Allama Tahir Madani · Transcript · · Updated
Mazaraat shirk ke adday ya Dua krne ki jaga? Imam shafae bhi barelvi they? | Allama Tahir Madani – Transcript
Video by Allama Tahir Madani · Watch the original on YouTube
Summary
AI-generated from the transcript. Verify details against the source video.
- कुरान मजीद में हजरत जकरिया के वाकये और मकाम इब्राहिम के जिक्र से यह साबित होता है कि अल्लाह के बरगुजीदा बंदों के आराम फरमाने या टच होने वाली जगहों के इर्द-गिर्द का माहौल मुतबरक हो जाता है।
- इब्ने आबदीन शामी ने रद्दुल मुख्तार में लिखा है कि औलिया अल्लाह अपनी कब्रों की जियारत करने वाले को उनके मर्तबे के हिसाब से नफा पहुंचाते हैं।
- इमाम शाफई से रिवायत है कि वह इमाम अबू हनीफा की कब्र के पास दो रकात नमाज पढ़कर अल्लाह से दुआ करते थे और उनकी हाजतें पूरी हो जाती थीं।

Use this video with Pro
Reading, copying and transcript downloads are free. Create saved AI results for this video with a signed-in Pro account ($9/month).
Transcript
Search ignores accents. All transcript text stays visible.
मजारात औलिया पर जाने का क्या फायदा है? आम घरों के मुकाबले में मजाराते औलिया पर जाकर उनके वसीले से दुआ करना किस कदर बाईसे बरकत है और इसमें दुआ की कबूलियत के इमकानात किस कदर बढ़ जाते हैं ये शरई मसला हमने डिस्कस करना है। बरेलवियों के खिलाफ बहुत ज्यादा प्रोपेगेंडा किया जाता है कि ये मजार की कब्रों को चाटने वाले हैं। कब्र की मिटियों को चाटने वाले हैं। औलिया
अल्लाह को खुदा मानने वाले हैं। इस किस्म की बदतरीन और गलीज तरीन फतवाबाजी बरेलवियों के खिलाफ की जाती है और ये भी कहा जाता है कि ये जो मजारात है ये शर्क की मंडियां हैं शर्क की फैक्ट्रियां हैं तो ऐसे लोगों को गौर करना चाहिए इतने बड़े-बड़े इरदाद के फतवे लगाने से पहले 1400 साल के सल्फ सालहीन और अरबी मुफसरीन और अरबी शहीन की मजारात के साथ अकीदत को
पहले देख लीजिए। उन्होंने कैसे दुआ की कबूलियत के लिए मजारात को मौजू करार दिया है। उनको देख लीजिए और फिर अगर फतवा लगाने का शौक हो तो बरेलवियों पर भी लगाइए और ये जो हम अभी फतवा पढ़ेंगे उन सारे बुजुर्गों पर भी ये शर्को कुफ्र के फतवे लगाइए। मजारात का क्या फायदा है? मजारात पर जाने पे क्या बरकत मिलती है? जहां पर अल्लाह के किसी नेक बंदे के कदम पड़े हो या वहां पर
वो आराम फरमा हो। वो इर्द-गिर्द का माहौल किस कदर मुतबरक हो जाता है। चंद दल हम देख लेते हैं। सबसे पहले देखें कुरान मजीद में है हुनालिका दा ज़करिया रब्बहु उस जगह ज़करिया ने अपने रब से दुआ मांगी है। मुफसरीन को उठाकर पढ़ें। पीछे आयत का कॉन्टेक्स्ट देखें। वाज़ तौर पर। यह वो जगह थी जहां पर अल्लाह तबारक व ताला का फ़ज़ल
नाज़िल होता था हज़रत मरियम रदी अल्लाहहु ताला अन्हा पर। तो उलमा ने इससे नतीजा निकाला कि जब अल्लाह के किसी वली की दुआ की कबूलियत और उन पे फजाइलो कमालात की बारिश जिस जगह हो वो जगह मुतबरक भी होती है। और हजरत ज़करिया ने कुरान में ये अकीदा मुसलमानों को बताया कि मरियम पर जहां पर फयूज बरकात नाज़िल हो रहे थे। उस जगह पर
