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Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated

What is Wahdat al-Wujud? Ibn Arabi's Philosophy vs Popular Myth | Fikr Nama – Transcript

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Summary

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  • वाहिदतुल् वजूद का यह फलसफा सफर करते-करते सब कुछ खुदा है के एक आसान नारे में बदल गया है जिससे कई गलतफहमियां पैदा हुई हैं।
  • इब्ने अरबी के मुताबिक वजूद की दो किस्में हैं जिनमें वाजिबुल वजूद सिर्फ खुदा का वजूद है जबकि मखलूक का वजूद अताई और मुमकिनुल वजूद है।
  • यह नजरिया खालिक और मखलूक के फर्क को खत्म नहीं करता बल्कि कायनात को खुदा की सिफात का मजहर या अक्स करार देता है।
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Transcript

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जब एक गहरी बात एक शख्स से दूसरे तक और फिर तीसरे तक पहुंचती है तो हर मरहले पर उसकी गहराई और नजाकत कम होती जाती है। आखिर में सिर्फ एक सादा सतही और अक्सर गलत जुमला बाकी रह जाता है। वाहदतुल वजूद के साथ भी यही हुआ। उसका गहरा फलसफा सफर करते-करते सब कुछ खुदा है कि एक आसान नारे में बदल गया।

जब आम लोगों या कुछ उलमा ने सुना कि सब कुछ खुदा है तो उन्हें फौरन यह अपने बुनियादी अकीदे यानी तौहीद के खिलाफ लगा। तौहीद का मतलब है कि खुदा एक है और वह मखलूक जैसा नहीं। इस जुमले ने उन्हें यह तासुर दिया कि यह नजरिया खुदा और मखलूक को एक कर रहा है जो शिर्क है। इस खौफ और अपने अकीदे के दफा के रद्दे अमल में बहुत से लोगों ने इस नजरिए को बगैर गहराई में समझे

फासिद या गुमराकुन करार दे दिया और फिर यही सोच नस्ल दर नस्ल चलती रही। वदतुल वजूद एक ऐसा नजरिया जिसका नाम सुनते ही ज़हन में एक ही जुमला गूंजता है। सब कुछ खुदा है। और सच पूछें तो इसी एक जुमले ने

इस गहरे फलसफे को या तो एक मुतनाजिया बहस बना दिया है या फिर एक ऐसा राज जिसे समझना तकरीबन नामुमकिन समझा जाता है। लेकिन असल सवाल यह नहीं कि यह नजरिया मुश्किल है। बल्कि यह है कि यह असल में अपनी गहराई में कहना क्या चाहता है। यह नजरिया खुदा के बारे में बात करने से भी पहले एक बहुत

बुनियादी एक बहुत ही फंडामेंटल सवाल उठाता है। वजूद यानी एग्जिस्टेंस आखिर है क्या? इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह के मुताबिक हकीकी मुतलक और खुद से कायम वजूद सिर्फ एक है और वो खुदा का वजूद है। जबकि कायनात इंसान और बाकी हर शय वो अपना वजूद खुद से नहीं रखती बल्कि उसे वजूद अता किया गया

है। आज की इस गुफ्तगू में हम इसी गु्थी को सुलझाने की कोशिश करेंगे। हम कदम ब कदम समझेंगे कि वहदतुल वजूद क्या है? यह सब कुछ खुदा है वाली मशहूर जमाना गलतफहमी से कैसे मुख्तलिफ है और आखिर क्यों सदियों से इस नजरिए को सही तरह समझा नहीं गया है तो आइए इसको खोलते हैं और इस नजरिए के असल

मफूम के सफर का आगाज करते हैं। तो शुरुआत वहीं से करते हैं। सब कुछ खुदा है। यह जुमला तो जैसे इस नजरिए के साथ किसी साए की तरह चिपक गया है। लेकिन जब इस पर एक लम्हे के लिए भी कोई सोचे तो जहन उलझ जाता है। अगर कुर्सी मेज इंसान हर अच्छी और बुरी चीज खुदा है तो फिर खालिक और मखलूक

