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Bhajan Marg · Transcript · · Updated

गौ सेवा, गौ ग्रास और गौ परिक्रमा की अद्भुत महिमा !! क्या गौ सेवा के बिना मुक्ति हो सकती है ? – Transcript

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Summary

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  • जो रोज गाय को प्रणाम करता है और गाय की प्रदक्षिणा करता है तो भगवत प्रदक्षिणा का उसे फल प्राप्त होता है।
  • गृहस्थ धर्म में या जिनके पास अर्थव्यवस्था है, उनको चाहिए कि गौ सेवा से शरीर व हृदय पवित्र होते हैं और गोविंद प्रसन्न होते हैं।
  • गौ सेवा के नाम पर आया हुआ धन केवल गौ सेवा में ही लगना चाहिए, उसे अपने भोग या वासनाओं की पूर्ति में नहीं लगाना चाहिए।
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Transcript

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जो रोज गाय को प्रणाम करता है और गाय की प्रदक्षिणा करता है तो भगवत प्रदक्षिणा का उसे फल प्राप्त होता है यदि घर में गाय बंधी है और भूखी है और प्यासी है तो तुम्हारे सारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे गौ का बहुत बड़ा महत्व वर्णन किया गया धर्मशास्त्रों में यहां तक कि जब कोई ऋषि नाराज होता था तो आगे गाय करके जाया जाता था तो क्षमा हो जाती थ गाय को देखते ही व

क्षमा कर देते थे क्या बिना गौ सेवा के जी जो हर तर बिना गौ सेवा के क्या उसकी उपासना क जो मुक्ति है वो विशुद्ध बोध से है जो भक्ति है व विशुद्ध प्रेम से है और जो धर्म है उसके अंग है हा य धर्म के अ य बात सतर सतर लोका तार मम भक्ति यतो भन पुना

तीर्थ कुर्वंति तीर्था गंगा जी भी इंतजार करते हैं ऐसे महापुरुष का जिसका निरंतर भगवता का चिंतन चलता रहता है गृहस्थ धर्म में जैसे है या जिनके पास बहुत अर्थव्यवस्था है उनको चाहिए कि गौ सेवा से बहुत जल्दी शरीर पवित्र होता है हृदय भी पवित्र होता है और

गोविंद भी प्रसन्न होते हैं यदि गावा प्रदक्षिणा कार्या वंदनीय ही नित्य सहा मंगलायतन दिव्या श स्वेता स्वयं भुवा यदि गाय घर में पाली जाए या गौशाला खोली जाए और गौओं की सेवा

की जाए जिनके पास अर्थ है भाव है भगवान स्वयं श्री कृष्ण चंद्र ू ने गौ सेवा स्वीकार की गए चराई गओ की परिक्रमा करने से जैसे आप प्रभु के बिहारी जी के मंदिर की चार परिक्रमा करें तो जो फल आपको मिलेगा वही गाय की चार परिक्रमा कर ले तो आपको प्राप्त हो जाएगा गौ की प्रदक्षिणा

से गाव प्रदक्षिणा कार्या वंदनी याही नित्य स जो रोज गाय को प्रणाम करता है और गाय की प्रदक्षिणा करता है तो भगवत प्रदक्षिणा का उसे फल प्राप्त होता है जहां गए विराजमान होती हैं व बड़ा पवित्र दिव्य तीर्थ स्थल माना जाता है गौवे जहां विराजमान रहती गौशाला में भजन

करे तो कई गुना बढ़ कर के प्राप्त होता है स्वयं ब्रह्मा जी ने गौओं को दिव्य गुणों से विभूषित बनाया है अपया गारा विप्राण देवता यतना निच यद गोमय सुति किम बूमो हृद कम ततः गाय के गोबर से जहां लेपा जाता है वहां जिस देवता का वाहन करोगे वही देवता आकर विराजमान हो जाए

अपवित्र भूमि में भी यदि गाय के गोबर का लेप कर दिया जाए तो परम पवित्र मानी जाती है गाय बहुत पवित्र जहां वह बैठती है जहां व मूत्र त्याग करती गोबर त्याग करती वह स्थान तीर्थ तुल्य पवित्र माना जाता है भगवान जब गाय के पीछे पीछे चलते तो गोरज उड़कर उनके मस्तक पर विराजमान होती

उनके मुखारविंद पर विराजमान होती बाल गोविंद के अनिष्ट को दूर करने के लिए गाय के पूछ को उनके ऊपर ऐसे झाड़ा देते थ मैया जब गुरु मंत्र वैदिक सिद्धांत से दिया गया था पहली

बार तो पंचगव्य पिलाया गया था गो मूत्रम गोमय रम दधि सरपस तथैव च गवामढ़ी सकलम जगत कितना भी बड़ा पापी हो अगर पंचगव्य पिलाया जाए तो वह वैदिक मंत्रों को स्वीकार करने लायक हो जाता है पवित्र हो जाता है