मैंने अल्लाह तबारक व ताला से दुआ की है। दूसरी देखें मकाम इब्राहिम जो औलिया अल्लाह और अंबिया से टच हुए हुई चीजों के तबरुक के मुनकिर हैं उन्हें भी ये आयत पढ़नी पड़ती है कुरान मजीद में और वो इसका इंकार नहीं कर सकते वरना तो मुर्तद हो जाएंगे काफिर हो जाएंगे। अल्लाह ताला ने इरशाद फरमाया वख मकामी इब्राहीम मुसल्ला और इब्राहिम के खड़े रहने की जगह को नमाज़
की जगह बना लो। नमाज़ तो हरम में कहीं भी पढ़ी जा सकती है। लेकिन तवाफ के बाद जो दो रकात हमने पढ़ने हैं मकामे इब्राहिम से जितना ज्यादा करीब होके पढ़ेंगे उतना ज्यादा इस आयत पर अमल होगा। अब मकाम इब्राहिम जिस पत्थर पर हजरत इब्राहिम के पांव टच हुए हैं। वहां पर बन नफीस इब्राहिम अल सलाम नहीं है। सिर्फ वो पत्थर है जिससे इब्राहिम के कदम मुबारक टच हुए हैं। अल्लाह फरमाता है उसके करीब वाली जगह
को तुम नमाज़ की जगह बना लो। मालूम हुआ जहां पर अल्लाह के बरगुजीदा बंदे होते हैं वो इर्द-गिर्द का जो माहौल और जमीन होती है वो मुतबरक हो जाती है और उस जगह को अल्लाह को सजदा करने के लिए मुंतखब किया जाए तो अल्लाह ताला को यह महबूब है वरना उस पत्थर के करीब नमाज़ पढ़ने की क्या पीछे लॉजिक है वो लॉजिक हमें बता दी जाए तो वाज़ तौर पर मकाम इब्राहीम से हमें समझ में आता
है। इसी तरह असहाबे काफ़ के बारे में कुरान मजीद में है। यह असहाबे काफ़ के जो लोग थे, यह अल्लाह के वली थे। उस वक़्त की कुफ़रिया ताकतों के खिलाफ अलम-ए- बगावत बुलंद करने वाले थे। अल्लाह ताला ने उनको 300 साल तक सुला के रखा कमोबेश और फिर वो बाहर तशरीफ़ लाए। तो वो जो उस इलाके के लोग थे, उन्होंने कहा कि ये इतना मुतबर्रक मक़ाम है जहां पर यह अल्लाह के औलिया की करामात
जाहिर हुई हैं। तो हम क्या करें इस जगह का? तो फिर कुरान मजीद में आता है वो क्या कहते हैं लनख अल मस्जिदा हम जरूर इस गार को इस गार वाली जगह को जहां पर अल्लाह के बरगुजीदा बंदे 300 साल कमोबेश सोए हैं हम इस मुतबरक जगह को मस्जिद बना लेंगे। मालूम हुआ अल्लाह के औलिया जहां आराम फरमा हों या जहां पर वो रहे हों उस जगह को मस्जिद
बनाना यह कुरान से साबित है और कुरान में आयतें मौजूद हैं ये अगर शिर्क हो जाए तो फिर कुरान की आयात क्या सबक दे रही हैं औलिया अल्लाह और अंबिया के करीब वाली जगहों से लोग बरकतें हासिल करें उस जगह को मस्जिद बना लें वहां पर अल्लाह से दुआएं करें अगर ये शर्क हो तो हजरत ज़करिया पर क्या फतवा लगेगा फिर देखें शोहदा ओहद हुजूर हुज़ूर अल सलातो सलाम की आदत मुबारका
थी कि रेगुलर शोदा ओहद के मजारात और उनकी कुबूर पर जाकर दुआ किया करते थे। और मुसन्नफ की ये रिवायत है कि अबू बकर सिद्दीक और हजरत उमर की भी ये आदत मुबारका थी कि वो हुजूर अल सलाम की ही तरह रेगुलर शोदा ओहद के कुबूर पर जाकर वहां पर दुआएं किया करते थे। इसी तरह देखें इबने आबदीन शामी हर देवबंदी इनको तस्लीम करता है। अपने फिकही मसाइल के अंदर इबने आबदीन शामी
की रद्दुल मुख्तार को कोई कोट ना करे ऐसा हो ही नहीं सकता। इतना बड़ा फिक्र की दुनिया का हफी फिक की दुनिया का नाम है। ये अपनी किताब में क्या लिखते हैं कि औलिया इकराम कुर्ब खुदावंदी के मुख्तलिफ दर्जात पर फ़ज़ होते हैं। व नफ़ ज़हरीना भी हसबी मारफ़ व असरह और ये औलिया अपनी कब्रों
