Terapanth · Transcript · · Updated
जैन रामायण~व्याख्यानकार:- युवाचार्यश्री महावीर - Episode 01- 27 September 2026 - JVB Ladnun – Transcript
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Summary
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- राम यशो रसायन ग्रंथ का संपादन तेरापंथ धर्म संघ के आद्य अनुशास्ता परम पूज्य आचार्य भिक्षु ने किया था।
- यति केशराज जी द्वारा रचित श्री राम यशो रसायन राजस्थानी भाषा का सत्रहवीं शताब्दी का एक ग्रंथ है।
- वैदिक रामायण में राम को अवतार के रूप में माना गया है जबकि जैन रामायण में राम बलदेव के रूप में उत्पन्न एक महापुरुष हैं।

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Transcript
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कल्याण भाग [गाना गाने की आवाज़] सानम जे गुरु सय मनु सासयती ते हम गुरु सयंम
याम ते हम गुरु सयंम पूयाम तेह हम गुरु [गाना गाने की आवाज़] सयंम पूयाम आहु
तस अभिषेक विशना च लक्षितो मया [गाना गाने की आवाज़] तस्य स्वल्पो
प्याकार विभ भ्रमः परम पावन परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर के श्री चरणों में सभक्ति वंदना राम यशो रसायन एक ऐसा ग्रंथ जिसका संपादन
तेरापन धर्म संघ के आद्य अनुशास्ता परम पूज्य आचार्य भिक्षु ने किया था रामायण के प्रति राम के प्रति भारतीय संस्कृति में हमेशा से ही एक आदर का भाव रहा है। क्योंकि कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं वे ऐसा जीवन जी जाते हैं जो मानो
सदियों सदियों शताब्दियों शताब्दियों तक आने वाली पीढ़ियों को एक प्रेरणा देती जाती है। [गला साफ़ करने की आवाज़] हम श्री राम यशो रसायन यति केशराज कृत रामायण का वाचन करें उससे पहले हम सर्वप्रथम नमिनाथ भगवान की स्तुति करेंगे। नमनाथ
अनाथो [गाना गाने की आवाज़] नाथ रे नित्य नमन कर जोड़ी हाथो [गाना गाने की आवाज़] रे कर्म काटण वीर विख्यातो प्रभु स्वामी
नाथ [गाना गाने की आवाज़] जी मुझे प्यारा रे मुझे प्यारा प्राण आधारा प्रभु नथ जी मुझ प्यारा रे
प्रभु ध्यान सुधार ध्याया पद [गाना गाने की आवाज़] केवल जोड़ी पाया रे गुण [गाना गाने की आवाज़] उत्तम उत्तम
आया प्रभु प्रभु नथ जी [गाना गाने की आवाज़] मुझे प्यारा प्रभु बाण विशालो
रे खीर [गाना गाने की आवाज़] समुद्र थी अधिक रसालो रे जग [गाना गाने की आवाज़] तारक दीन दयालु प्रभु नथ जी [गाना गाने की आवाज़]
मुझ प्यारा थाप्या तीथ [गाना गाने की आवाज़] चार [गाना गाने की आवाज़] मिथ्या हरण [गाना गाने की आवाज़] मुंद जान
सेवत सुर न वृंदो प्रभु नाथ जी [गाना गाने की आवाज़] प्यारा सुर अनुत्त [गाना गाने की आवाज़] ना से
प्रश्न पूछा उत्तर जिन दे [गाना गाने की आवाज़] अवधि ज्ञान [गाना गाने की आवाज़] हर जान ले प्रभु नथ जी [गाना गाने की आवाज़] मुझ प्यारा
हां बैठा तुम ध्यान ध्यावर रे तुम योग [गाना गाने की आवाज़] मुद्रा च तचा तपण आप [गाना गाने की आवाज़] भावना भावे
प्रभु नथ जी मुझ प्यारा उग [गाना गाने की आवाज़] से आसो उदारो कृष्ण चौथ गाया गुण [गाना गाने की आवाज़] धोर
हो आंद हर्ष अपारो [गाना गाने की आवाज़] प्रभु नथ जी मुझे प्यारा [गाना गाने की आवाज़] मुझे प्यारा प्राण
आधारा प्रभु नथ जी मुझ प्यारा रे परम पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद थे। इससे पूर्व
सन 2023 के मुंबई चतुर्मास में और सन 2024 के सूरज चतुर्मास में भी श्री राम रसो रसायन के वाचन का अवसर मिला था। और इस बार भी परम पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से ही यह क्रम प्रारंभ हो रहा है। हम श्री राम के बारे में जानने के लिए जितने उत्कंठित
