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Fusus al-Hikam Part 6: The Hidden Gift Allah Gave Only to Prophet Ishaq | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- शेख अकबर इबने अरबी फुसूसुल हिकम के उस बाब में हिकमतुल हक का जिक्र करते हैं जो हजरत इसहाक अल सलाम से मनसूब है।
- हजरत इब्राहिम अल सलाम ने बेटे की कुर्बानी का ख्वाब देखा जिसकी असल ताबीरर अल्लाह के इल्म में एक दुम्बा थी।
- आरिफ का दिल खालिक यानी हक को समा लेता है और कायनात उसके लिए एक लहर से ज्यादा हैसियत नहीं रखती।

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Transcript
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बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर्रहीम फिक्रनामा में खुशामदीद जहां हम अकल के दरवाजे से दाखिल होकर रूह के राज तलाश करते हैं। आज हम फुसूसुल हिकम के उस बाब में कदम रख रहे हैं जिसे शेख अकबर इबने अरबी हिकमतुल हक कहते हैं। यह फुस हजरत इसहाक अल सलाम से मनसूब है। जिनके जरिए
अल्लाह ने हमें यह दिखाया कि कभी हकीकत ख्वाब की सूरत में छुप जाती है। हजरत इब्राहिम अल सलाम ने ख्वाब देखा बेटे की कुर्बानी का। मगर उस ख्वाब की तावील एक दुंबे में पोशीदा थी। इबने अरबी फरमाते हैं ख्वाब सिर्फ तस्वीर नहीं होता। वो मानी का आईना होता है। जो इसे जाहिर में पढ़ ले भटक [संगीत] जाता है और जो इसे
बातिन से समझे वो हकीकत को पा लेता है। आइए इस ख्वाब के पर्दे में छुपी हिकमते हक को महसूस करते हैं। तो शेख-ए अकबर फरमाते हैं कि यह ख्वाब आलम मिसाल या आलम ख्याल में जाहिर हुआ। यानी एक ऐसी बातनी दुनिया जहां सूरतें महज सूरतें नहीं होती बल्कि वह गहरे मानी और हकीकतों का लिबास पहन कर आती हैं। एक तरह का कोडेड पैगाम था जिसे समझने की
जरूरत थी। बिल्कुल जिसे डिकोड करना [संगीत] था। लेकिन यहां एक सवाल पैदा होता है जो अक्सर ज़हनों में खटकता है। हजरत इब्राहिम अल सलाम अल्लाह के खलील हैं। एक नबी हैं। उनसे ऐसी चूक कैसे हो [संगीत] सकती है?
जी। क्या यह उनके मकाम के खिलाफ नहीं कि वह ख्वाब के बातनी पैगाम को ना समझ पाए [संगीत] और उसे जाहिर पर ले लिया? यह एक बहुत अहम और नाजुक सवाल है। शेख अकबर के नजदीक वो यह कोई आम इंसानी गलती नहीं थी। [संगीत] दरअसल यही इस आजमाइश का मरकज था। अल्लाह ताला यह देखना चाहता था कि हजरत इब्राहिम का रद्दे अमल क्या होता है। उन्होंने ख्वाब को सच जाना। लेकिन
ख्वाब की दुनिया का एक उसूल है कि वहां हर चीज तावील तलब होती है। हकीकत में उस ख्वाब के अंदर बेटे की सूरत में एक दुम्बा छुपा हुआ था। वही ज़ब अज़म वो ज़ब अज़म उस ख्वाब की असल ताबीरर [संगीत] थी जो अल्लाह के इल्म में थी। हजरत इब्राहिम का जाहिर पर अमल करना उनकी इतात का कमाल था। मगर अल्लाह ने उन्हें उस अमल के [संगीत] नतीजे से बचाकर यह सिखाया कि
इतात के साथ मारफत भी जरूरी है। तो गोया पहला बड़ा सबक यह है कि रूहानी दुनिया में हर चीज की एक जाहिरी सूरत होती है और एक बात हकीकत। जी। और हमें जाहिर को देखकर फौरन नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए। बिल्कुल। इसीलिए कुरान ने इसे बलान मुबीन यानी एक खुली आजमाइश कहा है। यह आजमाइश सिर्फ हुकुम मानने की नहीं थी
बल्कि इल्म और इदराक की भी थी। जी इम्तिहान यह था कि क्या देखने वाला यह जानता है कि आलम ख्याल की हर तस्वीर अपने पीछे एक पैगाम रखती है। सही। हजरत इब्राहिम ने अपनी सच्चाई [संगीत] से इस इम्तिहान का एक पहलू तो पूरा कर दिया। लेकिन अल्लाह ने फदिया भेजकर इम्तिहान का दूसरा यानी बातनी पहलू खुद खोल दिया। और यहां शायद अक्ल की हुदूद भी वाज़ होती
