Fikr Nama | فکر نامہ · Transcript · · Updated
Fusus al-Hikam Part 2: The Wisdom Allah Gave Only to Prophet Seth | Ibn Arabi | Fikr Nama – Transcript
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Summary
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- शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि यह फर्क अता में नहीं बल्कि इस्तेदाद में है।
- अल्लाह की तरफ से जो अतियात हैं वो हम तक मुख्तलिफ तरीकों जैसे मांग कर, उमूमी दरख्वास्त और बगैर मांगे मिलना के जरिए पहुंचते हैं।
- इब्ने अरबी और दीगर सूफिया के नजदीक हम अपनी नियतों को खालिस करके और अपने आमाल में मुताबिकत पैदा करके अपनी इस्तेदाद को बेहतर बना सकते हैं।

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Transcript
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फर्ज करें आपके पास एक प्याला है। आप वो प्याला लेकर समंदर के पास जाएं। अब आप समंदर से कितना पानी ले सकेंगे? जितनी प्याले में गुंजाइश होगी। बिल्कुल इतना ही जितनी आपके प्याले की गुंजाइश है। समंदर तो आप जानते हैं लाहदूद है। जी। मगर आपकी वसूली [संगीत] किसने महदूद कर दी? आपके जर्फ ने, आपकी इस्तेदाद ने। फिक्रनामा में खुशामदीद। बिस्मिल्लाहिर्रहमा रहीम।
गुजस्ता नशिस्त में हमने बात की थी हजरत आदम अल सलाम की जो पहले फस यानी पहले नगीने के तौर पर जाने जाते हैं। जिनमें खुदाई हिकमत का पहला अक्स हमें नजर आया। जी बिल्कुल। और आज हम आगे बढ़ रहे हैं अगले फस की तरफ। आज हम हजरत शीस अलैहिस्सलाम की हिकमत को समझने की [संगीत] कोशिश करेंगे। इंशा्लाह।
लेकिन इससे पहले एक सवाल जो अक्सर जेहन में आता है वो यह कि आखिर ऐसा क्यों है कि अल्लाह ताला कुछ लोगों को बहुत नवाजता है और कुछ लोग काफी कोशिश के बावजूद भी मेहरूम से नजर आते हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है? यह यह बहुत बुनियादी सवाल है और शेख अकबर इबने अरबी रहमतुल्लाह अल इसका जवाब ना एक बड़े [संगीत] किलीदी नुक्त में देते हैं। वो फरमाते हैं कि यह फर्क अता में नहीं यानी देने में नहीं बल्कि
इस्तेदाद में है। इस्तेदा यानी काबिलियत या सलाहियत? जी बिल्कुल। [संगीत] यानी खुदा वही कुछ अता फरमाता है जिसे कबूल करने की अहलियत या सलाहियत पहले से इंसान के अंदर मौजूद हो। अच्छा। इसे आप यूं समझे जैसे एक आईना है। आईना क्या करता है? वो सिर्फ वही अक्स दिखाता है जो उसके सामने हो। [संगीत] सही। बिल्कुल इसी तरह अल्लाह की तजल्ली यानी उसका नूर, उसकी सिफात का ज़हूर वो भी सिर्फ
उसी दिल पर उतरता है जो उस खास तजल्ली को कुबूल करने के काबिल हो। अच्छा तो यह मामला देने वाले से ज्यादा लेने वाले की अपनी अंदरूनी कैफियत उसकी काबिलियत का है। बिल्कुल। इबने अरबी इसी नुक्त पर बहुत जोर देते हैं। वो कहते हैं कि इस्तेदाद ही असल तलब है। इसका मतलब यह है कि इंसान के अंदर जो कबूल करने की सलाहियत है, जो गुंजाइश है, असल में वही हकीकी मांग है। यानी हम जो चीज मांगते भी है ना जी।
वो भी इसीलिए मांगते हैं कि कहीं ना कहीं हमारे अंदर उसे कबूल करने की इ्तेदार पहले से मौजूद होती है। अच्छा। अगर हमारी अंदरूनी कैफियत, हमारी सलाहियत हमें उस खास चीज को मांगने पर आमादा ना करती तो हम वो खास दरख्वास्त करते ही नहीं। हम तो गोया हमारी तलब भी हमारी इस्तेदाद के ताबे हैं। यानी हमारी दुआएं, हमारी ख्वाहिशात वो भी एक तरह से हमारी अपनी अंदरूनी साख्त का
हमारी अहलियत का ही आईना है। जी हां, बड़ी हद तक ऐसा ही है। वसूल करने का इंसार [संगीत] देने वाले की फयाजी पर इतना नहीं जितना लेने वाले के जर्फ़ उसकी इस्तेदार पर है। इसे किसी मिसाल से समझा सकते?
