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MEETING NATIONAL GOVERNING BODY, JAMIAT ULAMA-I-HIND | Mewat, Haryana Day 2 – Transcript
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Summary
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- हजरत मौलाना अजीमुल्ला सिद्दीकी ने बताया कि जमीयत उलमा का नसबुलैन तमाम शोबा हयात में मुसलमानों की मजहबी रहनुमाई है।
- हजरत मौलाना मोहम्मद सलमान साहब बिजनौरी ने बताया कि शादियों में हिंदुस्तान के मुसलमान साल भर में 1 लाख 75000 करोड़ खर्च करते हैं।
- मुफ्ती मोहम्मद अफान साहब मंसूरपुरी ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इजलास में इलामिया पेश किया जिसमें हर तरह की फिरका परस्ती को मुल्क के लिए नुकसानदेह बताया गया।
Key moments
- है। अगर है तो हमें और आपको साथ मिलकर प्यार और मोहब्बत…
- तो उसके 7000 खत्म हो चुके हैं और यहां खातून के 5…
- आज इसी मेवात की सरजमीन पर खड़े होकर हमारा वही पैगाम मुल्क…
- महमूद असद मदनी साहब दामत बरकात आलिया व हजरात अकाबिर व अराकीन…
- खामोशी और बाज रियासती हुकूमत हुकूमतों की इन शरपसंद अनासिर की खुली…
- मदरसे सोसाइटी एक्ट के तहत चल रहे हैं और इंशा्लाह ताला उसी…
- लोग बैठे हैं और इस इजलास की कामयाबी उस वक्त हम कामयाबी…
- है नहीं अल्हम्दुलिल्लाह हम सब अल्लाह रब्बुल इज्जत के बहुत शुक्रगुजार हैं…

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Transcript
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यस का सा मुरसा फी मिक इला रब तहा
इन माशा का अनहु यहा बस रसूल इलाशिया
यलू का सा मुरसा फी मिक फीमा जिक
इला रब का मुहा इन अ मुर काहु यहा
सदक् अज़म मौलाना ईसा साहब इधर इधर से तशरीफ़ लाइए अंदर आ जाइए जजा जजाक अल्लाह चालू कर अल्हम्दुलिल्लाह
हम अपने वक्त में तीसरी नशिस्त को अल्लाह ताला के फजल करम से शुरू कर चुके हैं। कुरान मजीद की तिलावत से इस नशिस्त का आगाज हो चुका है। लाइट चली गई।
जमीत उलमा हिंद का अल जमीयत बुक डिपो वो इदारा यहां मौजूद है। उसके तहत अल जमीयत कैलेंडर डायरी मदनी डायरी दीगर चीजें दस्तियाब हैं। उनको उससे हासिल करें। अब मैं दरख्वास्त करूंगा कारी मोहम्मद असलम साहब बडेट सदर जमीतु उलमा मेवात तशरीफ लाए और नात पाक पेश फरमाए। कारी मोहम्मद असलम साहब बट
जब रसूल आम के शहर में गुजर होगा जब रसूल आम के शहर में गुजर होगा
ये तो बस खुदा जाने ये तो बस खुदा जाने दिल पे क्या असर होगा जब रसूल आम के
दाग जो गुनाहों के है वो छूट जाएंगे दाग जो गुनाहों के दाग जो गुनाहों के
है वो छूट जाएंगे हैं वो छूट जाएंगे दामन मोहब्बत जब दामन मोहब्बत जब आंसुओं से
होगा जब रसूल आम के जाने उस घड़ी मेरी जान उस घड़ी मेरी दिल की कैफियत
क्या हो जब रसूल की चौखट होगी मेरा सर होगा जब रसूल आम के
शहर में गुजर होगा ये तो बस खुदा जाने दिल दिल पे क्या असर होगा खालिदो उमर जैसा खालिदो उमर जैसा
दे खुदा हमें जज्बा कुफ्र को दिखा दिखा देंगे मारिका अगर होगा जब रसूल आम के
शहर में गुजर होगा ये तो बस खुदा जाने दिल पे क्या असर