का फर्क कहां गया? नेकी और बदी का पैमाना क्या रहा? यह तो अकीदे की पूरी इमारत को ही हिला देता है। है ना? बिल्कुल। और असल दिलचस्प बात यह है कि यह जुमला एक बहुत गहरे समंदर जैसे तस्सवुर को एक चम्मच में बंद करने की कोशिश है। तारीखी तौर पर अगर आप देखें तो यह गलतफहमी इसलिए फैली क्योंकि जब भी कोई गहरा फलसफियाना या रूहानी तसवुर आवाम तक पहुंचता है तो वह अक्सर अपनी पेचीदगी खो देता है।

हम लोग उसे समझने के यह आसान याद रह जाने वाले नारों या आप कह लें कैच फ्रेजेस की शक्ल दे देते हैं। तो यह एक किस्म का जहनी शॉर्टकट है कि असल तसवुर को समझने की जो मेहनत है उससे बचने के लिए हम एक आसान सा जुमला पकड़ लेते हैं जो सुनने में बहुत गहरा लगता है। बिल्कुल यही सब कुछ खुदा है एक ऐसा ही नारा है। एक ऐसा ही शॉर्टकट है। सुनने में

बहुत पुरार और दिलचस्प लगता है। लेकिन यह असल पैगाम से कोसों दूर है। और इस गलत तशरी के नताज भी बहुत संगीन निकले। कई बड़े उलमा और मुफिकरीन ने इसी एक जुमले की बुनियाद पर इस नजरिए को इस्लामी अकायद के खिलाफ यात तक के गुमराहकुन करार दे दिया। हम और इसी वजह से इब्ने अरबी रहमतुल्लाह अलह की फिक्र पर सदियों तक एक तनाजा खड़ा रहा। उन पर तनकीद करने वालों ने ज्यादातर इसी

एक जुमले को बुनियाद बनाया और उनके पूरे फिक्री निजाम को मुस्तरद कर दिया। तो यह शॉर्टकट आपको समझने की मेहनत से तो बचा लेता है लेकिन असल माना को मुकम्मल तौर पर खत्म कर देता है। ठीक है? तो अगर यह नजरिया सब कुछ खुदा है के बारे में नहीं है तो फिर यह किस बारे में है? आपने कहा था कि यह नजरिया वजूद के सवाल से शुरू होता है। हम खुदा की बात

करते-करते वजूद की बहस पर क्यों आ गए? यह इतना बुनियादी सवाल क्यों है? देखिए यह इसलिए बुनियादी सवाल है क्योंकि वाहदतुल वजूद दरअसल खुदा की जात के बारे में बहस से भी पहले वजूद यानी एग्जिस्टेंस की हकीकत के बारे में एक नजरिया है। यह इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि होना टू बी आखिर है क्या? इबने अरबी के मुताबिक वजूद की दो बुनियादी किस्में हैं। इनको समझे बगैर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।

अच्छा। पहली किस्म है हकीकी और मुतलक वजूद। फलसफे की जुबान में इसे वाजिबुल वजूद कहा जाता है। यह वो वजूद है जो खुद से कायम है। अपने होने के लिए किसी दूसरे का मोहताज नहीं। उसे किसी ने बनाया नहीं। वो हमेशा से है और हमेशा रहेगा। उसका वजूद ही उसकी जात है। और यह सिर्फ और सिर्फ खुदा का वजूद है। और दूसरी किस्म।

दूसरी किस्म है अताई या मुमकिनुल वजूद। यह मखलूक का वजूद है। कायनात की हर शय बिशमूल हम और आप सितारे सयारे सब इसी किस्म में आते हैं। हमारा वजूद अपना जाती नहीं है। हम खुद से वजूद में नहीं आए। हमें वजूद दिया गया है। यह एक अतिया है। हमारा वजूद आरजी है और अपने कायम रहने के लिए हर

लम्हा हर सांस में हकीकी वजूद का मोहताज है। इसकी कोई मिसाल जो हम रोजमर्रा जिंदगी में देखते हो। अक्सर चांद और सूरज की रोशनी वाली मिसाल दी जाती है। क्या वो यहां फिट बैठती है?