जी। एक बहुत सादा मिसाल है। फर्ज करें आपके पास एक प्याला है। ठीक है। आप वो प्याला लेकर समंदर के पास जाएं। अब आप समंदर से कितना पानी ले सकेंगे? जितनी प्याले में गुंजाइश होगी। बिल्कुल इतना ही जितनी आपके प्याले की गुंजाइश है। समंदर तो आप जानते हैं लामहदूद है। जी। मगर आपकी वसूली किसने महदूद कर दी? आपके जर्फ ने, आपकी इस्तेदाद ने। वाकई इस मिसाल से तो बात बिल्कुल वाज़ हो
गई। तो क्या इसका मतलब यह है कि जो भी नेमतें हमें मिलती हैं या नहीं मिलती उन सबका ताल्लुक इसी इस्तदाद से जुड़ा हुआ है? यकीनन इबने अरबी के मुताबिक अल्लाह की तरफ से जो अतियात हैं, जो नेमतें हैं वो हम तक मुख्तलिफ तरीकों से पहुंचती हैं। लेकिन हर तरीके का जो बुनियादी ताल्लुक है ना वो इंसान के इस्तेदा से ही होता है। वो खासतौर पर तीन अहम रास्तों का जिक्र करते हैं। कौन से तीन रास्ते हैं वो और उनमें
इस्तेदाद का क्या किरदार है? देखें, पहला तरीका है मांग कर हासिल करना। यानी जब कोई शहरी तौर पर जानबूझकर [संगीत] एक खास चीज की दुआ करता है। मिसाल के तौर पर कोई कहता है ए रब मुझे सेहत अता फरमा। या ऐ अल्लाह मुझे फला नौकरी दिला दे। यह एक मखसूस स्पेसिफिक दरख्वास्त है। जी। लेकिन इब्न अरबी कहते हैं कि यहां भी गहरी बात यह है कि यह खास दुआ करने का ख्याल आना इसकी [संगीत] तौफीक मिलना। यह भी इंसान की उस वक्त की इस्तेदा और अंदरूनी
हालत की वजह से होता है। बातनी कैफियत ही उसे उस खास चीज की तरफ मुतवजे करती है और फिर मांगने पर उकसाती है। बिल्कुल। अच्छा दूसरा तरीका क्या है? दूसरा तरीका है उमूमी दरख्वास्त, जनरल रिक्वेस्ट। वो कैसे?
जब कोई शख्स किसी एक खास चीज का नाम नहीं लेता बल्कि यूं दुआ करता है। ए मेरे रब मुझे वो अता कर जो तू मेरे लिए बेहतर जानता है। जी हां ऐसी दुआ करते हैं? या जैसे मेरे तमाम मामलात में खैर बरकत डाल दे। यह उमूमी भलाई की तलब है। सही। अब इस तरह की दुआ करने की ख्वाहिश पैदा होना और यह सलाहियत होना कि इंसान अपनी मर्जी अल्लाह की मर्जी पर छोड़ दे। यह भी इंसान की [संगीत] बात जर्फ की आकासी करती है। यहां इंसान अपनी महदूद समझ के बजाय
अल्लाह की लामहदूद हिकमत पर भरोसा [संगीत] कर रहा होता है। और यह भरोसा करने की कैफियत भी असल में उसकी अपनी इस्तेदा का ही एक पहलू [संगीत] है। यह तो खुद को अल्लाह के सुपुर्द करने वाली बात हुई। अपनी मर्जी को उसकी मर्जी में गुम करना। इसमें यकीनन एक खास किस्म की इस्तेदा दरकार होगी। बिल्कुल। और तीसरा तरीका क्या कोई ऐसा रास्ता भी है जहां अल्फाज की जरूरत ही ना पड़े?
