं जो लोगों को अल्लाह के हुकुम यानी शरीयत की तरफ बुलाते हैं।

Use this video with Pro
Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).
Transcript
Search ignores accents. All transcript text stays visible.
बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर्रहीम फिक्रनामा में खुशामदीद। इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत याकूब अल सलाम के फुस की बुनियाद एक इंतहाई मुनफरिद और हैरतंगेज राज पर रखते हैं। और यहां फुस से मुराद उनकी मशहूर किताब फुसूसुल हिकम का एक बाब है। हर बाब एक पैगंबर की हिकमत से मनसूब है। तो आज हम हजरत याकूब अल सलाम की हिकमत पर बात कर रहे हैं। जी बिल्कुल। और इस फुस में वो फरमाते हैं
दीन दो हैं। [संगीत] एक वो जो सिर्फ अल्लाह के साथ है और एक वो जो मखलूक के साथ है। लेकिन फिर वो एक ऐसी बात फरमाते हैं जो हमारे [संगीत] तसवुर दीन में बिल्कुल नहीं है। यानी उनका कहना है कि दीन दरअसल तुम्हारे अपने आमाल की पैदावार है। यानी हमारा हर अमल हमारी हस्ती में एक [संगीत] ऐसा दीन तखलीक कर रहा है जो आखिरत में हमारे लिए बाईसे जजा
बनेगा या बाईसे सजा। अब इस बात का मतलब समझने के लिए एक अहम सवाल सामने आता है कि अगर हमारे आमाल खुद हमारे लिए दीन तखलीक कर रहे हैं तो फिर अल्लाह का अदल कहां है? क्या यह बात नाउजब्लाह अल्लाह के इख्तियार और अदल के खिलाफ तो नहीं जाती। और यही वो गहरा राज है जो आज हम हजरत याकूब अल सलाम के फुस में खोलेंगे। चल इस गुफ्तगू का आगाज वहीं से करते हैं
जहां से [संगीत] शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अलह ने किया है। दीन के दो पहलू एक अल्लाह के साथ दूसरा मखलूक के साथ। यह सुनने में तो सीधी बात लगती है। लेकिन उनकी मुराद क्या है? क्या यह दो अलग-अलग दीन है?
देखें यह दो अलग दीन नहीं बल्कि एक ही हकीकत [संगीत] के दो चेहरे हैं। पहला चेहरा जो अल्लाह के साथ है वो एक बात और कलबी ताल्लुक है। यह वो इस्लाम है जिसका जिक्र कुरान ने किया। इन [संगीत] दीना इंदलाहिल इस्लाम। यानी बेशक दीन अल्लाह के नजदीक इस्लाम ही है। जी। यहां इस्लाम का मतलब है अल्लाह के अम्र के सामने मुकम्मल तौर पर सर तस्लीम
खम कर देना। अपनी जात को उसकी मर्जी के सुपुर्द कर देना। यह एक अंदरूनी कैफियत है। एक रूहानी हालत है। यानी यह वो ईमान है जो दिल की गहराइयों में होता है। जिसका ताल्लुक सिर्फ बंदे और अल्लाह के दरमियान है। बिल्कुल। और दूसरा रुख जो मखलूक के साथ है वह इसी बातनी कैफियत का जाहिरी इजहार है। इसमें हमारे मामलात, अखलाकियात और शरीयत
के वो तमाम अहकामात आते हैं जिन पर हम अमल करते हैं। सही। और हजरत इब्राहिम और हजरत याकूब अलहम अस्सलाम ने अपने बेटों को इसी मुकम्मल दीन की वसीयत की थी। फला तमुतना इल्ला व अंतु मुस्लिमून। यानी बस तुम हरगिज़ ना मरना। मगर इस हाल में कि तुम मुस्लिम हो। यानी जाहिर और बातिन दोनों में अल्लाह के फरमाबरदार हो। जी बिल्कुल। तो गोया एक के बगैर दूसरा अधूरा है।
