Goro Toons · Transcript · · Updated
गाँव में चिकन चावल वाला | chicken rice | hindi stories | hindi kahani | कार्टून – Transcript
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Summary
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- रघु ने रामपुर गांव में बस अड्डे के कोने पर अपनी नई ठेली लगाकर चिकन चावल बेचना शुरू किया।
- लल्लन ने अपनी पक्की दुकान के बाहर बीस रुपये प्लेट का बोर्ड लगाकर प्रतिस्पर्धा शुरू की, लेकिन रघु ने कीमत घटाने के बजाय स्वाद और अपनी मेहनत को बढ़ाया।
- धनीपुर से ताजा मुर्गी का चिकन मिलने और चावल को शोरबे में पकाने से रघु की ठेली पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी।

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Transcript
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दिसंबर की सुबह रामपुर गांव कोहरे में [संगीत] डूबा था। गन्ने के खेतों पर पाला जमा था और चौपाल के पास चाय की [संगीत] भट्टी से धुआं उठ रहा था। लो काका अदरक वाली चाय। आज तो हाथ पैर जम गए। कल रात ऐसा पाला पड़ा। मेरी लौकी भी
सूख गई। तूने बस अड्डे के कोने वाली नई ठेली देखी है। अपना शहर वाला रघु बैठा है। देखी तीन दिन से बैठा है। एक प्लेट नहीं बिकी। चिकन चावल बेच रहा है। गांव में सुबह-सुबह कौन चिकन चावल खाता है?
यहां तो पूरी सब्जी चलती है। बेचारा सुना है उसकी घरवाली गौरी ने कंगन बेचकर ठेली ली है। चली नहीं तो घर का चूल्हा ठंडा [संगीत] पड़ जाएगा। शहर के ढाबे में काम करता था। हाथ का तो अच्छा होगा। पर गांव के लोग ₹20 खर्च करने से पहले चार बार सोचते हैं। अड्डे के कोने में पुरानी [संगीत] ठेली
खड़ी थी। भगोने से भाप उठ रही थी। रघु हर थोड़ी देर में ढक्कन उठाकर [संगीत] देखता फिर रख देता। चाय पी लो। सुबह से कुछ नहीं खाया। तीन दिन से यही कह रहे हो कि पहले ग्राहक [संगीत] आ जाए। चावल गरम रखने हैं गौरी। ठंडे हो गए तो कोई नहीं खाएगा। ग्राहक आए तो मुझे देरी नहीं करनी चाहिए।
पर आ कौन रहा है? लोग देखते हैं और आगे निकल जाते हैं। ₹30 उनके लिए बहुत हैं। नई ठेली है। टाइम लगता है। शहर के ढाबे पर भी लोग जमने में 2 महीने लगे थे। तुम बस मन छोटा मत करो। रघु शहर के ढाबे में काम कर रहा था। ढाबा बंद हुआ तो गांव लौट आया। [संगीत] गौरी का
कंगन गया तब यह ठेली आई। दोपहर ढल चुकी [संगीत] थी। एक मजदूर ठेली के पास आकर रुका। भैया चिकन चावल दे दो। पर मेरे पास ₹25 ही रुपए हैं। आज बस इतना ही मिला। रघु गौरी की तरफ देखता है। गौरी कुछ नहीं [संगीत] कहती। बैठ जाओ। 25 ही दे देना। आज कुछ बिका ही नहीं है। तुम पहले हो। खाली पेट कोई यहां
से नहीं जाएगा। सच में भैया। मैं तो सोच रहा था कि मना कर दोगे। मना करता तो ठेली क्यों लगाता? बैठो गरम है। मजदूर पहला निवाला मुंह में रखता है। उसका हाथ रुक जाता है। अरे भैया यह तो अलग ही बना है। चिकन इतना नरम है कि मुंह में घुल गया। हम तो रोज पूरी सब्जी खाकर काम चलाते हैं।
मसाला ज्यादा तो नहीं लगा। कहो तो अगली बार कम डाल देता हूं। नहीं नहीं बिल्कुल सही है। हम ईंट भट्टे [संगीत] पर काम करते हैं भैया। ₹20 की पूरी सब्जी से पेट भरता है। मन नहीं भरता। कल दोपहर चार साथियों को लेकर आऊंगा। 25 में तुम्हें कितना बचा?