माशा्लाह जजाकल्लाह खैर हसन जजा अब इसके बाद हजरत मौलाना अजीमुल्ला सिद्दीकी साहब दामत बरकात सेक्रेटरी जमीयत उलमा हिंद से गुजारिश है कि वो खिदमात जमीयत उलमा का मुख्त डॉक्टर सर प्रेजेंटेशन पेश फरमाए।
क्या नहीं उसको नहीं बदलना। बस ऐसे ही बोलना मुख्तसर बस बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। मोहतरम बुजुर्गों, दोस्तों, वारकाने मजलिस मुंतजमा
जमीयत उलमा का मुख्तसर तारुफ आप हजरात के सामने तफसील से पेश करने की जरूरत नहीं है। बल्कि कुछ इशारे और किनारे में यहां पर बात पेश करने की कोशिश करूंगा। बुनियादी बात यह है कि जमीयत उलमा का
जो नसबुल ऐन है वो हमारे सामने बिल्कुल साफ और वाज़ होना चाहिए। चुनांचे अकाबी रहला ने जमीयत उलमा का एक नसबुल तय फरमाया था और यह जमात उसी नसबुलन पर आज तक कायम और दायम है। जमीयत उलमा हिंद के तीसरे सालाना इजलास में हजरत मौलाना हबीब रहमान उस्मानी
रहमतुल्लाह ने फरमाया कि जमीयत उलमा का नसबुलैन तमाम शोबा हयात में मुसलमानों की मजहबी रहनुमाई है। फिर आपने आगे उसकी तशरीफ फरमाई। आपने कहा कि मजहबी रहनुमाई से मुराद सिर्फ ऐसा नहीं है कि नमाज रोजा या दूसरे दूसरे मजहब दीनी फराइज या इबादत के
फराय से इसका ताल्लुक हो बल्कि इसका दायरा वसी है। इस सिलसिले में आपने फका की किताबों और उसकी तरतीब का भी हवाला दिया कि उसमें किताबु सियासियात भी है, अदब भी है, काजी भी है, बै भी है। गरजे के आपका खुलासा यह था के तमाम शोबे हयात के अंदर चाहे वह सियासत का शोबा हो, मजहब का शोबा
हो या जिंदगी के दूसरे शोबे हयात हो उसके अंदर मुसलमानों की मजहबी रहनुमाई जमीयत उलमा का नसबुलन है। अब जमीयत उलमा ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग अपने 100 साला जो उसकी मुद्दत है सफर है इस सफर के अलग-अलग अतबार में आपकी जमात ने
जमीयत उलमा ने मुख्तलिफ तरह के इदामात किए और उन तमाम इदामात का खुलासा सिर्फ यही था के मुसलमान के इस मुल्क में मुसलमान बाइज्जत जिंदगी गुजार सकें। चुनांचे इसका एक विज़ और नसबुल यह तय किया गया कि जमीयत उलमा का नसबुल इस मुल्क में मुसलमानों की
बाइज्जत जिंदगी का हुसूल है। अगर इस नसबुलैन को आप सामने रखते हैं तो आप ये देखेंगे जितने भी एक्शन और इदामात जमीयत उलमा के जरिए मौजूदा वक्त में लिए जा रहे हैं उन इदामात को दो किस्मों में तकसीम किया जा सकता है। नंबर एक वो है जिसका ताल्लुक
दफाई से है। दफाई इदामात है। हालात खराब हो गए। कहीं पर किसी हुकूक के ऊपर किसी हक के ऊपर हमला किया गया तो जमीयत उलमा सुप्रीम कोर्ट के अंदर हाई कोर्ट अदालतों के अंदर खड़ी हो गई। मुसलमानों के शहरी हुकूक का मसला हुआ। मुसलमानों के मजहबी या दीनी हुकूक का मसला हुआ। इस तरह के मुकदमात इस वक्त जमीयत उलमा मुल्क की सबसे
बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में 19 मुकदमात लड़ रही। बड़े-बड़े मुकदमात है। मसाजिद के तहफुज का मामला है। मदारिस के तहफुज का मामला है। जमीयत उलमा अदालत के अंदर पूरी कुत और पूरी ताकत से लड़ रही। दूसरा जो मामला है जिसका ताल्लुक है वो उसका ताल्लुक दफा से नहीं है बल्कि तामीर से। चुनांचे जमीत उलमा के बुजुर्गों ने अपने