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भगवद ज्ञान के अधिकारी कौन हैं और इस कथा को सुनने का भी क्या महान लाभ है ? Sb 3.32.42,3.32.43 – Transcript

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Summary

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  • भगवान कपिल देव ने श्रीमद् भागवतम के तीसरे स्कंध के 42वें श्लोक में उस व्यक्ति का वर्णन किया है जो इस ज्ञान का अधिकारी है।
  • भगवान कहते हैं कि जो कोई श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक इस कथा का श्रवण या कीर्तन करता है वह निश्चय ही उनके परम धाम को प्राप्त होता है।
  • श्रीमद् भागवतम को सुनने और बोलने का मुख्य प्रयोजन श्रोता और वक्ता को भक्ति योग की प्राप्ति कराना है।
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Transcript

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हम लोग श्रीमद् भागवतम के तीसरे स्कंध के 32 व अध्याय के 42 श्लोक को पढ़ रहे हैं। उसके ऊपर दूसरा दिन है। तो यहां बता रहे हैं भगवान कपिल देव कि कौन व्यक्ति इस ज्ञान का अधिकारी है। उसको कैसे व्यक्ति को ज्ञान देना चाहिए? मेरे विषय बोलिए। बहिरजात विरागाय जातात विरागाय शांत चिताय दताम शांत चित निर्मसरायच

निर्मत्सरायच यस्या प्रसा प्रिय यस्या प्रसा प्रिय बहि विरागाया बहि विरागाया शांतित यदिता शांतित निर्मचरायच यस्या प्रसा प्रिय यस्या प्रसा प्रिय बहिर

जात विरागाया उसको ज्ञान देना चाहिए जिसको बाह्य विषों से विराग हो गया है शांत चित इसका इस कारण से उसका चित्त शांत है निर्मस सराया और दूसरों से वह दूसरों के दूसरों का कल्याण चाहने वाला है दूसरों के उत्कर्ष को से प्रसन्न होने वाला है शच मतलब पवित्र है और जिसके लिए मैं प्रिय से भी अधिक प्रिय हूं ये सब एक अर्थ था। अब देखिए बात क्या हो रही है? 41 और 42 में जिन गुणों का वर्णन हुआ है, जीव गोस्वामी जी कह रहे हैं कि उनमें यथाचित रूप से

क्या बोले यहां पे? इन गुणों के परस्पर कारण और कार्य का संबंध भी यथोचित रूप से विचार करने योग्य है। इन गुणों में कारण कार्य का संबंध है। यह गुण है। तो फिर इस वजह से यह गुण है। ऐसे करके तो देखिए एक ही एक ही क्रम नहीं है। जो क्रम है एक क्रम बताया जा रहा है। उससे आगे हम लोग देखते हैं। कैसे-कैसे कारण कार्य का संबंध हो सकता है। श्रद्धा अगर है तो श्रद्धा से

भक्ति श्रद्धाय भक्ताय मतलब जिसका भक्त रूप भक्त रूप गुरु में और शास्त्र में विश्वास है तो स्वाभाविक सी बात है कि उसका वो भक्ति करेगा इज इट नॉट जिसको श्रद्धा है कि गुरु जी सही बोल रहे हैं शास्त्र सही है तो भक्ति करेगा तो ये तो बिल्कुल स्पष्ट है। जब शिष्य को यह विश्वास हो जाता है कि भगवान ही परम सत्य हैं। गुरु भगवान के प्रतिनिधि हैं और शास्त्र उनका प्रमाण है। तब वह श्रद्धा

केवल भौतिक विश्वास नहीं रहती अपितु भक्ति के आचरण में परिणत होती है। श्रद्धा है इसका मतलब क्या लक्षण है? वो करेगा भक्ति। अतः श्रद्धा भक्ति में प्रवृत्ति का कारण है और भक्ति उसका स्वाभाविक कार्य। बिल्कुल ईजी समझ में आ गया। ठीक है? अब भक्ति है। भक्ति करेगा तो विनम्रता आ जाएगी। ईजी है। भक्ति का वास्तविक स्वरूप सेवा है। प्रपाद समझाए ना उसको डिवोशनल सर्विस। तो सेवा करते समय आज तक कभी भी आप

