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Lecture 01 – Transcript

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  • दीन इंसान की बुनियादी जरूरत है जो जिंदगी में नज़्म व ज़ब्त, रूहानी जरूरतें और अखलाकी पहलू को पूरा करता है।
  • इस्लाम अपने अंदर आलमगीरियत, रैशनलिटी, तवाजुन और एतदाल, जस्टिस और प्रैक्टिकल अप्रोच रखता है।
  • कुरान मजीद कुरान अजीम अल्लाह तबारक व ताला की आखिरी किताब है जो आखिरी नबी पर नाजिल हुई है।
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Transcript

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आउजब्लाह मिन शैत रजीम बिस्मिल्लाह रहमानिर्रहीम इस्लामियात लाजमी के मौजुआत में से इ्तदाई मौजू जो है वो दीन का मौजू है दीन की जरूरत और अहमियत का मौजू है। दीन की जरूरत और अहमियत इंसानी जिंदगी में गैर मामूली नयत की है। अब तक इंसानों ने जो तहकीकात की हैं, उन तहकीकात के नतीजे में यह बात सामने आई है कि तमाम इंसानी मुआशरों के

अंदर मज़हब या दीन का तसवुर मौजूद रहा है। अपने खालिक से ताल्लुक कायम करने की, अपने खालिक के बारे में जानने की ख्वाहिश इंसान के अंदर फितरतन मौजूद है। यही वजह है कि अहले दीन का अहले मजहब का यह नुक्त नजर है कि मजहब इस कायनात में अज़ल से मौजूद है। हम ये देखते हैं कि इंसान अपनी फितरत में कुछ बुनियादी सवालात रखता है। जैसा कि मैं कौन हूं? मुझे किसने बनाया है? मुझे क्यों

बनाया गया है? मेरा और खालिक का ताल्लुक किस नोइयत का है? मेरा और इस कायनात का रिश्ता ताल्लुक किस नोइयत का है? ये वो बुनियादी फितरी सवालात हैं जो इंसान अपने जेहन के अंदर पाता है और इन सवालात के जवाबात चाहता है। इन सवालात के जवाबात देने के लिए उसे दीन का डिसिप्लिन मिलता है। दीन का मैदान मिलता है। दीन इंसान की बुनियादी जरूरत है। जैसा कि मैंने जिक्र किया और हम ये देखते हैं कि दीन इंसान को

नज़्मो ज़ब्त सिखाता है। दीन इंसान की जिंदगी के अंदर डिसिप्लिन लेकर आता है। दीन की वजह से इंसान अपनी जिंदगी के उस स्पिरिचुअल पहलू को, स्पिरिचुअल एस्पेक्ट को जो है वो फुलफिल करने की कोशिश करता है और जो रूहानी जरूरतें इंसान की उनको दीन पूरा करता है। इसी तरीके से दीन का एक बहुत बड़ा किरदार जो है वो इंसान की जिंदगी में अखलाकी पहलू के एतबार से है। इंसान का इंफरादी अखलाक हो या किसी भी

मुआशरे का इज्तिमाई अखलाक हो। दीन इस मैदान में बहुत मरकजी और बुनियादी किरदार अदा करता है। इसी तरीके से दीन जिस सिखाता है कि जो दुनियावी कवानीन है उनकी भी पासदारी करनी है और वो जो इंतजामी एतबार से रियासतें तय करती हैं वो शहरियों को इनफरादी तौर पर भी और समाज के अंदर रहने वाले तमाम लोगों को इज्तमाई तौर पर भी पूरी करनी होती है। इसी तरीके से दीन जो है यह वह इंसान को नज़्मो ज़बत सिखाने के

साथ-साथ इंसान के अंदर यह जज्बा पैदा करता है कि वह दूसरों के साथ भी हुस्ने सुलूक करे। इसलिए कि दीन जो तालीमात देता है वो तालीमात अदिल की हैं। वो तालीमात तकवा की हैं। अल्लाह का डर पैदा करने की हैं। और दूगर लोगों के साथ जो है वो हुस्ने सुलूक को करने और हुकूक कुल इबाद को पूरा करने का नाम दीन है। या दीन की बुनियादी तालीमात में यह मज़मून पिनहा है। हम ये देखते हैं कि इंसानी तारीख के अदियान में