वो एक बेहतरीन मिसाल है। लेकिन एक हद तक चांद की अपनी कोई रोशनी नहीं। है ना? उसकी रोशनी सूरज की अता करदा है। उससे मुस्तार ली गई है। अगर सूरज ना हो तो चांद का वजूद तो होगा मगर वो तारीख होगा। इसी तरह यह कहा जाता है कि कायनात का वजूद अपना नहीं बल्कि खुदा के हकीकी वजूद का एक परतो या अक्स है। एक मिनट। सूरज और चांद वाली मिसाल बहुत

अच्छी है। लेकिन यह एक जगह पर आकर मेरे ख्याल में टूट जाती है। चांद एक ठोस मादी चीज है। वह सूरज के बगैर भी मौजूद है। भले अंधेरे में सही। क्या कायनात भी खुदा के बगैर अंधेरे में ही सही मौजूद रह सकती है?

या इब्ने अरबी के नजदीक इसका कोई वजूद ही नहीं। बहुत अहम सवाल है और यही वह नुक्ता है जहां वहदतुल वजूद की असल गहराई सामने आती है। इबने अरबी के मुताबिक कायनात का वजूद चांद जैसा भी नहीं है। चांद तो फिर भी एक अलग एक इंडिपेंडेंट वजूद रखता है। उनके नजदीक मखलूक का अपना कोई जाती खुद मुख्तार वजूद है ही नहीं। उसका वजूद खुदा के वजूद से हर लम्हा ऐसे मुस्तार लिया जा

रहा है जैसे आईने में हमारा अक्स। जिस लम्हे हम आईने के सामने से हट जाए अक्स फौरन गायब हो जाता है। अक्स का अपना कोई वजूद ही नहीं है। वो मुकम्मल तौर पर हम पर इनहसार करता है। वो हमसे है लेकिन वो हम नहीं है। वाह! तो यह कहना कि हम खुदा के बगैर अंधेरे में मौजूद होंगे। यह भी गलत है। हम सिरे से मौजूद ही नहीं होंगे। यह फर्क तो

बहुत ही बड़ा है। बहुत प्रोफाउंड है। यह फर्क ही इस नजरिए की बुनियाद और इसकी रूह है। अगर यह फर्क समझ ना आए तो इंसान खालिक और मखलूक को एक ही सतह पर देखने की गलती कर सकता है। जो कि सबसे बड़ी गलतफहमी की जड़ है। वहदतुल वजूद खालिक और मखलूक के फर्क को खत्म नहीं करता बल्कि इस फर्क को मजीद गहराई से वाज़ करता है कि एक हकीकी वजूद है और बाकी सब कुछ उस वजूद का अक्स

या उसकी तजल्ली है। यह दोनों कभी एक नहीं हो सकते। जैसे आईने का अक्स और असल चेहरा कभी एक नहीं हो सकते। भले ही अक्स चेहरे से जुदा भी ना हो। अच्छा। तो यह कहना कि सब कुछ खुदा है। ऐसा ही है जैसे आईने में अपनी तस्वीर देखकर कहा जाए यह मैं हूं। है तो मेरी ही शक्ल लेकिन वो कागज और शीशे का टुकड़ा मैं तो नहीं। यह फर्क तो बहुत अहम है। लेकिन यहां

एक और सवाल जेहन में आता है। अगर कायनात और हम सब इस हकीकी वजूद का अक्स हैं तो इसको बयान करने के लिए इबने अरबी क्या इस्तलाह इस्तेमाल करते हैं?

इसको समझाने के लिए वो मजहर का तस्सवुर इस्तेमाल करते हैं। मजहर का मतलब है जाहिर होने की जगह। प्लेस ऑफ अपीयरेंस। उनके नजदीक ये कायनात और इसमें मौजूद तमाम अशिया बशूल इंसान खुदा की सिफात के मजाहिर हैं। यानी खुदा की सिफात जैसे इल्म, कुदरत, हिकमत, रहमत, हुस्न वो इन चीजों के जरिए जाहिर हो रही हैं। यह बात सुनने में बहुत खूबसूरत है। लेकिन

इसका अमली मतलब क्या है? जरा इसे खोलेंगे। जरूर। इसकी मिसाल ऐसे समझे कि जब हम किसी खूबसूरत मंजर को देखते हैं। एक पहाड़, एक फूल। तो दरअसल हम खुदा की सिफत अल जमील यानी खूबसूरत उसका एक अक्स देख रहे होते हैं। जब किसी साइंसदान की जहानत को देखते हैं तो खुदा की सिफ्त अल अलीम यानी जानने वाला उसकी एक तजल्ली का मुशायदा कर रहे होते हैं। जब किसी मां की बिलोस मोहब्बत

