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Lecture 02 – Transcript
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Summary
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- अकीदा तौहीद इस्लाम का बुनियादी सुतून है जिसे तौहीद रूबूबियत, तौहीद उलूहियत और तौहीद अस्माओ सिफात में तकसीम किया जाता है।
- अकीदा रिसालत के तहत अल्लाह ने पैगाम पहुंचाने के लिए नबी और रसूल मुंतखब किए हैं जो मासूम और वाजिबुल इतात होते हैं।
- हजरत मोहम्मद रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद नबूवत और रिसालत का सिलसिला खत्म हो चुका है और आप खातमुन नबीन हैं।

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Transcript
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अस्सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह बरकातहू अजीज तालबा इस्लाम के अकायद के हवाले से आज हम गुफ्तगू करेंगे। मालूम होना चाहिए कि यह अकायद दरअसल वह बुनियादी उसूल और नजरियात होते हैं। बुनियादी अफकार होते हैं कि जिन जिनके ऊपर इंसानी जिंदगी का दारोमदार हुआ करता है। या इंसान हर वक्त जो भी आमाल वो कर रहा होता है उन अकायद का उसके ऊपर असर हुआ करता है। लफजी तौर पर यह अकीदा गिरा
लगाने के मानों में आता है। तो दरअसल अकीदे से मुराद वो नज़रिया, वो थिंकिंग और वो सोच है जो किसी इंसान के साथ हम वक्त मौजूद रहती है। इस्लाम क्योंकि एक मुकम्मल ज़ा हयात है, ये भी कुछ बुनियादी अक़ायद रखता है। तो उन्हीं बुनियादी अक़ायद के बारे में आज हमारी गुफ्तगू होगी। सबसे पहले जो बुनियादी अकीदा जिसके ऊपर इस्लाम की बुनियाद कायम है वो अकीदा तौहीद है।
अकीदा तौहीद यह भी अरबी जुबान का लफज़ है। तौहीद वाहिद से है। इसका मतलब एक होता है। अकेले होना इसका माना होता है। इस्तलाही तौर पर अकीदा तौहीद से मुराद यह है कि अल्लाह की वाहदानियत और अल्लाह को अपने तमामतर मामलात के अंदर और इबादत के अंदर अल्लाह को यता और वाहिद जानना। यह इस्लाम का बुनियादी सुतून है। जो ईमानियात हैं, यह इस्लामी नज़रियात हैं। इस्लामी नज़रियात
और ईमानियात का एक बड़ा जुज़ बुनियादी जूज़ बुनियादी असास दीन इस्लाम की वो यही अकीदा अकीदा तौहीद है। अकीदा तौहीद को समझने के लिए हम इसको तीन अम में तकसीम कर सकते हैं। उनमें से एक जिसे हम तौहीद रूबूबियत के नाम से जिक्र करेंगे। एक जिसे हम तौहीद
उलूहियत और नंबर तीन तौहीद अस्माओ सिफात। अब मैं थोड़ी सी इसकी वजाहत करता चलूं। तौहीद रूबूबियत से क्या मुराद है? रूबूबियत की तौहीद यानी अल्लाह के रब होने की तौहीद। अल्लाह की रूबूबियत। रुबूबियत का मतलब यह है के अल्लाह रब है। यानी वह
खालिको मालिक है। अपनी खलकियत मालिकयत में रजाकियत में वो अकेला है। वो पालनहार है। खालिक वो है। यानी जो भी कायनात में नजर आ रहा है। हमारा खुद अपना वजूद कायनात का वजूद इसको खल्क करने वाली जात अल्लाह की है। इसको चलाने वाली जात अल्लाह की है। इसको संभालने वाली ज़ अल्लाह की है। और