किसी की सेवा किए हैं, सेवा किए हैं तो आप देख रहे हैं कि उसमें निरंतर विनर्मता का भाव रहता है। क्यों? कि श्री कृष्ण उपाध्याय प्रभु कभी किसी की सेवा किए हैं तो अहंकार में से सीना ऐसे करके तो कभी सेवा नहीं करते ना। नेचुरल आप देखेंगे जब भी सेवा की भावना है हृदय में सॉफ्टनेस होती है कि नहीं? सेवा कर रहे हैं किसी की। मां अपने बच्चे की सेवा कर रही है। मतलब जभी भी सेल्फलेस भावना तभी सेवा की जाएगी। नहीं तो वह बिजनेस हो सकता है

लेकिन सेवा की भावना जब भी होती है तो व्यक्ति में विनर्मता रहती है तो यह तो बड़ा समझ में आ रहा है ऐसी बात है तो भक्ति से विनर्ता रहती है भक्ति मतलब सेवा सेवा से नर्मता आ जाती है भक्ति का वास्तविक स्वरूप सेवा है सेवा करने के लिए शिष्य को अपने स्वतंत्र भोक्तृत्व की मैं भोगता हूं और कर्तृत्व मैं करने वाला हूं उसके अभिमान को त्यागना पड़ता है। जैसे-जैसे भगवान की महानता और अपनी आश्रित स्थिति का अनुभव होता है वैसे-वैसे विनम्रता विकसित होती है कि भगवान महान है

और मैं बहुत शूद्र हूं। अब विनर्मता है तो उसे अनुसूयावा अनुसूया मतलब दूसरों में दोष दृष्टि नहीं देखना चाहिए। यह तो बिल्कुल देखिए स्पष्ट है। जो व्यक्ति विनर्म है वह दूसरों के गुणों में दोष नहीं देखता। ही कैन नॉट ही जस्ट कैन नॉट वो दूसरों में हमेशा गुण ही देखेगा। तो ये यद्यपि केवल यही क्रम नहीं बट इट्स वेरी लॉजिकल क्रम। मानना पड़ेगा कि जेपीटी हैज़ सम सेंस। वेरी गुड वेरी गुड। वेरी नाइस थिंग। देखिए ज्ञान कहीं से मिले अच्छा

मिलना है। ज्ञान अच्छा दिया है। यहां श्रील जीव गोस्वामी की व्याख्या विशेष महत्वपूर्ण है। यदि गुरु किसी अन्य शिष्य के गुणों से हां यदि गुरु किसी अन्य शिष्य के गुणों से प्रसन्न होकर उसका अधिक आदर करते हैं तो विनर्म शिष्य को उससे ईर्ष्या नहीं होती अपितु प्रसन्नता होती है। क्लियर है? इसका कारण यह है कि विनर्म शिष्य स्वयं को सम्मान का अधिकारी मानकर नहीं चलता है। तो विनम्रता से क्या आ गया? अनुसूया का गुण।

फाइन। ठीक है? अतः विनम्रता से दूसरों के गुणों में दोष देखने की प्रवृत्ति घटती है। अब दूसरों में दोष नहीं दिख रहे हैं। गुण देख रहे हैं तो उनसे मैत्री करने की भावना नहीं होगी। कितना मजेदार है ना? अच्छा है ना? कहीं किसी को विरोध तो नहीं हो रहा है। अगर आप दूसरों को अच्छा देख रहे हो, उसके गुण ही देख रहे हैं तो आपके पास अच्छा सामने वाला अच्छा व्यक्ति है तो अच्छा व्यक्ति है तो उससे दोस्ती करेंगे। तो अनुसूया से मैत्री जब हम किसी के गुण

में दोष देखेंगे तो खराब आदमी है कि नहीं? तो खराब आदमी से कौन दोस्ती करता है? आप लोग करते हैं किसी खराब व्यक्ति से जानते हुए जो आपको खराब लग रहा है उसमें कितने लोगों ने आज तक उन लोगों से मैत्री करी है जो आपको खराब लगते हैं। श्री कृष्ण उपाध्याय प्रभु समझ रहे हैं बात आपने मैत्री करी आज तक किसी से दोस्ती करी है तो उससे करी है जो आपको खराब लगता है। तो जो खराब लग रहा है उससे दोस्ती क्यों

