Dekho Suno Jano · Transcript · · Updated
French Revolution # 04 | Election and Bastille | by Usama Ghazi – Transcript
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Transcript
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[संगीत] 14 और 15 जुलाई 1789 की रात लुईस द 16थ के करीबी दरबारी लयानकोर्ट ने बादशाह को जगाया और कहा हुजूर उठिए बिस्तील पर कब्जा हो गया है। बादशाह आंखें मलते हुए उठा और कहने लगा अच्छा तो क्या फिर बगावत शुरू हो गई है? दरबारी ने अदब से सर झुकाया और कहा हुजूर यह बगावत नहीं इंकलाब है। मैं हूं मोहम्मद ओसामा गाजी और आज फ्रेंच
रेवोल्यूशन की कहानी में हम आपको पेरिस के उस बदनामे जमाना कैदखाने की दास्तान दिखा रहे हैं जिसे दुनिया बिस्तील के नाम से जानती है। हम आपको यह भी बताएंगे कि मुजरिमों से हथियार खरीद कर फौज क्यों बनाना पड़ी और फ्रांसीसी आवाम की आखिरी उम्मीद कौन था। [संगीत]
16 जुलाई 1788 को पेरिस में एक बग्गी दाखिल हुई जिसे छह घोड़े खींच रहे थे। [संगीत] इस बग्गी के साथ प्रोटोकॉल के लिए एक घुड़सवार फौजी दस्ता भी था जो शहरियों को रास्ते से हटा रहा था। शहर के लोग हैरान थे कि इस बग्गी में कौन बैठा है? यह बग्गी शहर के मरकजी हिस्से में एक छोटे से महल के सामने जाकर रुक गई। मेहमानों के इस्तकबाल के लिए शहर के बड़े-बड़े लोग मौजूद थे। मौजिज़ मेहमानों को महल में ठहरा
दिया गया। वारसाई महल में बादशाह को खबर कर दी गई कि मैसूर के सुल्तान टीपू का वफ मुलाकात की इजाजत चाहता है। लेकिन बादशाह ने मुलाकात को एक माह के लिए टाल दिया। क्योंकि वो खुद मुश्किलात का शिकार था। हम पिछली किस्त में आपको दिखा चुके हैं कि कैसे आवाम ने टैक्स देना बंद कर दिए थे। वफ्त की आमद से सिर्फ एक माह पहले जून में ग्रेनोबिल के इलाके में आवाम ने फौज को
ईंटें मार मार कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। रेनेस शहर में तो बगावत को पहले फौज से कुचला गया। फिर वहां चार पैदल और दो घुड़सवार रेजिमेंट्स की मुस्तकिल छावनी बना दी गई ताकि इंकलाबियों को रोका जा सके। टीपू सुल्तान का वक्त जुलाई में आया था और अगस्त में पेरिस में फिर हंगामे शुरू हो गए। इंकलाबियों ने पहले दो वजीरों के पुतले जलाए और फिर इनके घर जलाने की भी
कोशिश की। मुसलसल बगावतों के बाद आखिरकार बादशाह ने आवाम को ठंडा करने के लिए दो ऐसे बड़े फैसले कर दिए जिन पर अगर वो कायम रहता तो शायद फ्रांस में कभी इंकलाब ना आता। एक फैसला तो था साबिक वजीर जो स्नेकर को दोबारा वज़र खजाना और चीफ मिनिस्टर बनाने का। जो स्नेकर आवाम का पसंदीदा तरीन वज़र था। वो आवाम को रिलीफ देने और अमीरों
पर टैक्स लगाने का बहुत बड़ा हामी था। जब 1779 से 1781 तक वो वजीर खजाना रहा था तो इसने फ्रांस के सारे सूबों में लोकल असेंबलियां कायम कराई थी। [संगीत] इन्हीं असेंबलियों ने बादशाह की तरफ से नए टैक्स लगाने के फैसले रोके थे। इसी वजह से लोग नेकर को इतना पसंद करते थे कि एक बार जब चर्च के एक ओहदेदार ने नेकर को बुरा भला कहा तो लोगों ने इसे कोड़े मारे। एक औरत ने नेकर के एक मुजस्सिमे को नुकसान
पहुंचाया तो वहां मौजूद औरतों ने इसके कपड़े फाड़ डाले और मार मार कर इसे लहूलुहान कर दिया। यानी नेकर को वजीर बनाकर बादशाह ने आवाम के दिल जीतने की कोशिश की और ऐसे में जोक्स नेकर इंकलाबियों की आखिरी उम्मीद था। दूसरा अहम फैसला बादशाह ने यह किया कि पार्लियामेंट के मुश्तका इजलास यानी स्टेट्स जर्नल और पॉलिटिकल रिफॉर्म्स के ऐलान पर अमल का