हैं। अकल तो यही कहेगी कि जो ख्वाब में देखा वही करो। दुरुस्त। लेकिन शेख अकबर [संगीत] इशारा दे रहे हैं कि एक और देखने वाली आंख है दिल की [संगीत] आंख जो सूरत के पार हकीकत को देखती है। आपने बहुत खूबसूरत नुक्ता उठाया। अक्ल मंतिक और जाहिर के उसूलों पर चलती है। वो सबब और नतीजे की जंजीर में कैद रहती है। लेकिन दिल [संगीत] या जिसे सूफिया बातिन
कहते हैं वो बराहेरास्त हकीकत से जुड़ता है। वो अलामतों को समझता है। वो जानता है कि ख्वाब में नजर आने वाला बेटा दरअसल नफ्स की कुर्बानी की अलामत हो सकता है। या किसी और अजीम हकीकत का पर्दा हो सकता है। बिल्कुल। इस मकाम पर अकल खामोश हो जाती है और मारफत बोलती है। इस बात को मजीद समझने के लिए शेख अकबर ने कोई और मिसाल भी दी है कि जाहिर पर रुक जाने से क्या नुकसान [संगीत] हो सकता है।
जी वो एक बहुत ही सबकमोज़ वाक्या नकल करते हैं एक अजीम मुद्दिस तकी इबने मुल्ल का। जी। उन्होंने ख्वाब में हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें दूध का प्याला पिला रहे हैं। अच्छा। उन्होंने यह ख्वाब देखा और जब बेदार हुए तो इस ख्वाब को भी इसके जाहिर पर ले लिया। उन्होंने समझा कि यह मादी दूध है और इसे फौरन कै कर दिया। यानी उन्होंने उस नेमत को जाया कर दिया।
इब्ने अरबी यही फरमाते हैं कि अगर वह इसकी तावील करते या किसी साहिबइल्म से पूछते [संगीत] तो जान जाते कि ख्वाब में दूध से मुराद इल्म है। खासतौर पर जब वो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हाथ से मिल रहा हो। बिल्कुल। खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने जब एक बार ख्वाब में दूध पिया तो बेदार होकर उसकी तावील इल्म से फरमाई। यह वाक्य जाहिर करता है कि तावील का इल्म ना हो तो इंसान अल्लाह की अता करदा सबसे बड़ी नेमत
यानी [संगीत] इल्म को भी ठुकरा देता है। तो इसका मतलब यह हुआ कि तावील का लफ्ज जिसका हम आमतौर पर मतलब सिर्फ तशरी समझते हैं। यह सिर्फ तर्जुमानी नहीं है। जी नहीं। तावील का असल मादा है अव्वल जिसका मतलब है असल की तरफ लौटना। तो तावील का अमल किसी चीज को उसकी जाहरी शक्ल से उसकी हकीकी असल की तरफ वापस ले जाने का नाम है। जैसे हजरत यूसुफ अल सलाम ने मिस्र के बादशाह के ख्वाब की तावील की थी।
बिल्कुल जाहिर में वो सात मोटी और सात दुबली गाय थी। लेकिन बाततिन में वो खुशहाली और कहद के सात-सात साल थे। जी। हजरत यूसुफ ने सूरत को नहीं सूरत के पीछे छुपी हुई हकीकत को देखा और पूरे मुल्क को तबाही से बचा लिया। यह बात समझ में आती है कि हजरत इब्राहिम के वाक्य में असल कुर्बानी जिस्मानी थी ही नहीं। नहीं थी। यह तो इदराक और मारफत का इम्तिहान था। क्या देखने वाला सूरत के पर्दे को हटाकर
हकीकत को पहचान पाता है या नहीं? यही इस हिकमत का निचोड़ है। असल कुर्बानी बेटे की नहीं बल्कि अपनी उस नजर की थी जो चीजों को सिर्फ जाहिर में देखती है। जब वो नजर कुर्बान हो जाती है तो फिर हर चीज में उसकी असल हकीकत यानी हक नजर आने लगता है। ये जो जाहिर के पर्दे में बातिन को देखने की बात है। क्या यही वो नुक्ता है जिसे शेख-ए अकबर वहदतुल वजूद कहते हैं। जी कि हर पर्दे के पीछे चेहरा एक ही है।
अब आप इस हिकमत के कल में दाखिल हो रही हैं। शेख अकबर के नजदीक वो दुम्बा, ख्वाब की सूरत हजरत इब्राहिम का फहम यह सब एक ही हकीकत अल हक के मुख्तलिफ जलवे हैं। हर शय उसी एक वजूद का मजहर है। जी। इसीलिए वो अपना मशहूर कॉल फरमाते हैं। अगर तुम किसी चीज को देखकर कहो यही हक है तो तुमने सच कहा। और अगर तुम कहो यह हक के