निज़ामे कायनात को संभालने वाली ज़ अल्लाह की है। यानि इस तसवुर को, इस नज़री और अकीदे को कि तमामतर मामलात जिंदगी आसमान और ज़मीन के तसरुफ़ात इनका खालिक मालिक अल्लाह की जात है। यह अकीदा अकीदा तौहीद और तौहीद के अंदर इसको हम तौहीद रूबूबियत के नाम से जानते हैं। के खालिक भी वही है,
मालिक भी वही है, रब भी वही है, पालनहार भी वही है, राज़क भी वही है। और तसव तसरुफ़ात कायनात चलाने वाला भी वही है। हमारे अंदरूनी बैरूनी मामलात को संभालने वाला वो है। उसके इज़्म से कोई चीज़ पत्ता तक भी उसके इज़्म से नहीं गिरता है। जो भी ज़न के ऊपर मामलात तसर्रुफात हो रहे होते हैं, वो अल्लाह के इल्म में है और अल्लाह
के इज़्म से होते हैं। यानी, तौहीद रूबूबियत पालनहारी का की जो अह सिफ़त है, यह अल्लाह के साथ खास है, वह मुख्तस है। और यह सिर्फ और सिर्फ अल्लाह को ज़ेब देती है। यह तौहीद रूबूबियत है। इसी तरह दूसरी एक किस्म जिसको हम समझ सकते हैं तौहीद को समझने के लिए वह तौहीद उलूहियत। उलमा ने आमतौर पर तौहीद को इन तीन हिस्सों में या
तीन अम में जो मुंतसिम किया है ये समझने के लिए। दूसरी किस्म तौहीद उलूहियत। तौहीद उलूहियत यानी उलूहियत की तौहीद या अल्लाह के इलाह होने की तौहीद मतलब यह है कि अल्लाह के अलावा कोई इलाह नहीं है। ला इलाहा इल्लल्लाह कोई इला नहीं है। कोई माबूद नहीं है। इबादत के लायक कोई कोई भी नहीं है। जिसके आगे झुका जाए। जिसके आगे सर तस्लीम खम किया जाए। जिसकी बात को माना
जाए। जिसके आगे अपने जबीने नियाज़ को झुकाया जाए। जिसके आगे रुकू सुजूद किया जाए। तो तौहीद उलूहियत से मुराद अल्लाह को अकेले को इलाह मानना। अल्लाह अकेले को माबूद समझना और अपनी तमामतर इबादात मज़हरे इबादात अराकीने इबादात इबादात के तमाम अजजाओ अकसाम अल्लाह के लिए खास करना मुख्तस करना ये तौहीद उलूहियत है। यानी
दूसरे लफ्जों में हम यह भी कह सकते हैं तो तौहीद उलूहियत का मतलब यह है कि इबादत के अंदर अल्लाह को अकेले मानना उसके साथ किसी और को शरीक ना समझना। किसी और को इबादत के लायक भी ना समझना। तो इसी तरह तीसरे नंबर पर तौहीद जो है ना अस्माओ सिफात के नाम से हम तौहीद की तीसरी किस्म या तीसरे हिस्से को हम याद
करेंगे। तौहीद अस्माओ सिफात से मुराद ये है के अल्लाह की सिफात के जो भी तकाजे हैं उन तकाजों के अंदर और ये के जो दीगर मामलात हैं उनके अंदर अल्लाह की सिफात के अंदर किसी और को शरीक ना समझना। मतलब अल्लाह रहमान है, अल्लाह शफीक है। तो अल्लाह की जो रहमानियत है, अल्लाह का रहम
करना ये रहम बंदों के अंदर ना तो उसकी तशबीह दी जा सकती है, ना उसकी मिसाल दी जा सकती है। ना यानी तौहीद अस्माओ सिफात से मुराद यह है कि अल्लाह की सिफ़ात वो अल्लाह ही की हैं। और ये कि वो उनकी ना तो किसी और के साथ मिसाल दी जा सकती है ना तशबीह दी जा सकती है। तो अल्लाह का किसी भी
दुनियावी मखलूकात के अंदर लस का मिसली श के तहत कि अल्लाह का मिसल कोई भी नहीं है। अल्लाह की सिफात को अल्लाह के साथ खास करना ये तौहीद अस्मा और सिफात के नाम से इसको याद किया जाता है। मैं दोबारा दोहरा देता हूं कि तौहीद अकीदा ए तौहीद अक़ायद में से पहला बुनियादी अकीदा अकीदा ए तौहीद है। अकीदा तौहीद से मुराद अल्लाह को अकेले मानना। अल्लाह को अकेले मानना किस एतबार