हुक्म दे दिया। बतौर वज़रे आजम स्टेट्स जर्नल का सारा इंतजाम करने की जिम्मेदारी भी जोक स्नेकर को मिल गई। हमने पिछली किस्त में आपको दिखाया था कि यह इजलास 1789 में हुआ था। लेकिन स्टेट्स जनरल का इजलास पार्लियामेंट मुंतखब होने के बाद ही होना था। इसलिए फ्रांस में इलेक्शन की तैयारियां जोर पकड़ गई और इसके साथ ही मुल्क में पंपलेट्स का तूफान आ गया। आवाम ने लाखों पंपलेट्स पर अपने मुतालबात लिखकर
सारे मुल्क में तकसीम करना शुरू कर दिए। इनमें बड़े मुतालबे, टैक्सों में कमी और आवाम को ज्यादा इख्तियारात देने से मुताल्लिक थे। फ्रांस में इलेक्शन का मौसम चल रहा था और इसके साथ टीपू के वफ्त और लुइस द 16थ के मुजाकरात भी वफ्त ने बादशाह और दरबारियों से मुलाकात की और इन्हें बताया कि अगर टीपू सुल्तान को 10,000 फ्रांसीसी सिपाही दे दिए जाए तो वो अंग्रेजों को बर्रेस सगीर से निकाल बाहर
करेंगे। जब फ्रांस की हुकूमत ने कौमी खजाना खाली होने का रोना रोया तो वफ ने इन्हें कहा आप सिपाही भेजें इनकी सारी तनख्वाएं और खर्च टीपू सुल्तान बर्दाश्त करेंगे लेकिन लुइस द 16 खौफजदा था कि फ्रांसीसी आवाम पहले ही जंगों से तंग हैं। कोई नई जंग शुरू हुई तो लेने के देने पड़ सकते हैं। इसने टीपू सुल्तान के वफ्त को मायूस लौटा दिया। हम कह सकते [संगीत] हैं
कि अगर उस वक्त फ्रांस टीपू सुल्तान की मदद करता तो शायद हिंदुस्तान का मुस्तकबिल मुख्तलिफ होता। नवंबर 1788 में बादशाह ने जो स्नेकर की सिफारिश पर पार्लियामेंट में थर्ड स्टेट यानी आवाम के नुमाइंदों की तादाद दुगनी कर दी। अब पार्लियामेंट में नुमाइंदों की कुल तादाद 1214 थी। इनमें चर्च के 308, उमरा के 285 और थर्ड स्टेट
के 621 नुमाइंदे शामिल थे। वोटर्स की तादाद 60 लाख थी। लेकिन फिर घरेलू मुलाजिमों और अदाकारों को वोट देने से रोक दिया गया। पेरिस में तो पाबंदी लगा दी गई कि वोट सिर्फ वही डालेगा जिसके पास या तो कोई सरकारी [संगीत] ओहदा हो, यूनिवर्सिटी की डिग्री या फिर वो छह शिलिंग सालाना टैक्स देता हो। चुनांचे पेरिस के 12,000 वोटर वोट डालने के अहल रह गए।
पेरिस के ज्यादातर वोटरों, फ्रांस भर में घरेलू मुलाजमीन और अदाकारों को वोटिंग के अमल से बाहर करने का नतीजा [संगीत] यह निकला कि वोटरों की तादाद 60 लाख से कम होकर 50 [संगीत] लाख रह गई। लेकिन यह तादाद फिर भी बहुत ज्यादा थी। यूरोप में इतने ज्यादा लोगों ने कभी वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया था। फरवरी 1789 में वोटिंग शुरू हुई और यह सिलसिला अप्रैल 1789 तक जारी रहा। इलेक्शन का तरीका यह था
कि आवाम ने अपने नुमाइंदे बराहेरास्त मुंतखब नहीं करने थे बल्कि इन्होंने इलेक्ट्रोरल असेंबलियों को सेलेक्ट करना था। इन इलेक्टोरल असेंबलियों ने बाद में पार्लियामेंट के नुमाइंदे सेलेक्ट करने थे। यानी ये एक इनडायरेक्ट इलेक्शन था। अप्रैल 1789 को पेरिस में इलेक्टोरल असेंबलियों के इजलास शुरू हो गए थे। इसी दौरान रिवेलियन का वाकया भी पेश आया था। जिसकी कहानी हम आपको दिखा चुके हैं। इन हंगामों के दौरान जो पार्लियामेंट मुंतखब