एक मुमताज दीन जो है वो इस्लाम का दीन है। और इस्लाम वो दीन है कि जो इस वक्त दुनिया के बड़े अदियान में शुमार किया जाता है और दुनिया में तेजी से फैलता हुआ दीन है। इस्लाम का जब हम लुगवी तौर पर मतलब देखते हैं अगर हम इसकी लिंग्विस्टिक एप्लीकेशन की बात करें तो इस्लाम का मतलब सलामती है और जो आदमी इस्लाम कबूल करता है वो सलामती के दायरे में दाखिल होता है। ना सिर्फ वो सलामती के दायरे में दाखिल होता है बल्कि

दीगर लोग उससे सलामती पाते हैं। और इसी तरीके से इस्लाम का एक मतलब ये है कि मफूम जो है वो आले इल्म ने घुटने टेकना भी करार दिया है टू नील डाउन जैसे अंग्रेजी में इस्तलाह इस्तेमाल होती है कि इंसान अपने आप को अल्लाह के सामने पेश करता है और इस चीज का इज़हार करता है कि वो अल्लाह के सामने झुक रहा है और अब उसके ऊपर उसकी मर्जी नहीं चलेगी बल्कि वो क्रिएटर की खालिक की मर्जी के सामने सरेंडर कर रहा है

और खालिक को अपने अपने कायद के तौर पर अपने रहनुमा के तौर पर जो है वो तस्लीम कर रहा है कि अब उसकी मज़ियात को वो अपनी जिंदगी का रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाएगा। इस्लाम दुनिया के दीगर अदियान से कई पहलुओं के ऐतबार से एक मुमताज दीन है। एक तो हम ये देखते हैं कि इस्लाम के अंदर एक आलमगीरियत का तसवुर मौजूद है। इस्लाम जिंदगी के तमाम दायरों के बारे में ह्यूमन लाइफ के तमाम फंडामेंटल स्फीयर्स के बारे

में तालीमात देता है और वो ये दावा करता है कि वो इंसानी जिंदगी के तमाम एहत पहलुओं का एहाता करता है। इस्लाम के इस आलमगीर पैगाम के साथ-साथ इस्लाम वो दीन है कि जो अपने अंदर रैशनलिटी रखता है। इस्लाम अकल, अकलियत यानी अकल पर पूरा उतरता है। अकल के मयारात पर पूरा उतरता है। और इस्लाम की जो तालीमात हैं वो इस ऐतबार से इंसानी ज़हन को मुतम करती हैं। इसी तरीके

से इस्लाम का एक बहुत बड़ा इम्तियाज़ बैलेंस्ड अप्रोच है। तवाजुन और एतदाल है। बहुत सारे अदियान के अंदर मफकूद है। इस्लाम इंसानी जिंदगी की तमाम जहतों के हवाले से एतदाल बरतता है और इंसान इंसान की जो हैवानी ख्वाहिशात है या इंसान की पर्सनालिटी का जो एनिमलिटी का पर्सपेक्टिव है या एस्पेक्ट है उस हवाले से भी रहनुमा तालीमात देता है और जो स्पिरिचुअलिटी है

उस पर तो खासतौर पर इस्लाम फोकस करता है लेकिन इस्लाम का फंडामेंटल नुक्त नज़र ये है कि इंसान की जो स्पिरिचुअलिटी है उसकी एनिमलिटी पर गालिब रहेगी तो इंसानी जिंदगी जो है वो बेहतर तरीके से आगे बढ़ सके थी। इसी तरीके से इस्लाम का एक बहुत बड़ा इम्तियाज़ जस्टिस है और जस्टिस पर स्ट्रेस है। हम ये देखते हैं कि मोहम्मद अल सलातो सलाम नबी अल सलातो सलाम जो सिलसिले नबूवत की आखिरी कड़ी हैं। आप अल सलातो अस्सलाम ने अपने घर वालों के हवाले से भी ये कहा

कि हजरत फातिमा रज़ अल्लाह ताला अन्हा के हवाले से जो रिवायत है कि अगर फातिमा बिंते मोहम्मद भी चोरी करेगी तो उनके हाथ कटेंगे। ये जस्टिस और ये जो अदल है ये नबी अल सलातो अस्सलाम ने हमें दिखाया है और इस्लाम की पूरी तारीख के अंदर हम इसके नज़ा जो है वो देख सकते हैं। इसी तरीके से इस्लाम का एक बहुत अहम पहलू या इम्तियाजी पहलू हम ये समझते हैं कि वो प्रैक्टिकल अप्रोच है या प्रैक्टिकिटी है और मोहम्मद अल सलातो सलाम की सीरत तबा की सूरत में