करेंगे? है ना? अच्छा पॉइंट है। तो अगर अनुसूया है अर्थात दूसरों के गुणों में दोष नहीं देख रहे हैं। गुण ही देख रहे हैं तो गुणवान व्यक्ति से तो दोस्ती करनी चाहिए ना। करनी चाहिए नहीं करता है। करता है। इज इट अंडरस्टैंडेबल? बड़ा अच्छा लगा हमको। इसीलिए अनुसू्याया भूतेशु कृत मैत्राया। जब शिष्य दूसरों के गुण यानी उन्नति और सम्मान से ईर्ष्या नहीं करता तब उसका हृदय अन्य जीवों के प्रति खुलने लगता

है। उसे मैत्री करता है। सौहार्द करता है। दूसरों को प्रतिस्पर्धी समझने के स्थान पर वह उन्हें भगवान से संबंधित जीव मानता है। इस प्रकार से अनुसूया से मैत्री और दया की भावना विकसित होती है। इतना सब चैट जीपीटी को कैसे मालूम चल गया? हु थॉट हु फेड ऑल दिस थिंग। बड़ा अच्छा शिष्य है। क्या बढ़िया? बात सही कह रहा है। मैत्री से सेवा दिस इज वेरी नाइस। जब आप दूसरों के

प्रति मैत्री से युक्त होते हैं, सेवा से युक्त होते हैं। सॉरी दया की भावना से युक्त होते हैं। देन यू वांट टू सर्व देम। आप कभी किसी ऐसे व्यक्ति की सेवा करना चाहे हैं जिससे आपकी मैत्री ना हो। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सेवा करनी पड़ रही है। बॉस तो बॉस वाली बात तो अलग है। वो तो पैसे दे रहा है इसलिए कर रहे हैं। लेकिन आप देखिए कि जिनसे मैत्री होती है उनको भोजन कुछ देते हैं। उनको कुछ गिफ्ट देते हैं, मिठाई देते हैं। नेचुरल यू वांट टू सर्व देम ना बिकॉज़ जिससे मैत्री होती है

उसकी सेवा सुख स्वरूप होती है। सुख मिलता है करने में। समझ में आ रहा है ना? तो हमको बड़ा अच्छा ये लगा सिस्टम। जिसके हृदय में वास्तविक मैत्री और दया है वह केवल दूसरों का शुभ चाहकर संतुष्ट नहीं रहता। बहुत अच्छी बात है। बल्कि उनके कल्याण के लिए कार्य करना चाहता है। दिस इज़ वेरी नाइस। ऐसा नहीं है कि आपका कल्याण हो, कल्याण। जब आपका कल्याण करने का सामर्थ्य होगा तो छोड़ेंगे भी नहीं। आप समझ रहे हैं इस बात को जैसे पिता माता

है तो अपने बच्चे के प्रति मैत्री मतलब हित हित कामना होती है तो हित करते भी तो हैं करे बिना रहते नहीं ना ऐसा नहीं खाली शुभच्छु शुभच्छु आपका भला हो जाए भला हो जाए अगर सामर्थ्य होता तो करता भी है व्यक्ति तो इसलिए कह रहे हैं कि सुशुष अब अभिरताय च सेवा में रत रहता है गुरु की सेवा करके वह स्वयं शुद्ध होता है और गुरु के उपदेश का अनुसरण करके दूसरों का भी कल्याण कर सकता है यहां सुश्रुषभताय का विशेष अर्थ गुरु सेवा में आलस्य रहित

तत्परता है। लगातार भगवान की गुरु जी की सेवा में लगे रहना। तो गुरु सेवा से वैराग्य कैसे आता है? जब शिष्य गुरु सेवा और भगवत सेवा में आनंद प्राप्त करने लगता है तब भौतिक विषयों के प्रति उसकी आसक्ति क्रमशः कम होती है। यह तो बहुत बढ़िया बात बोली है। बहुत बढ़िया बात बोली है। देखिए गुरु जी की सेवा मतलब गुरु की प्रसन्नता। अब गुरु की प्रसन्नता किस में है? कि हम