को देखते हैं तो खुदा की सिफत अर रहमान यानी रहम करने वाला उसका ज़हूर देख रहे होते हैं। तो कायनात खुदा की जात नहीं है। लेकिन यह उसकी सिफात का मजहर है। यह एक बहुत बड़ा आईना है जिसमें उसकी लामहतनाई सिफात के अलग-अलग अक्स नजर आ रहे हैं। यह तशरी तो बहुत ताकतवर है। खासतौर पर जब हम इसे हुस्न और नेकी के हवाले से देखते हैं लेकिन यहीं पर वो सबसे मुश्किल सवाल

भी पैदा होता है जो अक्सर इस नजरिए पर एतराज के तौर पर उठाया जाता है। अगर कायनात खुदा की सिफात का मजहर है तो फिर दुनिया में बुराई, जुल्म और बदसूरती क्यों है? क्या यह भी नाउजब्लाह उसी की सिफात का अक्स है? यह एक लाजमी सवाल है और इसका जवाब भी उसी आईने की मिसाल में ही छुपा है। पहली बात तो यह कि आईना वही दिखाता है जो उसके सामने हो। लेकिन आईने की अपनी भी

एक हकीकत होती है। वो धुंधला हो सकता है, टेढ़ा हो सकता है या टूटा हुआ हो सकता है। इंसान को जो इख्तियार दिया गया है वो एक तरह से उस आईने को साफ रखने या गदला करने का इख्तियार है। तो बुराई और जुल्म उस आईने पर पड़ने वाली गर्द या उसके टूट जाने का नतीजा है ना कि असल हकीकत की खराबी। अच्छा यह एक पहलू है जी और दूसरी बात यह कि बाज सिफात अपने

मुखालिफ से ही पहचानी जाती हैं। हमें इंसाफ की अहमियत जुल्म को देखकर होती है और सेहत की अहमियत बीमारी से समझ आती है। खुदा की सिफत अल अद्ल यानी इंसाफ करने वाला भी तभी जाहिर होती है जब जुल्म का वजूद हो। तो यह चीजें भी बिल वास्ता तौर पर उसकी सिफात को समझने का जरिया बनती हैं। ठीक है? तो इस तमाम गुफ्तगू की रोशनी में

अब हम वापस इसी जुमले पर आते हैं। सब कुछ खुदा है। अब यह ज्यादा वाजे हो जाना चाहिए कि यह जुमला कहां और क्यों गलत है। अब यह बिल्कुल वाज़ हो जाना चाहिए। यह जुमला इसलिए गलत है क्योंकि यह मखलूक यानी अक्स को खालिक यानी असल के बराबर करार देता है। यह आईने में नजर आने वाली सूरत को असल चेहरा कहने के मुतरादिफ है। यह नजरिए की रूह के बिल्कुल खिलाफ है। इब्ने

अरबी ने कभी यह तालीम नहीं दी कि मखलूक बजाते खुद खुदा बन जाती है। बल्कि वो तो बार-बार इस फर्क पर इस डिस्टिंशन पर जोर देते हैं। क्या उनकी अपनी तहरीरों में इसकी वजाहत मिलती है? ताकि यह सिर्फ बाद की तशरीह ना लगे। जी बिल्कुल उनकी मशहूर किताबों फसूसुल हकम और फतूहात मकिया में वो बार-बार खालिक और मखलूक के फर्क को कायम रखते हैं। वो दो तसवुरात के दरमियान तवाजुन की बात करते हैं। तंजीहा और

Frequently asked questions

सबसे आम गलतफहमी यह है कि इस नजरिए का मतलब सब कुछ खुदा है है, जिससे यह तासुर मिलता है कि यह खुदा और मखलूक को एक कर रहा है।

इब्ने अरबी के मुताबिक वजूद की दो बुनियादी किस्में हैं, जिनमें पहली हकीकी और मुतलक वजूद यानी वाजिबुल वजूद है और दूसरी अताई या मुमकिनुल वजूद है।

उनकी किताबों में बार-बार खालिक और मखलूक के फर्क को कायम रखा गया है तथा तंजिया और तशबीहा के दो तसवुरात के दरमियान तवाजुन की बात की गई है।