₹5 पर शुरुआत तो हुई। अगली दोपहर पांच मजदूर आए। रघु ने आज थोड़ा ज्यादा बनाया था। यही है वो ठेली। कल मैंने यहीं खाया था। इतनी छोटी ठेली। मुझे तो लगा दुकान होगी। ठेली छोटी है। खाना देख लेना। रघु पांच प्लेट लगा दे।
सच में अच्छा है। कहां सीखा? शहर के ढाबे पर काम करता था। ढाबा बंद हुआ तो गांव लौट आया। यहां ठेली लगाई। बाकी ऊपर वाले की मर्जी। कल 25 दिए थे। आज पूरे 30 ले ले। तेरा भी घर है रघु। उस दिन छह प्लेटें बिकी। गौरी ने पहली बार
[संगीत] कॉपी में हिसाब लिखा। ₹180। हफ्ते भर में बात पूरे गांव में फैल गई। काका सुना। प्रभु की ठेली पर मजदूर वाले रोज पहुंच रहे हैं। कहते हैं चिकन ऐसा नरम है। क्या बताएं?
मैं भी सोच रहा हूं आज चेक कराऊं। पर लल्लन ने तो जरूर सुना होगा। बस अड्डे के सामने उसकी पक्की दुकान है। उसे सब दिखता है। लल्लन चुप बैठने वाला नहीं है। उसकी दुकान पुरानी है। नाम भी है। एक ठेली वाला उसके ग्राहक खींचे। यह उसे कैसे पचेगा?
देखते हैं गांव के दो दुकानदारों की खींचातानी सबसे बड़ा तमाशा होता है। अड्डे के सामने लल्लन चिकन सेंटर था। मालिक, भट्ठे वाले अब हमारी प्लेट पर नहीं आते। हफ्ते भर से सब रघु की ठेली पर जा रहे हैं। एक भगोना और एक चूल्हा। उसके पास है ही
क्या? हमारे नाम पर लोग यहां आते हैं। नाम है मालिक पर जुबान पर स्वाद चढ़ जाए तो नाम नहीं चलता। लोग उसके चिकन चावल की तारीफ कर रहे हैं। तो दाम की बात करते हैं। बोर्ड बनवा चिकन चावल सिर्फ ₹20 प्लेट। देखता हूं ठेली वाला कितने दिन तक टिकता है। अगली सुबह दुकान के बाहर नया बोट टंगा
[संगीत] था। दोपहर में रघु की ठेली पर सिर्फ तीन ग्राहक आए। रघु उधर 20 में दे रहे हैं। तू भी कम कर दे। ₹10 का फर्क कम नहीं होता। हफ्ते में ₹0 बचते हैं। मैं तेरी जेब समझता हूं। पर जो मैं इसमें डालता हूं उससे कम मैं वैसा खाना नहीं दे पाऊंगा। मैं क्या कहूं रघु? बच्चों का पेट भी
देखना पड़ता है। बुरा मत मानना। बुरा क्यों मानूंगा? जा। जहां [संगीत] ठीक लगे वहीं खा। मजदूर कुछ पल खड़ा रहता है। फिर लल्लन की दुकान की तरफ चला जाता है। वो भी चला गया। तुम्हें बुरा नहीं लगा?
[संगीत] लगा पर उसकी जेब का सवाल है। आज सिर्फ ₹90 आए। हफ्ते भर पहले ₹10 थे। हम भी 20 कर दें तो ग्राहक वापस आ जाएंगे। एक प्लेट पर कितना लगता है? तुमने जोड़ा है?
हां। चिकन 12, चावल चार, तेल मसाला गैस पांच यानी ₹21। तो 20 में बेचूंगा तो हर प्लेट पर ₹1 का घाटा होगा। लल्लन भी इतने में नहीं बेच सकता। या तो चिकन पुराना डाल रहा है या छोटे कर दिए हैं। पर लोग तो उधर जा रहे हैं। अगर लौटे ही
नहीं तो। जिसे सिर्फ सस्ता खाना चाहिए वो वहीं रहेगा। जिसे अच्छा खाना चाहिए वो लौटेगा। मैं बीस नहीं करूंगा गौरी। मेहनत और बढ़ा दूंगा। सुबह रघु चिकन उबाल कर निकाल [संगीत] चुका था। भगोने में पीला सुनहरा शोरबा बचा था। इसे फेंक दोगे? चिकन तो निकल गया। रुको। इसमें तो पूरा स्वाद है। फेंकना गलत
होगा। चावल इसी में पका दूं तो कैसा रहेगा? पानी की जगह शोरबा चावल बिगड़ गए तो शहर के ढाबे पर बड़ा कुक यही करता था। मैंने बस देखा था। नापतोल कर नहीं सीखा कभी। थोड़े से करके देखता हूं। रघु ने पहले मसाला भुना। फिर शोरबा डालकर उबाला। पानी कितना डाल रहे हो?