की जियारत करने वाले को हस्बे मारफ़त और हस्बे क नफ़ा भी पहुंचाते हैं। जितना इन औलिया का मर्तबा है उस हिसाब से अपनी कब्र की जियारत करने वाले ज़ायरीन को ये औलिया अल्लाह नफा पहुंचाते हैं। ये कैसा शानदार अकीदा है जो सिर्फ बरेलवियों का नहीं है बल्कि इब्न आबदीन शामी ने रद्दुल मुख्तार
में ये लिखा है कि औलिया अल्लाह कुर्बे खुदाबंदी के मुख्तलिफ दर्जात पर होते हैं। कोई एक दर्जे पर, उससे बड़े वली, उनसे ऊपर वाले दर्जे पर, और ये सारे औलिया अल्लाह अपने ज़ायरीन को नफ़ा पहुंचाते हैं अपने मर्तबे के एतबार से। मालूम हुआ औलिया अल्लाह की कब्रों से नफा लेना, तबरुक लेना, उनके इर्दगिर्द बैठकर बरकतें लेना, उनके वसीले से अल्लाह की बारगाह में दुआ
करना ये सिर्फ बरेलवी 150 साल का अकीदा नहीं है। बल्कि 1400 साल के सल्फ सालन ने इन्हीं अकायद पर अपनी कुतुब के अंदर मकालात और इबारतें लिखी हैं। हम अगर मुशरिक हैं तो फिर लगाओ सारे फका और बड़े-बड़े मुफसरीन पे फतवा। इसी तरह इबने हजर हजमी रहमतुल्लाह ताला अल ने इमाम आजम रहमतुल्लाह ताला अल के फ़ज़ाइल और कमालात पर
एक किताब लिखी है। ये इतनी शानदार किताब है इमाम आजम के फज़ाइल पर। और वो किताब का नाम क्या है? किताब का नाम है अल खैरातुल हिसान फी मनाकिब इमाम आज़मी अबी हनीफत नोमान। इमाम आजम अबू हनीफा के फ़ज़ाइल और कमालात पर ये किताब है। इस किताब में इमाम आजम की कब्र मुबारक पर हाजिरी के वाक्यात आप लिखते हैं। क्या इरशाद फरमाते हैं?
इमाम इबने हजर हतमी इरशाद फरमाते हैं लम यजलि उलमा वुल हाजात हमेशा से उलमा और हाजतमंद क्या करते थे?
यजुर ना कब्रहु इमाम आजम अबू हनीफा की कब्र की जियारत करते थे। हमेशा से हाजतमंद भी और उलमा भी वतलहु फी कजा हवाना नजहा जालिका और वहां अपनी हाजात पूरी कराने के लिए तवस्सुल वसीला करते और इसकी कामयाबी देखते चले आए हैं। ये इमाम हैतमी
इरशाद फरमाते हैं बरेलवी नहीं है। अरब दुनिया का नाम है। इमाम आजम की शान और फज़लत पर किताब लिख रहे हैं। और फरमाते हैं हमेशा से उलमा और हाजतमंद इमाम आजम अबू हनीफा की कब्र की जियारत भी करते हैं। आपके वसीले से अल्लाह से दुआएं भी करते हैं और अपनी आंखों से उन दुआओं की कबूलियत के मनाज़िर को मुलायजा भी फरमाते हैं हमेशा से। आगे इरशाद फरमाते हैं मिनहु उन्हीं
बड़े-बड़े उलमा जो इमाम आजम से बरकतें लेने मजार पर आते थे। मिनहु उन्हीं में से अल इमाम शाफई रह रही इमाम शाफई भी हैं। लम्मा कान बी बगदाद जब इमाम शाफई बगदाद में होते फ इनहु जा अनहु अनहु काल तो उनसे इमाम शाफई से रिवायत है
क्या है कि वो फरमाते हैं इननी लात अत बरकु अबी हनीफता बेशक मैं इमाम अबू हनीफा के जरिए से बरकत हासिल करता हूं व अजीउ इला कब्र ही और मैं इमाम शाफई इमाम आजम अबू हनीफा की कब्र पर हाजिर होता हूं हूं फदा अरदत ली हाजतुन सल्लत रकात बस जब मुझे
कोई हाजत पेश आती है तो मैं दो रकतें इमाम आजम अबू हनीफा के मजार पर नमाज़ पढ़ता हूं वजत इला कब्र ही और मैं इमाम शाफई इमाम आजम की कब्र मुबारक पर आता हूं व सतुल्लाह और फिर मैं इमाम अल्लाह ताला से सवाल करता हूं इंदहु इमाम आजम की कब्र के करीब फतुदा शरीन तो मेरी हाजतें अल्लाह ताला जल्दी