भगवान की भक्ति करें। तो उसमें संदेह नहीं है। अब भगवान की भक्ति करेंगे तो वैराग्य हो जाएगा। इंटरइंड है चीजें लेकिन गुरु की सेवा और भगवान की भक्ति में भेद नहीं है। मैं बार-बार बोल रहा हूं सेवा का क्या मतलब होता है? सेव्य को सुखी करना। यह समझते हैं ना सेवा का उद्देश्य। द ऑब्जेक्ट ऑफ आवर सर्विस इज टू प्लीज द ऑब्जेक्ट ऑफ़ आवर सर्विस। तो गुरु जी को वैष्णवों को संतुष्ट करने का क्या तरीका है? भगवान की भक्ति करना, साधना करना,

सेवा करना सब बेसिकली सर्विस। सर्विस समझ रहे हैं ना बात? तो गुरु जी की सेवा करेगा तो गुरु जी तो भक्ति से प्रसन्न होंगे तो कहेंगे बेटा थम्स अप ले आया तू थम्स अप नहीं ले आया राधा रमण प्रभु क्या है ऐसे खाली है गिरिराज जी के लिए थम्स अप लेके आते हैं कुछ तो आप जान रहे हैं कि कॉफी चाय तो ना कोई भी कोई भी आप भी नहीं मांगोगे कोई भी नहीं मांगेगा तो थोड़ा समझना चाहिए कि बड़ा इंटरेस्टिंग गुरु जी की सेवा करेगा तो भक्ति करेगा भक्ति करेगा तो जगत से

वैराग्य हो ही जाता है भक्ति परेशान विरक्त अन्यत्र च काल हम बहुत तेज जा रहे हैं क्या समझ में आ रहा है कुछ ओके लेट स्लो डाउन जब भक्ति करते हैं तो भक्ति का प्रभाव होता है ना कि भक्ति बढ़ती है और भक्ति बढ़ती है तो जगत से विरक्ति हो जाती है। ये तो देख ही रहे हैं आप लोग। हर दिन आप भगवान का नाम जप करते हैं तो प्रभुपाद जी की सेवा है प्रभुपाद से प्रसन्न होते हैं। गुरु महाराज अगर दीक्षा है तो गुरु महाराज ही प्रसन्न होते हैं। वैष्णव प्रसन्न होते हैं। कौन समझता है कि 16 माला करने से गुरु जी प्रसन्न नहीं होते

हैं। तो अब समझ में आ रहा है कि भाई सबसे पहला इंस्ट्रक्शन है कि 16 माला का जप करो। प्रसन्न होते हैं तो देख रहे हैं कुछ तो रिक्त आ रही है। ये नहीं कि पूरी आई लेकिन आई तो है। ठीक है। यह केवल विषयों का दमन नहीं बल्कि उच्चतर रस की प्राप्ति के कारण निम्नतर रस के प्रति आकर्षण घटना है। क्या यह परम दृष्ट्वा निवर्तते तो गुरु जी की सेवा कर रहा है। भगवान का अनुभव हो रहा है। तो

भगवान अच्छे लग रहे हैं। इस कारण से विषयों से विरक्ति हो रही है। ठीक है? अब ये तो बिल्कुल स्पष्ट है। वैराग्य है तो शांत चितता बिल्कुल इजी है। जिसको विषयों से वैराग्य हो गया उसका चित्त शांत है। चित्त में डिस्टरबेंस किस लिए होता है?

बैठा भजन कर रहा है। अरे यार यह खाना है। वह पीना है। यह देखना है। यह छूना है। यही ना चित्त की अशांतता है। तो वैराग्य हो जाता है। तोित शांत हो जाता है। तो ईजी है। चित्त की अशांति का एक प्रमुख कारण विश्व को प्राप्त करने और प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करने की निरंतर इच्छा है। परपट तो बहुत बढ़िया दे रहा है ये। बढ़िया परपट है। है ना यह? जो नहीं मिला उसको योग उसको