इस्लाम ने जो है वो अमली तौर पर अपनी तालीमात को अमल करके दिखाया और दुनिया ने ये चीज देखी और आज हम देखते हैं कि दुनिया में हर चौथा बंदा जो है वो मोहम्मद रसूल्लाह ससल्लम का मानने वाला है। तो इस्लाम अपनी बुनियादी तालीमात के एतबार से, अपनी अमलियत के ऐतबार से, अपनी आलमगीरियत के ऐतबार से वो गैर मामूली दीन है कि जो इस वक्त दुनिया के अंदर मौजूद है और हम ये देखते हैं कि दुनिया की एक बड़ी

तादाद जो है वो इस्लाम का मुताला भी कर रही है और इस्लाम की तरफ रगबत भी रखती है। तमाम अदियान के पास जो हम देखते हैं कि जो रिलीजियस लिटरेचर है या उनके पास महफूज़ है। उस मजहबी अदब के अंदर जो सबसे अहम चीज होती है वो उस दीन या मजहब की वो मजहबी किताब है कि जो वो मजहब रखता है। हम ये देखते हैं कि इंसानी तारीख में बहुत सारे अदियान मौजूद रहे हैं और अब भी मौजूद हैं।

तीन बड़े अदियान जैसे यहूदियत है, मसीहियत है और इस्लाम है। ये सेमेटिक रिलीजंस कहलाते हैं। सामी अदियान कहलाते हैं। और ये तीनों अदियान इनके मानने वाले इस वक्त दुनिया में मौजूद हैं। इनके अलावा जो नॉन सेमिट्रिक रिलिजंस हैं जो गैर सामी अदियान हैं उनकी भी एक बड़ी तादाद दुनिया में मौजूद है। बहुत सारे ऐसे अदियान हम देखते हैं कि इंसानी मुशरों के अंदर आज भी मौजूद हैं कि जिनके पास जो है वह आसमानी किताबों का दावा नहीं है या वो आसमानी किताबें नहीं रखते हैं या उनके पास भी कोई ऐसी

बड़ी किताब कि जिसको वो कहें कि ये रेवोल्यूशन की सूरत में उनकी किसी शख्सियत पर किसी पर्सनालिटी पर नाजिल हुई है और उनके पास आज मौजूद है। इस्लाम का एक बड़ा इम्तियाज ये है कि इसके पास कुरान मजीद की सूरत में वो अजीम किताब मौजूद है कि जिस किताब के बारे में मोहम्मद अली सलातो सलाम ने ये कहा था कि ये किताब जो है वो लोगों को उठाती भी है और लोगों को ज़बाल से भी दोचार करती है। जो लोग इससे ताल्लुक कायम करते हैं। इससे ताल्लुक मजबूत करते हैं।

इसकी रोशनी में अपनी इंफरादी और इज्तिमाई जिंदगी की तामीर करते हैं। वो यकीनन उरूज पाते हैं। और जो लोग इसको पसे पुश्त डालते हैं। वो ज़वाल का शिकार होते हैं। कुरान अज़ीम अल्लाह तबारक व ताला की आखिरी किताब है जो मोहम्मद रसूल वसल्लम यानी आखिरी नबी पर नाज़िल हुई है और जनाबे जिब्रील अमीन के जरिए नाज़िल हुई है। कुरान अज़ीम से पहले जो किताबें नाज़िल हुई हैं इलहामी किताबों के अंदर तो हम ये देखते हैं कि वो किताबें अपनी असली फार्म में अपनी जेन्युइन फॉर्म में मौजूद ना रह सकी। इसलिए कि उनकी

हिफाज़त का जिम्मा जो है वो अल्लाह ने इंसानों पर डाला था और इंसानों ने उस तरीके से उनकी हिफाज़त नहीं की जिस तरह की उनकी हिफाज़त की जानी चाहिए थी। तो वो डिस्टॉर्शन का शिकार हुई, तहरीफ़ का शिकार हुई। वो वो तरात हो कि जिसके बारे में खुद तोरा के मानने वाले ये मानते हैं कि तोरा जो है वो पांच से ज्यादा दफा दुनिया में ऐसा हुआ कि मफकूद हो गई और फिर हाफसे की बुनियाद पर लिखी गई। इसी तरीके से अनाजील के अंदर भी बहुत सारी चीजें हम देखते हैं कि तहरीफ की वजह से जो है वो सामने आई।