से? तीन हैसियतों और तीन एतबार से हम उसको जिक्र करना चाह रहे हैं। उनमें से पहला हिस्सा अकीदा तौहीद तौहीद रूबूबियत। अल्लाह को रब मानने में अकेला समझना। नंबर दो अकीदा तौहीद में तौहीद उलूहियत यानी इबादत के अंदर सिर्फ अल्लाह का हक जानना कि मुस्तहिक इबादत सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की जात है यानी रुकू सुजूद करना नमाज़ करना दुआएं मांगना अपना दस्ते सवाल दराज करना
ये सारी चीजें कि जिनके अंदर इंसान मांगता है इल्तजा करता है दुआ करता है झुकता है ये सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिए खास है ये तौहीद उलूहियत और नंबर तीन अल्लाह की सिफात को अल्लाह के लिए खास समझना आसमा सिफात यानी उसमें लोगों के साथ उसकी मुशाबहत नहीं हो सकती। दुनियावी माम किसी भी चीज़ के साथ ना मुशाबत हो सकती है ना उस वो बेनज़र है। वो
अकेला है वाहद ला शरीक है। उसकी तशबीह नहीं दी जा सकती। उसकी तमसील नहीं दी जा दी जा सकती। ये तौहीद अस्मा और सिफात है। ये पहला जो बुनियादी अकीदा अकीदा तौहीद के हवाले से मैंने थोड़ी सी गुफ्तगू की है। मजीद हम इसकी वजाहत करते चलते हैं कि अल्लाह के मौजूद होने के इंसानी तारीख के अंदर अगर देखा जाए तो हमेशा से इंसानी अक्सरियत अल्लाह को मानती रही है।
अल्लाह को मानना है। अल्लाह को तस्लीम किया है। लेकिन बात यह है कि अल्लाह को मानना हमने अपने अह ज़हन के मुताबिक नहीं होता। इसकी कुछ निशानियां मौजूद हैं। अल्लाह के मौजूद होने पर बेशुमार निशानियां इंसान अपनी जात के अंदर देख ले बाहर को देख ले वो आफ़ाक अनफुस में देखे तो अल्लाह के वाहिद होने की, अल्लाह के खालिक होने की उसको बेशुमार दलाइल, अल्लाह के रब
होने के दलाइल, अल्लाह के माबूद होने के दलाईल उसको मिलेंगे। मसलन व आयात मुकिनीन और जमीन में यकीन रखने वालों के लिए निशानियां है। कुरान पाक की आयत मुबारका है। व अनफसला तसून और तुम्हारी अपनी जात के अंदर भी निशानियां मौजूद है। क्या तुम देखते नहीं हो? यानी इंसान अगर अपनी तखलीक को देख ले तो वो खालिक तक पहुंच सकता है। इंसान ज़ में बिखरी चीजों को, मखलूकात को,
आसमानों, जमीन को, सितारों को, सूरज को, चांद को, पहाड़ों को, पत्थरों को, दरियाओं को देख ले। इन फलों फूलों को देख ले, जायकों को रंगों को देख ले तो वो अल्लाह के खालिक होने पर जो है ना उसका ज़हन अल्लाह के खालिको मालिक होने पर उसको लेके जाएगा। अल्लाह के खालिक होने का अकीदा यानी अल्लाह इलाह को मानना तो दुनिया की अक्सरियत मानती है। तो इलाह है कौन? ये
अल्लाह है। अल्लाह के इलाह होने की दलील वो ज़हरी नज़र आने वाली चीज़ भी मौजूद है। इसी तरह अल्लाह लदीज़ खलका अलदीज़ खल समा फत अगर इस आयत मुबारका को देख लें कि किसने सात आसमान बनाए हैं। इनको एक दूसरे के ऊपर रखा है। ये अल्लाह की तखलीक है। क्या इसके