पंचगव्य में पांचों चीजें गाय की होती है गाय का मूत्र गाय का गोबर गाय का दूध गाय का दही और गाय का घी यह पांचों मिलाकर पंचगव्य पिलाया गया था पहली बार जब वैदिक मंत्र दिया गया था तो पंचगव्य बनवाया था गुरुदेव भगवान ने सन्यास और वो पिलाया था ये पंचगव्य पिलाने से अपवित्र का नाश होकर पवित्रता का संचार होता है

इसलिए धन्य है उनका जीवन जो गौ सेवा परायण है भगवत भाव से गाय में साक्षात भगवान का भाव रखकर गौ सेवा करते हैं त्रिशिता गौर गृहे बद्धा गेहे कन्या रजस्वला देव शस्त्र स निर्माल्य हंति पूर्णम पुरा कृतम य घर में गाय बंधी है और भूखी है और

प्यासी है तो तुम्हारे सारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे अगर घर में रजस्वला कन्या बहुत काल तक है और उसका विवाह आप नहीं कर रहे हैं तो आपके सारे सुकृत नष्ट हो जाएंगे यदि घर में ठाकुर जी विराजमान हो कर का पहनाया हुआ माला सुबह तुमने देख लिया तो तुम्हारे सारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे क्योंकि सन कराते समय तुमने उतारा नहीं

अर्थात तुम सेवा में प्रमाद करते तो देवता चर माल हंति पूर्णम पुरा कृतम जैसे सुबह श्रृंगार किया तो रात्रि के शयन के समय व हटा लेने चाहिए माले जब हम शयन कराते हैं तो भले पुष्प सया पर सन कराए पर माला नहीं धारण कर श्रंगार का माला अगर दूसरे दिन दर्शन किए क्यों पहने ठाकुर जी तुम्हारे सुकृत नष्ट हो

जाएंगे गाय बंदी हो घर में प्यासी है और भूखी है तुम्हारे सुकृत नष्ट हो जाए जाएंगे त्रिशिता गौर गृह बद्धा क्योंकि तुम्हारे पास है सेवा करना चाहिए यव गाम प्रति सिद्ध तो चरम चत्र नर तस्य पूर्वे पित कपं पतन मुखा यदि गाय हरी हरी घास चर रही कहीं और तुमने डंडा ऊपर प्रहार किया

लाठी मारी तो तुम्हारे पितर खोपड़ी के बल नरक जाने के लिए तैयार हो गए ये लिखा है चरम स् ण नरा तस्य पूर्वे पित कम पते पत मुखा इसीलिए क्या भारत से कहीं किसी की तुलना हो सकती है जहां गौ को माता की पदवी दी गई जहां गौ को हम आराध्य देव के रूप

में मानते हैं आराधना करते हैं गौ रक्षा गौ सेवा य बहुत बड़ा इसमें छुपा हुआ है स्वयं भगवान अवतरित होकर गौर जब गाय के रूप में पृथ्वी रमती तो भगवान का अवतार हुआ है बड़ा विचित्र समय आता चला जा रहा है कि अब आधुनिक यंत्रों की ऐसी सेवाएं हो गई बड़ी बड़ी कि अब ना बैल की जरूरत है और ऐसे दूध

दे दूध की महंगाई बन गई कि अब देसी गाय दो लीटर तीन लीटर चार लीटर और ऐसी ऐसी की 20 20 25 2 लीटर दे तो कौन देसी गाय को गओ का सेवा का भावना शास्त्र आज्ञा करता है कि जो प्रतिदिन अग्र ग्रा से परो भावा कर्तव्य

भक्ति तोन अकृत स्व म हारम कुर्म नापन दुर्गति जोही तुम्हारे गृहस्थ में घरों में पहले होता था अब तो भगवान जाने जही पहली रोटी तवा में गई तो वह निकाल कर के पक्की रखी जाती थी गौ ग्रास के लिए पहला रसोई में तो इसमें लिखा प्रतिदिन स्व

भोजन पहले स्वयं भोजन ना करके गाय के लिए ग्रास निकालना चाहिए तो जिनके पास अर्थव्यवस्था जो गृहस्थ धर्म में है या जिनके पास अर्थ है कुछ रोज एक रुपया निकालो हम कह रहे रोज निकालो तो महीने में 30 रप होते 30 रप में एक गाय को हरी घास तो एक टाइम पवा ही सकते हो ना बहुत नहीं