लेकिन कुरान अजीम अपनी जेन्युइन फॉर्म में आज भी मौजूद है। कुरान का मतलब जो है वो पढ़ना है और पढ़ी जाने वाली किताब है और अल कुरान यानी खास किताब खास यानी तखसी हो गई अलिफ लाम के लगने से। तो ये वो खास किताब है कि जो पढ़ी जा रही है। सूर हिज्र के अंदर आयत नंबर नौ में अल्लाह तबारक व ताला ने खुद इसकी हिफाजत का जिम्मा लिया। जब अल्लाह ने फरमाया आउजब्लाह मिन शैतजीम बिस्मिल्लाह रहमान रहीम इन नल जिक्र व

इनहु हाफिजून कि बेशक हम इस जिक्र के नाज़िल करने वाले हैं और हम ही इसकी हिफाज़त करेंगे। यही वजह है कि ये किताब आज भी अपनी जेन्युइन फॉर्म में मौजूद है और हर दौर में मुसलमान आले इल्म ने इस किताब की अहमियत को मद्देनजर रखा है और इसको अपनी तहकीक का मौजू भी बनाया है। कुछ अरसा पहले हिंदुस्तान के एक बहुत बड़े आलिम जो इस वक्त दुनिया से चले गए हैं। उन्होंने एक किताब मुरत्तब की जिसको उन्होंने मान दिया

कुरान का कुरान के अबदी मतन का एजाज। ये वो किताब है जो डॉ. मोहम्मद मुस्तफा आजमी ने मुरत्तब की है। और ये वो गैर मामूली किताब है जिसके अंदर डॉ. मोहम्मद मुस्तफा आजमी ने कुरान अज़ीम की सिर्फ एक सूरत का इंतखाब किया। सूरह बनी इसराइल का और दुनिया भर के अंदर इस सूरत के 19 मखतूत का जायजा लिया जो इस वक्त भी मौजूद हैं जो दुनिया की मुख्तलिफ लाइब्रेरीज में मौजूद हैं और इन नुस्खों के अंदर इन मखतूत के

अंदर सदियों का फर्क भी है। लेकिन इनके अंदर जो मौजूद मतन है जो आयात हैं उनमें कोई फर्क मौजूद नहीं है। 14 सदियों पर मुश्तमिल सिर्फ ये सूर जो जिसका इंतखाब किया डॉक्टर मुस्तफा आजमी ने। तो ये अपनी जेन्युइन फॉर्म में मौजूद है। इंपिरिकल एविडेंस की आज दुनिया में बड़ी अहमियत है। तो ये वो इंपेरिकल एविडेंस है जो मुस्लिम्स अपने पास रखते हैं। ये कुरान अजीम जो है वो इसका मतन जो है इसकी जो ज़बान है जिसान में ये नाज़िल हुआ है।

जिब्रील अमीन के जरिए मोहम्मद अल सलातो सलाम के कलबे अतहर पर ये उसी तरीके से आज मौजूद और महफूज़ है। कुरान अज़ीम जो है वो मुसलमानों की एक रहनुमा किताब है। जिस तरीके से हर किताब का एक उनवान और मौजू होता है। कुरान अज़ीम का भी एक मौजू है। और कुरान कुरान अजीम का मौजू इंसान है। कुरान अजीम इंसान को डील करता है। इंसान की शख्सियत के हवाले से, उसके किरदार के हवाले से, उसके रवयों के हवाले से, इंसान

को रहनुमाई देता है। और मां कबल कुरान अज़ीम जो इंसानियत ने जिंदगी गुजारी है। उसके नज़ा भी कुरान अज़म ने महफूज़ किए हैं और मुरत्तब किए हैं। कुरान अज़म की सूरत में वो आगे भी मुंतकिल हुए हैं। कुरान अज़ीम मोहम्मद अल सलातो सलाम कलबे अतर पर नाज़िल हुआ और आपने अपनी जिंदगी में इसकी तहफीज़ का एतमाम फरमाया और सहाबा इकराम की एक पूरी टीम थी जो कुरान अज़ीम को बकायदा लिखा करती थी। उस दौर में कागज़ तो मौजूद