ये दोनों मिलकर एक मुकम्मल दीन की तशकील करते हैं। एक जड़ है तो दूसरा उसका फल। यह तो बात समझ आती है। जाहिर और बातिन दोनों अहम है। लेकिन शेख अकबर रहमतुल्लाह अल वो सिर्फ यह नहीं कहते कि आमाल दीन का हिस्सा है। वो कहते हैं कि दीन तुम्हारे आमाल की पैदावार है। जी और यही इस फुस का मरकजी और इंकलाबी नुक्ता है।
सही। शेख अकबर रहमतुल्लाह अल फरमा रहे हैं कि दीन कोई बाहर से थोपी गई चीज नहीं बल्कि वो हकीकत है जिसे तुम खुद अपने आमाल से वजूद में ला रहे हो। वो फरमाते हैं कि खुशी सिर्फ उसी चीज से हासिल होगी जो खुद तुमसे सादिर हो। यानी [संगीत] तुम्हारे आमाल ही तुम्हारी खुशी या गम का सर चश्मा है। बिल्कुल। यह तो पूरा तसवुर ही उलट देता
है। हम समझते हैं कि हम दीन पर अमल करते हैं और फिर इसकी जजा या सजा मिलती है। लेकिन वो यह कह रहे हैं कि हमारा अमल करना ही हमारा दीन बन रहा है और वो दीन ही हमारी जजा है। बिल्कुल यही नुक्ता है। इसे यूं समझें कि आपका हर अमल, हर नियत, हर सोच एक बीज की तरह है। वह बीज आपकी रूह की जमीन में बोया
जाता है और फिर वही एक दरख्त की शक्ल में उगता है। आखिरत में जो फल आपको मिलेगा, वह उसी दरख्त का होगा जिसे आपने खुद अपनी जिंदगी में परवान चढ़ाया है। तो जजा या सजा कोई बैरूनी चीज नहीं बल्कि आपके अपने आमाल का मुजस्सम रूप है। तो गोया हमारा हर लम्हा हमारी आखिरत को बुन रहा है। हर अमल एक धागा है जिससे हमारी आने वाली हकीकत का लिबास तैयार हो
रहा है। जी इसीलिए फरमाया गया कि दीन इतात का नाम है और यह इतात ही वो सर चश्मा है जिससे हमारे आमाल फूटते हैं। तो जो कुछ हम कर रहे हैं वही दरअसल हमारा दीन बन रहा है। यानी वही हमारी जजा बन रहा है। अच्छा तो अब हम अपने शुरू वाले सवाल के करीब आ रहे हैं। अगर हमारी जजाओ और सजा हमारे ही आमाल का अक्स है। हमारे ही बोए हुए बीज का फल है तो फिर अल्लाह के अदिल
वाला मामला हल कैसे होता है? अल्लाह के हाकिम या जज होने का क्या मतलब हुआ? यह तो लगता है कि सब कुछ खुदकार निजाम के तहत हो रहा है। देखें शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह के नजदीक यही अल्लाह का असल और कामिल अद है। वो फरमाते हैं कि अल्लाह का अदल किसी इंसानी बादशाह की तरह नहीं कि वो अपनी मर्जी से किसी को इनाम दे और किसी को सजा। हम्।
इसका अदल यह है कि उसने हर शय को एक खासियत और हकीकत अता की है। और वह शय अपनी उसी हकीकत के मुताबिक नतीजा पाती है। दीन का एक मतलब जजा भी है। यह जजा कभी आसान होती है जैसे अल्लाह का राजी हो जाना और कभी मुश्किल जैसे अज़ाब। लेकिन दोनों सूरतों में यह हमारे ही वजूद का नतीजा होती है।
लेकिन यह कैसे मुमकिन है कि अल्लाह की रहमत या उसका गजब सब पर एक जैसा हो। मगर उसका असर हर एक पर मुख्तलिफ हो। उसकी गहरी बातनी हकीकत क्या है? इसे समझने के लिए शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह एक हैरतंगीज तसवुर पेश करते हैं। आप तसवुर करें कि खुदा के इल्म में कायनात की हर चीज का एक