जोड़ने की इच्छा उसकी वजह सेित अशांत रहता है कि नहीं यह फोन है वो फोन चाहिए यह नहीं है तो चाहिए है ना आप देखो आजकल जितना व्यक्ति सोचता है स्मार्टफोन यह खरीदें वो करें आज से सन 2000 की बात करें तो कोई फोन स्मार्टफोन था ही नहीं एग्जिस्ट ही नहीं करता था आप सोचिए कितना कम डिस्ट्रैक्शन था हम

सोचिएगा मतलब बहुत मोक्ष माता जी और नरेंद्र प्रभु मैं साइंटिस्ट प्रभु यह लोग जमाना देखे हैं जब स्मार्टफोन नहीं और भी जो थोड़े वृद्ध लोग हैं वो हां ये राधिका प्रभु मतलब अब हमको वृद्ध नहीं कह रहे हैं मतलब जस्ट मतलब वो वी आर जैन ए और जैन जैन सी जो भी है और कुछ लोग तो पैदा ही हुए हैं कि बिल्कुल पूजा माता जी आप देखी हैं वो जमाना जब स्मार्टफोन नहीं होता था इन्होंने भी देखा

है किन-किन बच्चों ने बिल्कुल नहीं देखा वह जमाना कि स्मार्टफोन होता ही नहीं था कुछ लोगों ने देखा होगा इज नॉट बट लाइफ वास वेरी ईजी नो ईजी मींस इट वास स्टिल ईजी आई वोंट से नॉट मतलब कास्टेंट डिस्ट्रैक्शनेस कास्टेंट एजिटेशन कास्टेंट एजिटेशन अमेजिंग और वो भी जमाना देखा होगा शायद राधिका प्रभु ने देखा होगा कि टीवी भी नहीं होता था वो तो और भी अमेजिंग था वो भी एकदम डिस्ट्रक्शन खत्म वो आपने देखा

होगा वो ब्लैक वाला जो टीवी आया उसमें रामायण दिखाया महाभारत देखा उसके बाद सब कुछ सब कुछ दिखाया जो नहीं देखना चाहिए चाहिए था। एक घर में हां, एक घर में होता था। तो आप देख रहे हैं कि उससे पहले कितना कम डिस्ट्रक्शन रहता होगा। फिर भी लोग जप नहीं करते थे। यह भी दिक्कत थी। लेकिन लेकिन ये है इंटरेस्टिंग बात। तो आप देख रहे हैं कि जितना वस्तु हम इकट्ठा करते हैं उतनी और अशांति बढ़ती है। तो अब जो है नहीं है

उसको प्राप्त करने की शांति और जो है उसकी रक्षा करने की चिंता। यह खराब ना हो जाए यह ना हो जाए वो ना हो जाए। तो यह सारी चीजों से व्यक्ति को जब वैराग्य होगा, वस्तुएं चाहिए ही नहीं तो फिर चित्त शांत नहीं हो जाएगा। भोग लालसा समाप्त हो जाएगी तो चित्त शांत हो जाएगा। आप देखिए कि हम लोगों की प्रोग्रामिंग की जा रही है कि हम लोग जानबूझ करके चित्त को अशांत करते हैं। मतलब शांति से बैठा तो शांत चैन नहीं

मिलेगा। फिर बोर हो जाएगा। कुछ उसको इनपुट चाहिए जिससे वो डिस्टर्ब हो। स्वीकार है ना चीजें। जब विषय शक्ति घटती है तब चित्त की चंचलता भी घटने लगती है। अतः वैराग्य चित्त की शांति में सहायक होता है। ईजी है। कारण कार्य दिख रहा है। जैसे एक सिंपल सी बात है कि बहुत से भक्तों का यहां पर अब घूमने की चाह खत्म हो गई कि देखें भाई शिमला में क्या है? मनाली में क्या है?

Frequently asked questions

ज्ञान के अधिकारी व्यक्ति को बाह्य विषयों से विराग होना चाहिए, उसका चित्त शांत होना चाहिए, वह दूसरों का कल्याण चाहने वाला और पवित्र होना चाहिए।

भक्ति और सेवा करने से व्यक्ति में निरंतर विनम्रता का भाव रहता है और अहंकार का त्याग करना पड़ता है।

श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक इस कथा का श्रवण या कीर्तन करने से व्यक्ति निश्चय ही भगवान के परम पद और धाम को प्राप्त करता है।