हुई इसमें [संगीत] थर्ड स्टेट के तकरीबन तमाम ही रुकन बादशाह के सख्त खिलाफ थे। इनमें एरिस का वो नौजवान भी शामिल था जिसने कभी बादशाह की शान में कसीदे पड़े थे। लेकिन बादशाह ने इसे नजरअंदाज कर दिया था। इस बात पर [संगीत] इस नौजवान यानी मैक्सिमिलियन रब स्पेयर को तौहीन का एहसास हुआ था और यह एहसास इसके दिल में जड़ पकड़ चुका था। अब रब स्पेयर इंतकाम और इंकलाब
के मिलेजुले जज्बात लेकर असेंबली इजलास में हिस्सा लेने पेरिस पहुंच गया था। जहां बादशाह की गलतियों से ही इंकलाब की तहरीक को हवा [संगीत] मिल रही थी। बादशाह ने पार्लियामेंट बनवा तो दी थी, लेकिन दिल से कबूल नहीं किया था। इसे डर था कि पार्लियामेंट इसके इख्तियारात छीन कर बादशाहत का खात्मा कर देगी। क्योंकि इस पार्लियामेंट में थर्ड स्टेट यानी आवामी नुमाइंदों की अक्सरियत थी जो रोसों के फलसफे से मुतासिर थे। और रोसों का फलसफा
तो जाहिर है बादशाहत के खिलाफ था। यही वजह थी कि जब 2 मई 1789 को पार्लियामेंट के नए अराकीन बादशाह से मिले तो बादशाह ने थर्ड स्टेट वालों से सीधे मुंह बात नहीं की। 5 मई को पार्लियामेंट का इजलास होना था। इससे पहले 4 मई को पेरिस के नोटरी डम चर्च से सेंट लुइस तक एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में पार्लियामेंट के तमाम अराकीन शाही खानदान के अफराद बादशाह और मलिका भी
शरीक हुए। इस जुलूस को देखने के लिए सारा पेरिस उमड़ आया। लाखों लोग रास्ते के दोनों तरफ खड़े थे या घरों की छतों पर बैठे यह मंजर देख रहे थे। आवाम थर्ड स्टेट के अराकीन को देखकर तो खुशी से नारे लगा रहे थे लेकिन जब बादशाह और मलिका गुजरे तो औरतों ने मलिका के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ औरतों ने मलिका को चिढ़ाने के लिए ड्यूक ऑफ आर्लिंस जिंदाबाद के नारे भी
लगाए। ड्यूक ऑफ आर्लिंस एक शहजादे का नाम था जो आवाम की हिमायत करता था। इसने अपनी एक बिल्डिंग भी आवाम को दे रखी थी। जहां आवाम बादशाहत के खिलाफ तकरीरें करते थे और सबसे ज्यादा तकरीरें मलिका की फिजूल खर्ची के खिलाफ ही होती थी। इसलिए हुजूम मलिका को चिढ़ा रहा था। अब जाने यह सच है या अफवाह। लेकिन कहने वाले कहते हैं कि मलिका लोगों के ताने सुनकर बेहोश होते-होते बची।
वो संभल तो गई लेकिन जलसा खत्म होने तक वो आवाम को नफरत से देखती रही। यह जुलूस तो खत्म हो गया लेकिन अगले रोज पार्लियामेंट का इजलास हुआ जिसमें बादशाह ने तकरीर [संगीत] की। इस तकरीर में बादशाह ने ढके छुपे लफ्जों में आवाम पर बड़ी तनकीद की और कहा कि पुराने दौर और रिवायत को बदलकर तब्दीली की बात करने वाले गलत हैं। [संगीत] यह तकरीर थर्ड स्टेट के लोगों को पसंद नहीं आई। एक नुमाइंदे ने लिखा अब जंग
छिड़ गई है। फ्रांस में 1614 के बाद पहली बाकायदा पार्लियामेंट बनी थी। ये एक तारीखी वाकया था। लेकिन पार्लियामेंट के साथ एक कानूनी मसला था। वो यह कि जब तक पार्लियामेंट के तीनों हिस्से यानी पादरी, उमरा और थर्ड स्टेट मिलकर सेशन में हिस्सा ना लें तब तक पार्लियामेंट में कोई कानून पास नहीं हो सकता था। बादशाह ने इस कानून का फायदा उठाया और इसके इशारे पर पादरियों और उमरा दोनों ने ही पार्लियामेंट [संगीत]