अलावा कुछ और है तो तुमने तावील की। यानी जो आरिफ है जो जानने वाला है वो हर सूरत में उसी एक को देखता है। बिल्कुल उसके लिए दुम्बा और बेटा दोनों एक ही हकीकत के दो मुख्तलिफ लिबास हैं। सही। आरिफ की नजर में कसरत वाहदत का हिजाब नहीं बनती। वो जानता है कि हर रंग में वही एक बेरंग जात जलवागर है। [संगीत]
अच्छा। इसी मकाम पर आरिफ के दिल की वसत का जिक्र आता है। शेख अकबर रहमतुल्लाह हजरत बायजीद [संगीत] बस्तामी का कॉल नकल करते हैं कि आरिफ के दिल के एक गोशे में अगर अर्श और जो कुछ उसमें [संगीत] है करोड़ों बार समा जाए तो भी उसे महसूस ना हो। यह कैसे मुमकिन है? हमारा दिल तो छोटी-छोटी बातों से भर जाता है और बेचैन हो जाता है।
इसकी वजह यह है कि हमारा दिल मखलूक को समाने की कोशिश करता है और मखलूक महदूद है। इसके बरक्स आरिफ का दिल खालिक को समा लेता है यानी हक को। और जो हक को संभाले जो समंदर को अपने अंदर जजब कर ले उसके लिए फिर यह पूरी कायनात एक लहर से ज्यादा हैसियत नहीं रखती। यह बात तो इंसान को हिला कर रख देती है कि आरिफ अपनी हिम्मत,
अपनी रूहानी कुत से चीजें तखलीक भी कर सकता है। लेकिन अगर ऐसा है तो फिर खालिक और मखलूक में रब और बंदे में क्या फर्क रह गया? यहां दिल संभलता नहीं बल्कि पिघलता है। जब इबने अरबी उस नाजुक फर्क को बयान करते [संगीत] हैं, वह फरमाते हैं कि हां आरिफ अपनी हिम्मत से कोई सूरत बना सकता है। लेकिन उस सूरत की बका आरिफ की मुसलसल
तवज्जो पर मुनसिर है। अगर आरिफ की तवज्जो एक लम्हे के लिए भी हट जाए तो वो सूरत फना हो जाएगी। अच्छा। और यहीं शेख अकबर वो राज खोल देते हैं जिसे वह फुरकान कहते हैं। वो फरमाते हैं बंदा कितना ही कामिल क्यों ना हो जाए वो किसी ना किसी चीज से गाफिल जरूर होता है। सही। जबकि हक ताला की शान यह है कि वो एक ही आन में कायनात की हर शय पर पूरी तरह मुतवजे
है और किसी शय से किसी लम्हे गाफिल नहीं। अल्लाह हु अकबर। यही वो नाजुक और अबदी फर्क है जो अबद को अब्द और रब को रब रखता है। यानी अबदीयत की मेराज यही है कि इंसान अपनी इस गफलत को अपनी इस मोहताजी को पहचान ले। जी। जब बंदा इस फर्क को समझ लेता है तब वह अपनी हकीकत को पा लेता है। वह जान जाता है
कि उसकी ताकत, उसका इल्म, उसकी हर सिफत उसी हक की अता करदा है और उसी की तवज्जो की मोहताज है। तो इस तमाम गुफ्तगू को समेटते हुए हम यह कह सकते हैं कि हिकमते हक का खुलासा यह है कि हकीकत हमेशा और हर जगह मौजूद है। बिल्कुल। वो कभी गायब नहीं होती। बस कभी वह ख्वाब के पर्दे में अपना चेहरा दिखाती है, कभी
आजमाइश की सूरत में हमें पुकारती है। बहुत खूबसूरती से आपने इसका खुलासा किया। कुर्बानी और आजमाइश की तमाम शक्लें दरअसल इंसान को जाहिर के अंधेरे से निकालकर बाततिन की रोशनी की तरफ ले जाने के लिए हैं। यह सफर सूरत से माना का है। वहम से हक का है और अपनी महदूद नजर की कुर्बानी देकर हक की लामहदूद नजर को पाने का है। [संगीत] और आखिर में जो शख्स अपने दिल के आईने को
इतना साफ कर लेता है कि उसमें हक का जलवा बेहिजाब नजर आने लगे, वो खुद मजहरे हकीकत बन जाता है। मेरे ख्याल में यही इस फुस का [संगीत] असल निचोड़ है। अगर यह सफर आपके दिल में उतरा तो इसे यहीं ना छोड़ें। अपने वजूद में सरायत करते हुए इस राज को महसूस करें और फिक्रनामा को सब्सक्राइब करें ताकि अगला दर अगली रोशनी आप तक सबसे पहले पहुंचे।