अंदर कोई कजी, कोई कमी, कोई फर्क तुम्हें नज़र आता है? बार-बार तुम देख लो फर्ज बसा हल तन फतूर तो ये अल्लाह के खालिक होने के दलाइल है। इसी तरह आप यह देख सकते हैं कि जो अकीदा तौहीद है इसकी इतनी अहमियत है अकीदा तौहीद की ये इस्लाम का एक ना सिर्फ ये कि बुनियादी अकीदा है बल्कि इंसानी जिंदगी को अगर देखा जाए तो इंसानी जिंदगी
की इस्लाह का दारोमदार ये तौहीद इलाही को यानी अल्लाह के वाहिद होने को मानने पर मौकूफ है। दीन की बुनियाद है ये। अक़ीदा तौहीद दीन इस्लाम की बुनियाद है। और इस्लामी तालीमात का इहसार ही इसके ऊपर है। जो बंदा अक़ीदा तौहीद को तस्लीम नहीं करता। जो बंदा अक़ीदा तौहीद को नहीं मानता वो दायरा इस्लाम में दाखिल ही नहीं हो सकता। दायरा इस्लाम में दाखिल होने का एक
बुनियादी जो नुक्ता है वो अल्लाह को एक मानना और तौहीद को तस्लीम करना है। और ये तौहीद इंसानी अखलाक को भी सवारती है। कैसे सवारती है? तौहीद रखने वाला तौहीद पर ईमान लाने वाला शख्स अपने अखलाक को बेहतर करता है। वो जानता है कि उसकी जिंदगी का मकसद अल्लाह की रिजा है। उसकी जिंदगी का मकसद वो अपनी मकसद जिंदगी को जानता हो। जो शख्स अपने मकसद जिंदगी को जानता है उसकी जिंदगी
वो बेनिफिशियल होगी। जो शख्स अपने जिंदगी मकसद जिंदगी से वाकिफ ही नहीं है। उसकी जिंदगी वो इंसानियत के लिए मुफीद नहीं हो सकती। तो लिहाजा अकीदा तौहीद ये इंसानी जिंदगी के मुफीद होने के लिए भी जरूरी है। अकीदे तौहीद की वजह से इंसानियत का की शख्सियत उजागर होती है। रूहानियत मजबूत होती है। मुआशरे के अंदर अकीदे तौहीद
बेहतरीन असरात पैदा करता है। और तौहीद ही की तालीमात है कि जो लोग सही मानों में तौहीद को समझते जानते हो, तस्लीम करते हो वो मुआशरे के अंदर इंसाफ के अद के अलमबरदार बन जाते हैं। और अकीदा तौहीद ही दरअसल अमन की और अमने आलम की जामिन है। और यह बतलाती है कि अल्लाह के सामने तमाम इंसान बराबर हैं। लिहाजा कोई ताकतवर अपने
से कमजोर के ऊपर जुल्म ना ढाए। यानी अकीदा तौहीद हमारी मुआशरती अदार रिवायत के लिए अमनो अमान के लिए यह बड़ा अहम और बुनियादी किरदार भी अदा करता है। अकीदा तौहीद के बाद दूसरा बड़ा अकीदा अकीदा रिसालत है। ये अकीदा रिसालत मैं इस पर गुफ्तगू करने से कब्ल मैं ये भी जिक्र करता चलूं के अल्लाह को एक मानना अल्लाह की तौहीद को मानना
अल्लाह की अस्माओ सिफात को तस्लीम करना ये अकीदा बुनियादी इस्लाम में मौजूद है। ताम अल्लाह को इंसान अपने खुद गौर फ़िक्र करे तो उसके जाहरी बातनी अंदरूनी खारजी बहुत सारे दलाइल हैं। अल्लाह की तौहीद पर दलालत करते हैं। लेकिन इंसानी फ़िक्र ठोकर खा सकती होती है। और उसको जिस तरह उसने अल्लाह को और अपने रब को पहचाना होता है।
उसमें उसको गलतफहमी हो सकती है। उस गलतफहमी का सही इज़ाला वो अकीदा रिसालत के ज़रिए से होता है। वेरिफिकेशन तौहीद की वेरिफिकेशन रिसालत के जरिए से है। रिसालत यानी अल्लाह ताला ने दुनिया तक अपना पैगाम पहुंचाने के लिए दुनिया तक लोगों तक अपना पैगाम पहुंचाने के लिए कुछ लोगों को मुंतखब किया है। अल्लाह की ये मुंतखब