जी बिल्कुल। और यही तीसरा तरीका है। बगैर मांगे मिलना। यह वो अतियात हैं जो बगैर अल्फाज के सिर्फ इंसान के हाल यानी उसकी इस लम्हे की [संगीत] बात कैफियत उसकी अंदरूनी हालत या उसकी मजमुई इस्तेदाद की बुनियाद पर मिल जाते हैं। अच्छा ये तल्ब की सबसे पोशीदा सबसे गहरी किस्म है। [संगीत] इंसान जुबान से कुछ नहीं कह रहा होता। लेकिन उसका पूरा वजूद उसकी अंदरूनी कैफियत वो एक तरह से पुकार रही
होती है। एक खामोश दुआ बन जाती है। यानी हाल की दुआ जी हाल की दुआ। अल्लाह उस हाल के मुताबिक अता फरमाता है। इबने अरबी के नजदीक दर हकीकत दरखास्त तो हमेशा ही मौजूद होती है। चाहे वो जुबान से अदा हो या हाल से जाहिर हो या फिर इस्तेदाद की शक्ल में पोशीदा हो। हम और इस्तेदाद वो कहते हैं दरखास्त करने की सबसे ज्यादा मखफी और बुनियादी शक्ल है।
तो खुलासा यह हुआ कि चाहे हम कोई खास चीज मांगे या उमूमी खैर तलब करें या फिर जुबान से कुछ ना भी कहें। हर सूरत में जो कुछ हमें मिलता है उसका इनहिसार बुनियादी तौर पर हमारी अपनी अंदरूनी सलाहियत हमारी इस्तेदाद हमारे जर्फ पर ही है। बिल्कुल दुरुस्त आपने सही समझा और इसी गहरे नुक्त को [संगीत] इबने अरबी
रहमतुल्लाह अलह एक बहुत ही खूबसूरत और ताकतवर तशबीह से मजीद वाजे करते हैं। जी जिसका जिक्र हमने बिल्कुल शुरू में किया था आईने की मिसाल। जी जी वो आईने वाली बात इसे थोड़ा और खोलेंगे। क्या राज है इसमें?
वो फरमाते हैं आईना [संगीत] सिर्फ वही दिखाता है जो सामने हो। अल्लाह आपका आईना है और आप उसका आईना है। अल्लाहू अकबर। अल्लाह हमारा आईना और हम उसका आईना। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि जब अल्लाह की [संगीत] तजल्ली, उसका नूर या उसकी सिफात का जुहूर हम पर होता है तो हम उस तजल्ली में उस इलाही आईने में दरअसल अपनी ही सूरत देखते हैं।
यानी अपनी इस्तेदा, [संगीत] अपनी काबिलियत, अपनी हकीकत का अक्स। जैसे हम आईने में अपनी शक्ल देखते हैं। आईने को नहीं। सही। हम बराहेरास्त खुदा की जात को नहीं देखते बल्कि उसकी तजल्ली के आईने में अपनी [संगीत] इस्तेदाद के मुताबिक अपना आप पहचानते हैं। और यह कि हम अल्लाह का आईना है। उसका क्या मतलब हुआ?
हम अल्लाह का आईना इस तरह हैं [संगीत] कि अल्लाह अपने अस्माओ सिफात यानी अपने नामों और खूबियों को जैसे इल्म है, कुदरत है, रहमत है। जी। उनका जलवा हमारे वजूद में देखता [संगीत] है। हमारी जात, हमारी खूबियां, हमारी कमजोरियां, हमारी इ्तदाद यह सब अल्लाह के मुख्तलिफ नामों और सिफात [संगीत] के मजाहिर हैं। हम वो अपनी सिफात को हमारे जरिए इस दुनिया में जाहिर करता है। लेकिन यह जुहूर भी
हमारी इस्तेदा के मुताबिक ही होता है। यानी जिसका आईना जितना साफ होगा बिल्कुल। जिसका आईना [संगीत] जितना साफ, जितना बड़ा और जितना दुरुस्त जाविय पर होगा, उतना [संगीत] ही वाज़ और मुकम्मल अक्स उसमें नजर आएगा। तो हमारी इस्तदादी यह तायुन करती है कि अल्लाह की कौन सी सिफात हम में किस हद तक जाहिर होंगी। यह तो वाकई बहुत गहरा नुक्ता है। कायनात और इंसान का ताल्लुक एक बिल्कुल नए जाविए से
समझ में आता है। अच्छा इस सारी गुफ्तगू से खासतौर पर यह जो इ्तेदाद का मरकजी ख्याल है, हमारी रोजमर्रा जिंदगी के लिए क्या अमली रहनुमाई मिल सकती है। अगर कोई यह समझ ले कि असल चीज इ्तेदाद है, तो उसके लिए क्या असबाक हैं?