के इजलास का बॉयकॉट कर दिया। अब थर्ड स्टेट वाले अकेले ही इजलास में जाते थे। लेकिन जाहिर है इस इजलास [संगीत] की कोई कानूनी हैसियत नहीं थी। यह पार्लियामेंट को रबर स्टैंप बनाने की एक और कोशिश थी। लेकिन इस बार आवाम खामोश नहीं बैठे। आवाम ने एक काम तो यह किया कि पार्लियामेंट के हर इजलास में खुद जाना शुरू कर दिया। असेंबली में [संगीत] सिर्फ थर्ड स्टेट के नुमाइंदे ही आते थे और हॉल के ऊपर बनी
गैलरियां खाली रहती थी। आवाम ने इन गैलरियों पर कब्जा जमा लिया। अब कम से कम 600 लोग रोजाना इजलास देखते थे। [संगीत] लेकिन ये लोग सिर्फ खामोश तमाशाई नहीं थे बल्कि वो इजलास में होने वाली हर बात पर खुलकर बात करते थे। जहां असेंबली का कोई रुकन आवाम के मफाद के खिलाफ बोलता तो आवाम इस पर वोटिंग करते और कत्ल की धमकियां देते। बल्कि थर्ड स्टेट में कोई भी फैसला होता तो गैलरी में बैठे आवाम भी जबरदस्ती
वोटिंग में हिस्सा लेते। कुछ ही दिनों में असेंबली अमली तौर पर आवाम की गुलाम बन गई। अब थर्ड स्टेट के नुमाइंदे भी अपनी मर्जी से कोई फैसला नहीं कर सकते थे और आवाम का हाल यह था कि वो थर्ड स्टेट के हक में नारे तो लगाते थे लेकिन थर्ड स्टेट भी अब इनकी मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकती थी। यानी इज़हार राय और अपोजिशन का बुनियादी हक जो जम्हूरियत की बुनियाद है वो खत्म हो गया था। यह बर्दाश्त वाली
जमूरियत नहीं बल्कि अदम बर्दाश्त वाले एक और तबके की डिक्टेटरशिप थी। असेंबली के अराकीन [संगीत] से आवाम का सुलक कैसा था? इसका अंदाजा सिर्फ इस मिसाल से लगाएं कि एक बार असेंबली के एक रुकन ने मेजॉरिटी के एक फैसले पर तनकीद की तो गैलरी से एक शख्स ने हॉल में छलांग लगाई और नुमाइंदे का गिरेबान पकड़ कर बोला अपनी जुबान बंद करो। इजलास के दौरान अगर आवाम को किसी पर शक
होता कि यह अमीर तबके की [संगीत] हिमायत कर रहा है तो वो इसका नाम पर्चियों पर लिख देते। फिर यह पर्चियां असेंबली के बाहर पालकियां उठाने वालों और हाथ रिक्शे खींचने वालों में तकसीम [संगीत] कर दी जाती। यह लोग सारे शहर में घूमते थे और जो मिलता इसे यह नाम बता देते। और इस तरह अक्सरियत से मुख्तलिफ राय रखने वाले आवामी नुमाइंदे को जिसे थर्ड स्टेट ही से मुंतखब किया गया होता था इसे एक ही दिन में पूरे
शहर में बदनाम कर दिया जाता। जिससे इसका [संगीत] जीना दो भर हो जाता। ये तो था थर्ड स्टेट का हाल यानी उन लोगों का जो पार्लियामेंट के इजलास में जा रहे थे। लेकिन जो नहीं जा रहे थे यानी पादरी और उमरा इनके खिलाफ आवाम ने गलियों बाजारों में जंग छेड़ दी थी। [संगीत] लोगों ने एक पादरी को सरेआम पैरों तले
कुचला। पुलिस के मुखबिर को फवारे के तालाब में गोते दिए गए। 25 जून को लोगों ने पेरिस के आर्च बिशप की बग्गी पर पथराव किया। ड्राइवर ने बग्गी भगाई और घर तक पहुंच गया। लेकिन पीछे आने वाले लोगों ने घर को घेरे में लेकर खिड़कियां दरवाजे तोड़ दिए और बिशप को मजबूर किया कि वो थर्ड स्टेट के नुमाइंदों का साथ देने की हामी भरे। बादशाह के एक सेक्रेटरी और वजीर के खिलाफ तो इतनी वोटिंग हुई कि वो
सेक्रेटरी साहब सदमे से ही वफात पा गए। बाद में आर्च बिशप को भी कत्ल कर दिया गया। [संगीत] यह सब तो जारी था। लेकिन जाहिर है पार्लियामेंट कानून साजी के बगैर ज्यादा देर नहीं चल सकती थी। इन हालात में भी थर्ड स्टेट के लोगों ने एक अनोखा फैसला किया जिसने फ्रांस की तारीख ही बदल डाली। वो फैसला यह था कि पादरियों और उमरा को आखिरी बार मुश्तका इजलास की दावत दी जाए और अगर वो इजलास में शरीक ना हो तो थर्ड