हैं, हमें इस बारे में चिंतन करना है कि राम का चरित्र हमारे जीवन में कैसे आए। वह संस्कृति सफल होती है जो कर्तव्य निष्ठ व्यक्तियों को जन्म देती है। [गला साफ़ करने की आवाज़] वह शताब्दी सफल होती है जो कर्तव्य की धारा को सतत प्रवाही बनाकर जनजन तक पहुंचाती है। और वह
परंपरा सफल होती है। जो कर्तव्य का बोध देती है। कर्तव्य निष्ठा की पारदर्शी आभा जब चारों ओर बिछती है तो वहां का वातावरण बदल जाता है। और आज इस बात की आवश्यकता है कि पूजा प्रतिष्ठा मान सम्मान सुख सुविधा की अर्थहीन चिंता छोड़ के मानव अपने जीवन
को कर्तव्य के लिए समर्पित कर दें। यह बात परिवार और समाज के लिए जितनी लागू है, धार्मिक संगठनों के लिए भी उतनी ही लागू है और उतनी ही लागू है। आज के भारतीय राजनीतिक दलों पर हमारे जीवन में मोहनीय कर्म का प्रभाव होता है और उसमें सबसे सशक्त मोहनीय कर्म का प्रभावशाली जो
व्यक्तित्व जो एक अंग है वह लोभ है लोभ सत्य का सबसे बड़ा बाधक तत्व है प्रामाणिकता ईमानदारी सच्चाई इन सबको समाप्त करने की क्षमता रखने वाला तत्व लोभ है और जिसके मन में लोभ है आकांक्षा है आसक्ति है वहां सत्य टिक नहीं सकता हम सबको यह निर्णय करना है कि हमें सिर्फ
महापुरुषों के नाम का स्मरण करना है या वैसा बनना भी है। सिर्फ राम का नाम, कृष्ण का नाम, महावीर का नाम, बुद्ध का नाम जपते हैं। किंतु काम उल्टा करें तो फिर यह बात अधूरी रह जाती है। कुछ लड़के ऐसे होते हैं कि मां-बाप को प्रणाम तो करते हैं, पूजा सत्कार करते हैं किंतु कहना नहीं मानते
हैं। और आज धर्म की स्थिति भी यही बन गई है कि लोग महापुरुषों का स्मरण करते हैं। राम की पूजा करते हैं। तीर्थंकरों की आदि की पूजा भी करते हैं। किंतु उनके जीवन में वह आदर्श कितना आता है यह उनके लिए एक चिंतनीय विषय बनता है। राम का जीवन एक बहुत बड़ा आदर्श था
निर्लोपता का अनासक्ति का। दशरथ ने कहा कि भरत भरत राज्य करेगा। इतनी सहजता से श्री राम ने उस बात को स्वीकार कर लिया। कोई तर्क नहीं, कोई वितर्क नहीं, कोई ननुनच नहीं। आज का शायद कोई मानव होता तो ऐसी स्थिति बनती या नहीं एक प्रश्न चिन्ह है। किंतु राम जैसे एक ऐसे व्यक्तित्व
जिन्होंने इंद्रिय चेतना के स्तर पर अपना जीवन नहीं जिया क्योंकि इंद्रिय चेतना के स्तर पर जीने वाला व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। मानो कि राम इस जगत के व्यक्ति थे ही नहीं। किसी दूसरी दुनिया के ही व्यक्ति थे, प्राणी थे। उस चेतना के प्राणी थे। जहां सारी बातें संभव बन सकती है। और उसका कारण था उनके भीतर निर्लोपता की चेतना थी।
श्री राम की वह निर्लोपता की चेतना का ही कारण था कि श्री राम उस वैसी स्थिति में भी पिता के निर्देश को स्वीकार करके वनवास के लिए चले गए। अगर राम के जीवन में सुविधावादी दृष्टिकोण का विकास होता तो श्री राम कभी भी 14 वर्ष तक इस प्रकार जंगलों में कभी नहीं घूमते। वे कितनी सहजता से जंगलों में घूमते रहे। वनवास किया, पद
यात्रा की। मानो पूरी एक साधु की च्या जैसे होती है वैसे ही वे चलते रहे अविराम गति से चलते रहे इतने कष्ट सहे हम कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति ऐसे कष्ट कैसे सह सकता है जिसके भीतर में लोभ है आसक्ति है सुविधा का भाव है वह व्यक्ति जिंदगी में कभी भी इतने कष्टों को सहने का
चिंतन भी नहीं कर सकता किंतु लगता है श्री राम ऐसे महापुरुष थे कि उनके भीतर से सुविधा का या कष्टों की सहष्टता की बात समाप्त हो चुकी थी। उनका जीवन एक सहजता का जीवन था। उन्होंने कष्ट की अनुभूति को भी बड़ी सहजता से स्वीकार किया। बाकी तो राम को जरूरत क्या थी? 14 वर्ष घूमने की। मान