Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Why Did the Prophet Want to Return? | Unveiling the Barzakh | Fuss 26 | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्सलाम ज़हूर इस्लाम से जरा पहले के एक ऐसे नबी थे जिनकी नबूवत का रंग आलम गैब से जुड़ा हुआ था.
- हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम से वादा किया था कि वफात के बाद वह कब्र से उठकर बरजख के मुशाहिदे के बारे में बताएंगे.
- शेख-ए-अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलैह हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्सलाम की नबूवत को नबूवत बरजखिया का नाम देते हैं.

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Transcript
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मौत के बाद क्या होता है? यह वो सवाल है जिसका जवाब जानने के लिए इंसान हमेशा गैब के पर्दों में झांकता रहा है। हमें अंबिया अलह सलाम ने मौत और आखिरत के बारे में खबरें दी और हमने उन पर ईमान लाया। मगर अगर कोई शख्स यह कहे कि मैं मौत के बाद बरजख के अहवाल का मुशाहदा करूंगा और फिर वापस आकर तुम्हें बताऊंगा कि वहां क्या
हकीकत है। शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्सलाम का एक ऐसा ही अजीब वाक्या बयान करते हैं। हजरत खालिद बिन सनान अलहिसलाम ने कहा जब मैं मर जाऊं मुझे दफन कर देना। फिर जब एक निशानी जाहिर हो तो मेरी कब्र खोलना। मैं तुम्हें बताऊंगा कि मौत के बाद क्या होता है। मगर जब वह वक्त आया तो उनकी अपनी कौम ने उन्हें जाया कर
दिया। आखिर क्यों? और शेख-ए अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलह हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्स ससलाम के इस वाक्य में हिकमते समदिया क्या देखते हैं? आइए इस हिकमत को समझते हैं। जी बिल्कुल। और इससे पहले कि हम इस वाक्य की मतलब गहराई में उतरें। एक बुनियादी सवाल जो मैं सोचती हूं कि सबसे पहले वाज़ होना चाहिए वो यह है कि हजरत खालिद बिन सनान अलैह सलाम आखिर थे कौन?
हम ये बहुत अहम सवाल है। क्योंकि तारीख की किताबों में हमें आमतौर पर उनका जिक्र इस तरह नुमाया नहीं मिलता जैसे बाकी अंबिया का मिलता है। यह तारीख की खामोशी क्यों है? देखिए ये जो तारीख की खामोशी है ना यही तो दरअसल उनकी कहानी का एक बहुत बड़ा राज है। अगर हम उनके तारुफ की बात करें तो हजरत खालिद बिन सनान अल सलाम ज़हूर इस्लाम से जरा पहले के नबी थे। सही। इनका ताल्लुक बनू आबस के कबीले से था और
रदन के आसपास का इलाका था। और सबसे अहम बात जो ज़हन में रखने वाली है वो यह है कि इनका जमाना रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि व आह वसल्लम के जाहिरी जमाने के इंतहाई करीब था। और तारीख में उनकी पोशीदगी की वजह कोई इत्तेफाक नहीं है। बल्कि उनकी नबूवत का वो खास रंग है जो जाहिरी दुनिया से ज्यादा आलम गैब से जुड़ा हुआ था। एक बहुत ही खूबसूरत हवाला मिलता है कि उनके विसाल के काफी अरसे बाद जब इस्लाम का नूर
फैल चुका था तो उनकी एक बेटी रसूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर हुई थी। उस वक्त नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका इस्तकबाल जिन मुबारक अल्फ़ाज़ से किया वह मतलब पूरी दास्तान का निचोड़ है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मरहबा बिबन नबी अदाहु कौमु यानी उस नबी की बेटी को खुशामदीद जिसे उसकी कौम ने जाया कर दिया। कितनी गहरी बात है यह। एक ऐसी हस्ती जो
अल्लाह का पैगाम लाई हो उसे जाया कर देने का क्या मतलब है? मैं यह सोचती हूं कि एक नबी जिनका जमाना रहमत दो जहां सल्लल्लाह अल वसल्लम के इस कदर करीब हो उनका असल काम फिर इस जाहरी दुनिया का था ही नहीं ना। बिल्कुल ऐसा ही है। आपने बिल्कुल दुरुस्त जाविय से इस बात को पकड़ा है। आमतौर पर अंबिया क्या करते हैं? वो अपनी जिंदगी में कौम के सामने हक का रास्ता बयान करते हैं। अहकामात देते हैं।
जी जाहिरी तबबलीग करते हैं। बिल्कुल। जाहरी तबबलीग लेकिन शेख अकबर फुसूसुल हिकम में यह उकदा खोलते हैं कि हजरत खालिद बिन सनान अल सलाम की नबूवत की जो नयत थी वो बिल्कुल मुख्तलिफ थी और शेख उल अकबर उसे नबूवत बरजखिया का नाम देते हैं। नबूवत बरजखिया इसका हकीकी मफूम क्या है?