असली गैर तब्दीलशुदा ब्लूप्रिंट मौजूद है। आपका मेरा हर इंसान का। यह ब्लूप्रिंट हमारी असल हकीकत है। इसी को वह ऐनने साबिता कहते हैं। ऐसा साबिता जी। अब खुदा की तजल्ली, उसकी रहमत या उसका हुक्म जब हम पर पड़ता है तो वह उस ब्लूप्रिंट के मुताबिक ही जाहिर होता है। [संगीत] कोई मिसाल देकर समझाएंगी यह तसवुर थोड़ा पेचीदा है।
जरूर जैसे [संगीत] एक ही सूरज की रोशनी जब साफ शीशे से गुजरती है तो बेरंग रहती है। लेकिन जब लाल शीशे से गुजरती है तो लाल हो जाती है और नीले शीशे से नीली। रोशनी एक ही है। [संगीत] मगर नतीजा शीशे की अपनी खासियत और रंग पर मुनहसिर है। सही। इसी तरह अल्लाह की तजल्ली [संगीत] एक है। लेकिन हर इंसान इसे अपनी ऐन साबिता यानी
अपने अजली ब्लूप्रिंट के मुताबिक कुबूल करता है और उसी के मुताबिक अमल करता है। सुभान अल्लाह। अच्छा तो अगर मैं इसे ठीक समझ रहा हूं आप यह कह रही हैं कि हम जो कुछ कर रहे हैं वो दरअसल हमारी अपनी ही बातनी हकीकत हमारे उसी ब्लूप्रिंट का जोहूर है। यह तो तकदीर और इख्तियार की बहस को देखने का बिल्कुल नया जाविया है। जी शेख अकबर रहमतुल्लाह अल इसीलिए एक बहुत गहरी बात फरमाते हैं। वो कहते हैं बंदे को
उसकी अपनी जात के सिवा कोई भलाई नहीं देता और ना ही उसकी जात के सिवा कोई बुराई। बस वो खुद अपनी जात को इनाम देता है और खुद ही सजा [संगीत] देता है। वो सिर्फ अपने आप को मलामत करता है और सिर्फ अपनी ही तारीफ करता है। यह तो जिम्मेदारी का एक बिल्कुल नया और बहुत गहरा एहसास दिलाता है। यानी हम किसी और पर इल्जाम नहीं धर सकते। लेकिन ईमानदारी की बात है। यह सुनने में बहुत
सख्त भी लगता है। यह तो गोया तमामतर जिम्मेदारी इंसान पर डाल दी गई है। इसमें अल्लाह की रहमत का तसवुर कहां फिट होता है? क्या यह नजरिया हमें मायूसी की तरफ नहीं ले जा सकता कि हम तो जैसे हैं वैसे ही रहेंगे। यह एक बहुत अहम सवाल है और अक्सर लोग इस मकाम पर आकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। शेख अकबर रहमतुल्लाह अल यह नहीं कह रहे कि अल्लाह की रहमत का कोई किरदार नहीं। बल्कि वो यह कह रहे हैं कि अल्लाह
की रहमत ही तो है जिसने हर ऐसा साबता को वजूद की रोशनी बख्शी है। अच्छा रहमत का सबसे बड़ा मजहर यह है कि उसने हमें हमारी हकीकत के मुताबिक जाहिर होने का मौका दिया। यह नजरिया मायूसी नहीं बल्कि खुद शनासी की दावत देता है। यह कहता है कि अपनी असल को पहचानो। और इसी से तकदीर का वो राज भी जुड़ा है जिसे सिर्रे कदर कहा जाता है।
जी यही सिर्रे कदर है। शेख फरमाते हैं कि अल्लाह का इल्म मालूम के ताबे होता है। इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह को पहले से मालूम नहीं। नाउजब्लाह बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह हमें वैसा ही जानता है जैसे हम अपनी असल हकीकत में हैं। उसका इल्म हमारी हकीकत को बदलता नहीं बल्कि हमारी