नाप कर एक कटोरी चावल। पौने दो कटोरी शोरबा। चावल आधे घंटे भिगोए हैं। आंच पहले तेज फिर धीमी। भगोना सीधा आग पर मत रखना। नीचे तवा रख दो। [हंसी] मेरी मां दूध ऐसे ही गर्म करती थी। जलता नहीं। हैं? यह बात तो मुझे सूझी ही नहीं। ठीक है। तवा रखता हूं।
10 मिनट बाद रघु ढक्कन खोलता है। दाने अलग-अलग हैं। भाप में खुशबू है। अब सही है। चिकन का स्वाद चावल के अंदर तक आ गया है। दोपहर में वही पहला मजदूर ठेली पर [संगीत] आया। रघु आज क्या खास है? मेरे पास 25 ही हैं। बैठ चख और बता।
मजदूर निवाला खाता है। कुछ देर चुप रहता है। भैया तूने इसमें क्या किया? पहले भी अच्छा था। आज तो स्वाद अंदर तक है। जैसे चिकन चावल में घुल गया हो। लाजवाब। थोड़ा तरीका बदला है बस। तुझे अच्छा लगा यही बहुत है। सच बोलूं तो उधर 20 वाले के यहां हड्डी ही हड्डी मिलती है।
चावल अलग मसाला ऊपर से। पेट खराब हो जाए तो दवा का खर्चा अलग। उससे अच्छा तेरे यहां ₹5 ज्यादा दे दूं। अगले 10 दिन में कुछ ग्राहक लौट आए पर सब नहीं। गौरी की कॉपी में 5 7 [संगीत] 9 12 प्लेटें लिखी जा रही थी। तभी बस ड्राइवर शंकर आता है। हाथ में स्टील का टिफिन है।
आधे घंटे में बस निकालनी है। जल्दी लगा दे। सुना है तेरे यहां का चिकन चावल अच्छा मिलता है? जी भैया अभी लगाता हूं। चिकन तो नरम है। मैं जयपुर की लाइन पर चलता हूं। अब रोज यही खाकर निकलूूंगा। पहली बार किसी ने बाहर से आकर तारीफ की है। गांव वाले तो चक कर बताएंगे। बाहर वाले
कहें तो भरोसा बढ़ता है। उधर लल्लन की दुकान पर भीड़ थी। पर हाथ में कुछ बच [संगीत] नहीं रहा था। भोला रोज 20-25 प्लेट बिक रही हैं। फिर भी कमाई शून्य और रघु की ठेली पर लोग लौट रहे हैं। उसके चावल में क्या है ऐसा?
लोग कहते हैं कुछ अलग है मालिक। पर क्या यह कोई नहीं बताता। तो खुद देख कर आ। एक प्लेट खरीद। देख वो करता क्या है। तू गांव का है। तुझ पर शक नहीं होगा। भोला रघु की ठेली पर पहुंचता है। एक प्लेट लगा दो भैया। इतने अच्छे चावल
कैसे बनाते हो? कोई खास मसाला है क्या? मसाले वही हैं जो घर में होते हैं। बाकी अनुभव है। भोला भगोने के नीचे रखा तवा देख [संगीत] लेता है और पैसे देकर चला जाता है। यह लल्लन का आदमी था। तुमने तवे तक के बारे [संगीत] में कुछ नहीं छिपाया। वो सब देख गया। छिपाने जैसा कुछ नहीं है। जो देखेगा समझ
जाएगा। पर असली चीज हाथ की है। वह किसी को सिखाने से नहीं जाएगी। अगले दिन लल्लन की दुकान पर भी शोरबे वाले चावल बने। भोला चावल तैयार है। आज से यही सबको देंगे। बोर्ड लगवा दे। मालिक बड़ी देग में बना रहे हैं।
भीड़ को देखकर पानी भी ज्यादा डालना पड़ा। एक ग्राहक प्लेट खाकर बाहर [संगीत] निकलता है। अरे लल्लन भैया स्वाद ठीक है पर रघु जैसा नहीं। उसके चावल में चिकन का स्वाद अंदर तक आता है। [संगीत] यहां ऊपर ऊपर लगता है। क्या कमी रह गई? तूने तो सब देखा था। मैंने तवा देखा था। शोरबा देखा था मालिक।