बहुत सादा अल्फाज में अगर मैं अर्ज करूं तो देखें बरजख दो चीजों के दरमियान एक आड़ या पर्दे को कहते हैं। मौत और कयामत के दरमियानी अरसे को जो हम आलम बरजख कहते हैं वो दरअसल दुनियावी जिंदगी और आखिरत के मुकम्मल आगाज के दरमियान का यूं कह लें कि एक पुल है। तो ये दरमियानी मुकाम है। सही। तो हजरत खालिद बिन सिनान अल सलाम ने अपनी कौम से यह नहीं कहा कि मैं तुम्हें अभी
इसी दुनिया में सारे हकायक दिखा दूंगा। बल्कि उन्होंने एक बहुत ही अजीब और हैरानक वादा किया। उन्होंने फरमाया कि जब मेरी वफात हो जाए तो मुझे दफन कर देना और फिर एक खास निशानी का इंतजार करना। वो निशानी यह थी कि एक बेदुम का गधा जिसके पीछे बकरियों का एक रेवड़ होगा वो आएगा और मेरी कब्र के पास आके रुक जाएगा। जी। उन्होंने कहा कि जब तुम यह निशानी देखो तो
मेरी कब्र खोलना। मैं आलम बरख से उठकर बरजख के अंदर से मुशायदा करके तुम्हें बताऊंगा कि मौत के बाद हकीकत क्या है। मैं तमाम अंबिया की सच्चाई की गवाही बरजख से दूंगा। अल्लाहू अकबर। मतलब यह तसवुर ही अक्ल को दंग कर देने वाला है। बिल्कुल यह इंसानी आम समझ से बहुत बुलंद है। क्योंकि हम तो यही मानते हैं ना कि नबी का काम गैब पर ईमान लाने की दावत देना है।
युमिन बिल गैब लेकिन हजरत खालिद बिन सिन अल सलाम तो गैब के पर्दे को हटाकर उसे मतलब ऐनुल यकीन बना देना चाहते थे। जी। मगर मुझे यह समझ नहीं आ रही कि उन्होंने इतना अनोखा और कह लें कि कठिन रास्ता क्यों चुना। इतना बड़ा खतरा लेने के पीछे क्या अजीम मकसद था। देखिए इसके पीछे एक बहुत बड़ी बसीरत और इंसानियत के लिए एक बेपनाह तड़प थी। जैसा
कि हमने शुरू में जिक्र किया कि उनका जमाना रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आही वसल्लम के दौर के बहुत करीब था। तो हजरत खालिद बिन सनान अली सलाम अपनी उस रूहानी विरासत से जानते थे कि अब वह अज़म हस्ती आने वाली है जो रहमतुल आलमीन है यानी रहमत मोहम्मददिया सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़हूर होने वाला है। सुभान अल्लाह। अब शेख-ए अकबर रहमतुल्लाह अल ये वाज़ करते
हैं कि चकि उन्हें बाकायदा जाहिरी तबबलीग का वो वसी हुक्म नहीं दिया गया था जो आमतौर पर बाकी अंबिया को मिला। मगर उनके दिल में यह एक शदीद तड़प थी कि मैं इस आलमी रहमत में अपना हिस्सा डालूं। सही। उनका मकसद यह था कि जब वो बरजख से वापस आकर गवाही देंगे तो फिर क्या होगा? फिर तो पूरी इंसानियत के लिए कोई शक बाकी ही नहीं रहेगा ना। तो दरअसल वो एक गैर मुतजलजिल ईमान एक खालिस यकीन पूरी इंसानियत को नसीब
करवाना चाहते थे। और यह उनकी इंसानियत से मोहब्बत और उस रहमत मोहम्मदिया सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम से वाबस्तगी का नतीजा था। कितनी खूबसूरत बात है यह। यानी वह एक ऐसी बुनियाद रखना चाहते थे जिस पर इंसानियत के यकीन की इमारत खड़ी हो सके। मगर फिर वही बात आती है कि हम इंसानों की अपनी कमजोरियां होती हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि यह अजीम मकसद एक अलमिया बन गया।