था लेकिन अरब के अंदर दस्तियाब नहीं था। इसलिए कुरान अज़ीम को मुख्तलिफ़ चीजों पर लिखा जाता था। जैसे जो है वो लकड़ी के ऊपर कुरान अज़ीम को लिखा गया। झिल्ली के ऊपर लिखा गया। खास तरह के पत्ते थे। उनके ऊपर कुरान अज़ीम को लिखा गया। तो कुरान अज़म को लिखने का एतमाम मोहम्मद अल सलातो सलाम ने अपनी जिंदगी में करवाया और पूरा कुरान अज़म मोहम्मद अल सलातो सलाम की जिंदगी में लिखा हुआ मौजूद था। हम ये देखते हैं कि उसके बाद जनाबे अबू बकर सिद्दीक रज़ अल्लाहहु

ताला अनो का दौर आता है। तो जनाबे अबू बकर सिद्दीक रज़ अल्लाह ताला अनो ने भी कुरान अज़म की तहफ़ज़ का एतमाम किया। जंग यमामा के अंदर चकि बहुत ज्यादा सहाबा शहीद हो गए और वो हुफाज़ साहब सहाबा थे। इसलिए हजरत उमर फारूक रज़ अल्लाह ताला अन ने मशवरा दिया कि कुरान अज़म की महफूज़ का गैर मामूली एतमाम इस तरह कर दिया जाए कि उसकी उसको जमा बैन दफतन कर दिया जाए कि दो जिल्दों के अंदर इसको बाकायदा मुरत्तब कर दिया जाए। एक दस्तावेज की सूरत में एक किताब की सूरत

में तो हजरत अबू बकर सिद्दीक रज़ अल्लाह ताला अनो का ये कारनामा है कि उन्होंने कुरान अज़म को जमा बैन दफतन किया और दो जिल्दों के अंदर कुरान अज़म जो है वो मुरत्तब और महफूज़ हुआ। कुरान अज़ीम जिस तरतीब से नाज़िल हुआ, हम ये तस्लीम करते हैं और वो मानते हैं कि वो तरतीबे नज़ूली है और वो तरतीब जो है कुरान अज़ीम के अंदर आज उस तरीके से मौजूद हम नहीं पाते। वजह ये है कि मोहम्मद अल सलातो सलाम ने जो इसको तरतीब दी है जिसे तरतीबे तौकीफी कहते

हैं। अब मुसलमानों के नजदीक वही तरतीब जो है वो काबिल एतमाद है और मुसलमान उसी पर बिलीव करते हैं और उसी के मुताबिक कुरान अज़म को पढ़ते हैं। हम ये जानते हैं सही बुखारी के अंदर रिवायत है कि कुरान अज़ीम जब मोहम्मद अल सलातो सलाम पर सबसे पहले नाज़िल हुआ तो इब्तदाई वही जो है वो इरा के अल्फ़ाज़ के साथ जो है वो नाज़िल हुई और इब्तदाई आयात सूरह अलक की जो है वो नाज़िल हुई। लेकिन हम उसको कुरान अज़म के आखिरी पारे में पाते हैं। और आज कुरान अज़म का

आगाज़ जो है वो उससे नहीं हो रहा। तो वजह यह है कि कुरान अज़म को मोहम्मद अल सलातो सलाम ने अपनी हयात तबा में तरतीब दिलवाई कि जिसे हमें तरतीबे तौकीफ़ के तौर पर जानते हैं। कुरान अज़म जो है वो हर दौर में इंसान की रहनुमाई करता रहा है और करता रहेगा। मुसलमानों का यह दावा है कि इसकी जो तालीमात है वो लाजवाल हैं और हर दौर के लिए है और यह उसूलों की किताब है। जैसा मैंने जिक्र किया कि इसका बुनियादी मौजू इंसान है और फिर यह इंसानी जिंदगी के तमाम

Frequently asked questions

इस्लाम का मतलब सलामती है और आले इल्म ने इसका मफूम घुटने टेकना यानी खालिक की मर्जी के सामने सरेंडर करना भी करार दिया है।

अल्लाह तबारक व ताला ने खुद कुरान मजीद की हिफाजत का जिम्मा लिया है।

कुरान अजीम का सबसे बुनियादी हक़ यह है कि इसके ऊपर ईमान लाया जाए और ताज़म का तकाजा पूरा किया जाए।
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