है तो एक एक रुपया निकाल के अगर एक गाय को चारा दोगे तो एक बार का भोजन तो हो ही सकता है रप में हरी घास जाकर के उसके एक बार पवा दोगे ना अग्र ग्रा से परो भावा कर्तव्य भक्ति तोन भक्ति पूर्वक गाय को एक ग्रास भोजन में एक रोटी तो निकालना चाहिए

गाय के लिए ऐसा शास्त्र आज्ञा कहता है जो ऐसा करता है तो अकृत वा स्वयम हारम कुवन नापन दुर्गति अपने आहार से एक रोटी निकालकर गाय को देता है और स्वयं तीन रोटी भले पाले एक रोटी गाय को दे दी तो बोले उसकी दुर्गति नहीं होगी अर्थात उसके अंदर

भाव बढ़ता चला जाएगा भगवान की भक्ति में और तेना नयो हुता सम्यक पितरस पितर पिता देवास पूजिता स् तेन यो ददा गवान हिकम जो प्रतिदिन गौ ग्रास निकालता है अर्पित करता है तो उसको अग्निहोत्र करने का फल मिलता है उसके पितरों को तृप्ति मिलती है और समस्त

देवताओं के पूजन का फल मिल जाता है जो गौ ग्रास निकालता है यो ताते धनु मृत्य वि मध जो मूर्ख मनुष्य जैसे अब गाय दूध नहीं दे रही मार डंडे डंडे मार रहे हैं इंजेशन लगा रहे ऐसे वैसे कर रहे उसको ताड़ना दे रहे हैं तो बोले जो मूल बुद्धि मूर्ख मनुष्य यो ताते

धनु मृते विम वो गाय को लाठी से मारता है डंडे से मारता है हाथों से मारता है तो धर्म राजस नगरे सा याति करव जिता धर्मराज जी पहले अपने नर्क में ले जाकर के उसके कहते थोड़े थोड़े तिल तिल करके पहले इसके हाथ काटो मरना है नहीं वहां अब आराम आराम से थोड़े थोड़े पहले हाथ वजता इन्ही हाथों से गाय को मारा था

ना ऐसे थोड़ा थोड़ा काटा जाता है उसके हाथ कर वजता उसके दोनों हाथ काट कर के थोड़े थोड़े यव दन न वारती तस पूर्वे कथा काहा नृत्य त सवाद स्मा तरसती भाग्यवान जो गौ के शरीर को स्नान कराता है गौ के

शरीर को कीट आ से मच्छर आदि से रक्षा करता है और खूब अच्छा अच्छा पदार्थ केवल दूध के लोभ से नहीं य हम गौ सेवा की बात कर रहे हैं ये कि नहीं 10 लीटर दूध देती तो हाथ फिर और जब दूध नहीं देती है तो चारा भी ठीक से नहीं दे रहे और उसके ये स्वार्थी वो गौ सेवा का बात नहीं वो दूध का लोभी केवल व्यापार की बात करता है गौ सेवा का

तात्पर्य है गौ सेवा केवल खूब बछड़े को पिला दिया प्रसाद रूप से जो दूध मिला उसका अपने सेवन की वो बात तो अलग है अब बछड़े को तो जरा सा केवल पिलाने के लिए कर दिया और खूब सारा दूध लीटर में नाप करके जा रहा है और उस समय तक तो खवा पियाओ ग ही खूब अच्छे से उसके बाद जब दूध देना बंद किया तो उसका आदर सत्कार खत्म खोल के बाहर ऐसे

वो प्लास्टिक खाते घूम रही है तो ये गौ सेवा नहीं मानी जाएगी वो स्वार्थ पूर्ति मानी जाएगी जो सदैव गौ सेवा करता है उसके डास मच्छर हटाता है स्नान कराता है पीठ में हाथ फेरता है उसके पूर्वज जो पितर होते हैं वो नाच पढ़ते हैं उनका मंगल होना शुरू हो जाता है कि हमारे

वंश में गौ सेवक पैदा हुआ बड़ा भाग वान है और वो गौ के द्वारा हमें तार देगा ऐसा भाव गौ सेवा हमारे सनातन धर्म में बहुत बड़ा स्थान गौ सेवा का है पर एक बात ध्यान रखें इन सब सेवा का फल है भगवान के चिंतन में निरंतर वृत्ति डूब जाए हमारी एक एक वृत्ति

Frequently asked questions

जो रोज गाय को प्रणाम करता है और गाय की प्रदक्षिणा करता है, तो उसे भगवत प्रदक्षिणा का फल प्राप्त होता है।

पंचगव्य में गाय का मूत्र, गाय का गोबर, गाय का दूध, गाय का दही और गाय का घी शामिल होता है।

मुक्ति विशुद्ध बोध से और भक्ति विशुद्ध प्रेम से होती है, तथा अलग-अलग निष्ठाओं के द्वारा महापुरुषों ने भगवान की प्राप्ति की है।