यह उस पूरे वाक्य का सबसे तकलीफ देह हिस्सा है। हुआ कुछ यूं कि एक दफा उनकी कौम पर एक शदीद आफत आई। जी। एक गार था जिससे खौफनाक आग निकली और वह आग पूरे इलाके की तरफ बढ़ने लगी। लोग जाहिर है खौफजदा होकर अपने नबी के पास भागे आए तो हजरत खालिद बिन सनान अलैहिस्सलाम ने उस आग का रुख मोड़ा और उसे पीछे धकेलते धकेलते वापस गार के अंदर ले गए। यानी वो आग के पीछे गार में चले गए।
जी। और उस मौके पर उन्होंने कौम को एक खास हिदायत दी। उन्होंने कहा कि मैं इस गार के अंदर जा रहा हूं। तुमने बस तीन दिन मेरा इंतजार करना है और इन तीन दिनों में मुझे हरगिज़ नहीं पुकारना। सही। लेकिन शैतान इंसान की कमजोरियों से खेलता है ना। शैतान ने उनके दिलों में यह वसवसा डाल दिया कि आग इतनी शदीद है। कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारा नबी अंदर हलाक हो गया हो। हम्म वसवसे। बिल्कुल। और कौम सब्र नहीं कर सकी।
उन्होंने तीन दिन मुकम्मल होने का इंतजार ही नहीं किया। महज 2 दिन के बाद ही उन्होंने गार के मुंह पर जाकर इन्हें पुकारना शुरू कर दिया। और यह जो बेवक़ पुकार थी ना यह उनकी रूहानी रियाजत में एक खलल थी। यानी उन्होंने शर्त तोड़ दी। जी। और उसका नतीजा यह निकला कि हजरत खालिद बिन सेनान अल सलाम बाहर तो तशरीफ लाए मगर इस हालत में कि उस पुकार की तकलीफ और अमल के टूटने की वजह से उनका विसाल करीब आ गया। अल्लाहू अकबर।
उन्होंने निहायत दुख से अपनी कौम से फरमाया कि तुमने मेरा अहद तोड़ दिया और मुझे जाया कर दिया। लेकिन आप उनकी शफकत देखें कि विसाल से बिल्कुल पहले उन्होंने फिर वही वसीयत दोहराई कि जब 40 दिन गुजर जाए और वो निशानी जाहिर हो तो मेरी कब्र खोल लेना। यानी कौम ने अपनी बेसब्री से उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया। लेकिन वो हस्ती फिर भी उनकी रूहानी बका सोच रही थी तो 40 दिन बाद जब निशानी आई तो क्या उन्होंने
फिर कब्र खोली? बदकिस्मती से असल सानहा तो यही था कि वो निशानी आई बिल्कुल वैसे ही जाहिर हुई। वह गधा वो बकरियों का रेवड़ सब कुछ वैसा ही था। अब कौम का और खासतौर पर उनके बेटों का यह फर्ज था कि वह आगे बढ़ते और कब्र खोल लेते। तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
यहां आड़े आ गई जाहिलियत की अना। उनके बड़े बेटों ने कब्र खोदने से साफ इंकार कर दिया। और उनकी दलील क्या थी? उन्होंने कहा कि अगर हमने अपने बाप की कब्र खोदी तो कल को पूरे अरब के लोग हमें ताना देंगे और हमें कब्र से निकाले गए शख्स की औलाद कह कर पुकारेंगे। वाह। यानी जिसे हम कहते हैं कि लोग क्या कहेंगे। मतलब कबीले की अना और मुशरे के तानों का खौफ इतना हावी हो गया कि
उन्होंने कायनात का इतना बड़ा राज हमेशा के लिए दफन रहने दिया। उन्होंने एक नबी को अपनी दुनियावी इज्जत के लिए जाया कर दिया। जी, यही हुआ था। लेकिन यहां एक बहुत ही बारीक और अजीम नुक्ता है। अगर हम रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उन अल्फाज़ पर दोबारा गौर करें जो आपने उनकी बेटी से फरमाए थे। जी कि उस नबी की बेटी को खुशामदीद जिसे उसकी कौम ने जाया कर