इस गहरी समझ से कम से कम दो बहुत अहम अमली नुक्कात हम अखज़ कर सकते हैं। जी। पहला नुक्ता तो इस सुरते हाल से मुतालिक है जब कोशिश नाकाम हो रही हो। यह तो बहुत आम मसला है। जी। अगर कोई शख्स मुसलसल मेहनत कर रहा है, दुआ भी मांग रहा है लेकिन उसे अपनी ख्वाहिश या कोशिश का फल नहीं मिल रहा तो बजाय मायूस होने या सिर्फ बैरूनी हालात को इल्जाम देने के। हम्।
उसे अपने अंदर झांकने की जरूरत है। इब्ने अरबी के नजरिए की रोशनी में उसे यह देखना चाहिए कि क्या उसकी अंदरूनी हालत, उसका हाल, उसकी इ्तेदाद, उस मांगी जाने वाली चीज के साथ हम आ-आंग है। मतलब?
मतलब, कहीं ऐसा तो नहीं कि वो जुबान से तो सब्र मांग रहा हो मगर अंदर से बेचैनी और गुस्से से भरा हुआ हो। सही। क्या इसका बात जर्फ उस नेमत को कबूल करने और संभालने के लिए तैयार भी है। अच्छा। जैसा कि कहा गया है इंसान [संगीत] अपनी जात के दरख्त से ही अपनी काश्त के फल जमा करता है। तो खुद शनासी अपने आप को समझना और अपनी दाखिली रुकावटों को पहचानना यह पहला कदम है।
यानी नाकामी की सूरत में अपनी अंदरूनी कैफियत [संगीत] और मांगी जाने वाली चीज के दरमियान तजाद को तलाश किया जाए। यह वाकई एक बहुत अमली नुक्त नजर है। और दूसरा नुक्ता क्या है? दूसरा नुक्ता बराए रास्त इसी से जुड़ा है। इ्तेदाद को कैसे बढ़ाया जाए?
जी यह तो अहम सवाल है। अगर मिलने का दारोमदार इ्तेदाद पर है तो यह सवाल फितरी है कि क्या हम अपनी इ्तेदाद को बेहतर बना सकते हैं? क्या इसे बढ़ाया जा सकता है? तो क्या जवाब है इसका? इब्ने अरबी और दीगर सूफिया के नजदीक जवाब हा में है। अगरचे इ्तेदाद का एक पहलू हमारी फितरत और तकदीर से [संगीत] जुड़ा है जिसे वो ऐन साबता कहते हैं। ऐन साबिता जी। यानी वो बुनियादी हकीकत जो अजल
[संगीत] से मुतयन है। लेकिन इसका एक काबिल जिक्र पहलू हमारे इरादे, हमारी कोशिश और हमारे अमल से ताल्लुक रखता है। यानी हमारे [संगीत] इख्तियार में भी है कुछ। जी हां। हम अपनी नियतों को खालिस करके अपने इल्म पर अमल करने की कोशिश करके अपने आमाल और एहवाल में मुताबिकत पैदा करके। यानी जो हम जानते हैं और जो हम करते हैं और जो हमारी अंदरूनी कैफियत है इनमें तजाद
ना हो। मुसलसल खुद एतसाबी यानी अपना मुहासबा करते रहना और अपने आप को अल्लाह की मर्जी के ताबे करने की मुखलिसाना कोशिश इन सब चीजों से हम अपनी बात हालत और इस्तेदार को बेहतर बना सकते हैं। तो जितना बाततिन पाकीजा होगा जितना हमारा बातिन पाकीजा होगा इल्म से रोशन होगा और अल्लाह की तरफ रागिब होगा उतनी ही हमारी इस्तेदाद में वसत पैदा
होगी। गोया खुद पर काम करना, अपने बातन को संवारना, इल्मो अमल में हम अहमंगी पैदा करना ही दरअसल अपनी इस्तेदा को बढ़ाने का रास्ता है। बिल्कुल। इब्ने अरबी के नजदीक यह वो इरफान है जो खासतौर पर खातमु रसूल यानी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम। और खातमुल औलिया यानी विलायत के सिलसिले को मुकम्मल करने वाली हस्ती उनसे ताल्लुक रखता है।