पूरी फरमा देता है। अंदाजा करें ये कोई बरेलवी नहीं है। यही वाला अकीदा मैं बताऊंगा तो बहुत सारे लोग कहेंगे मुर्तद है, मुशरिक है, कब्र चाटने वाला है, दायरे इस्लाम से खारिज है। लेकिन जब बताया जाएगा ना कि यही वाला अकीदा इमाम शाफई ने इमाम आजम की फ़ज़ाइल की किताब में बयान फरमाया है, तो ये शिर्क का फतवा लगाने वाला जलील और रुसवा होकर गटर में गिर जाएगा। क्योंकि वहां पर हिम्मत नहीं है कि इमाम शाफी पे
मैं शिर्क का फतवा लगा दूं। लोग जूते मार के रौंदा दरगाह करके मुझे मददसे से निकाल देंगे। तो भाई ये डबल स्टैंडर्ड ना करो। जो फतवा इमाम शाफई के लिए है वही बरेलवियों के लिए होना चाहिए। जो बरेलवियों का अकीदा है वही इमाम शाफई का अक़ीदा है। जो बरेलवियों का अक़ीदा है वही इब्ने आबदीन शामी का अक़ीदा है। जो बरेलवियों का अक़ीदा है, वही अक़ीदा इब्न हजर हैज़मी रहमतुल्लाह ताला अलह का अक़ीदा है। ये इतने बड़े-बड़े नाम हैं। कि कोई मजाल
नहीं है किसी की, कोई जुर्रत नहीं है कि इन सबको काफिर और मुशरिक करार दे दे। तो वाज़ तौर पर मजारात जहां पर मुसल्लमा अल्लाह के औलिया आराम फरमा हैं। उसकी इर्द-गिर्द की जगह बहुत मुतबरक है। फैज वाली जगह है और वहां पर कोई अल्लाह की बारगाह में दुआ करता है। इस दुआ की कबूलियत के इमकानात बहुत ज्यादा हैं। वाज़ तौर पर हजरत ज़करिया ने मरियम की बैठने की
जगह पे दुआ की है। वाज़ तौर पर कुरान ने मकाम इब्राहिम के करीब नमाज़ पढ़ने का हुकुम दिया है। वाजे तौर पर असहाबे काफ के आराम करने की जगह का कुरान में जिक्र है कि लोगों ने वहां पर मस्जिदें बना ली और अल्लाह ताला से मस्जिद में दुआ करते थे। 1400 साल पिछली उम्मतों के लोग भी बता रहे हैं अल्लाह के नेक बंदों को फॉर ग्रांटेड नहीं लेना वह जहां आराम फरमा है वो बहुत
मुतबर्रक और बाबरकत जगह है। शोहदा ओहद के मजारात पर ताजदारे कायनात ने जाकर सहाबा ने जाकर बताया है कि मजारात की अहमियत है जहां पर अल्लाह के बरगुजीदा बंदे हो वो मुतबरक जगह हैं। और फिर इबने आबदीन शामी ने वाज़ तौर पर इरशाद फरमाया वन हस मारह व असरारह ये औलिया अल्लाह अपने मर्तबे के
हिसाब से अपनी कब्रों की जियारत करने वाले को फायदा पहुंचाते हैं। जिंदगी में भी औलिया अल्लाह फायदा पहुंचाते हैं और बाद विसाल भी अपनी कब्रों की जियारतें करने वालों को नफा पहुंचाते हैं। लगाओ कोई इब्ने आबदीन पर फतवा लगाए शिर्क का फतवा लगाओ तो हम माने कि हां आपने डबल स्टैंडर्ड नहीं किया। बरेलवी भी मुशरिक है आपके नजदीक और इब्ने आबदीन शामी भी मुशरिक हैं फिर कोई डबल स्टैंडर्ड नहीं होगा। लेकिन अगर तुम वहां पे उनके कसीदे पढ़ते
हो, हम पे शर्क के फतवे लगाते हो, तो ये मुनाफिकत है और इस मुनाफिकत से बाज आना चाहिए। इब्न हजर हजमी रहमतुल्लाह ताला ने तो कमाल ही कर दिया कि जो भी इमाम आजम की कब्र पर जाता है उसे ये नजर आता है कि उसकी दुआएं कबूल हो रही हैं। और हमेशा से उलमा और हाजतमंद उनकी कब्रों पे जाते हैं। और इमाम शाफी ने भी कमाल कर दिया। आप इरशाद फरमाते हैं जब भी मुझे कोई हाजत होती है दो रकात नमाज पढ़ता हूं इमाम आजम