दिया। बिल्कुल आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने यह नहीं फरमाया कि हजरत खालिद बिन सनान जाया हो गए या उनका मकाम कम हो गया। आपने फरमाया अहुू कौमू कौम ने जाया किया। शेख-ए-अकबर रहमतुल्लाह अल इस बात पर जोर देते हैं कि अंबिया की जात और उनका मकाम कुर्ब अल्लाह के यहां कभी जाया नहीं होता। बेशक। नुकसान उस नबी का नहीं हुआ। वह तो अपना फरीजा अपनी नियत पूरी कर गए। नुकसान उस
कौम का हुआ और एक ऐतबार से इंसानियत का नुकसान हुआ जो इस मुशाहिदे से महरूम रह गई। सही मकाम नबूवत तो अपनी जगह महफूज़ रहा। मगर यहां से शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल हमें एक ऐसे रूहानी और कह लें कि फलसफियाना मोड़ पर ले आते हैं जो हम सबके लिए गहरी सोच का मकाम है। हम क्योंकि उनकी कौम की अना की वजह से मतलब कब्र तो नहीं खोली गवाही नहीं दी जा
सकी। तो जाहिरी अमल तो नामुकम्मल रह गया। तो अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या हम यह समझें कि उनका वो अजीम मकसद अधूरा रह गया। हमारे यहां तो यह बात बहुत आम है ना कि आमाल का दारोमदार नियतों पर है। बिल्कुल इन आमाल बिन नियात जी। तो क्या हजरत खालिद बिन सेनान अलह सलाम की वो सच्ची नियत उनके इस नामुकम्मल जाहरी अमल का मुकम्मल मुतबादिल नहीं बन गई?
यह वो मरकजी सवाल है जो शेख-ए अकबर बड़ी खूबसूरती से उठाते हैं। वो सवाल करते हैं कि क्या महज नियत का अज्र और जिस्मानी अमल का अज्र क्या यह दोनों मुकम्मल तौर पर एक दूसरे के बराबर हैं? और इसका जवाब वह कैसे देते हैं?
वो उसे समझाने के लिए बड़ी आमफ मिसालें देते हैं। शेख अकबर फरमाते हैं कि फर्ज करें एक शख्स वजू करता है। खालिस नियत से मस्जिद की तरफ चलता है कि मैं बाजमात नमाज अदा करूंगा। मगर जब वह पहुंचता है तो जमात हो चुकी होती है। इसी तरह एक और मिसाल देते हैं। एक गरीब शख्स है जिसके दिल में सच्ची तड़प है। वह नियत करता है कि ऐ अल्लाह अगर मेरे पास माल होता तो मैं भी
तेरे रास्ते में खर्च करता। अब शेख-ए-अकबर यह सवाल हमारे सामने रखते हैं कि क्या इस गरीब शख्स को और उस शख्स को जिसकी जमात छूट गई। क्या उन्हें बिल्कुल बईने वही अजर मिलेगा जो उस शख्स को मिला जिसने हकीकतन सफ में खड़े होकर नमाज पढ़ी या जिसने हकीकत में माल खर्च किया?
यह तो वाकई सोचने की बात है। क्योंकि बजाहिर तो हमारी सोच यही कहती है कि नियत सच्ची थी तो अल्लाह ताला यकीनन मुकम्मल अजर अता फरमाएगा। है ना? क्या शेख-ए-अकबर का जाविया इससे कुछ मुख्तलिफ है? देखिए शेख अकबर रहमतुल्लाह अल यहां मारफत का एक बहुत ही बारीक फर्क बयान करते हैं। वो यह बिल्कुल नहीं कहते कि नियत का अजर नहीं मिलता। वो कहते हैं कि अजरुल उमनिया यानी
इंसान की जो सच्ची दिली ख्वाहिश है उसका अजर तो उसे हर हाल में मिलता है। यानी वो अजर यकीनी है। जी हजरत खालिद बिन सनान अल सलाम को भी उनकी इस अजीम नियत का पूरा अजर मिला। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन और यह बात बहुत तवज्जो तलब है। शेख अकबर फरमाते हैं कि नियत का होना और नियत के साथ उस अमल का आलम शहूद में यानी इस जाहिरी और जिस्मानी दुनिया में मुकम्मल होना यह दोनों मकाम