हकीकत को जैसा है वैसा ही जानता और जाहिर करता है। बस उसका फैसला हमारी हकीकत के ऐन मुताबिक होता है। और यही उसकी हुज्जत कातिया है। [संगीत] यानी ऐसी दलील जिसके बाद कोई और दलील बाकी नहीं रहती। क्योंकि फैसला खुद हमारी अपनी जात से सादिर होता है। तो अब इस सारी गुफ्तगू की रोशनी में हजरत
याकूब अल सलाम की वसीयत फला तत इल्ला व अंत मुस्लिमून को कैसे समझा जाए? इसका मतलब सिर्फ यह नहीं कि मरते वक्त कलमा पढ़ [संगीत] लेना बल्कि इसका मतलब यह है कि एक ऐसी जिंदगी गुजारो कि जब मौत आए तो तुम्हारा जाहिर और बाततिन दोनों अल्लाह के सामने झुके हुए हो। तुम्हारे जाहिरी आमाल यानी मखलूक के साथ तुम्हारा दीन तुम्हारी बातिनी तस्लीमो [संगीत] रजा यानी
अल्लाह के साथ तुम्हारे दीन का मुकम्मल अक्स हूं। यह सिर्फ जाहिरी इतात नहीं बल्कि अपनी उस हकीकी तकदीर अपने उस अजली ब्लूप्रिंट के सामने सर झुका देना है जो इल्म इलाही में तुम्हारे लिए अजल से मौजूद है। यह अपनी ऐन साबता के साथ मुकम्मल हमाहंगी में जीने का नाम है। शेख अकबर रहमतुल्लाह अलह ने अपनी बात को समझाने के लिए तबीब और फितरत यानी नेचर की एक बहुत खूबसूरत मिसाल भी दी है। वो क्या
है और इसका इस मौजू से क्या ताल्लुक है। जी वो एक और पेचीदा गु्थी को सुलझाने के लिए यह मिसाल देते हैं। वो फरमाते हैं कि एक तबीब या डॉक्टर को देखें। एक लिहाज से वह फितरत का खादिम भी है और नहीं भी। जब वो किसी बीमारी का इलाज करता है तो वह फितरत के एक मजहर यानी बीमारी के खिलाफ काम कर रहा होता है। सही।
लेकिन वह ऐसा क्यों करता है? वो फितरत के एक दूसरे और बेहतर मजहर यानी सेहत को पाने के लिए ऐसा करता है जो खुद फितरत का ही हिस्सा है। तो वो एक ही वक्त में फितरत की एक हालत की मुखालफत भी कर रहा है और दूसरी हालत की खिदमत भी। बहुत दिलचस्प और इसका ताल्लुक अंबिया और दीन से कैसे बनता है? अंबिया और उनके वारिसीन यानी औलिया और उलमा भी अम्रे
इलाही के खादिम हैं। वो लोगों को अल्लाह के हुकुम यानी शरीयत की तरफ बुलाते हैं। लेकिन कभी-कभी अल्लाह का अम्र यानी उसका हुकुम जिसे कमांड कहते हैं उसके इरादे यानी उसकी मशीयत विल से मुख्तलिफ होता है। अम्र और इरादे में फर्क इसे जरा आसान अल्फाज में समझाएं। जी। अल्लाह का अम्र एक उम्मी कानून है
जैसे ट्रैफिक का कानून कि सब सुर्ख बत्ती पर रुके। यह हुकुम सबके लिए है। लेकिन अल्लाह का इरादा उस बात का इल्म है कि कौन अपनी फितरत, अपनी जल्दबाजी या अपनी एहतियात की वजह से इस कानून पर अमल करेगा और कौन नहीं। अच्छा। अल्लाह का इरादा हमेशा गालिब आता है अम्र नहीं। यानी अल्लाह का हुकुम तो यह है कि
सब ईमान ले आए। सीधे चलें। लेकिन उसकी मशीयत या इरादा उस शख्स की अपनी असली हकीकत यानी उसकी ऐन साबितता के मुताबिक होता है जो शायद सीधा चलने की इस्तेदाद ही ना रखती हो। और इसी वजह से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि सूरह हुद ने मुझे बूढ़ा कर दिया। क्योंकि इसमें हुकुम था बस आप साबित कदम रहें जैसा आपको हुकुम दिया गया है।